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कथा साहित्य

अनिता गोपेश

एक आसान ज़िन्दगी

एक साधारण मध्यमवर्गीय इंसान को ज़िन्दगी में क्या चाहिये. दो जून कि रोटी, सिर पर एक छत और तन पर ढकने को कपड़ा और थोड़ा सा प्यार... बस!! पर इतना भी मयस्सर नहीं होता उसे. दो जून रोटी का जुगाड़ कर लें किसी तरह, कपड़े हो ही जाते हैं, थोड़े अच्छे या थोड़े बुरे और छत भी जुटा ले कोई तो भी ज़िन्दगी की गाड़ी धचर-धचर ही चलती है. रफ़्तार पकड़ती ही नहीं. "ज़िन्दगी हर क़दम एक नयी जंग है" घर गृहस्थी के चक्कर में.

बन्धनों और ज़िम्मेदारियों से मुक्त रहने के लिए शादी नहीं की थी विधु ने - हर कोई कहता है "मस्ती की ज़िन्दगी"

साथ काम करने वाली सभी विवाहिताएँ हसरत से लम्बी साँस भरती और कन्धे पर धौल भर कर कहती हैं "तेरी तो मौज है --- न पति न बच्चे. न घर गृहस्थी के झंझट."
खीझ उठती विधु -- क्या सचमुच ही है ऐसा!! जैसा सोचा करती थी, अविवाहित ज़िन्दगी के बारे में जब पढ़ा करती थी तक्ष - वैसा तो बिल्कुल ही नहीं. सोचा हुआ, हुआ भी कहाँ -- माँ को घर गृहस्थी का बड़ा शौक --- बेटों से नाखुश रहती. विधु सोचती -नौकरी करेगी - घर पर एक नौकरानी रख देगी और माँ के हाथ में घर खर्च का पैसा - खुद बाहर-बाहर - साल भर में एक बार निकल जाया करेगी लम्बी यात्रा पर घूमने कभी पहाड़ तो कभी समुद्र तो कभी जंगल --. इसी दिशा में सारे प्रयास -- पर सारी तस्वीर बिगड़ गयी - माँ के अचानक गुज़र जाने से - पापा उनसे भी पहले - रह गई अकेली विधु!! दो छोटे भाई के सहित.

उसकी परेशानियाँ- अपनी अकेली औरत होने की अलग - साथ ही वो सारी भी जो किसी भी मध्यमवर्गीय इंसान को नचाए रखने के लिए काफ़ी होती है. बिजली, पानी, गैस और फ़ोन - कभी-कभी हंक पड़ती है विधु - ससुराल न किया विधु ने ये चीज़ें पाल ली. गनीमत है कि गाड़ी नहीं है - स्कूटर में तो सर्विसिंग का समय जितना खींच पाती है टाल जाती है. जब पनाह माँगने लगती है बेचारी तभी कराती है. विधु का बस चलता तो स्कूटर का झंझट भी न पालती - पर जितनी दौड़ भाग करनी पड़ती है उसे उसमें एक वाहन के बिना नहीं चलता - ऑफ़िस घर बाज़ार दोस्ती - नातेदारी उनके बीच कभी बिजली का बिल तो कभी पानी का, कभी गैस बुकिंग तो कभी फ़ोन की शिकायत. साथ ही इनकम टैक्स एसेसमेन्ट, उसका लेखा-जोखा और भुगतान. ऑफ़िस में दूसरी ओर से अधिक काम की जिम्मेदारी. अकेली जान है न - घर पर पति बच्चे जो नहीं इन्तज़ार में बैठे हैं जब कभी देर से रुकने या ऑफ़िशियल किसी काम से बाहर जाने की बात होती, सभी विवाहिताएँ एक स्वर से न सिर्फ अपना पल्ला झाड़ लेती - साहब को विधु का नाम भी सुझा देती. साथ ही विधु से भी कह देती - "तेरी बात फ़र्क है - तुझे तो किसी की जवाबदेही भी नहीं और घर की जिम्मेदारी भी नहीं. शुरु-शुरु में विधु बात के पीछे छिपे भाव को समझती नहीं थी - घूमने का उसे शौक भी था झट से चली जाया करती थी - पर धीरे-धीरे जब समझ में आने लगा तो उसने उस बात के विरोध स्वरूप ऑफ़िस में देर से रुक कर काम करने से इंकार करना शुरु किया. बाहर जाने के प्रस्ताव पर विफ़र ही जाती थी विधु. जवाब में तुरन्त कह दिया करती थी, "तुम लोगों का आधा कम करने का तुम्हारे पास 'पति' नाम का जीव है. पत्नी के प्रति ओवर-प्रोटेक्टिव होकर, चाहे सदय होकर, चाहे अपनी ड्यूटी समझकर कम से कम फ़ोन-बत्ती का बिल जमा करने या आरक्षण कराने जैसे काम तो कर ही देते हैं. मुझे तो ये सारे काम खुद करने पड़ते है." चपरासियों से काम कराने की आदत नहीं पड़ी है अभी विधु की. भाइयों से भी नहीं करा पाती - जब जब काम छोड़ती है उन पर - काम टलते-टलते आख़िरी तारीख भी निकल जाती है और अन्तत: उसे ही जाना पड़ता है - जमा कराने, सो कि बढ़ी हुई राशि के अलावा इसके पुरुषों की लाइन से महिलाओं की लाइन छोटी होती है. विधु के जाने पर कम समय लगता है. महिला होने का छोटा सा लाभ. - पर अकेली महिला होने का कोई लाभ नहीं - जो लोगों को दिखता है वह नहीं. पर सचमुच जो है, उससे विधु को इंकार नहीं अपनी जीवन की बागडोर अपने हाथ. इसीलिए समस्याओं से निपटती चलती है. "ज़िन्दगी हर क़दम एक नयी जंग है" की तर्ज़ पर.

