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इक्कीसवीं सदी की जनसंवेदना एवं हिन्दी साहित्य की पत्रिका

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कथा साहित्य

नासिरा शर्मा

संगसार

आसिया जब अलमस्त सी मुलायम बिस्तर पर करवट बदल, कुहनी के बल उठी तो उसे महसूस हुआ जैसे सारी दुनिया ही बदल गयी हो और उसके अंदर एक नई औरत ने जन्म लिया हो, जो हर तरह से भरी पूरी मुतमैन है. उसने दूसरी तरफ़ से झुककर अपने लंबे बालों को उसके औंधे पड़े सीने के नीचे से धीरे से खींचा और बिस्तर से उतरी.

आहिस्ता - आहिस्ता क़दम उठाती हुई आगे बढ़ी, लगा जैसे बदन के सारे जोड़ ज़ंजीरें तोड़, ठुमक रहे हों और रोएँ-रोएँ से उमंगों का सोता फूट रहा हो. बदन इतना हलका जैसे धुनी हुई रुई का गोला. सामने आईने में नज़र आते अपने सरापे पर उसने नज़र डाली. एक निख़ार, एक सम्मोहन, एक हुस्न, एक लावण्य उसके पूरे वजूद को दमका रहा था. कोई जलन, कोई ज़ख़्म, कोई दाग़, किसी तरह का कोई स्याह निशान कहीं मौजूद नहीं था बल्कि बदन पर फ़िसलते हाथों ने अहसास दिलाया जैसे वह फूल की तरह मुलायम और ख़ुशबूदार है.

अपने दोनों हाथ उठाकर उसने भरपूर अँगड़ाई भरी, बदन में छाई गहरी मस्ती फूलों से भरी डाल जैसे झरी. उँगलियों को बालों के बीच फँसाकर उसने दोनों हाथों से माथे पर झुक आये बालों को पीछे की तरफ समेटा और पलकें झपकाईं. लंबे बालों के गुच्छे उसके नंगे नितंब पर लहराए. उसके होठों पर मुस्कान फैल गई. सारा बदन अनजानी गुदगुदाहट से भर गया.

वह इन बालों से कैसा खेल रहा था. कभी बालों की लंबी भारी लट इस तरह छितराता कि महीन जाल उसके सीने पर बिखर जाता. वह उनके चुंबन लेता. बालों को समेटकर आधे चेहरे और सीने को ढकते हुए उसे अपलक निहारता. फिर उन्हें बिस्तर पर दूसरी तरफ फैला, उसकी कमर में हाथ डाल, उसके होठों को इस तरह अपने होठों के आग़ोश में भींच लेता कि वह बेसुध हो जाती और....' आसिया की भारी पलकों में सपनीला समा तैर गया.

कुछ घण्टे पहले झिझकती आसिया दो दिल बनी चिलमन के बाहर खड़ी थी. एकाएक जाने किस जज़्बे से प्रभावित होकर उसने चिलमन हटाई और कमरे में तैर गई. उसके जिस्म पर उगी नागफनी की बेल अपनी चुभन भूल गई. पीछे से पुकारती आवाज़ थककर ख़ामोश हो गई और उसका काँपता वज़ूद एकाएक थम गया. यह थमना मौत नहीं थी बल्कि उस भय से मुक्ति थी कि अंदर घुसते ही तेज़ भूकंप आ जाएगा जो उसके साथ इस आसमान और ज़मीन को भी हिलाकर तबाह और बरबाद कर देगा.

'चिलमन एक ख़ौफ, एक दीवार, एक कैद थी. उसके इस पार एक आज़ादी, एक ज़िंदगी, एक अधिकार है.' सोचकर आसिया हँस पड़ी और गुनगुनाती - सी गुसलख़ाने से कमरे में दाख़िल हुई. खुली खिड़की से हवा का ताज़ा झोंका आया.

'सब कुछ बदल गया - अंदर और बाहर.' उसने झाँककर बाहर देखा. आँखों में दिखता नीला आसमान और पेड़ों के हरे पत्ते कभी इतने चमकदार और सूरज कभी इतना जानदार नज़र नहीं आया था. वह कपड़े उठाने झुकी तभी बालों से ढकी पीठ के नीचे उसको गरम उँगलियों ने छुआ. 'वह जाग गया शायद, ' शरमाई सी आसिया बिना मुड़े सीधी खड़ी हो गई. उँगलियाँ अब हथेली बनकर उसके पैरों को सहला रही थीं. सारी ज़िंदगी की थकान टूटी ज़ंजीर की तरह उसके पैरों से उतरने लगी. वह सब कुछ भूल गई. इतना याद रहा कि दो गरम बाँहें पहली जैसी गरमी और तशनगी के साथ उसकी कमर के गिर्द बँध गईं और वह किसी भँवर की तरह उस बदन से लिपट गई. माथे के क़रीब गरम साँसों की छुअन से आसिया ने चेहरा ऊपर उठाया, भारी पलकें खोलीं, आँखें मिलीं और अंदर की खौलती, उबलती खुशी बाँध तोड़ गई. ज़िंदगी से भरपूर दोनों की हँसी एक साथ एक स्वर में कमरे में गूँज उठी.

'सच है, इंसान को अपने सुख की तलाश ख़ुद पूरी करनी पड़ती है.' आसिया ने गरम होठों को उसके सीने पर रख दिया. शहद के मनों मटके एक साथ लुढ़के, एक - दूसरे के तन की गंध सूँघते, एक - दूसरे को पूरी तरह पाने की लालसा से बेचैन, दोनों खिलते कमलों के बीच मदहोश थे.

सूरज चढ़ा, ढला. और रात दबे - पैर खुली खिड़की से कमरे में दाख़िल हो गई. गली - कूचों में ज़िंदगी की चहल - पहल बदस्तूर क़ायम थी. तौबा की बारगाह खुली थी और गुनाहों के रास्तों पर पहरेदार खड़े थे, मगर इस कमरे में सीसों के सारस हर चीज़ से बेनयाज़ समर्पण के समंदर पर उड़ने के लिए पँख फैलाए कमरे की मदहोश फिज़ा में झूला झूल रहे थे. उन्हें न दुनिया का खौफ़ था, न ज़माने का डर. तलवार, गोली और फाँसी उनके लिए फूलों की सेज थी.

