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हस्तक्षेप

संध्या नवोदिता

भूमण्डलीकरन का निर्मम प्रहार और स्त्री अस्मिता

भूमण्डलीकरण, वैश्वीकरण, उदारीकरण - यानी इज़ारेदार पूँजी की मायावी छड़ी जो छूते ही जीते जागते इंसान को कठपुतली बना दे - बाज़ार में एकाधिकारवादी पूँजी के इशारे पर नाचती कठपुतली दुनिया का एक बड़ा हिस्सा गिरफ़्त में है. नब्बे के दशक में जब ग्लोबलाईजेशन के संभावित भयावह परिणामों पर देश में तीखी बहस छिड़ी थी आज उन्हें भुगतते हुए जनता बर्बादी और तबाही के दुष्चक्र में फँसी है. बहुसंख्यक हाथों से रोटी रोज़गार, शिक्षा, स्वास्थ्य, नागरिक सुविधाएँ एक एक कर छिनते जा रहे हैं जिस उपभोक्ता के लाभ के तर्कों से विश्व बाज़ार के पुरोधा विशाल ग्रंथ रच रहे थे उन्हें दरकिनार कर बाज़ार अपनी चमक दमक, ग्लैमर, झूठ और बेतहाशा मुनाफ़े के धारदार हथियारों से उसी उपभोक्ता की दमड़ी और चमड़ी दोंनों उतारने में बेशर्मी से जुटा है.

वैश्वीकरण का वर्तमान दौर साम्राज्यवादी देशों द्वारा अपने आर्थिक संकट को हल करने के लिए आरंभ किया गया. साम्राज्यवादी देशों को मुनाफ़ा कमाने के लिए पूरी दुनिया का बाज़ार सुलभ हो जिससे उनकी विलीय पूँजी बच सके. इसके लिए उदारीकरण व खुली बाज़ार अर्थव्यवस्था लागू कर तीसरी दुनिया के देशों को अपने बाज़ार खोलने की नसीहत दी गई जिसकी क़ीमत विकासशील देशों को अपने संसाधनों व बाज़ार की खुली लूट के रूप में चुकानी पड़ रही है. उपनिवेशिक दासता से मुक्त हुई तीसरी दुनिया अब बहुराष्ट्रीय निगमों की इजारेदारी के चंगुल में फ़ँसी है जो अंतहीन, असीमित मुनाफ़े के लिए बहुसंख्यक आबादी की तबाही के लिए सीधे ज़िम्मेदार हैं.

मुनाफ़े की लूट खसोट में पैंतरेबाजी करती वित्तीय पूँजी की ताक़त के सामने विकासशील देशों की सरकारें या तो दलाल की भूमिका में हैं या समर्पण की मुद्रा में. खुला बाज़ार जिसमें बड़ी पूँजी का मगरमच्छ छोटी पूँजी की मछलियों को निगलकर ही पल रहा है, नतीज़ा - छोटे रोज़गार, बंद होते उद्योग धंधे, बेरोज़गारी एवं बैंकों की आधुनिक सूदखोरी से त्रस्त आत्महत्याएँ करते य्वा एवं किसान, छटनी का शिकार होते कर्मचारी, मँहगाई व असुरक्षा से पीड़ित श्रमशक्ति.

इस पूरे परिदृश्य में स्त्री कहाँ है ? उसकी अस्मिता, अस्तित्व के लिए क्या स्थान है ? पूँजी की ताक़त के इस दौर में पूँजीविहीन, बेरोज़गार स्त्री अत्यधिक दबाव में है. स्त्री का इस्तेमाल कार्पोरेट के माल के कैरियर के बतौर हो रहा है. इस प्रक्रिया में स्त्री शरीर भी एक 'कॉमोडिटी' बना दिया गया है जिसकी क़ीमत बाज़ार तय कर रहा है. 'यूज़ एण्ड थ्रो' के सिद्धांत पर टिके वैश्विक बाज़ार में स्त्री का वज़ूद कॉर्पोरेट के लिए बाज़ार विस्तार में सहूलियत करने मात्र तक है.

