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इक्कीसवीं सदी की जनसंवेदना एवं हिन्दी साहित्य की पत्रिका

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कथा साहित्य

नीलम शंकर

मरदमारन

बहुत सारी ख़बरों के बीच सलोनी की आत्महत्या की ख़बर ने उसे एकदम से झकझोर दिया था. मज़बूत मगन दिखने वाली ने पलायन का रास्ता चुन लिया था. फागुन के महीने में भी कोई अपनी जान देता है, जब सारा नगर, देश संसार प्रेम में मगन रहता हो, तो उसे दुनिया छोड़ने का विचार मन में कैसे आ गया? एक सलोनी ही नहीं थी जो मदनोत्सव की परवाह किए बगैर अपनों और अपने जायों को छोड़कर चली गयी थी. ख़बरों की मानें तो ढेरों सलोनियाँ-मलोनियाँ उत्सवों की परवाह किए बगैर इस संसार से कूच कर जाती हैं.

"बेचारी!! आख़िर मर ही गई. दो-दो बच्चों का भी ख़्याल नहीं किया. अब तक अपने तई ज़िन्दा रही, मरी भी तो अपने लिए. क्या किसी को ले गयी? नही. न, चार दिन में सभी भूल-भाल जायेंगे, हर मुँह से लगभग ऐसी ही बातें निकल रही थी.

प्रतिदिन का न भी लें, हफ़्तावर ही लें तो भी हर सप्ताह आने वाली ख़बरों के अनवरत क्रम में इस हफ़्ते भी कई महिलाओं की मौत की ख़बरें छपी थी. कोई दहेज की अपूर्ण मांग के लिए जला दी जा रही थी, कोई बलात्कार का शिकार हो रही थी (जो मरे के समान है) कोई आत्महत्या कर रही थी. कुछ योग्य पत्नियों से कुंठित हो उन्हें मौत की नींद सुला दे रहे. कुछेक अपवादों को छोड़ दें तो इसमें कही. पड़ोसी-परिवार की भूमिका रहती ही रहती है. इस भूमिका का दायरा इतना विशाल और निर्वहन इतना अचेतन है कि अब हम लोग इसे सामान्य-जीवन का हिस्सा माने ले रहे हैं. बल्कि यूँ कहें मक्खी-मच्छर की भाँति उनका मरना सामान्य सी और ज़रूरी बात होती जा रही है. हर हाल में औरतों के अस्तित्व पर संकट मंडराता रहता है.

सलोनी का मरना सामान्य बात नहीं थी. उसे कुछ खास-खास सीन दिन पे ज़्यादा ठक-ठक कर रहे हैं उसके घर से एक फ़र्लांग पर उठाऊ चट्टा था. वहाँ वह अपने पति की मरज़ी के खिलाफ़ दूध लेने जाया करती थी. इस गरज़ के साथ कि सही दूध के साथ-साथ महिलाओं से मेल-मुलाक़ात का सिलसिला बना रहेगा. जो कि उस मुहल्ले में एक दूसरे के घर आवा-जाही का प्रचलन कम ही था सो महिलाएँ उसके घर कम ही आती-जाती थीं. उसके पति को लगता औरतों के बीच मेरी बीबी उठेगी-बैठेगी तो मेरे कस-बस में नहीं रहेगी. वह कहता, 'पन्नी वाला दूध (पराग) भी जब वही भाव है तो फिर क्यों दूध के बहाने पंचायत-पंचौरा करती हो.' और पता नहीं वह क्या-क्या बोलता था. उसका मुँह तब तक बन्द नहीं होता था जब तक वह पलट कर 'आँखों देखा दूध लिती हूँ, थोड़ा बोला-बतिया लेती हूँ तो तुम्हारी क्यों सुलगती है.' इतना न बोल देती. सलोनी की तुरन्त प्रतिक्रिया पर वह आग-बबूला हो उठता था. उतने पर तो आपसी चटका-चटकी तय थी. मतलब माँ-बहन शुरू कर देता था. 'तेरी ऐसी की तैसी'. हाथ-पैर पटक-झटक सामान इधर उछालता उधर गिराता.

ऐसा उसके घर आए दिन होता रहता था. और वह इस रोज़ की झौं-झौं से अपने-आपको तनाव में नहीं आने देती थी. ऐसा नहीं कि उसने आसानी से तनाव पर विजय पायी हो, वह काफ़ी प्रयासों-अभ्यासों के बाद ही ऐसा कर पायी थी. उसके प्रयासों में शामिल था, जो उसके घर में अठारह-बीस गमले थे उनकी नियमित देखभाल करना, कोने-अतरों की भी डस्तिंग करना. और तो और वह प्राणायाम के रोज़ के अभ्यास से काफी कुछ तनाव मुक्त हो जाती थी. यह एक अजीब सा गँवई चलन शहर का भी सामाजिक नियम बन गया कि बहू चाहे किसी के भी घर की हो परन्तु मोहल्ले की सभी महिलाएँ उम्र के अनुसार ननद-सास जेठानि की पदवी में स्वत: आसीन हो जाती हैं. मुहल्ले में कई संयुक्त परिवार थे. लगभग उन सभी के घरों में बहुएँ थीं, परन्तु सलोनी का रख-रखाव खांटी बहू जैसा नहीं था. इसीलिए लोगों की उसके बारे में मिश्रित राय थी.