....

माँ की जहाँदीदा नज़रों से आसिया की घबराहट छिपी नहीं रह सकी. मायके में आकर आसिया ज़्यादा खिल उठी थी, मगर रोज़ - रोज़ बाहर निकलना और हर बार नया झूठ बोलना ज़रा मुश्किल काम था.

'दोज़ख की आग ख़रीद रही हो तुम?' माँ के तेवर बदल चुके थे. उन्हें देखकर उसका दिल दहल गया और वह जवाब देने की जगह माँ को फटी नज़रों से देखती रही. जैसे कह रही हो कि ज़िंदगी एक ही तरह के रास्ते पर चलने का नाम नहीं है, माँ!

कई दिन आसिया घर से बाहर नहीं निकली. कुम्हलाई, मुरझाई बिना नहाए - धोए पड़ी रही, मगर चौथे दिन वह उठकर तैयार हुई, जैसे माँ से कहना चाह रही हो कि दोज़ख़ की आग में जीते - जी झुलस चुकी हूँ, मुझसे मेरी जन्नत मत छीनो. सबकी निगाह में यह पाप ही सही, मगर कर लेने दो मुहे यह गुनाह.... यह मेरे अनुभव की उपलब्धि है, इस पर किसी का अधिकार नहीं.

आसिया चली गई. माँ उसके चेहरे के तेवर को देखकर चुप रही या फिर बेटी की पहली सरकशी को देखकर वह समझ नहीं पाई कि बाईस साल की अपने से ऊँचे क़द की इस ख़ूबसूरत बला को वह क्या सज़ा दे?

.......

शाम को आसमा अपने चार बच्चों के साथ लदी - फँदी चली आई. घर की कोई चीज़ अपनी जगह पर टिकी न रह सकी. घुड़दौड़ ने घर में वह तूफान बरपा किया कि आख़िर माँ को मुँह खोलकर उन्हें डाँटना पड़ा, मगर नानी की डाँट कौन सुनता है. खाने के बाद जब सारे शैतान सो गए तो माँ - बेटी अपने - अपने दु:ख - सुख की बातें करने लगीं.

शाम ढले जब आसिया घर में दाखिल हुई तो उसके स्वागत में बच्चों ने वह चीख - पुकार मचाई कि आसिया भूल गई कि अब उसे इनके साथ ऊधम नहीं मचाना चाहिए. इस उछल - कूद में आसिया को वापस घर में देखकर माँ के तेवर भी ढीले हो गए और हँसी - खुशी सब एक साथ बैठकर चाय पीने लगे, टी. वी. पर बच्चों का प्रोग्राम शुरू हो गया था. इसलिए केक - फल खाते बच्चे ख़ामोशी से बैठे थे.

एक रात खाने के बाद बहनें जब अकेली रह गईं तो आसिया ने बहन को ग़ौर से देखा, फिर झिझकते हुए बोली, "सच बताना, क्या वह सब तुम्हें अपने शौहर से मिला जिसकी तमन्ना एक औरत के दिल में रहती है या सिर्फ़ हर साल एक अदद औलाद का तोहफ़ा मिलता रहा?"

"हाँ, मिला बहुत कुछ, घर - बार और ये औलादें, ऊपर आसमान से नहीं गिरीं न?" आसमा ने आँखें इस तरह उठाई जैसे बहन की नादानी पर हँस रही हो, मगर जब बहन के चेहरे पर संजीदगी और आँखों में सवाल को लगातार नाचते पाया तो वह सवाल को समझी और हँसना भूल गई. जवाब के नाम पर एक सुस्ती चेहरे पर उतर आई.

"झूठ.... यही झूठ हमारा ज़ेवर है... यह ज़ेवर मैंने भी पहना, यह नक़ाब मैंने भी आँखों पर डाली, मगर जानती हो मेरे भाग्य में कुछ और बदा था. मुझे मेरा हिस्सा मिला ज़रूर, मगर उसने मेरा सब कुछ बदल डाला."

"मैं समझी नहीं तुम्हारी बात."

"जब कोई किसी अनुभव से गुजरा ही न हो तो उससे ज़िंदगी की गहराई पूछना बेकार है."

उलझी - उलझी आसमा बहन को समझने की कोशिश करने लगी. जब कुछ भी पल्ले न पड़ा तो उसने एक पुराना सवाल दोहराया, "अफ़ज़ल शौहर तो अच्छा है न?"

"हाँ, शरीफ़, सीधे और कमानेवाला.... हर औरत के लिए सिर्फ़ ये खूबियाँ काफ़ी नहीं होतीं."

"यानी?"

"शराफ़त भूखे को खाना, प्यासे को पानी, मरते हुए को ज़िंदगी नहीं बख़्शती. इन चीज़ों के लिए शराफ़त से और ऊँचा उठना पड़ता है, समझी? अगर अब भी औरत होकर न समझ पाई हो तो...." आसिया बहन के ताज़्जुब से खुले मुँह को देखकर चिढ़ गई और बिस्तर पर जाकर लेट गई.

आसमा की गोद का बच्चा दूध के लिए रो पड़ा और वह बहन को छोड़कर लाड़ले को सँभालने में लग गई. आसिया ने उकताई नज़रों से बहन को देखा जिसके बांई तरफ़ तीन और बच्चे बेसुध पड़े सो रहे थे.

........

सूरज के निकलते ही घर में हंगामा शुरू हो गया. कोई गिरा, कोई चीख़ा और कोई रोया. नाश्ते के बाद आसिया मौक़ा देखकर चुपचाप घर से निकल गई.

आसमा रात से उलझन में पड़ी थी. इसलिए बच्चों के पार्क में निकलते ही उसने माँ से पूछा, "सब ठीक तो है न?"

"बुलाकर पूछो उसी से?" माँ एकाएक गुस्से से भड़क उठी.

"वह तो कब की जा चुकी, पूछकर नहीं गई क्या?" ताज्ज़ुब से आसमा ने पूछा.