वित्तीय पूँजी की नियामक शक्ति से संचालित भूमण्डलीकरण ने घर, परिवार, कुटुंब की पुरानी सभी अवधारणाओं को धूल चटाते हुए संबंधों, मूल्यों व आदर्शों के नये व कूट प्रतिमान स्थापित किए हैं. बाज़ार ने उसकी बुद्धि, मेधा, रूप सौंदर्य, वाक्पटुता, माधुर्य, ममता, त्याग, संवेदनशीलता आदि जो भी स्त्री के अर्जित या लादे हुए विशेषण थे उन सभी को जमकर कैस ही कराया है. बदले में स्त्री और अधिक अकेली, असुरक्षित, कुंठित, भ्रमित, तनावग्रस्त एवं हताश हुई है.

बाज़ार के दबाव ने पहले तो संयुक्त परिवार से एकल परिवार बनाए. बेहतर जीवन स्थितियों की आवश्यकताओं एवं अपेक्षाओं के चलते स्त्री को भी घर की चारदीवारी लाँघनी पड़ी. शिक्षा संस्थानों व नौकरियों में लड़कियों की संख्या निर्विवाद रूप से बढ़ी तमाम सामंती, रूढ़िवादी मूल्यों से पूँजीवाद ने स्त्री को एक हद तक मुक्ति दिलाई भले ही ये सब बाज़ार विस्तार की आवश्यकताओं के तहत किया गया वैश्वीकरण ने स्त्री को पुन: घर का रास्ता दिखा दिया है. स्त्री की आत्मनिर्भरता घटी है एवं समाज व अर्थव्यवस्था में उसकी हिस्सेदारी कम हुई है क्योंकि वैश्वीकरण आम स्त्री को उत्पादन प्रक्रिया से लगातार काट रहा है. तीसरी दुनिया ही नहीं साम्राज्यवादी देशों में भी रोज़गार कम हुए हैं, जिसके चलते जो महिलाएँ घर से निकलकर उत्पादन प्रक्रिया से जुड़ी थीं वह अब उलट चुकी है. वैश्वीकरण ने उनका रोज़गार छीनकर फ़िर से पराश्रित होने को विवश कर दिया है. भारत सरकार भी इसके साथ कदमताल करते हुए द्वितीय श्रम आयोग की जनविरोधी, कामगार विरोधी व महिला विरोधी नीतियाँ लागू करने की तैयारी में है.

वैश्वीकरण ने बड़े स्तर पर निजीकरण का डंका बजाया है. फलत: सार्वजनिक क्षेत्र के अधिकांश संस्थान पूरी तरह बंद हो चुके हैं तथा बचे हुए संस्थानों में छंटनी के बाद भी बंदी की तलवार लटक रही है. 1970 के दशक में मुम्बई में 96 कपड़ा मिलों में 2.5 लाख मजदूर कार्यरत थे जो तीन सिफ़्टों में काम करते थे. आज मात्र बीस मीलें जैसे तैसे चल पा रही हैं. बंद मीलों की 600 एकड़ जमीनों पर शॉपिंग कॉंप्लेक्स, फ्लैट्स, फाईव स्टार होटल आदि बनाए जा रहे हैं. नई आर्थिक नीतियों ने इन मीलों के दो लाख से अधिक मजदूरों को सड़क पर ला पटका है. स्थायी भर्ती का स्थान कॉन्ट्रैक्ट लेबर ने ले लिया है. जिससे ठेकेदारों की चाँदी हुई है और महिला मजदूरों को कम मजदूरी व यौन शोषण का निशाना बनाया जा रहा है. नई श्रम नीतियों में महिलाओं की सामाजिक स्थिति को दृष्टिगत रखकर दी गयी रियायतें छिन ली गयी हैं. अब रात की पाली में ड्यूटी महिला के लिए भी बाध्यकारी हो जायेगी.