वैसे वह भी यह मान चुकी थी कि मुहल्ला ससुराल ही होता है. लेकिन वह मुहल्ले से बाहर निकली नहीं कि नख से शिख तक अप-टू-डेट हो जाती थी. वह खूबसूरत तो थी ही, उसका बनाव-ठनाव ऐसा, जैसे वह किसी महानगर की वर्किंग वूमन मालूम पड़ती थी. ऐसा नहीं कि वह स्वयं में ही फिटफाट रहती थी, अपने इर्द-गिर्द महिलाओं-लड़कियों में भी दुरुस्त रहने के फिटनेस टिप्स देती और साथ ही उदासीन लोगों में रुचि भी पैदा करती थी. उसकी यही सब सुघड़ता, शालीनता और खूबसूरती उसे याद आ रही थी. मुहल्ले मेंहर किसी के साथ उसकी दुआ बन्दगी नहीं थी, कुछ खास-खास लोग थे, उसकी सोच के दायरे में जो फिट बैठते थे.

परन्तु वहीं पीठ पीछे कुछ दकियानूस प्रपंची महिलाओं की रय इसके उलट थी, क्योंकि उसने प्रेम और अन्तर्जातीय विवाह किया था. बल्कि जब किसी को उस पर गुस्सा आता तोवही लोग उसे 'अरे भगोड़ी है, भाग कर आयी है' जैसा कुछ बोलते थे, पर पीठ पीछे ही (पपुआ का खौफ़ जो था). इसीलिए इस कर्नी (प्रेम विवाह) से उसका रूप-बद्रूप और गुण-दुर्गुण में बदला गया था. उसका पति पपुआ भी कुछ-कुछ ऐसा ही सोचने लग गया था 'जब यह हमसे प्रेम कर माँ, घर परिवार को किनारे कर मेरे साथ भाग सकती है तो किसी के भी साथ...? क्या मैं बेवकूफ़ बना...? क्या ठगा गया...?' अपने आपसे यह प्रश्न उस घड़ी ज़रूर दोहराता, जब वह उसके किसी मित्र से सहज ढंग से बोल बतिया लेती थी. उसके उलट सलोनी की सोच थी, जब बिन पिता-काका के पति ढूँढ़ा है तो जो भी है सब ठीक है. कम से कम रंडुओं-लोफ़रों से तो बची रहूँगी.

गैर जिम्मेदारी की पराकाष्ठा को पार करता पपुअ. जिम्मेदारी की दोनों-दिन सीढ़ियाँ चढ़ती सलोनी. सलोनी का काम करते-करते मारे थकान के शाम तक बदन टूटने लगता. और पपुआ का, इतना आराम कि आराम की अधिका के मारे देह में चटकन होने लगती. दोनों विपरीत दिशा में जाते हुए. पति-पत्नी दोनों के ही अपने-अपने अनुमान-आग्रह थे, परन्तु दोनों एक-दूसरे पर खरे नहीं उतर रहे थे. इसी वजह्से आए दिन आपसी मन-मुटाव कलह में तब्दील हो जातथा. जो कमरे-आँगन से निकल सड़क-पड़ोस तक जा पहुँचता था. ज़ोर-ज़ोर से चीखने-चिल्लाने की आवाज़ें पपुआ की ही आती थी, परन्तु दोषी ठहराई जाती थी सलोनी. 'अरे वही लुकारी लगाती होगी, खुद तो मेऊ-मेऊ बिलती है, पपुआ को चिंघाड़ के आगे कहाँ से ओकर आवाज़ सुनाई पड़ी.' यह किसी एक खास पड़ोसी की सोच थी जो फैलते-फैलाते सब की हो गयी थी. पपुआ की गालियों में रिसर्च करती आवाज़ कान में पड़ी नहीं कि अड़ोस-पड़ोस की बुढ़ीवें अपने घर से ही बड़बड़ाना शुरू कर देती थीं, "ई ओढ़री (भगाई हुयी) मेहरारू पर तो गालियों का भी असर नहीं है, न खुद चैन से रही न केहू के रहे देई. आपन नान्ह-नान्ह नाति-नतेरुवा लेके कहाँ जाई. ई मुहल्ला गन्धाय दिहिस. मरदे को तो कोंछा में बाँध के रखे है. कुल काम अपनेन मने से करेले." प्रचलित नियम-नियमान्तरों के विपरीत यह सारे मत-मन्तव्य उस बुढ़िया के नहीं थे जो उसकी सास थी. पपुआ से खीझी थी उसकी माँ, उसके अन्य भाई. उसे कुछ राह पर ले आ पाई थी तो सलोनी ही. अपने उस व्यवहार से जिसको समाज त्रिया चरित्र कहता है. उसकी सास मुहल्ले में थोड़ा बहुत उठती-बैठती ज़रूर थी उसी वॉकर के सहारे. आपसी बतकही में सलोनी की प्रशंसा-प्रासंगिकता का ज़िक्र करना नहीं भूलती थी.