"वह तज़ुर्बे कर रही है. यहाँ सदियों से जो तज़ुर्बा हम कर रहे हैं वह तो उसकी नज़र में फुज़ूल और बोसीदा बात है. वह अकेली समाज को बदल डालेगी, मर्दों की बराबरी कर उनसे नया कानून लिखवालेगी, चुपचाप बैठी देखती जाओ यह आतशपारा क्या गुल खिलाती है." माँ का चरखा चल गया था और आसमा के कान खड़े हो गए थे. अब धीरे धीरे करके बात उसकी समझ में आने लगी थी.

"मर्द सीग़ा भी करेगा, ब्याहता के रहते दूसरी शादी भी करेगा और बाहर भी जाएगा, उसे कौन रोक सकता है भला? लोग थू - थू भी करेंगे तो फ़र्क़ नहीं पड़ता; मगर औरत ये सब करेगी तो न घर की रहेगी न घाट की. दूसरा शौहर करना तो दूर, किसी से आशनाई भी हुई तो दुनिया उसे हरामकारी और मज़हब उसे जानकारी कहेगा, मगर उसके सिर पर तो इंक़लाब सवार है. एक इंक़लाब ने हमारा सुख छीना, दूसरा आया तो समझो हमारी बची इज़्ज़त भी धूल में मिल जाएगी." माँ पर जैसे दौरा पड़ गया था. उनकी आवाज़ ऊँची होकर फट गई थी.

"सब्र से काम लो." घबराकर आसमा ने माँ को शांत करना चाहा.

"अरे, उसके मियाँ में है कोई ख़राबी, मगर बदबख़्त की क़िस्मत फूटी है." माँ ने रुआँसी आवाज़ में कहा और चुप हो गई, शायद आँसू पीने की कोशिश कर रही थीं.

आसमा सिर झुकाए बच्चों के धुले कपड़ों पर इस्तिरी करने लगी. उसका दिमाग़ तेज़ी से सोच रहा था. अग़र आसिया अफ़ज़ल से खुश नहीं है तो तलाक़ ले ले, मगर यह सब? तलाक़ वह किस बुनियाद पर माँगेगी भला? कोई ख़राबी नहीं अफ़ज़ल में, नशा, बीमारी, बेकारी, पिटाई, लापरवाही कुछ भी नही है जो केस बना सके. नामर्दानगी का इल्ज़ाम उस अर लगाया नहीं जा सकता है. उसको साबित करना पड़ेगा और यह पता लगा कि आसिया ख़ुद कहीं दिलचस्पी रखती है फिर तो क़यामत आ जाएगी, कोर्ट उसे....

"कपड़ा जल रहा है?" माँ चीख़ी.

"ओह!" आसमा चौंकी. छोटी बेटी का लाल फ्राक सीने के पास से जल चुका था. आसमा ने प्लग निकाला, कपड़े समेटे और चुपचाप बेटे के पास जाकर बैठ गई. उसका दिल - दिमाग़ परेशान था. कई तरह के सवाल उसके सामने आ खड़े हुए थे. जिनमें सबसे अहम सवाल था कि शादी के बाद ऐसा क्यों हुआ और वह कौन है जिसने
उसकी बहन का ईमान डगमगा दिया है?

........

शाम को आसमा के शौहर का फोन आया कि वह उसे लेने आने वाला है, मगर माँ की बीमारी का बहाना करके आसमा ने उससे एक दिन और रुकने की इज़ाज़त ले ली. बेटी को रुकता देखकर माँ ने बड़ी बहन को फोन करके बुला लिया और तीनों सिर जोड़कर आसिया की बदक़िस्मती पर आँसू बहाती रहीं. आसिया जब शाम ढले घर में दाख़िल हुई तो ख़ाला ने महसूस नहीं होने दिया कि उन्हें सारी बात का पता चल गया है. वह उसी प्यार - दुलार से मिली और पूछने लगी.

"मायके में कब तक रहना है? हो सके तो ख़ाला के घर भी आओ."

"अब यहीं रहूँगी, मुझे वापस नहीं जाना है." आसिया ने फ़ैसला सुनाया, जिसे सुनकर माँ ए हाथ से घी का डब्बा छूटते छूटते बचा.

"लाओ, मैं बघारती हूँ." आसमा गोद का बच्चा आसिया को दे, माँ ई घबराहट ताड़, हड़िया भूनने में लग गई.

"पूरे एक महीने मैंने तुझे दूध पिलाया था, जब तू तीन महीने की थी और ज़ोहरा सख़्त बीमार थी." ख़ाला ने पुरानी यादों में डूबते हुए कहा.

"अब मैं तीन महीने की बच्ची थोड़े ही हूँ जिसकी ज़रूरत सिर्फ माँ की छाती का दूध होता है. इस घर में कोई नहीं समझता कि मैं बड़ी हो गई हूँ. मेरी ज़रूरत, मेरी चाहत कुछ और है." आसिया ने शिक़वे - भरे लहज़े में कहा.

"अ मेरी बच्ची, तेरी ज़रूरतों को मैं अपनी अकल के मुताबिक़ समझने की कोशिश करूँगी." कहकर ख़ाला ने आसिया को अपनी बाहों में समेट, उसके माथे को चूमा और बालों को सहलाया.

ज़ोहरा एक किनारे बैठी बेटी का चेहरा हैरत से ताकने लगीं. आसमा ने चाय की ट्रे सामने रखी और केक, सूखे मेवे की प्लेट ख़ाला के आगे बढ़ाई. आसिया सँभलकर बैठ गई.

"ज़रूरत का, इनसान की ज़िंदगी में एक उसूल होता है." ख़ाला ने धीमी आवाज़ में कहा.

"मानती हूँ ख़ाला, मगर जब ज़िंदगी इन बोसीदा उसूलों की क़ानूनी क़िताबों से आगे निकल जाए तो?" आसिया ने परेशान आँखें उठाईं और ख़ाला को देखा.

"हर ज़रूरत अगर पूरी की जाए तो फिर अल्लाह ही हफ़िज़ है." ख़ाला ने उसके गालों पर प्यार से चपत मारी.