बढ़ती बेरोज़गारी कार्पोरेट के लिए सस्ते श्रम का अकूत भण्डार है. कार्पोरेट ने मुनाफ़े के लिए नई कार्य संस्कृति विकसित की है. जिसमें कड़े संघर्ष से हासिल काम के आठ घण्टे, बोनस, नौकरी सुरक्षा, बीमा, वेतन वृद्धि, फ़ण्ड, पेंसन आदि सभी कर्मचारी हित कार्पोरेट के मुनाफ़े की बलि चढ़ गये हैं. कार्पोरेट सेक्टर में दस बीस घण्टे से भी अधिक लगातार काम, ऊँचे ऊँचे प्रॉफ़िट टार्गेट पूरा करने के तनाव शारीरिक मानसिक दबाव बनाते हैं. उसे हल्का करने के लिए ड्रग्स का सेवन एवं घटिया मनोरंजन का दौर आरंभ होता है, जिसमें पोर्नोग्राफ़ी से लेकर वेश्यावृत्ति तक सब चलता है. यह कार्य संस्कृति मनोरोगियों को जन्मा देती है जिन्हें स्त्रियाँ ही सर्वाधिक झेलती हैं. घर और बाहर के दोहरे तनाव स्त्री को सामान्यत: परिवार या कैरियर में से किसी एक के चुनाव की स्थिति में लाकर खड़ा कर देते हैं.

स्त्रियों के सस्ते श्रम के इस्तेमाल में बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ सबसे आगे हैं. इसका एक उदाहरण भारत में बहुराष्ट्रीय कंपनियों का सीधी बिक्री कारोबार यानी डायरेक्ट सेलिंग है. इससे उपभोक्ता के लिए खरीदारी आसान हुई है या नहीं यह अलग बात है, बरहाल पिछले पाँच वर्षों में इनका कारोबार छ: गुना बढ़ गया है. 90 के दशक में लाइफ़ टाइम एसिया, एवन, ओरीफ़्लेम, एम्वे आदि कंपनियों ने भारत में व्यवसाय आरंभ किया. डायरेक्ट सेलिंग में स्त्रियों के इस्तेमाल से ये कंपनियाँ अरबों डॉलरों के मुनाफ़े तक इतने कम समय में कैसे पहुँची हैं इसके जानने के लिए 1998 में शुरू देश में सबसे बड़ी डायरेक्ट सेलिंग कंपनी एम्वे इण्डिया को देखें. इस कंपनी के उत्पाद घरेलू व कॉस्मेटिक्स हैं. अपने इन महंगे उत्पादों को बेचने के लिए कंपनी न तो विज्ञापन पर अधिक खर्च करती है न ही डीलर आदि नियुक्त करती है. भारत में कंपनी का टर्न ओवर 625 करोड़ रुपए है. इसके साढ़े तीन लाख वितरकों में सत्तर प्रतिशत से अधिक महिलाएँ हैं. स्पष्ट है कि भारी मानसिक शारीरिक श्रम, चातुर्य से कार्यरत महिलाएँ ही एम्वे के इस विशाल मुनाफ़े की आधारशिला हैं. इस मुनाफ़े की तुलना में इन महिलाओं की आय बहुत साधारण है, जबकि कंपनी प्रति वितरक नियुक्ति से भी 4400 रुपए कमाती है. इस प्रकार इस खाते में कंपनी की कमाई 880 करोड़ रुपए की है. इसके अतिरिक्त महिलाओं के निजी संबंधों, मित्रों, इनकी मृदुभाषिता, सौम्यता, सहजता, वकपटुता आदि का लाभ सीधे कंपनी को मिलता है. निजी रिश्तों को व्यापारिक रिश्तों में बदलकर भुनाने की इसी चालाक नीति से कंपनी के मुनाफ़े में जबरदस्त उछाल आया है. भले ही इससे उत्पादन, आत्मकेंद्रित, संवेदनहीन, स्वार्थी, व्यतिवादी मूल्यों ने सामाजिकता को तहस नहस कर दिया है.