सलोनी की शादी के सात वर्ष दो बच्चों के साथ इसी तरह रोते-धोते, लड़ते-झगड़ते गुज़र गये थे. ऐसा नहीं इन वर्षों में उसे घर और पपुआ को छोड़ने का ख़्याल मन में नहीं आया अनगिनत बार आया. कभी-कभी तो घड़ी-घंटा बीतते न बीतते आ जाता घर छोड़ने का मन. परन्तु कुछ था, कोई डोर थी जिसकी सहारे वह बँधी थी. उसे याद आता वह कैसी-कैसी मुसीबतों से पार पाते हुए इण्टर तक पढ़ाई कर पायी थी. रस्ते की छेड़खानियाँ. लगता जैसे लड़के अपना दिल हथेली पर लिए उसी को सौंपने की फिराक में हों. तेज़ाब से चेहरा खरब करने की धमकियाँ. तन्हाई के क्षणों में मिले अच्छे दिनों के प्रेम-प्रपोजल्स उसे ढीला कर देते थे. बचा-खुचा तनाव उसके दो मासूम बेटी-बेटा फलश कर देते थे. इतने दिनों में उसने एक कठिन काम को अंजाम दिया था. पपुआ (पति) को राह पर लाने की कोशिश की थी. बहुत कारी चिन्हित-अचिन्हित नीतियाँ अपनाकर. सलोनी की इस करनी से पड़ोसियों-सगोतियों को ही राहत मिलती थी पर सलोनी की तो मुसीबतें ही बढ़ी थीं शायद ही कोई ऐसा होगा जो पपुआ की ठगी-धोखा से बचा हो और यही उसकी आमदनी भी (चाहे धन्धा कहो) थी. यह सारी बातें आवेश में या फ़ुरसत में बुढ़ीवें अपनी बहुओं को और बहुएँ अपने पतियों को कथ्यात्मक ढंग से सुनाया करती थी. वैसे मुहल्ला हर मायने में ठीक था पर दूसरे के जीवन में ताका-झाँकी जैसी प्रवृत्ति प्राणहीन नहीं हुई थी. और प्रगतिशीलता तो उस स्तर पर भी नहीं पहुँची थी. जहाँ प्रेमविवाह जैसी बातें बेमानी हो जाती हों या किसी औरत का मर्दाने ढंग से काम करना. भारी-भरकम कामों में भी किसी पुरुष को न ताकना.

एक ही मुहल्ले में रहते हुए पड़ोसी विवेक का सलोनी से आमना-सामना कम ही हुआ था. परन्तु घर में पड़ोसी-पोथा खुलने-बांछने से सलोनी के बारे में बहुत कुछ जान गया था बल्कि यूँ कहें सलोनी के 'पौरुष' से कुछ-कुछ प्रभावित भी होने लगा था. सलोनी से सम्बन्धित बातें सुनने में उसे रुचि भी आने लगी थी. तभी तो उसकी मौत की ख़बर से वह अचम्भित-आहत दोनों ही हुआ था. उसके प्रति किस-किस पुरुष के मन में प्रेम का अंकुर फूटा यह तो खोज का विषय था.

पपुआ के घर के सामने कई-कई टुकड़ों में लोग जमा थे. लोगों के चेहरों को वह अपने मोहारे से भलीभाँति देख पा रहा था. उसका घर इतना पास भी नहीं था कि लोगों की अस्फुट आवज़ें स्पष्ट सुनाई देती. आती कई आवाज़ों की एक लड़ी पकड़ने से यह पक्का विश्वास हो गया था कि पपुआ की बीबी (सलोनी) ने ही फाँसी लगाई.

पड़ोसी के यहाँ आपकी आवा-जाही न भी हो तो तब भी एक रिश्ता-धर्म स्वत: कायम होजाता है. उसने वक्ती तौर पर कौन सा रिश्ता कायम किया यह तो वह जाने. परन्तु उसके दुआरे जाकर मातम्पुर्सी करने के लिए मन विकल रहा था. वह कभी अन्दर जाता कभी बाहर कुछ-कुछ बेचैन सा हो रहा था. उसकी पत्नी ने चुटकी ली, 'तुम तो ऐसे तड़फड़ा रहे हो जैसी तुम्हारी ही सगी बहिन-बिटिया गले में फन्दा अटका ली हो.' गुस्से के मारे उसके कान की लवे सुर्ख देख उसकी पत्नी को तुरन्त अपनी ताना-मारन भाषा का अहसास हो गया था. पड़ोस में गमी और घर में गर्मा-गर्मी न हो झट वह सिफलाने (फुसलाने) भी लगी थी, तुम्हारे वहाँ जाने से क्या वह लौट आएगी. अरे उसके दुआरे सभी लोफर-लफाड़िये ही तो इकट्ठा हैं एक्कौ क़ायदे का आदमी नहीं है.' उसने एक्कौ को बहुत ज़ोर देकर कहा था. वह नहीं चाहती थी कि ऐसी दागदार मातमपुर्सी में उसका अदुनियावी पति जाए. पर उस वक्त वह अपनी पत्नी से उलझने के मन: स्थिति में नहीं था. वह था भी अजीब किस्म का जीव. एक तो जल्दी-जल्दा गमी में जता नहि.., यदि वह ठेले-ठाले गया तो भी तो एक्दम गुमसुम, न सान्त्वना, न सलाह. ऐसा नहीं कि उसकी संवेदन्शीलता में कोई खोट थी. बस उसका व्यवहार किंकर्तव्यविमूढ़ सा था. उस वक्त उसके आँख-कान दो की जगह चार हो जाते. उन दो अदृश्य आँखों से वह वहाँ मौज़ूद चेहरों की मन: स्थिति पढ़ता और कानों से भिन्न-भिन्न गुटों के मध्य होने वाले गल्प को सुनता.