"आपका पुराना क़ानून नई परेशानियों का हल नहीं आनता, मगर घुटते इंसान की मदद को नहीं पहुँचता, इसलिए आप ज़िंदगी को ख़ौफ़ की दीवारों में चुन देना चाहती हैं ताकि इंसान एक बार मिली ज़िंदगी भी खुलकर न जी सके." कहकर आसिया उठी और कमरे से बाहर निकल गई.

कमरे में थोड़ी देर ख़ामोशी छाई रही. तीनो औरतें अपने - अपने ख़्यालों में डूबी थीं. कमरे में अंधेरा बढ़ते देखकर आसमा ने बत्ती जलाई.

"ये रिश्ते किस ज़माने में औरत - मर्द के बीच नहीं बने, मगर...." माँ ने धीरे से कहा.

"अरे ज़ोहरा, तब अचानक ये रिश्ते बनते थे क्योंकि अचानक ही मौक़ा मिलता था. गर्भ ठहरा या औलाद पैदा हुई. इस बात को बताने के लिए शायद ही उन बेचारों को दूसरा मौक़ा मिलता हो, किसकी औलाद किस घर में पली, किसी को क्या पता है. मगर अब हालात दूसरे हैं. यहाँ बार - बार ज़िंदगी इंसान को मौक़ा देती है. हालात उसका साथ भी देते हैं, क्योंकि इंसान अपने हक़ को पहचानने लगा है और... " ख़ाला बीच में रुक गई.

"हमने आपको इसलिए बुलाया था कि आप उसे समझाएँ, उलटे आप उसी की ज़बान बोलने लगी हैं." ज़ोहरा बहन की इस अदा का बुरा मान गई और उनकी बात बीच में काट दी.

"मेरे कहने का मतलब है कि बात न हलकी है न फ़ुज़ूल, इसलिए थोड़ा सब्र से काम लो, जोश वक़्त के साथ बैठेगा, दबाने से और उफनेगा." बड़ी बहन ने सोचते हुए कहा.

रात को सबने जाने कहाँ - कहाँ की बातें कीं, दु:ख - सुख को आद किया. आसिया ने बच्चों के साथ तकिया फेंककर खेला, माँ से रूई के टूटने पर सलवातें सुनीं और खाने के बाद एक लिहाफ़ में घुसकर सबने आसिया से ढेर सारी कहानियाँ सुनीं. कहानी सुनाते - सुनाते आसिया बच्चों के बीच गहरी नींद में डूब गई.

आधी रात को लगभग जब माँ और ख़ाल अपने कमरे में सो गई तो आसमा ने जाकर बहन को जगाया और दोनों ख़ामोशी से बैठक में आकर बैठ गयीं. आसमा ने पहले ही कॉफ़ी बनाकर रख ली थी. बहन की ख़्वाब में डूबी आँखें देखकर आसमा हल्के से मुस्कुराई.

"लो, पहले तुम्हारी यह नींद टूटे तो आगे बात हो."

दोनों धीरे धीरे कॉफ़ी पीती रहीं. आसमा के चेहरे पर चिंता थी. आसिया के चेहरे पर सपने का सुनहरापन था. कॉफ़ी के प्याले खाली हो गए. आसिया ने पैर उठाकर सोफ़े पर पालथी मारी और बहन की तरफ़ देखा. आसमा ने सोफ़े की पीठ से टेक लगाकर एक लंबी साँस खींची.

"कौन है वह?"

"कौन?" आसिया चौंकी, नींद का ख़ुमार काफ़ूर हो गया.

"तुम मेरा मतलब समझ रही हो, आख़िर वह कौन है?" आसमा का लहज़ा सपाट था.

"एक मर्द." आसिया का स्वर तल्ख़ था.

"उससे तुम्हारा क्या रिश्ता है?" बहन की भौहें तनीं.

"मेरा और उसका रिश्ता? आदम और हव्वा का है." आसिया हँसी.

"आदम और हव्वा का रिशा पाक़ है, मगर औरत - मर्द का जो रिश्ता तुम जी रही हो वह समाज की नज़र में नापाक़ है." आसमा ने आईना उलट दिया.

"समाज? कौन- सा समाज? औरत - मर्द का आपसी रिश्ता किसी समाज, किसी कानून का मोहताज़ नहीं होता है. सो मैं भी नहीं हूँ."

"तुम्हारे चेहरे पर बग़ावत की तुतुहरी बज रही है, मगर यह बग़ावत तुम्हें सिर्फ़ ग़लत रास्ते पर नहीं, बल्कि मौत के रास्ते की तरफ़ भी ढकेल रही है."

"अब मेरा हर रास्ता मौत की ही ओर जाता है."

"तो फिर रास्ता बदल डालो."

"जब मरना हर हालत में है तो रास्ता बदलकर क्या होगा?"

"एक मौत को समाज इज़्ज़त देगा और दूसरे पर लानत भेजेगा."

"तो फिर भेजने दो उन्हें लानत, उस सूरज पर जो ज़मीन को ज़िंदगी देता है, उस मिट्टी पर जो बीज को अपने आग़ोश में लेकर अंकुर फोड़ने के लिए मज़बूर करती है और इस क़ायनात पर जिसका दारोमदार इन्हीं रिश्तों पर क़ायम है, जिसमें हर वज़ूद दूसरे के बिना अधूरा है."

"यह लनतरानी छोड़ो और हक़ीक़त की दुनिया में उतरो."

"हक़ीक़त?"

"हाँ."

"अगर शौहरदार औरत को मर्द पूरी तरह हासिल न हो उसकी अपनी इच्छाओं और तमन्नाओं के मुताबिक़, तो फिर तुम्हारा समाज और क़ानून कोई हल बताता है?"

"तलाक़.... दूसरी शादी..."

"तलाक़? उस इंतज़ार में तो मैं बूढ़ी हो जाऊँगी... फिर आज तक औरत को तलाक़ माँगने पर क्या उसे आज़ादी मिलती रही है जो मैं...."

"फिर शराफ़त, शराफ़त की ज़िंदगी गिज़ारो, औरतों के लिए शरीफ़ होना ही..."