घोर स्त्री विरोधी भूमण्डलीकरण ने स्त्री को "प्रोडक्ट" भी बनाया है, 'प्रोडक्ट सेलर' भी. स्त्री के सौंदर्य का बाज़ार बनाने के लिए विश्व स्तर से शहरों - कस्बों तक में सौंदर्य प्रतियोगिताएँ आयोजित की जा रही हैं. स्त्री सौंदर्य के नए नए प्रतिमान कार्पोरेट ने अपने माल को बेचने की सुविधा के अनुसार गढ़ लिए हैं. आज की विश्व सुंदरी कल सैंपू, कार, कोला या पेप्सी बेचती नज़र आती हैं.

पहले तमाम लिमिटेशन के बावज़ूद एक स्तर का बहनापा तो था ही औरतें एक दूसरे के दुख सुख बांटती थी. अब तो ईर्ष्या के विषय बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने तय कर दिए हैं - उसकी साड़ी मेरी साड़ी से ज़्यादा सफ़ेद क्यूँ ?..... उसके बाल इतने सिल्की, नरम कैसे ?...... उसकी त्वचा इतनी कसी कैसे ?...... पड़ोसी की जले जान तो आपकी बढ़े शान! जैसे घृणित मूल्यों का प्रसार करने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ मुनाफ़े के लिए दुष्प्रचार के किसी भी स्तर तक जा सकती हैं.

एक ऐसे समाज में जहाँ सामन्ती, पितृसत्तात्मक मूल्य मान्यताएँ पहले से ही प्रभावी हैं, स्त्री अस्मिता का संघर्ष कठिन हो जाता है. आक्रामक बाज़ार स्त्री मुक्ति की राह और भी दुरूह और दिग्भ्रमित कर रहा है. बाज़ार हर उस परंपरा के इस दौर में खाद पानी दे रहा है जिसे मुनाफ़े के स्रोत में बदलने की संभावना हो. भले वह दहेज जैसी घातक परम्परा हो. या न माँगे विवाह आयोजन, करवाचौथ, दीपावली, होली, रक्षाबंधन.... ये त्योहार भी कम पड़ें तो और नए उत्सवी दिन वैलेंटाइन डे, फ़्रैंडशिप डे, मदर्स डे...... आदि आयात किए गये. इसी केसाथ आगमन हुआ पश्चिमी उय्पभोक्ता संस्कृति का भी. महँगी पार्टियाँ, कारें म्यूज़िक धमाका, फ़ैशन, ई चैटिंग, पोर्नोग्राफ़ी, फ़्री सेक्स आदि का. मानवता के युग हित में उपयोगी सूचना क्रांति का इससे अधिक नकारात्मक इस्तेमाल नहीं हो सकता. इंटरनेट युग में साम्राज्यवादी वैश्वीक उपभोग का रास्ता खोल दिया है.

पूँजीवादी उपभोक्ता ने वधू हत्या के प्रमुख कारण दहेज प्रथा को नया रूप देकर इसे मजबूत किया है. पहले जहाँ दहेज के नाम पर साइकिल, रेडियो जैसी चीजों से काम चल जाता था, आज महँगी व ब्रांडेड उपभोक्ता वस्तुओं की माँग है. कार्पोरेट की विज्ञापन रणनीति मुनाफ़े के लिए पिछड़ी सामंती प्रथाओं को ग्लैमराइज़ कर रही है. शूटिंग शर्टिंग की एक कंपनी के शानदार शूट का स्लोगन था - 'मेरे जीजू के लिए.' मोटरबाइक का नया मॉडल एक प्रसिद्ध कंपनी ने 'शुभ लगन' के स्लोगन के साथ लॉंच किया. गहने बनाने वाली कंपनी तनिष्क का विज्ञापन है - 'विवाह ज़ेवर शुद्ध न हों तो बेटी पर क्या गुज़रेगी'. एक खास ब्राण्ड का सूटकेस ले जाने पर ही ससुराल में शर्मिंदगी का सामना नहीं करना पड़ेगा - ऐसा एक सूटकेस कंपनी का विज्ञापन बताता है.

पिछड़े मूल्यों का आलम ये है कि भारत अपने ही अंधविश्वासों से अभी पूरी तरह बाहर नहीं निकल पाया है कि फेंगसुई से लेकर पुनर्जीवित वास्तुशास्त्र एवं कंप्यूटर कुंडली तक का वैश्वीकरण हो गया है. जींस पहनकर सॉटवेयर में कैरियर बनाती पीढ़ी यदि अपनी कुण्डली बांचती है तो आश्चर्य क्यों ?