एक स्थायी टेंशन बिजली के बिल की राशि का है. रहे रहे ही इतना ज़्यादा बिल आ जाता है. बरसों से परेशान है, विधु, पर ठीक होता ही नहीं हर बार यही होता है. बिजली का बिल आते ही झगड़ा शुरु हो जाता है घरा पर - "कौन कितनी बिजली वेस्ट करता है." कमरे से जाते समय किसने बत्ती बन्द नहीं की थी या पंखा चलता छोड़कर कौन चला जाता है. सर्वेन्ट क्वार्टर में मीटर लगवाने की बात उठ खड़ी होती है. जब तक सब चलता है ये सब जब तक बिल जमा नहीं हो जाता. बिल जमा होते ही फिर सारी स्थितियाँ ज्यों की त्यों हो जाती हैं. कुछ साल पहले एक बार कमर कसी थी विधु ने पता करके रहेंगे प्राब्लम कहाँ - मीटर में गड़बड़ी है - या कही. लीकेज है - बड़ी दौड़ भाग की थी बिजली घर में - निचले स्तर पर जब सुनवाई नहीं हुई तो तमतमाती हुई पहुँच गई थी सबसे बड़े साहब के कमरे में. साहब एक सुदर्शन से खुश मिजाज़ व्यक्ति. - विधु से बोले - "सबसे पहले तो आप बैठिए और एक गिलास ठण्डा पानी पीजिए - "चपरासी को आवाज़ दी थी उन्होंने - पानी के लिए. विधु का गुस्सा थोड़ा शान्त हुआ था - दूसरी तरफ़ का व्यक्ति कम से कम उसकी बात सुनने को तैयार तो है - समझेगा या नहीं तो बाद की बात है.
"आप बहुत गुस्से में लगती हैं. शान्त होकर मुझे इत्मीनान से बताइए क्या प्राब्लम है?" उन्होंने कमरे में भरी भीड़ को एक-एक कर निपटाया फिर विधु की ओर मुख़ातिब हुए - विधु ने सारे बिल दिखाए - और बताया कि खर्चने वाली यूनिट का कोई हिसाब ही नहीं है. कभी दो महीने में दो सौ सत्तर यूनिट होता है तो कभी दो महीने में ही पन्द्रह सौ यूनिट - जबकि स्थितियाँ वैसी ही हैं कोई अतिरिक्त खर्च भी नहीं है बिजली का और आजकल तो पावर कट भी होता रहता है रोज़ ही चार घण्टों का.. न ग़ीज़र है, न वॉशिंग मशीन. एयर कंडिशनर का तो सवाल ही नहीं... "गुप्ता जी ने सारी बात सुनी और कहा आप अभी तक सही जगह पर नहीं पहुँचीं थीं. "आप मेरे पास आ गयी हैं अब मैं सब ठीक करवा दूँगा." ब्रीफ़केस बन्द करते हुए पूछा आपके साथ कोई है?"

