अर्गला

इक्कीसवीं सदी की जनसंवेदना एवं हिन्दी साहित्य की पत्रिका

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अनुसृजन

वरयाम सिंह

डरी हुई हमारी ज़िंदगी

हमारी ज़िंदगी डरी हुई है इस आसमान से
और हमारी ज़िंदगी से डरा हुआ है आसमान
अच्छा है होना लोहे की नसों वाला स्मारक
मुलायम धमनियाँ मनुष्य के लिये ठीक नहीं
गिर रहे हैं गिर रहे हैं मृत पत्ते
मातम के वक़्त ऐसी चापलूसी से ज़्यादा कुछ भी मीठा नहीं
काश विदा के वक़्त तुम्हारे लिये अगाथा क्रिष्टी हाज़िरी देती
काश मेरे लिये उपलब्ध रहता एक काला चमकदार सलीब
अधिक कुछ नहीं. इस सैन्याधिकारी पर कुछ रहम करो
रहम करो कामेच्छाओं के सात सप्ताहों पर
चर्च के पास से गुजरती अनुभूतियों की फ़ौज़ पर
खरोंचों की बटालियन पर. सोये रहो
मैं न तुम्हारा नाम बूझ पाया हूँ
और न ही ख़ूनी ख़ौफ़ के तुम्हारे रिश्तेदार पत्थर को
तुम फ़िर से मेरे पास आये हो लालची हाथ फ़ैलाते हुये
ठीक जैसे ऑर्गनवादक बाख की प्रार्थनाओं के पास
मैंने नाटक किया. मैं मर गया हूँ. तुम दुस्साहस न करो
वो देखो. एड़ियों के बल पहले ही खड़ी हो गयी है नफ़रत
ताकि देख सके. कितने डिगरी सेंटीग्रेड की है यह उदासी
मुझ जैसों के लिये केवल एक वही आकाश है
घाटियों में कड़ी मेहनत कर रही हैं जिप्सी औरतें
चीड़ का काला जंगल खर्राटे ले रहा है
काँय-काँय कर रही हैं उम्मीदें
झील पर बेंत के कितने ही झाड़ क्यों न रोते रहें
सब कुछ ढक जाता है लहरों से झूठे नक्शों से
पूरी आत्मा चरमरा रही थी निराशाओं ने सुखा डाला उसे
लेकिन पूरी लदोगा को याद है मेरी हथेली
मोटे चोंगे पर बिजली ने उकेरे हैं कुछ शब्द
याद है और मुझ पर खुश हैं
इतनी सहजता से लिस्ट की भूमिका निभाते
पुनर्जीवन का प्राक्कथन केक पकाया
लेकिन मेरी भूमिका प्राप्त हुई एक दूसरे अभिनेता को
अनुमति मिली थी उसे फिर से यह भूमिका न करने की
कितना अच्छा है होना जो हैं हम स्वयं
और ज्यादा चालबाज़ी न करना न भले के लिये न बुरे के लिये
आख़िर चर्च के पीछे कहीं हम दफ़्ना डालेंगे प्राम्पटर को
और पियेंगे प्रसन्नता में डूबे हुये.

मैं पी रहा हूँ

मैं पी रहा हूँ भाषा
मैं सुन रहा हूँ प्राचीन लिखावट
मुलाक़ातों के फड़फड़ाते पन्ने
शीघ्र विवाह की कर रहे हैं भविष्यवाणियाँ
जरी का काम अभी भरा नहीं है नफ़रत से
पतले कंधों पर बैठने की नफ़रत से
अभी तक किसी डॉक्टर की ज़रूरत नहीं पड़ी
मेरे सफ़ेद सिर वाले अर्धविरामों को
अभी तक वयस्क नहीं हुआ वो कवि
जो बजाता बाँसुरी पर
मेरी विजयों की धुनें
सफ़ेद चुड़ैल के कमरे में
बुला रही है कब्र की शिला
बात नहीं बन रही प्रेमिका के साथ
व्हेल मछली के जैसा एक बड़ा गिलास
भर डालो ऐश्बेरी और शराब से
गहरी नींद सो रहे हैं तुम्हारे बँगले में
हृदय के चौबारे पर बहस कर रहे हैं
कौन हैं वे जिनकी मृत्यु बेचैन कर रही है मुझे
क्या कह रहे हैं फूलों के ये घर
अपनी आत्मा के कब्रिस्तान में
मैं ढूँढ रहा हूँ अनाम स्त्री की कबर
जिसे यों ही नहीं दफ़्नाया गया यहाँ
इन शब्दों के साथ
मैं बदला ले कर रहूँगी.

मैं मैं ही रहूँगा

मैं मैं ही रहूँगा
कुछ भी हो मैं मैं ही रहूँगा
भले ही तुम्हारा दर्द
खोल डाले मेरे लिये नील लोहित द्वार
मैं स्वयं अपने-आप के लिये रहूँगा
बकाइन का अकेला झाड़
मुझे डर नहीं किसी के भी काँटों का
हँसी नहीं आती किसी के भी पंखों पर
मेरी रक्षा करेंगी भौंहें
झिमड़ियों के बल यायावरी करूँगा
तफ़रीह चाह रहा है हृदय
नीले भ्रमों का अहसास हो गया है उसे
घबराओ नहीं मेरे होंठों
परेशान न हो ओ मेरी बाँसुरियों
आख़िर हर तरह का गढ़ा एक नुकसान है
और रही पहाड़ की बात
उससे तो मौत की गंध आ रही है.

© 2009 Varyam Singh; Licensee Argalaa Magazine.

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