कार्पोरेट की निर्लज्जता की कोई सीमा नहीं है. ऑस्ट्रेलिया में वेश्यावृत्ति के धंधे से मुनाफ़ा कमाने वाली 'डेली प्लानेट' नाम की कंपनी बाक़ायदा अपने शेयर बेच रही है. आई. एल. ओ. की रिपोर्ट के अनुसार दुनिया में हर वर्ष 12 लाख लड़कियों को खरीदा बेचा जाता है जिनमें 1.5 लाख दक्षिण एशिया की हैं. इनका एक अरब डॉलर का कारोबार है. भारत में मुंबई के व्यापार का केंद्र है जहाँ से लड़कियाँ पश्चिम एशिया, फ्रांस व यूरोप को सप्लाई की जाती हैं. यह चौंकाने वाला तथ्य है कि भारत में मानव तश्करी का सबसे बड़ा केंद्र बन रहा है. उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखण्ड की गरीबी, बेरोज़गारी कम उम्र लड़कियों को बाज़ार में बिकने के लिए खड़ा कर देती है.

उस पर आंध्र प्रदेश में यह दर सर्वाधिक है. जहाँ वैश्वीकरण का साइबराबाद है. शायद यही कारण है कि आंध्र अकेला ऐसा राज्य है जहाँ मानव तश्करी निरोधक कानून ( आई आई टी ए ) लागू है. ये मामले राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग, पुलिस, न्यायपालिका की जानकारी में है परंतु जहाँ साम्राज्यवाद की दलाली स्वयं सरकारें कर रही हों उन्हीं के तंत्र से इसे रोकने की अपेक्षा करना बेमानी है.

वेश्यावृत्ति के दलदल में धकेली जा रही लड़कियाँ कुपोषण, यौन शोषण, मानसिक शारीरिक उत्पीड़न एवं एड्स का शिकार बन रही हैं. कार्पोरेट ने बाज़ार में लड़कियाँ भी उपलब्ध कराई हैं और कंडोम भी. लिहाज़ा हर क़िस्म की नैतिकता एवं मानवीयता को ठेंगा दिखाते हुए मानव तश्करी एवं वेश्यावृत्ति जैसे अमानवीय धंधों के भूमण्डलीकरण से कार्पोरेट और उसके दलाल मोटी कमाई कर रहे हैं क्योंकि आतंकवाद एवं ड्रग्स के बाद सेक्स ही दुनिया का सबसे कमाऊ धंधा है ऐसा संयुक्त राष्ट्र संघ व मानवाधिकार आयोग भी मानते हैं.

बाज़ार जो कभी हाट हुआ करता था सप्ताह में अमूमन एक बार लगने वाली यह हाट आमजन की आवश्यकता थी पर उपभोक्तावाद की आँधी से दूर थी. बहुत सीमित मुनाफ़ा, सादगी, ईमानदारी, रोटी और रोज़गार की इस हाट को यद्यपि बाज़ार निगल ही रहा था फ़िर भी घर और बाज़ार में कुछ अंतर तो बचा ही था.

अब बाज़ार की घुसपैठ घर के अंदर तक है. टेलीविज़न इसका उत्तम वाहक है. इसके पूर्व भी समाचार पत्र, पत्रिकाएँ मार्केटिंग कर रहे थे पर यह तब सीमित थी. दृश्य - श्रव्य मीडिया ने इसका स्वरूप बदलकर प्रभाव क्षेत्र एकदम असीमित कर दिया है. टेली - मार्केटिंग जैसी नई विधाएँ सामने आ गई. टी. वी विज्ञापन पुराने फ़ेरी मॉडल का अत्याधुनिक संसोधित संसकरण हो गये हैं या शायद उससे भी अधिक. क्योंकि फ़ेरी वाले तो गली दरवाज़े तक ही आते थे, टी. वी. विज्ञापन की हांक तो घर के अंदर बेडरूम तक है. विज्ञापनों पर करोड़ों का बजट रखने वाले बहुराष्ट्रीय निगमों का प्रोपेगंडा एक झूठ को हज़ारों बार दोहराकर दर्शकों को भ्रमित कर एक बड़ा ग्राहक वर्ग तैयार करता है साथ ही आत्महीन, कुंठित मानसिकता का कारण भी बनता है.