पपुआ के दुआरे सैकड़ा भर भीड़ में स्त्री और पुरुष दोनों ही थे. पुरुषों में तो हर वय की मौज़ूदगी थी परन्तु महिलाओं में एक दो को छोड़कर ज्यादातर उम्रदराज थीं जिन्हें घर के कामों में कोई दिलचस्पी नहीं थी. वहाँ कई गोलबन्दी थी. वह रह-रह कर हर गोल में जा खड़ा होता. कहीं खुसुर-फुसुर होती कहीं से किस्म-किस्म के औरतों की लाचारगी के किस्से सुने-सुनाये जा रहे होते. जब कभी वह बोला होता तब न वहाँ कुछ बोलता-बतियाता. जो सुन रहा था वह उसको उद्वेलित कर रहा था. "वह मरदमारन मेहरारू थी" पहली बार यह शब्द उसने अपनी पत्नी के मुँह से सुना था दोबारा यहाँ सुन रहा था. तब उसने अपनी पत्नी को ही गँवार मान उसी की दिमाग की गढ़न-उपज माना था. परन्तु अब वह इस शब्द को हल्के में नहीं ले पा रहा था.

वहाँ मौज़ूद एक बुढ़िया रह-रह कर कोसती 'मरदमारन मेहरारू सही होलिन'. फिर कुछ देर बाद किसी और के मुँह से निकलता 'उनका हश्र ऐसे ही होता है.'

सलोनी ने अपारम्परिक विवाह किया था पर वह प्रव्रित्ति से थी घोर पारम्परिक. वह अपनी माई-ताई के तरह ही अपना जीवन गुज़ारना चाहती थी. हर किसी का अपना चाहा कहाँ होता है? उसका भी नहीं हुआ था. पहले झटके नें ही उसे झकझोर कर रख दिया था जब जाना कि पति (पपुआ) का कोई बिजनेस-विजनेस नहीं, नटवरगीरी ही उसकी जीविका है. ऐसा धन्धा शुरुआती दौर में परिचितों में ही पनपता है. वही इसकी गिरफ्त में भी आते हैं पपुआ ने भी वही किया था.

ऐसा नहीं कि वह अपढ़ था, इण्टर पास था. नौकरी की खातिर ही फिटर-टर्नर से आई0टी0ाई0 का व्यावसायिक कोर्स भी किया था. किसी की सरपरस्ती होती या वह स्वयं ही संघर्षशील होता तो कहीं क्लास थ्री या फ़ोर में लग ही जाता. परन्तु ऐसा न हो सका था. बदलते खराब वक्त में बी0टेक पास बेरोज़गारी कई लाइन में खड़े हैं तो आई0टी0ाई पास की कहाँ पूछ होती. बिना प्रेम के दिनों में उसने नौकरी के लिए हाथ - पैर मारा था, मिली थी चार चक्का (फ़ोर व्हीलर) की क्लीनरी. अपने आपको जूनियर इंजीनियर मानने वाला इसे करता? आ गया था उस लाइन में जहाँ से उसके पप्पू से पपुआ बनने की शुरूआत हो गयी थी.

मुँह चलाकर बिना पसीना बहाए, पीठ अकड़ाए जिसे पैसा कमाने की लत पड़ जाए वह क्यों इस धन्धे को छोड़ेगा? इतनी सरलता से यह भेद सलोनी पर नहीं खुला था. उसे पपुआ की स.दिग्ध कार्स्तानियों से शक तो बहुत पहले से ही होने लगा था. बिना पुख्ता आधार के कैसे उस पर आरोप लगाती. किसी एक दिन चट्टे पर जाने से दबे मुँह बातें उसके कानों पर पड़ी थीं. "सुन्नर मेहर केढ़ेर ठसका के चलते अब ऊ सुधरी? जेकर लोला (जीभ) चलाए के कमाई हो जाए ऊ काहे आपन चूतर-एड़ी घिसी." वह समझ गई थी किसे निशाना बनाकर किसको सुनाया जा रहा था. पर बिना प्रमाण के वह किससे तर्क-वितर्क करती-सफ़ाई देती. जब अपने में ही खोट हो तो कैसे अकड़े और किसके दम पर चले-बहसे.