"हाँ, मेरा छोटा भाई है न?" विधु ने बताया.
"आप लोग कैसे हैं गुप्ता जी का मतलब "सवारी" से था.
"स्कूटर से आये हैं." विधु ने बोला. गुप्ता जी ने उठते हुए कहा - "आप में से कोई एक मेरे साथ कार पर आ जाए. मैं अभी चल रहा हूँ आपके घर. चलकर मीटर देखता हूँ और देखता हूँ क्या हो सकता है." गुप्ता जी को अन्दाज़ा नहीं रहा होगा कि विधु भी स्कूटर चला सकती है - उनके पास कार पर वरूण बैठने गया तो थोड़ा हतप्रत दिखे वे - "अरे आप? क्या मैडम स्कूटर ड्राइव करती हैं"

"जी", वरूण ने जवाब दिया. दरसल, उन्हें बाज़ार से कुछ सामान लेते हुए जाना है." विधु को कुछ और नहीं, नाश्ते का सामान लेना था. उसने सोचा शाम की चाय का समय हो गया है - गुप्ता जी खुद जा रहे हैं - मुआयने के लिए. कुछ नाश्ते का सामान लेती चले - रास्ते भर में गुप्ता जी ने पता कर लिया था कि विधु लोग भी उन्हीं की बिरादरी के हैं. दरसल विधु लोग अपने नाम के आगे "प्रकाश" ही लगाते थे, जिससे जाति का पता नहीं चलता था. बातचीत में वरूण से काफी दोस्ती गाँठ ली थी उन्होंने. घर आकर मीटर कम देखा - बोले - "हाँ कुछ स्पीड तो तेज़ लग रही है." और चाय और नाश्ते के समय बताया उन्होंने - मीटर तेज़ चल रहा है इस बात की जाँच आपलोग भी कर सकते हैं - "100 वाट का बल्व, दस घण्टे तक जलाइए और देखिए अगर मीटर एक यूनिट बनता है तो ठीक है - वरना तेज़ है." समोसा गरम था मुँह में आता तुरन्त बाहर निकाल हाथ में ले लिया. बोले दूसरा तरीका ये है कि "घर पर बिजली के सभी प्वाइंट बन्द कर दीजिए और फिर देखिए. अगर मीटर तब भी चल रहा है तो मीटर खराब है." विधु उनके इत्मीनान को देख थोड़ी अधीर होने लगी थी..." और अगर मीटर ही तो?" मीटर बदलवाना पड़ेगा. आप बिल्कुल निश्चिन्त रहिए - मैं जब तक इस सब स्टेशन पर हूँ आपका कोई काम रुकेगा नहीं. देखता हूँ क्या किया जा सकता है. आप बिल्कुल परेशान मत होइये. बातों बातों में ये भी बताया कि उन्हें विधु जैसी पढ़ी लिखी, तेज़-तर्रार महिलाएँ बहुत प्रभावित करती हैं. "मैं तो न सिर्फ ऑफ़िशियल, पारिवारिक सम्बन्ध भी बनाने की सोच रहा हूँ."

विधु चौंकी - ये कौन सा समीकरण हुआ. कहीं ये अविवाहित तो नहीं.. "ओ.. नो!!" मैं तो शादी शुदा हूँ मेरी पत्नी पी पी एस है - बाहर रहती है - पर आपके लिए मैं परिवार में कोई सुपात्र ढूँढ़ कर आपकी शादी कराऊँगा" राहत की साँस ली विधु ने. गनीमत है औरों की तरह उन्होंने भी छूटते ही शादी न करने की वजह नहीं पूछी. 'अउर ये भैया' -- वरूण की ओर इशारा करते हुए बोले - "इनकी शादी के लिए तो बहुत अच्छी लड़की है - मेरी निगाह में. समझ लीजिये कि आपकी ज़िन्दगी की हर प्राब्लम का हल है मेरे पास."

"फिलहाल तो मेरी बिजली की समस्या की बात करिए." विधु ने उन्हें वर्तमान मुद्दे पर लाने की कोशिश की."

