अर्गला

इक्कीसवीं सदी की जनसंवेदना एवं हिन्दी साहित्य की पत्रिका

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काव्य पल्लव

बिपिन कुमार शर्मा

लिफ्ट के बहाने से ........

कई दिनों तक देखता रहा
लाइब्रेरी की लिफ्ट में
खूब बोल्ड करके लिखे
एक लड़की का नाम

ऐन बगल में, बॉलपेन से
हड़बड़ी में बनाए गए
कुछ रेखा-चित्र: स्त्री पुरुष अंगों के
ठीक नीचे कुछ अश्लील श्लोगन
उस लड़की के बहाने से
सबों को शर्मसार करता-सा
कहीं भी खाली नहीं है स्थान
है शेष जगहों में भी
रति-क्रीड़ा का आक्रामक बख़ान
अनेक लिखावटों में
अनेक रंगों में
मेरे मित्रों ने सजा रखी है
लाइब्रेरी की लिफ्ट.

कुछ दिनों बाद, मानो
किसी ने उस नाम को
मिटाने का प्रयास किया हो
धुंधला गए थे अक्षर, और
बेतरतीब ढंग से काट-पीट की गई थी
बहुत जल्दी में
या शायद घबराहट में

ऐसा तुम्हीं ने किया था?
हे भगवान! तुमने भी देख लिया?
अकेली थी तुम
जब पहली बार देखा था
कि साथ में था कोई---
दोस्त, प्रेमी, भाई, शिक्षक?
घबराहट में रो पड़ी थी न तुम
तभी तो धुंधला गए थे अक्षर!
उसके बाद
किस-किस से चुराती रही आँख
किस-किस की आँखों में पड़ती रही उसे
कितनी रातों तक चुभते रहे
तुम्हारी पलकों में वे चित्र
कितनी बार सोचा
कि भाग जाऊँ इस 'जंगल' से
किन चेहरों में ढूँढ रही हो उन्हें
हर जगह छुपे हैं वैसे लोग
कहीं भी तुम चली जाओ
बनाने वाले बना कर ही रहेंगे
तुम्हारे अंगों के चित्र.

© 2009 Bipin Kumar Sharma; Licensee Argalaa Magazine.

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