अर्गला

इक्कीसवीं सदी की जनसंवेदना एवं हिन्दी साहित्य की पत्रिका

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गीत माधुर्य

मीरा शलभ

मैं सूरज के रथ में

लौटो अपने नगर पिया जी, मैं बैठी हूं पथ में
तुम ठहरे पीपल की छैयाँ, मैं सूरज के रथ में

सजल प्रतीक्षा बन उर्मिल, दहे विरहा में तिल-तिल
साध अधूरी चित्र हैं धूमिल, चौदह पल भी बोझिल
यों तड़पूँ ज्यों जल बिन मछरी, जीने के स्वारथ में
तुम ठहरे पीपल की छैयाँ, मैं सूरज के रथ में

मधु श्रतु संताप रही बुन, सुन कर पतझारी रूदन
सूना पनघट टूटा है मन, कहाँ गये मधुसूदन
संशय की बेलायें बोलीं, गरूण न भटका हो पथ में
तुम ठहरे पीपल की छैयाँ, मैं सूरज के रथ में

सुधि देश जगी कहानी, एक राजा एक थी रानी
मृगतृषित भटका अज्ञानी, माटी में मिल गयी रानी
मेरा भाग्य-चक्र न जुड़ जाये, कहीं उसी कथारथ में
तुम ठहरे पीपल की छैयाँ, मैं सूरज के रथ में

तुझ पर बोझिल हो जायेगी

यदि! सीमाओं से अधिक बढ़ी, जो तेरे मन की प्यास
तुझ पर बोझिल हो जायेगी, हर आती जाती साँस

मन को साध कर रखना हो तो, है बहुत बड़ी तपस्या
वरना पूर्णमासी में भी, छा जाती है अमावष्या
हालत ऐसी हो जाती है, ज्यों हिरनी के पगफांस
तुझ पर बोझिल हो जायेगी, हर आती जाती सांस

सारा जीवन ऐसे बीते, ज्यों भरा कलश हो रीता
ना भाये सांसारिक बातें, न रामायण गीता
तब जल में प्यासी मीन सा, अंतर में भरता अहसास
तुझ पर बोझिल हो जायेगी, हर आती जाती सांस

मन कुम्हार की माटी, चाहे जीस सांचे में ढालो
सो!जितना तापोगे अग्नि में, उतना ही दृढ़ बना लो
फिर गहन कठिन पलों में भी, ये भरे न अतृप्त उच्छवास
तुझ पर बोझिल हो जायेगी, हर आती जाती सांस

© 2009 Meera Shalabh; Licensee Argalaa Magazine.

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