भूमण्डलीकरण की दलाली पर पल रहा अधिकांश मीडिया चरित्र में समझौतापरस्त एवं प्रकारांतर से ऐसी भूमिका में है जो अंतत: साम्राज्यवादियों के ही पक्ष में जाता है. साम्राज्यवादियों ने सीधे भी अपने बड़े बड़े मीडिया प्रतिष्ठान खड़े कर लिए हैं. जनपक्षधर मीडिया के सामने यह एक चुनौती है.

इलेक्ट्रानिक मीडिया की चालक शक्ति इसी कार्पोरेट का विज्ञापन तंत्र है जो स्त्री को कमोडिटी एवं सेक्स सिंबल बना रहा है. यह औरत के विरुद्ध अपराध को उकसाता है. केवल दिल्ली में ही छेड़छाड़ एवं बलात्कार की घटनाओं में चिंताजनक वृद्धि हुई है. जब देश की राजधानी में विदेशी राजनयिक के साथ रेप हो सकता है, राष्ट्रपति के सुरक्षागार्ड दिन दहाड़े एक छात्रा के साथ दुष्कर्म के दोषी पाए जाते हैं, तो बाकी देश की महिलाएँ कितनी सुरक्षित हो सकती हैं ?

टेलीविज़न के एम टी. वी. जैसे कई चैनल साम्राज्यवादी अपसंस्कृति का प्रसार कर रहे हैं. कला के बहाने स्त्री शरीर को भुनाया जा रहा है. टी. वी. सीरियलों का इस्तेमाल उपभोक्ता संस्कृति को प्रोतसाहित करके मध्यवर्ग में बाज़ार की पकड़ को मज़बूत करने में किया जा रहा है. टी. वी के मेगा शोप ओपेरा गहनों, कपड़ों के फ़ैशन शो हैं, जिनमें स्त्री की कामकाज़ी, संघर्षशील छवि का लोप कर उसे ग्लैमरस, आत्मतुष्ट एवं षडयंत्रकारी भूमिका में प्रस्तुत किया जा रहा है. ज़्यादातर धारवाहिक स्त्रियों के अवैध संबंधों एवं संपत्ति हथियाने के हथकण्डों पर टिकी है. यहाँ 'उड़ान' की कविता चौधरी के आदर्श, संघर्ष या 'बुनियाद' की लाजो जी की सादगी, नरमी, सौम्यता व मानवीय मूल्यों के लिए कोई स्पेस नहीं बचा है.

भारतीय सिनेमा में सामाजिक राजनीतिक मुद्दों पर गंभीर विमर्श वाली कला फ़िल्मों का एक शानदार अतीत रहा है. उपभोक्तावाद व वैश्वीकरण के दबाव में सिनेमा को पूर्ण व्यावसायिक बना दिया है. विशुद्ध कला फ़िल्में पूर्ण लुप्त हो चुकी हैं. स्त्री सवालों पर केंद्रित लज्जा, अस्तित्व, ज़ुबैदा, बेंडित क्वीन, गॉडमदर, सरदारी बेग़म, चाँदनी बार जैसी फ़िल्में आज भी बन रही हैं जिनमें ग़रीब स्त्री की विवशताएँ व संघर्ष भी है तथा अभिजात वर्ग की घुटन में क़ैद स्त्री की मुक्ति की छटपटाहट भी. दूसरी ओर वैश्वीकरण ने सभी विदेशी फ़िल्मों का आवागमन सामान्य किया है. विदेशी बाज़ार एवं साम्राज्यवादी अपसंस्कृति से प्रेरित भारतीय सिनेमा का दूसरा पहलू भी तेजी से अपना प्रभाव क्षेत्र बड़ा रहा है. इन फ़िल्मों में 'जिस्म' से होती हुई बाज़ार की 'ख़्वाहिश' 'मुम्बई मैटिनी' के नायक को प्रॉस्टीट्यूशन के मार्केट तक बाइज्ज़त, सहज स्वीकृत भोलेपन के तर्क के साथ ले आई है. इन फ़िल्मों में देह प्रदर्शन के नए नए आयामों की खोज की गई है. कार्पोरेट भी मुनाफ़े की इस गंगा में डुबकी लगाने आ गया है. स्त्री के इस्तेमाल में माहिर कार्पोरेट के इस फ़िल्मी निवेश की क़ीमत बेशक स्त्री को ही चुकानी है.

