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इक्कीसवीं सदी की जनसंवेदना एवं हिन्दी साहित्य की पत्रिका

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अनुसृजन

गंगाधर वसंत

साहित्य में मौलिक अनुवाद और उसकी संभावना

साहित्य समाज का दर्पण है और स्वतंत्र विचारों का प्रस्तोता है लेकिन अनुवादक ऐसे निजी अनुभवों शिक्षा या संबंधों के ज़रिये प्रस्तुतिकरण के एक आयाम तक तो जा सकता है लेकिन यह कहना उचित न होगा कि अनुवाद में मूल लेखक के गूढ़ार्थों का पूर्ण प्रस्तुतिकरण हो सकता है. भागीरथ मिश्र ने साहित्य और समाज के संदर्भ में कहा है. साहित्य और समाज का अटूट और अगाध संबंध है. समाज की जीवन धारा में साहित्य कमलवत विकसित होता है. वस्तुत: विश्वग्राम विभिन्न भाषायी संस्कृतियों एवं परम्पराओं के समुच्चय का एक सृजनशील स्वरूप है. वही एक लिखित भाषा में साहित्यिक कृतियों का दूसरी साहित्यिक भाषाओं में अनुवाद करना एक जटिल प्रक्रिया है. इसके लिए दोनों संबंध भाषाओं के सम्यक ज्ञान और प्रकृति मुहावरों लोकोक्तियों वैशिष्ट्य एवं आंतरिक संरचना का ज्ञान भी आवश्यक होता है. साथ ही वहाँ की मिट्टी की सुगंध सामयिक परिवेश और शैक्षणिक स्तर का ज्ञान भी अपेक्षित है. साहित्य और उसके अनुवाद में मौलिकता उतनी ही आवश्यक. जैसे वनवासियों और आदिवासियों के लिए जंगल.

मौलिकता के संदर्भ में अनुवाद के लिए शब्दों के चयन में निहितार्थों पर स्पष्ट रूप से विचार किया जाना चाहिए और वहाँ युक्तियों का प्रयोग कर पाठकों को मूल पाठ की संस्कृति से रूबरू कराया जाना चाहिए यहाँ जटिलता पाठ और मूल संस्कृति में उभरने वाली छवि की स्वस्थ अभिव्यक्ति की है. जिसे अनुवादक को दूर करना पड़ता है. अनुवाद की प्रक्रिया में दो संस्कृतियाँ उभयनिष्ठ होती हैं. अत: उत्तम अनुवाद के लिए उभयनिष्ठ होकर भाषा विकार से मुक्त होना अनिवार्य है. मौलिक अनुवाद में चुनौतियाँ यूँ तो बहुत सी हैं लेकिन मूल रूप से दो समस्याएँ सामने आती हैं पहली पाठ की मूल भाषा और संस्कृति के ज्ञान का अभाव. दूसरी मूल पाठ का अँग्रेज़ी अनुवाद कर उसका दूसरी भाषा में अनुवाद कर पाठ में परिवर्तन की संभावना.

आधुनिक समय में विश्वग्राम की संस्कृति एक नव संस्कृति को जन्म दे रही है. अत: मूल पाठ की संस्कृति में कुछ समानताएँ भी नज़र आएगी जोकि प्राय: महानगरी सभ्यता का हिस्सा है. इसलिए भौतिक संस्कृति में तो समानता मौज़ूद रहेगी लेकिन पारम्परिक रीति रिवाज़ों में अंतर स्पष्ट हो जाता है. यदि हम बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में देखें तो पाएँगे कि रूसी साहित्य अपने स्वर्णकाल में था लेकिन तत्कालीन साहित्यकारों जैसे लियो टॉल्स्टॉय अन्तोन चेख़व और पुश्किन की कृतियों को नये अनुवादक उस समय की संस्कृति और व्यवस्था के अनुसार नहीं भाँप सकते इसके लिए विषयगत ज्ञान का मर्मज्ञ होना आवश्यक है. अनुवादक की मौलिकता के संदर्भ में प्लेटो का मत है कि साहित्य के संदर्भ में सत्यता का प्रश्न अनावश्यक है. जैसे बच्चों को सुनायी जाने वाली कहानियाँ पूर्णत: असत्य होती हैं और साथ ही काल्पित भी इस प्रकार प्रश्न सच और झूठ का नहीं बल्कि अच्छे झूठ और बुरे के चयन का है. इसलिए अनुवादक के लिए साध्य तो विषय वस्तु है. जो मूल पाठ में अन्तर्निहित है.