लेकिन उसने ऐसी ही इतनी बातों पर दूध लेने जाना तो नहीं ही छोड़ा, इसके उलट वह विनम्र बहू होने के सलीके अपनाती जा रही थी. उसे अब यकीन हो चला था यह सारे ताने-कटाक्ष पपुआ के बहाने से उसे सुनाए जा रहे थे. कब तक कोईढ़की जुबान से उलाहना देता.

पीड़ितों की शिकायत चरम पर थी. अनियमित होता क्रोध अब अपरोक्ष शिकायती रूप में नहीं परोक्ष चेतावनी के रूप में सामने आने लगा था, 'अपने खसम से कहो जौन चूतिया बनाए के पैसा एंठे हा न हमार, सीधे-सीधे लौटाए दे, नाहीं तो हमार बेटवा-मरद (हात के इशारे से) हलक में ई हाथ जाई पेटे से पैसा निकर लेईहैं.' अब उसे लगभग ऐसी ही भद्दी धमकियाँ सुनने को मिल जाया करती थीं. क्या सलोनी इतनी सीधी थी कि यह सब सुनने के बावज़ूद चुप लगाए रखति. नहीं ऐसा नहीं था. वह अपने को बड़ी ही मशक्कत से नियंत्रण में रखती, 'जिसे दिया है उससे उगाहिए. मुझसे कहने से आपको कोई फ़ायदा न होगा.' अपमान की चरम अनुभूति के बावज़ूद वह अपनी बोली-भाषा को नियन्त्रित ही रखती. 'वही बात दो-दो बच्चे, अपंग विधवा सास और स्वयं अपना' उसके पास और किसका बल था जो मुखरता दिखाती. अपमानित सलोनी घर पर किससे कहती, पेन्शनर विधवा सास से? जो पहले ही बेटे की आवारगियों से आजिज आ पल्ला झाड़ चुकी थी. खाना-खर्चा तो नहीं, पर जोर-जांगर से वह बहू पर आश्रित होती जा रही थी. बाकि उसके पास स्त्री आत्मा जैसी भी कोई चीज़ थी. नहीं तो कहाँ सासें बहुओं की तरफ़दारी करती हैं

जब भी पपुआ से वह दरियाफ़्त करती, बात पूच-पुछ्व्वल से शुरू होती, फिर चटका-चटकी से होती हुयी झगड़ा मार-पिटाई पर ही ख़त्म होती थी. जब-जब सलोनी का अपमान का घड़ा भरता, उड़ेलती पपुआ के ही आगे. अपमानित होने का कारण भी तो वही था तो अपमान का घड़ा भी तो उसी के आगे फूटेगा. फिर वही, जो होता आया था. अब तो वह छुट्टा साँड़ के माफ़िक हो चला था. मतलब हर समय नंगई पर उतारू रहता. किसी की कोई भी लगाम उसके नाउ की नहीं थी.

कुंठित पपुआ पन्नि चढ़ाता. ज्यादा चढ़ जाती तो पसरे-पसरे बड़बड़ाता गरियाता. जब कम चढ़ी होती तो वह उस वक्त अपने आपको महाबली समझने लगता. उसका ताण्डव सामानों के तोड़-फोड़ से शुरू होता जा पहुँचता उसके कपड़े फाड़ने और घूँसा जमाने पर. कुछ नहीं तो उसके कपड़े फाड़ घूँसा भी जमा देता. कभी अचकचाहट में उसके बालों को खींच लेता. जब तक वह पलटवार की सोचती तब तक वह अपनी मोटर साइकिल से यह जा वह जा. वह तब लौटता जब उसका क्रोध तरल हो चुका होता. जीवन की आवश्यक सुविधाओं का अभाव मनुष्य को अधिक दिनों तक मनुश्य नहीं बने रहने देता. पपुआ भी अब ऐसी विकृतियों की गिरफ़्त में था. अमनुष्यता कीढ़ेरों घटनाओं पर अधिकार जमा लिया था.

अमूमन स्त्रियाँ जिम्मेदार होती हैं यदि माँ के ओहदे तक पहुँची हो तो जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है. उसको खाय जा रहा था, बाल्यावस्था तक पहुंचे दोनों बच्चों का उत्तरदायित्व. उन्हेंकैसे शिक्षा संस्कार दें इस किचकिच, आर्थिक अभाव वाले माहौल में कदम-कदम पर पैसे की नितान्त कमी की टकराहट होती रहती. कितने दिन सास भरे घड़े में हाथ डालती और कुछ कुछ हाथ आ जाता.

