अर्गला

इक्कीसवीं सदी की जनसंवेदना एवं हिन्दी साहित्य की पत्रिका

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काव्य पल्लव

मधु मित्तल

विश्वास तो देते

लहरों ने कहा जल से
अम्बर ने कहा थल से
हम फिर भी मिलेंगे
हम को आस तो दे देते

कल का है पता किसको
पल की ख़बर नहीं है
टूटे जो डाल से
फिर जी सकेंगे कैसे

क्षण भंगुर जीवन में
कुछ भी ख़बर नहीं
पल में खुशी का मौसम
गम में बदलता जैसे

लेकर मन में आशा
जीते हैं खुशी से
कल क्या होगा जग में
अहसास तो देते

कोहरे के घने बादल
आकाश में है तो क्या
छट जायेंगे ये सब
तुम साथ तो देते

करें प्यार की पूजा
खिलें फूल बन जग में
चले साथ जीवन में
विश्वास तो देते.

मेरे देश में

मेरे देश को न जाने ये,
किसकी नज़र लगी
सोने की चिड़िया कहते थे,
चिड़िया कहाँ गई

दूध दही की नदियाँ बहती,
वह भी सुख गई
बच्चे अब हैं दूध को तरसे,
गईया रूठ गई

यहाँ की धरती सोना उगले,
वह भी बदल गई
ईंट पत्थरों के मकान बनें,
कृषि भूमि कम हुई

करना चाहता न कोई खेती,
न गईया पालन
बाबू बनकर काम करे न,
ऐसा यहाँ चलन

ये अदालत ऐसी चलती,
काम न कोई होता
इंसाफ़ की आँखों बँधी है पट्टी,
हर कोई बैठा रोता

ये गद्दारों की भरमारी,
समझ न कोई पाये
दुश्मन सिर पर डटा खड़ा है,
निर्णय न हो पाये.

© 2009 Madhu Mittal; Licensee Argalaa Magazine.

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