वैश्वीकरण शब्द स्वयं में सकारात्मक है - यदि मानवीय मूल्यों, जन - संस्कृति, रोज़गार, तकनीक का वैश्वीकरण हो तो! परन्तु यह साम्राज्यवादी मूल्यों, विचारों व पूँजी के कब्ज़े का वैश्वीकरण है. यह चुनिंदा साम्राज्यवादी देशों का अपनी वित्तीय पूँजी, उन्नत तकनीक एवं विनाशकारी ताक़त के बल पर पूरी दुनिया के आर्थिक व प्राकृतिक संसाधनों पर एकाधिकार के जनविरोधी एजेंडे का वैश्वीकरण है. यह लूट की खुली छूट का भूमण्डलीकरण है. युद्ध इसका अनिवार्य अंग है. साम्राज्यवादी देश इसी लूट के लिए आपस में भी युद्धरत रहते हैं तथा अन्य देशों पर भी युद्ध थोपते हैं.

वैश्वीकरण ने अपने निर्बाध प्रसार के लिए कट्टरपंथी व हिंदुत्व फ़ासीवादी ताक़तों को हर प्रकार से बढ़ावा दिया है. भारत में हिंदुत्व फ़ासीवादी संगठन जनता को सांप्रदायिक ध्रुवीकरण में उलझाकर साम्राज्यवादियों का रास्ता साफ करने में पूरी स्वामिभक्ति से जुटे हैं. गुजरात नरसंहार हमारी आँखें खोलने के लिए पर्याप्त है जिसमें साम्राजवादियों के इन्ही चारणों ने सैकड़ों बेगुनाह स्त्री - पुरुषों, मासूम बच्चों को धर्म के बहाने आग में झोंक दिया. कैसरबानो का नाम इस संदर्भ में मात्र एक उदाहरण है जिसका गर्भ चीरकर उसके अजन्मे नन्हे शिशु को आग में फ़ेंक दिया गया. हिंदू होने का ढोंग करने वाले साम्राज्यवाद के पिट्ठुओं, नृशंस बर्बरता के इन ध्वजवाहकों को अपने आका साम्राज्यवादी देशों से इन्हीं कार्यों के लिए मोटा फ़न्ड मिलता है.

युद्ध देश के अंदर हो या सीमा पर, स्त्री इसकी सबसे क्रूर शिकार होती है. दूसरे विश्व युद्ध में पूर्वी यूरोप की औरतें जर्मन सैनिकों की यौन तृप्ति का माध्यम बनीं, हज़ारों कोरियाई महिलाओं को जापानी सैनिकों ने अपना शिकार बनाया. वियतनाम युद्ध के दौरान दक्षिण पूर्व एशिया को अमेरिकी सैनिकों ने वैश्यालय बना दिया. आज भी थाईलैण्ड अमेरिका की ऐशगाह है.

स्त्रियों के ख़िलाफ़ बलात्कार को हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जाता है. सर्वियन सेना ने हज़ारों बोस्नियाई मुसलमान औरतों से बलात्कार इस तर्क से किया कि इससे सर्वियन नस्ल के बच्चे पैदा होंगे. अफगानिस्तान हो या इराक सबसे बुरा हाल औरतों का है. साम्राज्यवादी फ़ौज द्वारा उनका उपभोग हो या स्थानीय अराजक समूहों द्वारा. औरतों ने अपने पति, पिता और बेटे खोए हैं. युद्ध के बाद छोटे छोटे बच्चों के पालन पोषण की ज़िम्मेदारी अकेली स्त्री पर ही आती है. युद्ध से साम्राज्यवादी देशों को पुनर्निर्माण के नाम पर अरबों डॉलरों के ठेके मिले हैं, हथियारों का बाज़ार तेज़ हुआ है, तेल के कुएँ और बाज़ार मिले हैं - तो युद्ध की शिकार औरतों को लुटा हुआ वर्तमान और अंधकार पूर्ण भविष्य मिला है.