कई दिनों तक उसने अपने आपको जाँचा-परखा. काफी सोचने-विचारने के बाद उसने अपने शौक को ही व्यवसाय में तब्दील करने का मन बना लिया था. मनपसन्द व्यवसाय कुछ तामझाम के साथ खड़ा कर लिया. थूनी के रूप में सास थी तो बवन्डर के रूप में पपुआ आ जाता था. मेहनती, धुन की पक्की सलोनी के साथ उसका आत्मविश्वास था. खैर, वह कुछ महीनों में ही अच्छे-खासे ब्यूटी पार्लर की मालकिन बन गयी थी.

यहीं से शुरुआत हो गई थी उस विशेषण (मरदमारन) की जो किसी पड़ोसी ने उसके व्यक्तित्त्व पर चस्पा कर दिया था. जैसे शुरुआती तंगी के दिनों में वह बच्चों को साइकिल पर बैठाल कर स्कूल छोड़ और ले आती थी (साईकिल भी उसे जुगाड़ से ही मिली थी) जो काम पपुआ को करना चाहिये, उसे करना पड़ रहा था. वह करता भी कैसे उसका भोर तोदिन के दस बजे होता था. कभी कभी तो वह अर्द्ध - अपंग सास को भी साइकिल पर बैठकर ब्लड प्रेशर चेक करवाने ले जाती थी. स्कूटी-मोपेड के जमाने में उसे साइकिल से ज़रूरी कार्य निबटाने पड़ते थे. मुँह अँधेरे हीवह उठती थी, दुआर-मोहार बुहार कर कूड़े में आग लगा देती थी. यह सब करते हुए न वह झेंपती थी न ही कुंठित होती थी. इतना ही नही. गैस सिलेण्डर नीचे से ऊपर किचेन में ले जाती, गेहूँ पिसाती आदिढ़ेरों ऐसे काम वह किया करतीथी. ऐसे ही कामों को वह बिहिचक-बेहिसाब करती तो सुनती भी थी 'एतनी करेर मेहरारू के आगे तो पपुआ को कमरा के कोना ही नसीब होयी.' कितनी देर तक वह अपने दिल से लगाती. किसे आराम करना नहीं अच्छा लगता, उसे भी लगता था. एशो-आराम कि ज़िन्दगी जिए. परन्तु सलोनी ने यही मान लिया था सबके अपने-अपने करम और भाग. अब घर के मामलों में उतनी दख़लंदाजी पपुआ की नहीं रहती जितनी कि बच्चों के मामले में वह करने लगा था. यह कुछ हद तक सही भी है कि निठल्ला शराबी बाप खामखाँ खाँटी बाउ बन जाता हैं जब तक घर में रहता भर कनस्तर बच्चों पर प्यार उड़ेलता रहता. जब से वह आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हुयी थी तब से बच्चों से सम्बन्धिर कोई भी कैसा भी फ़ैसला पपुआ की झोली में नहीं जाने देती थी. सारे डिसीजन स्वयं लेती और अपने अनुसार उसे क्रियान्वित भी करती थी. चाहे बच्चों के स्कूल का चयन हो, चाहे उनके खाने-पीने, सोने-पहनने का फ़ैसला, सब सलोनी ने अपने पास सुरक्षित कर रखे थे.

उसका अपना धंधा-पानी बन्द सा हो गया था. नशा-पत्ती के लिये भी वह कभी माँ के आगे कभी सलोनी के आगे हाथ पसारने लगा था. जो बिना दो-चर बात सुनाए नहीं ही मिलता था. सभी उससे चौकन्ना रहने लगे थे. मुहल्ले में भी सलोनी ने लोगों कोढ़ंकी-तुपी भाषा में आगाह कर दिया था. इससे पपुआ की खीज दुगनी होने लगी थी. पपुआ का शरब से कृषिकाय और उसका गुस्सा भीमकाय हो गया था. सलोनी पर शारीरिक प्रताड़ना मन्द पड़ रही थी, मानसिक आघात बढ़ रहे थे. मेहरारू घर चलावे मरद बैठे कर खाए और मरदाना ठसका न दिखावे यह कैसे हो सकता था. ऐसा नहीं कि शारीरिक गठन-संरचना में उससे कमतर थी, डेवढ़ा थी पपुआ से. पर वही पति को देव मानो के आदिम संस्कार उसको कुछ करने से रोकते थे. अति होने पर वह उसकी कलाई पकड़ लेती थी. उसके हिंसक होने पर एकध बार उमेठ भी दिया था.

ईर्ष्या-सन्देह की पगडण्डी पर रपटते हुए पपुआ हर समय बदले की भावना से प्रेरित रहता. कभी नशे में कभी उसका बहाना, पड़ोस मेंकिसी के भी घर में घुस जाता, उसकी शिकायत दाग आता, 'एतना कमाती है, एक्कौ चवन्नि हाथ्पर नहीं धरती. न जाने कौन-कौन मरद के संग घर लौटती हैं कुछ कहो तोढ़केला-ढ़केली पर उतर आती है." दाढ़ी बढ़ाये, आवाज़-चाल में लड़खढ़ाहत लिए वह अपने आपको दयनीयता के उस ख़ेह्पर ले जाता जहाँ से उसे सहानुभूति की थैली मिल जाती पर साथ में, 'बहेतू मेहरारू के कोई भी पगहा नहीं डार सकता जाने बचवा, ओके वैसे ही छोड़ दो.' ऐसे वाक्य उसके घाव पर मरहम नहीं स्प्रिट का काम करते थे.

