अर्गला

इक्कीसवीं सदी की जनसंवेदना एवं हिन्दी साहित्य की पत्रिका

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काव्य पल्लव

विशाल भारती

एक तपस्वी की मौत

तुमसे मैंने प्रेम किया
अज़ीब-ओ-गरीब अनुभव रहे
एक ख़ूबसूरत कविता की तरह
मैंने तुम्हें देखा
एक ख़ूबसूरत याद की तरह
सहेज कर तुम्हें रखा
न जाने कितनी बार
एकांत में ईश्वर की तरह
तुम्हें याद किया
अंतत: यह चाहा
तुम्हारी चाहत भी जान लूँ;
जानने के लिए
तुम्हारी आँखों में झाँका
और
एक तपस्वी की मौत हो गई.

शायद यही प्यार

थकी हुई परेशानियाँ
उम्मीद भरी नाउम्मीदियाँ
रुकी हुई धड़कनें
भारी बोझ बन चुकी हैं
कमज़ोर कंधों की
लेकिन किस वज़ह से
शायद
एक समझौते की वजह से
गर्भ और रक्त के दर्मियाँ
और यही समझौता
या यूँ कह लें
शायद यही प्यार
बन जाती है
एक वज़ह
उम्मीद भरी
बेवज़ह
नाउम्मीद ज़िंदगी की.

© 2009 Vishal Bharti; Licensee Argalaa Magazine.

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