"शराफ़त कुछ औरतों की मज़बूरी हो सकती है, क्योंकि उनकी तरफ़ कोई आँख उठाकर देखना पसंद नहीं करता है और इस मज़बूरी में वे पाक पवित्र बनी रह जाती हैं मगर मेरे साथ यह मज़बूरी नहीं है."

"तुम अफ़ज़ल को ज़लील कर रही हो?"

"बिल्कुल नहीं, वह बिस्तर पर मेरा पूरक नहीं है, यह मैं जानती हूँ. उसका जोड़ा भी कहीं होगा और...."

"मैं भी इसी घर में पैदा हुई, पली - बढ़ी और अपनी ज़िंदगी गुज़ार रही हूँ, कम और ज़्यादा का संतुलन बनाकर शादीशुदा ज़िंदगी को खुशहाल बनाने की हम दोनों कोशिश करते हैं, मगर तुम? तुम भी तो उसी घर में पैदा हुई, पली - बढ़ी और अचानक यह तब्दीली...
वह भी शादी से पहले नहीं शादी के बाद, आख़िर क्यों?"

"इसलिए कि मोहब्बत ने मेरा दरवाज़ा खटखटाया है." आसिया ने कहा सहज स्वर में, मगर उसके तेवर को देखकर आसमा के माथे पर पसीना छलक आया.

बहन के इस तरह किए गए सवालों से आसिया के दिल में उथल-पुथल मच गई थी. उसने यह रिश्ता ख़ुद तलाश नहीं किया था. शादी के बाद अफ़ज़ल से मिली, हर ख़ुशी को उसने उमंग के साथ जिया था, मगर शादी के एक साल बाद वह कौन सा कमज़ोर लम्हा था, जब वह आ टकराया. अपनी बातों, अपनी नज़रों से उसने इस तरह आसिया से ख़ुद उसका परिचय कराया कि आसिया दंग रह गई थी.

दूर से पैदा हुई क़शिश पहले ही दिन तन - गाथा में नहीं बदली थी बल्कि जब दोनों हर तरह के तर्क, अंकुश और व्यथा पर विजयी हो गए तो इस मुक़ाम पर पहुँचे थे. वह अफ़ज़ल से उम्र में दो - तीन साल बड़ा था. आधी दुनिया घूम चुका था. पढ़े - लिखे होने के साथ उसके पास अनुभव था, नज़रिया था जो आसिया के सामने से कई तरह के जाले साफ़ करने में, उसे विश्वास देने और समाज को सियासी तौर से समझने में मददगार ही नहीं हुए थे बल्कि बातों से एक अजीब तरह का लुत्फ़ भी देते थे. अफ़ज़ल के साथ उसकी ज़िंदगी बँधे - बँधाए ढर्रे पर चल रही थी, मगर इसके साथ रोज़ एक नई बात मालूम होती. रोज़ एक तलाश शुरू होती जो उसे बड़े आराम से एक ठहरी ज़िंदगी से आगे ले जाती. आसिया उम्र के जिस दौर में थी वह जिज्ञासा से भरी उम्र का दौर था. उसकी यह ज़रूरत अफ़ज़ल नहीं बल्कि वह पूरी कर रहा था.

"वह शादीशुदा है?" आसमा ने सवाल ठोंका.

"नहीं." आसिया ने मासूमियत से गर्दन हिलाई.

"तुमसे शादी करेगा?" उपेक्षा - भरे स्वर में आसमा बोली.

"मैंने अभी तक इस सवाल पर सोचा ही नहीं था."

"अगर तुम्हारे वज़ूद में एक नए इनसान ने साँस ली तो?"

"क़यामत के दिन बच्चे माँ के नाम से पुकारे जाएँगे, बाप के नुत्फ़े से नहीं."

दोनों बहनें आमने - सामने बैठीं चुपचाप - सी चंद लम्हे टकटकी बाँधे एक - दूसरे को देखती रहीं, जैसे अपनी बात समझाने की कोशिश कर कर रही हों. फिर जाने क्या हुआ कि आसमा की बड़ी - बड़ी आँखों में पानी जमा होने लगा.

"यह क्या?" आसिया चौंक पड़ी, अपनी जगह से उठकर बहन के पास बैठ गई.

"तुम्हारी ज़िंदगी की कौन - सी मंज़िल होगी, उसके अंजाम से घबराती हूँ." आसमा ने प्यार से बहन का गला थपथपाया. आँखों में भरे आँसू गालों पर लुढ़क आए.

"डरती मैं भी हूँ मगर गुनाह का यह पक्का मीठा फल छोड़ने का दिल नहीं चाहता." आसिया ने बहन के सिर पर प्यार से अपना सिर रखते हुए कहा.

"कोशिश करो." आसमा ने भर्राई आवाज़ में कहा.

"भूल मत करना कि मुझे अपना अंजाम पता नहीं, मगर मोहब्बत को लौटाने का दम मुझमें नहीं था. इस तन को सुलाना अब मेरे बस की बात नहीं है." आसिया क़ालीन पर बहन के पैरों के पास आकर बैठ गई और बहन की आँखों में झाँकते हुए गहरी आवाज़ में बोली.

जाने किस जज़्बे के तहत आसमा ने बहन के ऊपर उठे मासूम चेहरे को पल भर ग़ौर से देखा, चूमा और ज़ोर से उसे सीने से लगाया. आसिया का मन बहन की हालत देखकर भर आया. इन सबके बीच रहते हुए आसिया ने उस रिश्ते को समंदर में पड़े मोती की तरह सँभाल लिया था. लौटना, ठहरना और वापस मुड़ना उसके बस में नहीं रह गया था. मगर एक दिन यही सारे लोग उससे जवाब तलब करेंगे, इस रिश्ते का नाम पूछेंगे, पाप और पुण्य का फर्क समझाएँगे, उसे सोचने पर मज़बूर करेंगे.... यह सब रिश्ता बनने से पहले उसने नहीं सोचा था. वह मिल गया, यही उपलब्धि उसे सिर झुकाने पर नहीं बल्कि उसमें विचित्र शक्ति और विश्वास देने के साथ सिर उठाने पर उकसाती रही है और आज.... आसिया की पलकों पर टिके आँसू आबसार बन गए.

