अर्गला

इक्कीसवीं सदी की जनसंवेदना एवं हिन्दी साहित्य की पत्रिका

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काव्य पल्लव

जया झा

मन के साथ भटकना होगा

मन के पीछे चलने वाले,
मन के साथ भटकना होगा.

हाँ, अभी देखी थी मन ने
रंग-बिरंगी-सी वह तितली
फूल-फूल पे भटक रही थी
जाने किसकी खोज में पगली.

पर वह पीछे छूट गई है
इन्द्रधनुष जो वह सुन्दर है
अब उसको ही तकना होगा.

मन के पीछे चलने वाले,
मन के साथ भटकना होगा.

बच्चों-सा जो कल सीधा था
और कभी किशोर-सा चंचल
आज वयस्कों-सा वह दूर, क्यों
रूप बदलता है पल-पल ?

मन घबराए, गुस्सा आए
चोट लगे, आँसू आ जाएँ
हर कुछ को ही सहना होगा.

मन के पीछे चलने वाले,
मन के साथ भटकना होगा.

काम वाली

(शहर की ज़िंदगी को समर्पित)

तरस गई हूँ मैं
पथरा गई आँखें.
देख चुकी रास्ता
कई बार जा के.

पूछा पड़ोसियों से
उसे देखा है कहीं.
पागल समझते हैं
मुझे लोग सभी.

बहुत मन्नतें माँगी
बहुत रोई, गिड़गिड़ाई.
कितने संदेशे भेजे पर
काम वाली आज फिर नहीं आई.

© 2009 Jaya Jha; Licensee Argalaa Magazine.

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