"वो तो मीटर चेक होने के बाद ही होगा - अरे हाँ, किसी और आदमी से चेक मत करवाईयेगा - आपके मीटर की सील टूटी हुई है. किसी को पता लगा तो जुर्माना हो सकता है. इसका मतलब ये हो सकता है कि इसे टैम्पर किया गया है.

विधु की इन मशीनी चीज़ों में रुचि तनिक भी नहीं रही थी. उसने मीटर को आज तक कभी रुक कर देखा भी नहीं था - टैम्पर करने की तो बात ही क्या... और वरुण को तो उससे मतलब ही क्या. इस तरह की बातों से बहुत डरती थी विधु. "मैं तो जानती भी नहीं कि सील कहाँ कैसी होती है." विधु को अब लगने लगा कि ये सब चीज़ें भी जाननी समझनी चाहिए. वरना दूसरा आपका फ़ायदा उठा सकता है. उसके चेहरे पर हवाइयाँ उड़ने लगी थी शायद. उठते हुए आश्वस्त करते गये गुप्ता जी - अरे भी ऐसी घबराने की कोई बात नहीं है. मैं आदमी भेजकर ठीक करा दूँगा. बस बिजली घर के किसी और आदमी को दिखाईयेगा मत."

खीझ कर रह गयी विधु - यही होता है उसके साथ हमेशा, काम तो बनता नहीं - दूसरा बखेड़ा और खड़ा हो जाता है - अवांछित कोमल भाव का. अभी तो एक टेंशन सील टूटे मीटर का खड़ा हो गया. विधु को हर समय लगे कोई आयेगा और सील तोड़ने और बिजली की चोरी में अन्दर डाल देगा - परेशानी के इस हाल में ही उसे समाधान वरुण ने सुझाया - "मीटर की छेड़-छाड़ कोई किसलिए करता है - रीडिंग को घटाने के लिए... यहाँ हम तो बिजली के बहुत अधिक बिल के आने से ही परेशान हैं... हम क्यों फसेंगे." बात तर्कसंगत तज़्ग - एक प्राइवेट इलेक्ट्रीशियन को बुलाकर दिखाया - उसने कहा कहीं कुछ भी तो नहीं है. लीजिए और टाइट किए देते हैं. हँसकर रह गया वो... जो लोग मीटर को आगे पीछे करते हैं लग्गी लगाकर गलत तरीके से बिजली लेते हैं बिल्कुल नहीं डरते. आप पढ़े लिखे लोग बिना कुछ किए ही डरते रहते हैं." गुस्सा आया विधु को गुप्ता जी पर... "बेवजह डराकर चले गये" पर बेवजह नहीं डरा गये थे -- उसी के बहाने गाहे-बगाहे, वक़्त-बेवक़्त उनका आना चालू हो गया - उन्हें पता चल गया कि वरुण की ड्यूटी प्रेस में रात में होती है - और विकास शहर में अलग रहता है. शाम को प्राय: विधु, घर पर अकेली होती है. विधु की जान साँसत में... इतना पुरातनपंथी भी नहीं कि उनसे कह दे कि मैं जब अकेली घर में रहूँ आप न आया करें.. इतनी आधुनिक भी नहीं कि उनके साथ पूरी शाम अकेले गुजारने में उलझन न हो.. प्राय: उनकी कार को अन्दर घुसती देखते ही वो पीछे सर्वेन्ट क्वार्टर से रामदीन को बुला लाती - उससे कहती, "आँगन में बैठे रहना जब तक ये चले न जाएँ" --- और खाँसते रहना बीच-बीच में कि उन्हें लगे घर में कोई और भी है. विधु का तर्कशील दिमाग अकारण ही उन पर शक भी न करने दे और बिना किसी आधार के उनसे अभद्रता और अशिष्टता भी न करने दे. अपने इस अकेले जीवन में विधु हमेशा हर पुरुष को बहुत दूर तक 'बेनिफिट ऑफ़ डाउट" देती रही है - वह किसी की नीयत पर तब तक शक नहीं करती जब तक उसे कोई स्पष्ट करण न दिख जाए क्या पता ये उसका पूर्वाग्रह हो. इसीलिए गुप्ता जी आते रहे.. वो उन्हें और उनकी बातों को झेलती रही.. उनके