"इन मोतियों को यों मत गिराओ, इन्हें सँभालकर रखो, ये बहुत क़ीमती हैं पगली.." आसमा ने बहन की झमझमाती आँखों से गिरते आँसुओं को अपनी उँगलियों से साफ किया.

आसिया ने पास पड़े कागज़ के रूमाल को उठाया, चेहरा व आँखें ख़ुश्क कीं और अपने को सँभालने लगी मगर आँसू थे कि रुकने का नाम नहीं ले रहे थे. सिसकियाँ इतनी शिद्दत लिए हुए थीं, जैसे उसका सीना तोड़कर बाहर निकल आएँगी.

"तुम मुझे ग़लत मत समझना..... ज़िंदगी मैंने भी जी है और क़रीब से देखी भी है. मेरे पास मेरे अपने तज़ुर्बे हैं.... हो सकता है, वे तुम्हें बेकार लगें, मगर.... शायद तुम्हारे काम भी आ जाएँ..." आसमा ने बहन का हाथ अपने हाथ में लेते हुए सरगोशी के अंदाज़ में कहा.

आसिया ने बीरबहूटी जैसी लाल - लाल आँखें बहन की तरफ उठाईं और क़ालीन से उठकर सोफ़े पर आ बैठी. आसमा अपनी जगह से उठी और सोफ़े के बाज़ू पर टिककर बहन के गले में बाँहें डाल, उसके सिर पर अपनी ठुड्डी रख, कुछ पल बैठी रही.

"हो सकता है कुछ नाज़ुक लम्हों में अफ़ज़ल को तुम्हारी मदद की ज़रूरत होती हो.... जो तुम्हें मिला, तुमने जाना, उसकी रौशनी में सोचो..... जानती हो, औरत चाहे तो अपने साथी को भरपूर मर्द बना ले और न चाहे तो नामर्द.... अपने सुख को अफ़ज़ल में तलाश करो, हो सकता है, छिपा खज़ाना तुम्हारे हाथ आ लगे और तुम्हें दोगुने सुख से सराबोर कर जाए...." आसमा ने गहरी आवाज़ में नपे - तुले शब्दों में अपनी बात ख़त्म की और बहन का चेहरा अपनी तरफ़ मोड़ा.

आसिया ने हैरत से बहन को ताका. आसमा का चेहरा उसे बिल्कुल अलग - सा दिखा और उसकी आँखों का ठहरा भाव जाने कैसी चमक से धुँधला गया था. आसिया के होंठ काँपे और भारी पलकें झुक गयीं.

..........

बहन सुबह माँ को यह दिलासा देकर चली गई कि आसिया अपने को बदलने की कोशिश करेगी. वह अपने ख़ून पर यक़ीन रखे. दोपहर को ख़ाला भी इतमिनान दिलाकर चली गईं कि आख़िर आसिया है तो इनसान ही, कोई फ़रिश्ता तो नहीं, एक दिन ज़रूर समझेगी घर का मतलब. जब बच्चे से गोद भरेगी तो उसको ख़ुद अपनी ज़मीन की तलाश होगी. अभी शादी को दो साल ही तो गुज़रे हैं.... ठोकर खाए बिना कोई सँभलता है? बहन के कहने - सुनने से माँ का दिल काफ़ी सँभल चुका था. माँ को दोपहर में किसी दूर के रिश्तेदार के घर पुरसे में जाना था. वह चली गई.

भरा - पूरा घर एकाएक खाली हो गया और आसिया तन्हा रह गई. उसे वे दिन याद आने लगे जब बाबा ज़िंदा थे. आसिया और आसमा के बीच एक भाई भी था जो पाँच साल का होकर डिप्थिरिया से मर गया था. दादा - दादी थे जिनकी मौत के कुछ दिन बाद बाबा को हार्ट - अटैक हुआ था. घर की आबादी और ख़ुशहाली घटकर सन्नाटे में बदलने लगी थी. जाने कितनी घटनाएँ थीं जिन्होंने आसमा और आसिया को बहन से ज़्यादा सहेली बनने में मदद की थी. तरह - तरह के खेल, ऊटपटाँग बातें, हार - जीत, लड़ाई - आँसू, शिक़वे - शिकायत, जलन, दु:ख सुख के बाद जब आसमा की शादी हो गई तो वह एकाएक अकेली हो गई. हर जगह आसमा की कमी खटकती. पढ़ना - लिखना, घूमना - फिरना फीका फीका लगता.

जब आसमा कुछ दिन बाद अपने शौहर के साथ घर लौटी तो वह बजाय आसिया के साथ बैठने के अपने शौहर के आगे - पीछे घूमती रहती थी. वे दोनों आपस में बातें करते ठहाके लगाते. यह देखकर आसिया को गहरा आघात लगा और जलन में मुँह से निकला था - 'बेईमान...' फिर एक बच्चे के बाद दूसरा बच्चा आसमा को उससे इतनी दूर ले गया कि उसे अपनी ही बहन से चिढ़ होने लगी थी. मगर कल रात, इतने दिनों बाद उसे अपनी बहन वापस मिली थी. खुशी का एहसास पुरानी उदासी को पोंछ गया था.

पुरानी यादों को उमंग से भरी आसिया उठी और उसने आलमारी से एलबम निकाले. बचपन की अपनी सारी तस्वीरें देखकर वह हँसने लगी. दोनो बहनें एक - सी लंबी फ्रॉकें पहन गले में बाँहें डाले आगे से टूटे दाँत दिखाती हँस रही थी. दूसरी तस्वीर में उसकी दो कसी चोटियाँ सीने पर पड़ी थीं. आसमा ने बाल मोड़कर बना रखे थे. कान के दोनों तरफ बड़े - बड़े रिबन के फूल लगे थे मगर धूप से बचने के लिए उसने अजीब तरह से मुँह बिचकाकर आँखें बंद कर रखी थीं.