ऐसे में स्त्री मुक्ति का रास्ता किधर है ? एक ओर सामंती पितृसत्तात्मक मू, मान्यताएँ दूसरी ओर साम्राज्यवाद का चौतरफ़ा हमला. यौन शुचिता एवं परिवार की दुहाई देती झूठी सामंती नैतिकता जो स्त्री से निजी संपत्ति का वारिस चाहती है तथा मुनाफ़े के लिए स्त्री को जींस में तब्दील करता आक्रामक पूँजीवाद - दोनों ही स्त्री को इंसान के रूप में नहीं देख पाते.

इस आक्रामक पूँजीवाद को अपने हितों के लिए सामंती मूल्यों से गठजोड़ करने में कोई दिक्क़त नहीं है. सामंती मूल्यों में बेटी बोझ और शर्म है. उसे पैदा होते ही मार देने की प्रथा रही है. तो मुनाफ़े के मजबूत तर्क के साथ पूँजीवादी व्यवस्था इससे कई क़दम आगे है. यहाँ साफ़ तौर पर बेटी घाटे का सौदा है. छुटकारा भी सहज है. बच्ची के पैदा होने से पूर्व गर्भ में ही उसकी हत्या के सामान उपलब्ध हैं. भूमण्डलीकरण ने इसे इसे सर्वग्राह्य नैतिकता बक्शी है.

स्त्री को इन दोनों से संघर्ष करना है. सामंती पितृसत्तात्मक मूल्य मान्यताओं की जकड़ में फ़ंसी स्त्री भूमण्डलीकरण का निर्मम प्रहार सबसे ज़्यादा व हर मोर्चे पर झेल रही है, उसमें इसके प्रति क्रोध भी है तथा अपनी अस्मिता को बचाने की छटपटाहट भी. भूमण्डलीकरण के विरुद्ध प्रदर्शनों में भारी संख्या में महिलाओं की भागीदारी इस बात का संकेत है कि जुझारू महिला आंदोलन की संभावनाएँ प्रबल हैं. स्वाभाविक तौर पर इस महिला आंदोलन का चरित्र सामंतवाद - साम्राज्यवाद विरोधी होगा तथा इसकी सहज एकता व ताक़त सामंतवद - साम्राज्यवाद विरोधी श्रमजीवियों के आंदोलनों से होगी.

एक दिन बेटियाँ

माँ
काश सब बेटियों की माएँ हों बिल्कुल तुम सी

बेटी की बला ले लें अपने ऊपर
उसके खौफ़, उसकी पाबन्दियाँ, उसके पहरे
सब बदल जाएँ
घने प्रेम और विश्वास में

कहें बेटियों से
कंधे सीधे रखो
और सिर ऊँचा
नाज़ुक नहीं मज़बूत बनो

बेटियाँ पतंग नहीं होतीं
न बेटियाँ वर्तमान होती हैं
बेटियाँ भविष्य होती हैं
और बेटियों का भी होता है
वर्तमान और भविष्य

एक दिन बेटियाँ
हो जाती हैं माँ भी
तुम्हारी जैसी बेटियों की
तुम्हारी जैसी माँ.

गलती वहीं हुई थी

तुम्हारे अँधेरे मेरी ताक में हैं
और मेरे हिस्से के उजाले
तुम्हारी गिरफ़्त में

हाँ
गलती वहीं हुई थी
जब मैंने कहा था
तुम मुझको चाँद ला के दो

और मेरे चाँद पर मालिकाना तुम्हारा हो गया.

© 2009 Sandhya Navodita; Licensee Argalaa Magazine.

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