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इक्कीसवीं सदी की जनसंवेदना एवं हिन्दी साहित्य की पत्रिका

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काव्य पल्लव

प्रेम सिंह

1

मेरी कहानी जो तुम से अलग होती माँ
तो मैंने लिख दी होती
मेरी और तुम्हारी कहानी
अभी बदल नहीं सकती
कहानियाँ बदलने के लिए
करवट बदलनी पड़ती है
करवट बदलने के लिए
जगह बनानी होती है
गिरने का डर अभी खत्म नहीं हुआ माँ
करवट कैसे बदलूँ
तुम्हारी ही कहानी
जीते - जीते थक तो मैं भी गई हूँ
मेरी बेटी शायद न थके
शायद वह इसी कहानी को न दुहराए
शायद वह जगह बना ले
क्योंकि वह सीधा चलती है
मेरी और तुम्हारी तरह
झुक कर नहीं
सीधा चलने से
सब कुछ साफ -साफ दिखाई देता है माँ
रास्ता बुहार कर चलने की हिम्मत
वह बटोर लेगी
अब तो जगह-जगह डस्टबिन पड़े हैं
सुना है सड़क पर थूकने वालों कों
दंड मिलेगा माँ
अब नई सड़के भी बन गई हैं
मेरी बेटी नई सड़कों पर
सीधा चलकर
नई कहानियाँ रच लेगी माँ

किसी कारण

मेरी सारी रगें दुख रही हैं
तुम किस किस पर हाथ रखोगे
मेरी सारी चोटें उघड़ रही हैं
तुम किस किस की मरहम करोगे
बह रही है आँखों से जो नदी
मुझे उसी में स्नान करने दो
नहीं गा सकी जो गीत
किसी कारण
लड़खड़ाते पाँव से ही सही
अब जाने दो
रह गया है शेष जो
किसी कारण
उपयोग कर उसका अशेष करने दो
जलते दिए की लौ
नहीं पहुँच सकी थी मुझ तक
किसी कारण
किरणें आई हैं मेरे द्वार अब पहनने दो
मेरा वह सब नहीं हो सकता था जो
किसी कारण
माँगने आया है मुझसे अब तो देने दो
जो न हो सका अब तक मुझसे
किसी कारण
वह सब हाँ वह सब
हार- शृंगार
रीझ कर स्वयं पर
अब मुझे सारा करने दो - सारा करने दो.

अपने हिस्से का आसमान

जन्मते ही मैंने
शहद से उसकी जीभ पर
लिखा भरत
और नाम रख दिया भारत
ब्रिगेडियर पिता ने गोद में लेते ही
कान में कहा 'वन्दे मातरम'
नन्हीं भारती किलक कर बोली
जे भालत और मैं भालती
दादी ने
राम, कृष्ण, अर्जुन और अभिमन्यु को
लोरियों में गूँथ दिया
सपूत मेरा बड़ा होने लगा
रेडियो पर भी 'जन - गण - मन' सुनकर
सावधान की मुद्रा में खड़ा होने लगा
स्कूल में पंक्ति में प्रथम खड़ा होकर
लेफ्ट राइट करने लगा
और फिर एन . सी. सी. में
मैडल पर मैडल लेने लगा
कॉलेज में जाते ही उसने
दल बल संजो लिया
और देश प्यार के गीत गाता
नारे बाजी करने लगा
कॉलेज से निकलते ही
सपूत मेरा उड़न छू हो गया
पराई धरती की कली मरोड़ ली
और मुझसे अपने हिस्से का
आसमान भी माँग लिया
बहना ने कूरियर से राखी भेज दी
भैया ने सैंट की बोतल भेज दी
ये उदारता नहीं तो और क्या है
मैं किसे सिखाऊँ
मातृदेवी भव पितृदेवी भव
जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी
कहते हुए कंठ अवरूद्ध हो जाता है
मेरी सहेलियाँ तक
मेरी बात नहीं सुनती
कहती हैं
अपने बेटे को तो भेज दिया
हमें रोक रही है
मेरी भारती तक
मेरा कहना नहीं सुनती
कहती है
भाई को तो भेज दिया
मैं लड़की हूँ
इसलिए रोकती हो
मुझे भी दो मेरे हिस्से का आसमान
मैं भी उड़ूँगी
और उसने भी
पराए कागज का फूल सजा लिया
ब्रिगेडियर साहब अब भी तन कर खड़े हैं
नौकरानी के बेटे को
सैनिक की शिक्षा दे रहे हैं
वह अधनंगे बच्चों का
झुंड ले आया है
मैं उन्हें
कपड़े पहनाने, नाश्ता कराने में
जुट गई हूँ

© 2009 Prem Singh; Licensee Argalaa Magazine.

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