दूसरे एलबम में सबकी शादियों की तस्वीरें थीं. पहले पन्ने पर माँ और बाबा खड़े थे. माँ की शकल कभी आसमा की तरह लगती, कभी अपनी तरह. फ़िर दूसरे पन्ने पर आसमा और राशिद का रंगीन फोटोग्राफ था. तीसरे पन्ने पर उसका और अफ़ज़ल का.... वह शरमाई खड़ी है और अफ़ज़ल किसी से हाथ मिला रहा है.

'कहते हैं ज़न्नत में जोड़े बन जाते हैं और उनकी शादी भी वहीं हो जाती है. मेरी शादी जन्नत में भला किससे हुई होगी, अफ़ज़ल से या उससे?' उसने सोचा.

काफ़ी देर तस्वीरों को देखने के बाद वह उठी और रात के खाने के इंतज़ाम में लग गई. उसने रेडियो खोल रखा था, ठीक पहले की तरह, ताकि उसे तनहाई का एहसास न हो. गानों के साथ कभी वह गुनगुनाती, कभी उसकी लय पर काम करते हुए हाथ तेजी से चलाती.

खाना ख़ुद पकाया जा सकता है, पैसा भी ख़ुद कमाया जा सकता है, मगर ख़ुद अपना महबूब आप नहीं बनाया जा सकता है.' सोचते हुए हँस पड़ी आसिया.

खाना पक गया तो वह सामान समेटकर बैठक में लौट आई. उसने एलबम उठाए और उन्हें वापस आलमारी में रखने लगी. तभी उसमें से एक लिफ़ाफ़ा नीचे गिरा. झुककर उसने लिफ़ाफ़ा उठाया और खोला. कुछ रंगीन तस्वीरें थीं. शादी के कुछ दिनों बाद ही पहली ईद पड़ी थी.

आसिया की आँखों के सामने शादी के शुरू के दिन घूम गए. ईद का दिन. घर मेहमानों से भरा है. दूर - क़रीब के रिश्ते की ननदें भाभी को घेरकर मज़ाक और दुलार दिखा रही हैं. चूँकि शादी के बाद उसकी यह पहली ईद है इसलिए ईदों के साथ शादी के दिन न आ सकने वालों से उसे मुँह दिखाई भी मिल रही है. रस्म के मुताबिक उसने झुककर सबके आगे शीरीनी की सेनी बढ़ाई.

"बहू सलीक़े की है." अफ़ज़ल की दादी की आवाज़ में संतोष था.

"कमसिन है, घर के माहौल में आसानी से रच - बस जाएगी." फूफी ने फैसला सुनाया.

"यह क्या दरियादिली दिखाई बेटी, अभी तो तुम्हारे खाने - खेलने के दिन हैं." चचिया सास ने अपनी बेटियों के हाथ उपहारों से भरे देखकर बड़े ताज्ज़ुब से कहा.

"उन्हें पसंद आए, उन पर सजते भी तो हैं." आसिया ने हँसकर ननदों की तरफ देखा.

"मुबारक हो तुम्हें, बड़े दिलवाली बहू पाई है." सास की बड़ी बहन ने पसंदीदा नज़रों से आसिया को देखते हुए खुशी से भरकर बहन को गले लगाया.

.........

हिना की ख़ुशबू से कमरा महक रहा था. मौसम दिलकश और हवा मतवाली थी. अफ़ज़ल ने खिड़की खोल दी, तारों से भरा आसमान झिलमिलाती चादर तानकर खड़ा हो गया. खुश मगन आसिया फूलों के ज़ेवर से लदी - फँदी कमरे में दाख़िल हुई तो अफ़ज़ल से रहा न गया, हँसता हुआ आसिया के क़रीब पहुँचकर बोला, "आपका हमसे ईद मिलना रह गया."

आसिया बुरी तरह झेंप गई. अफ़ज़ल ने उसे छुआ और वह छुई-मुई बन गई. आसिया के दिल में हसरत थी कि अफ़ज़ल उसको बार - बार देखे, उसकी तारीफ़ करे और धीरे - धीरे उसकी सजावट उससे दूर कर, अपनी बाहों में उसे भरे. अफ़ज़ल को गुनगुना पसंद नहीं था. वह तूफ़ान की तरह उसको अपने साथ बहा ले जाता और फिर जब वह पूरे वेग से बह रही होती तो वह एकाएक शांत हो जाता और आसिया अभी 'थोड़ा और' के एहसास में डूबी मुश्किल से उस बिखराव से अपने को बाहर निकाल पाती और ज़ोर से अफ़ज़ल का हाथ अपनी तरफ़ खींचती. वह 'अभी आया', कहकर उसके पास से उठ जाता. अफ़ज़ल उसे वक़्त से पहले भँवर में ले कूदता और मझधार में छोड़कर बाहर निकल आता.

अफ़ज़ल को मँहगे और ख़ूबसूरत तोहफ़े देने का बहुत शौक़ था. आसिया को बहुत अच्छा लगता, बाहर घूमना, सजना, ख़ाली वक़्त में कुछ पढ़ना और सास - ससुर के लाड़ में भरकर कभी - कभी कुछ पकाना और ढेरों तारीफ़ें सुनना. कुछ महीनों बाद इस एकाकी ज़िंदगी से वह घबराने लगी. कोई कोर्स करने के लिए सोचने लगी. अफ़ज़ल ने इजाज़त दे दी और जब कोर्स ख़त्म हो गया तो ज़िंदगी भी एक नए रास्ते पर मुड़ गई. उसमें किसका कितना दोष था?

आसिया ने तस्वीरें लिफ़ाफ़े में वापस रखीं और आलमारी बंद करके वापस मुड़ी. उसके दिल और दिमाग़ की कैफ़ियत बदल रही थी. कई तरह के सवाल उसके सामने आकर उससे जवाब तलब कर रहे थे. ये जन्नत की शादियाँ होश आने पर जवानी का रोग क्यों बन जाती हैं? शौहर से तन और मन का मिलना बहुत ज़रूरी होता है? जिससे तन, मन और मस्तिष्क सब मिल जाएँ वह शौहर नहीं होता है, फिर वह क्या होता है.... दुनिया की नज़र में सब गुनाह? गुनाह आखिर इतना ख़ूबसूरत, इतना लबरेज़, इतना लतीफ़ क्यों होता है? गुनाह में इतनी ताक़त कहाँ से आ जाती है कि वह सवाब को छोटाकर समाज और क़ानून को चुनौती देने लगता है?

