अर्गला

इक्कीसवीं सदी की जनसंवेदना एवं हिन्दी साहित्य की पत्रिका

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काव्य पल्लव

अंजु भटनागर

विरह की वेदनाएँ

दुख- भरे मन की कथाएँ!
हम विरह की वेदनाएँ!

शाख से बिछड़े 'सुमन' हैं
बाण-बींधे हिरन- मन हैं
आज रति- पति यूँ न तीखे
तीर रह- रह कर चलाएँ!

जो कली कोमल खिली है
क्रूर काँटों में पली है
उस कली जैसी हृदय में
हैं हमारी कामनाएँ!

बात किसकी कौन माना
कौन मन का मौन जाना
मूक- बधिरों की सभा में
क्या व्यथा अपनी सुनाएँ!

हैं अधर पर शुष्क प्यासें
टूटती उन्मुक्त साँसें
मृत्यु के निर्मम करों में
हम समर्पित- सी ध्वजाएँ!

दोहे सप्तक

चुभने वाले गर बनो, तो लो इतना जान!
काँटे कभी न छीनते, कलियों की मुस्कान!!

इस धरती पर नाचके, गाकर मेघ मल्हार!
नाम तुम्हारा लिख गई, प्रिय मदमस्त फुहार!!

बदले सभी मुहावरे, बदल गई हर रीत!
अधजल गगरी को मिली, छलकन पर भी जीत!!

अपनी- अपनी ढफलियाँ, अपने-अपने राग!
फिर हम कैसे खेलते, 'सुमन' प्रीति का फाग!!

कितने भी षड्यंत्र रच, होगी मेरी जीत!
वक्र दृष्टि के चक्र से, बोली भोली प्रीत!!

किसने जानी है यहाँ, भावुक मन की टीस!
मनोचिकित्सक माँगते, पहले अपनी फ़ीस!!

पाँवों में छाले पड़े, चलने से मजबूर!
पेड़ों की छाया कहीं, चली गयी है दूर!!

© 2009 Anju Bhatnagar; Licensee Argalaa Magazine.

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