बारे में वो जो जान पायी वो यही कि वे बहुत सुन्दर और समर्थ थे. कायदे से उन्हें उतनी ही सुन्दर बीबी मिलनी चाहिये थी. पर माँ बाप ने जिससे उनकी शादी करायी वो उनके लायक नहीं थी - उन्होंने सोचा सुन्दरता न सही शिक्षा सही. सो उन्होंने पत्नी को पढ़वाया - क़ाबिल बनवाया - अब वो एक अफ़सर है और प्राय: बाहर ही रहती है पर उनका अभी भी उनसे मेल नहीं खाता. बेटे दो हैं - म्स डॉक्टरी, एक इंजीनियरिंग कर रहा है. दोनों बाहर हैं."
विधु को सोचकर वितृष्णा हुई - अपना अकेलापन काटने में मेरे पास आते हैं... गोया कि मैं कोई मन बहलाने का साधन हूँ!! साफ़-साफ़ मना करना पड़ेगा इन्हें. अवसर स्वयं दे दिया था गुप्ताजी ने - एक शाम बड़ी चमकती दमकती नई कार लेकर आ पहुँचे - विधु से बोले "घर में बैठी रहती हैं हमेशा ऊब नहीं होती." मैं घर में रहती ही कितना हूँ. घर पर रहना मुझे अच्छा लगता है." बात काट दी थी विधु ने.
"पर कभी-कभी घूमना भी तो अच्छा लगता है."
"आपसे ये किसने कहा कि घूमती नहीं - खूब घूमती हूँ - जब मौका मिलता है तब घूमने निकल जाती हूँ."
मैं क्या जानूँ - मैं तो तब मानूँगा जब आप मेरे साथ चलेंगी. आज मैं नयी गाड़ी लाया हूँ - आइए आपको लाँग ड्राइव पर ले चलता हूँ." अपने अन्दर सिर उठाते गुस्से को रोक कर एक बार शालीनता से मना करने की कोशिश की "नहीं मुझे कुछ ज़रूरी काम निपटाने हैं. मैं नहीं जा पाऊँगी." "हमेशा अपने ही बारे में मत सोचा करिए. कभी-कभी दूसरों का दिल रखने के लिए भी कुछ करना पड़ता है." रोका हुआ गुस्सा बाँध तोड़कर निकल पड़ा "नहीं मुझे अपनी ज़िन्दगी को अपने दिल और दिमाग से जीने की आदत पड़ चुकी है." और साथ ही ये भी बता दूँ कि न तो मुझे गाड़ी का शौक है न ही मर्दों का आप इतने दिनों से बराबर मुझे गलत समझते आ रहे हैं."
"नहीं ऐसी बात तो नहीं है - मैं तो बल्कि आपकी बहुत इज़्ज़त करता हूँ" हक्लाने लगे थे गुप्ताजी मैं तो अपनी वाइफ़ को भी आपसे मिलाने लाने वाला था."
पर लाए नहीं कभी. रोज़ यहाँ आकर बैठ जाते हैं - बेवजह... आप लोग अकेली औरत को क्या समझते हैं? रास्ते में पड़ा कोई लावारिस सामान, जिसे जो चाहे, जैसे चाहे क्लेम कर ले!! मैं नहीं जानती आप क्या सोचते हैं और क्या समझते है. पर मैं एक बात बिल्कुल साफ़ कह दूँ अगली बार जब आईयेगा तो अपनी पत्नी को लेकर. वरना मत आईयेगा
विधु बदतमीजी से ड्राइंग रूम से अन्दर चली आयी थी और ज़ोर से आवाज़ दी थी नौकरानी को -
"मुन्नी. ड्राइंग रूम से सामान उठाओ और दरवाजा बन्द कर आओ.
गुप्ता जी कुछ कहना चाहते और कहने को कुछ न मिल पाने की ऊहापोह में थोड़ी देर खड़े रहे - शायद.
नई चमचमाती कार की सधी हुई आवाज़ थोड़ी देर बाद सुनाई पड़ी और बैक गेयर के साथ बजते "सारे जहाँ से अच्छा..." की धुन की दूर जाती आवाज़ से पता चला गुप्ता जी जा चुके थे.
बिजली का बिल वहीं का वहीं था. उसे चुपचाप भर देना ज़्यादा आसान लगता था विधु को.

© 2009 Anita Gopesh; Licensee Argalaa Magazine.

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