मौलिकता के प्रश्न के उत्तर में इसके लिए देखा जाए तो हर संस्कृति के कुछ केन्द्रस्थल अवश्य ही मौज़ूद रहे है. जिनका गंभीर प्रभाव वहाँ के साहित्य में स्पष्ट: दिखायी देता रहा है. यदि भारतीय परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो काशी एक महत्वपूर्ण स्थल के रूप में उभरता है. जो देवनागरी लिपि तथा भारतीय संस्कृति के समावेश का केन्द्र है. इस तरह रोम जो यूरोप के धर्म और दर्शन का केन्द्र रहा है. उसकी छाया किसी न किसी प्रकार हमें देखने को मिलती है. इसी श्रेणी में मास्कों को अधिग्रहीत करते हैं. तो पूर्वी यूरोप में यहाँ से उपजी नयी संस्कृति के जन्म का प्रभाव व्याप्त है. यहाँ अनुवादक के लिए चुनौती दुसाध्य है लेकिन असाध्य नहीं. उपरोक्त पंक्तियों में अनुवादक को यह अहसास कराया जा रहा है कि साहित्य में सभ्यतायों के अभ्युदय और सँघर्ष छिपे हुए होते है. यह अहसास प्राय: नवीन अनुवादकों को कराना आवश्यक होता है.

इसी कड़ी में अनुवादक की मौलिकता को देखने के लिए उदाहरण प्रस्तुत किये जा सकते हैं. जैसे रामचरितमानस के पहले अँग्रेज़ी अनुवादक एफ. एस. ग्रॉच का शीर्षक "द रामायण ऑफ़ दि तुलसीदास" था वहीं डब्ल्यू डगलस पी हिल ने इसका अनुवाद (द लेक एट दि एक्ट्स) किया है. यहाँ दोनों महान अनुवादकों के शीर्षकों की तुलना से अभिप्राय है. न कि अन्य अर्थों में जहाँ "मानस का समान अर्थ" बुद्धि या मस्तिष्क है. वही मानस मानसरोवर के प्रतीक का रूपक भी है. इसी क्रम में सी. एल. घोड़ी इसे (द गॉस्पेल ऑफ़ लव) का शीर्षक देते है. जो पाश्चात्य संस्कृति के कहीं निकट और मौलिकता का परिचायक है. अनुवाद में जहाँ एक तरफ सृजनशीलता देखने को मिलती है. वहीं दूसरी ओर मूल भाषा के पाठकों को जो सहजता उपलब्ध होती है. वह अनूदित रचना में नहीं दिखायी पड़ती.

अत: लेखकों को सामयिक समरसता का ज्ञान भी आवश्यक हो जाता है. दूसरा महत्वपूर्ण पहलू यह कि अनुवादक उस पृष्ठभूमि तक कैसे पहुँचे यह चुनौती पूर्ण विषय है क्योंकि अनुवादक के सामने मूल भाषा के समवर्ती लेखों का चयन व समकालीन साहित्य को समझना महत्वपूर्ण हो जाता है और दोतरफा संवाद क़ायम करने के लिए गहन अध्ययन की आवश्यकता पड़ जाती है. संक्षेप में मौलिक अनुवाद हमारे लिए सहज कार्य है लेकिन पाठक की आकाँक्षाओं पर ख़रा उतरने का उत्तरदायित्व लेखक से अधिक अनुवादक के ज़िम्मे होता है.

श्यामसुंदर दास भी इस बात से सहमत हैं. कि मौलिक रचना की सारी विशिष्टताओं को अनूदित रचना में लाना अत्यन्त दुरूह है. बावज़ूद इन सब मुश्किलों के एक प्रयत्नशील अनुवादक को धैर्य नहीं खोना चाहिए चूँकि भाषा के शब्द के सापेक्ष दूसरी भाषा में शब्द मिलना संभव नहीं होता अत: उचित शब्दों का प्रयोग करते हुए भाव शिल्प की यथासंभव रक्षा करनी चाहिए. आम पाठकजन की उत्सुकता मौलिक रचनाओं में अधिक होती है. जब-जब कोई उत्तम रचना भली-भाँति अनूदित होकर अन्य भाषायी पाठकों को तृप्त करती है. तो विश्वबन्धुत्व की भावना बलवती होती है और कृति देशकाल के बंधन तोड़कर समूची मानवता की धरोहर हो जाती है. यही किसी साहित्यकार और अनुवादक के लिए सर्वोत्कृष्ट पुरस्कार है.

© 2009 Gangadhar Vasant; Licensee Argalaa Magazine.

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