पर वह यूँ ही उसे जाने देगा कभी नहीं. झगड़ा-लड़ाई, बीछ-बीछ कर गालियाँ चीख पुकार आए दिन का किस्सा था. एक बुढ़िया के मुँ से निकला शब्द (मरदमारन) सबकी जुबान पर चढ़ गया था. सबने अपने-अपने तरीके से इसका अर्थ निकाला था. सामान्य अर्थ यही निकला कि वह अपने पति (पपुआ) को मारती है. जबकि वह पिटती ही आयी थी. उसने पपुआ को पीटा कब था? आजिज आ कर वह शायद कर भी देती. परन्तु हर समय पारम्परिक पत्नी होने का बोध और सबसे बड़ा कवच पपुआ की माँ (उसकी सास) घर में हर समय मौज़ूद जो रहती थी.

उसकी ब्यूटी पार्लर का बिजनेस पग-पग आगे बढ़ रहा था. उसमें थी उसकी लगन, मेहनत और रुचि. इसी के चलते उसका आत्मविश्वास पैर जमा रहा था. नित्य दिन वह बाहर निकल रही, किस्म-किस्म के लोगों से मिल-जुल रही. दुनिया जहाँ देख रही. दिनों दिन स्वनिर्णय की क्षमता बढ़ा रही थी. अपने और अपने बच्चों के बारे में निर्णय की डोर उसने स्वयं थाम रखी थी. इस रूदढ़िग्रस्त आधुनिक समाज में ऐसी औरत कहाँ होती है. और यदि कोई अदृश्य शक्ति गढ़ भी दे तो ठौर कहाँ पाती है. एक घरेलू स्त्री के हथ में इतनी ताकत कहाँ से आयी, उससे सीधे-सीधे यह प्रश्न पहले पपुआ करता था. हर बार वही टका सा जवाब, 'तुम इससे ज्यादा कुछ सोच भी नहीं सकते हो. तुम्हें लगता है मैं किसी के इशारे पर चलती हूँ. तुम्हारे अलावा भी मेरा कोई और है. यह झूठ है मन से शक निकाल दो. तुम भी सुखी साथ में हम सभी." अपनी सफाई में सलोनी जो कुछ भी कहती पपुआ के गले के नीचे भी नहीं. उतरता. अब तो पपुआ की शह पर प्रचुर समय की मालकिन बुढ़ीवें, कामचोर ग्रिहस्थिनें, कुछ ताका झाँकी करने वाले पुरुष भी उसे ताने मारने लगे थे. वह सबकी परवाह करती, ऐसी ऊलजलूल बातों पर कान देती तो कैसे घर-बाहर सम्भाल पाती.

वैसे उसने अपने प्रेम के सुनहरे दिनों में उस (पपुआ) पर भरपूर यकीन किया था. ऐसा नहीं कि उसके प्रेम में उसे सदिच्छा न दिखी हो. यह एक प्रश्न था कि शादी के कुछ दिनों बाद ही वह क्यों उसे झूठा लगने लगा था? और अब उसे हर पुरुष संदिग्ध सा लगने लगा था. निठल्ला पति हो, खूबसूरत बीवी हो तो उसकेढ़ेरों प्रेमी पैदा हो जाते हैं परन्तु वह किसी पर यकीन करती तब न. अब तो वह मट्ठा भी फूँक-फूँक कर पीने लगी थी.

वैसे झूठ के पर्दाफ़ाश के शुरुआत तो उसके कमाई के धन्धे से हुयी थी. जिस कार से वह पहली बर अपनी ससुराल आयी थी, उसके कुछ दिनों बाद ही पता चल गया कि उसका पति उस कार का मालिक नहीं उसका ड्राइवर था. यह पहला झटका था सलोनी को. पपुआ अपने चारित्रिक दोष को छुपाये रखने के लिए कब तक मुस्तैद हो नैतिकता-ईमानदारी की चादर ताने रहता. उसके अन्दर के शैतान की जानकारी सलोनी को दिन-ब-दिन होती जा रही थी. तो बची खुची पशुता वह शराब पीते ही दिखने लगती थी. उस वक्त वह कैसी भी गाली दे देता, कैसा भी लाँछन उस पर लगा देता था. वह बोलता नहीं था लड़खड़ाती आवाज़ से पूरे दम के साथ चिंघाड़ता था. अड़ोसी-पड़ोसी तो सुनते ही, सड़क के आवाजाही वालों के कान भी फड़क उठते थे.

बहुत सारे लोगोंन को उसके "पौरुषीय" आचरण पर आपत्ति थी वही लोग उसे बिगड़ैल-खूँखार बेलाइन औरत की संग्या देते थे. ऐसे ताने वह एक कान से सुनती दूसरे से बाहर कर देती थी. बस कुछ नहीं कहती थी तो उसकी सास. वह तो जाने दो सलोनी तुम सच्ची रहोगी तो जमाना कुछ दिनों बाद अपने आप ही तुम्हें कबूल लेगा.' उसे अपनी तरह से समझाती भी थी. सलोनी के अन्दर का शैतान और पशु वैचारिक रूप भले ही किन्हीं पीड़ा के क्षणों में मुँह निकाल लेते हों परन्तु क्रियाशील कभी नही. हुए थे. हुए ही होते तो क्या इस दशा को पहुँचती? क्या मरती? अनन्त उदाहरणों में फिर एक महिला पुरुष के आगे हार गयी थी. फैली ख़बर के मुताबिक उसने आत्महत्या कर ली थी.

मुहल्ले मे. नैसी घटना हो और मुखबिरी न हो, हो नहीं सकता. बिना समय गँवाये पुलिस आ धमकी थी. उसके दुआरे सैकड़ा भर इकट्ठी भीड़ में एक भी स्वर उसकी असमय मौत को लेकर दुख का भाव नहीं था. उसकी मौत पर केवल दो ही महिलाएँ रोती हुई दिखीं थीं. एक उसकी सबसे छोटी बहन जो कुंवारी और शादी के योग्या थी. दूसरी सबसे बड़ी बहन मौज़ूद थी. 6 बहनों में केवल दो मातम्पुर्सी के लिए? माँ बूढ़ी और जीवित थी. वह अभी भी उसके प्रेम विवाह को अपना अपमान मान अड़ी हुयी थी.

पुलिस का चरित्र किससे छुपा है? जितने लोग वहाँ मौज़ूद थे उनसे या फिर जिनके यहाँ दुर्घटना थी? शायद किसी से भी नहीं बड़ी बहन किंकर्तव्यविमूढ़ सी एक कोने में सहमी सी भुसुर-भुसुर रोये जा रही थी वैसे वह ताजा-ताजा दामाद वाली थी. अलबत्ता छोटी बहन ज़ोर-ज़ोर से चीख रही थी. रोते-रोते बेकाबू हो जाती. भीड़ में से ही कभी कभी-कभी कोई महिला उसे सान्त्वना देती. थकने पर जब धीमी पड़ती तो, 'हमार सलोनिया, हमार दिदिया लड़ सकती पर जान नहीं दे सकती. एकदम पक्का, कुल करनी जिजवा कि ही है. ओ ही का कुछ होना चाहिये", इतना कह वह कातर नज़रों से कुछ दबंग से दिखने वाले पुरुषों की तरफ ताकती. पर वास्तविक दबंगई किसी में होती तब न?

वहाँ इकट्ठा अधिकंश लोगों ने सलोनी को अन्तिम अवस्था में देखा ज़रूर था. पर जिसने जो भी देखा-जाना-पर्खा, रखा अपने दिल में ही. एकत्रित भीड़ में कुछ में तो साहस रहा ही होगा परन्तु 'कौन झन्झट मोल ले!' का शहरी प्रचलन वहाँ काम कर रहा थी. बहुत हुआ तो किसी-किसी गोल में से फुसफुसाहट के रूप में 'ऊ पपुआ के मान के थोड़े रही, ओसे करेर रही कि. ज़रूर पपुआ के संगी-संगाती मिलकर ओका निबटाए होइहैं कि.' आपसी हामी भरवा, सब फिर निजी बातों में मशगूल हो जाते.

मृतका सलोनी के पक्ष में खुलकर कोई भी नही. आ रहा था. पूछताछ की खानापूर्ति भी हो चुकी थी. उसकी छोटी बहन ने एफ़0 आई0 आर0 की तह्रीर मनचाहे ढंग से लिखवाई जा चुकी थी. एकत्रित भीड़ में किसी ने भी चूँ तक नही. किया था. पुलिस की डील हो चुकी थी. छोटी बहन के हात सलोनी के ब्यूटी पर्लर की चाभी जाने-अनजाने खनकी जा रही थी. इतनी प्रक्रिया के बाद वह सामान्य से कुछ आगे की दिखायी दे रही थी. पपुआ पन्नी चढ़ाये किसी कोने में लुढ़का पड़ा था.

चन्द बचे लोग भी उसके दुआरे रह गये थे निराशा दिखायी दे रही थी. शायद वह इन्सानियत, इन्साफ़ के पक्षधर रहे होंगे. अकथ व्यथा से सराबोर उसकी सास निराशा नहीं दिख रही थी. अब वह वॉडर पकड़ रही नहीं चलती थी. उसका हाथ थामे सलोनी की6 साल की बेटी दादी को गतिमान बनाने का प्रयास कर रही थी.

कितनी ही 'सलोनियाँ' मार दी जाएँ या मिटा दी जाएँ परन्तु बेटी-बहू के रूप मैं फिर-फिर पैदा होंगी. यह कथन उसकी सास का था. सलोनी के चौथा के सबको प्रसाद बाँटते वक्त....

© 2009 Neelam Shankar; Licensee Argalaa Magazine.

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