आसिया गुसलख़ाने में घुस गई और जी भरकर नहाई. नल बंद किया और सामने से तौलिया उठाई, पानी की बूँदे उसके बदन पर ओस की बूँद की तरह ठहर गई थीं. वह बदन पोंछना भूल गई.

'अपने इस बदन के साथ इतने साल रही मगर जान न पाई यह कैसा है और जो पल भर के लिए इससे जुड़ा उसने पुरानी गाथा गा दी - बदन पर कहाँ पर काला तिल है और कहाँ का स्पर्श फ़ाख़्ता के मुलायम परों जैसा रेशमी है. उसके तलवों में ख़म है और पैरों की उँगलियों के पीछे का गदबदा हिस्सा ठीक फूलों की पँखुड़ियों की तरह कटावदार है, उसकी पिंडली चिड़िया के पंजे की तरह नाज़ुक और लचकदार है. उसके बदन का रंग पीली चँपा जैसा सुनहरा और महकदार है और....'

उसने सिर झटका मगर उत्सुक निगाहें फिर अपने को तौलने - परखने लगीं. साँसें तेज होती गईं. उसने घबराकर तौलिए से अपना बदन लपेटा.

नहाने से दिल और दिमाग़ काफ़ी हलका हो गया था. चाय बनाकर वह प्याली उठाए कमरे में वापस आई. उसने टी. वी. का बटन दबाया. अपने ही मुल्क़ में नहीं बल्कि सारी दुनिया में आग लगी हुई है. कहीं धर्म, कहीं रंग, कहीं नस्ल, कहीं विचारधारा, कहीं सत्ता, कहीं अंकुश इंसानी दु:खों का कारण बनी हुई है. आदमी ने तरक़्क़ी कहाँ की है? इससे तो अच्छा वह ज़माना था, जब सब एक बड़े कुनबे की शकल में रहते, बाँटकर खाते, बाढ़, भूकंप, तूफ़ान से डरते, उन्हें ख़ुदा मानते. रंग, नस्ल और ख़ुदग़र्ज़ी ने उनके बीच तब गहरी खाईयाँ नहीं खोदी थीं. वे अपने नुत्फ़े के लिए जान नहीं देते थे बल्कि बच्चों के बाप की पहचान का प्रश्न उनके लिए कोई मसला नहीं था.

दरवाज़े की घण्टी न बजती तो अपनी रौ में आसिया सोच की धारा में बहती जाती. माँ वापस लौट आई थी और कपड़े बदल रही थी. उसने दस्तरख़ान बिछाकर उस पर खाना चुन दिया. खाना खाते हुए माँ वहाँ आई औरतों और लड़कियों का ज़िक्र करती रहीं. आसिया बड़े ध्यान से उनकी बातें सुनती रही.

रात को सोते हुए माँ का दिल चाहा कि बेटी से पूछे कि आख़िर ससुरालवाले भी उसकी राह देख रहे होंगे. बेहतर है कि वह उस ज़िंदगी को उजड़ने से पहले बसा ले. एक घर बनाने की कोशिश करे, मगर कुछ सोचकर चुप रह गई कि कहीं कच्ची मिट्टी पर वार करने से बना - बनाया खेल बिगड़ न जाए.

आसिया सारे दिन घर में रहती. माँ के साथ कुछ पुराने बक्से साफ़ करने, कूड़ा - कबाड़ा फेंकने में और घर को नए तरीक़े से सजाने में उनकी मदद करती रही. माँ को इत्मिनान हो गया कि आसमा की बातों का असर आसिया पर हो रहा है. ख़ुदा ने चाहा तो वह एकदम बदल जाएगी. ख़ुद ही वापस जाने की ख़्वाहिश करेगी.

........

एक रोज़ सुबह - सुबह आसिया ने जो दरवाज़ा खोला तो अफ़ज़ल को फूलों के गुलदस्ते के साथ सामने खड़ा पाया. उसने पूरा दरवाज़ा खोल दिया. अफ़ज़ल ने गुलदस्ता उसके हाथों में पकड़ाते हुए कहा, "ज़ालिम, एक बार तो फोन करके अपने बीमार का हाल पूछ लेतीं?

"कौन है?" पूछती माँ आसिया के पीछे आकर खड़ी हो गई.

अफ़ज़ल ने उन्हें सलाम किया और कार से उतरती समधिन ने आगे बढ़कर उन्हें गले लगाया. ससुर फल और मिठाई की छोटी - छोटी टोकरियाँ उठाए अंदर दाख़िल हुए और बोले, "वाह रे ज़माना, हम चुप रहे तो आपने हमारी चीज़ अपनी समझकर रख ली."

"सच, घर सूना हो गया है. मैं अभी आती न, सोचा साल भर बाद गई है. रह ले महीना - दो महीना, मग़र आपके दामाद का बाहर जाना हो र्हा है." सास ने एक अदा से समधिन से कहा.

"आपकी अमानत पूरे दस दिन सँभालकर रखी. आपकी बहू है, जब चाहें ले जाएँ." माँ का चेहरा ख़ुशी से गुलनार हो र्हा था.

"आप अकेली यहाँ रहती हैं; आख़िर हमारे साथ रहें न!" अफ़ज़ल ने सास से कहा.

"ठीक ही तो कहता है आख़िर आपका बेटा जो है." समधी बोले.

"किस मुँह से शुक्र अदा करूँ उस ऊपरवाले का जिसने आप जैसा घराना और हीरे जैसा दामाद दिया है."

झिझकती सी आसिया चाय की ट्रे लेकर कमरे मेन दाख़िल हुई. अफ़ज़ल की आँखें शरारत से चमकीं. शरमाई - सी आसिया सास - ससुर की दुआएँ लेती अफ़ज़ल की नज़रों से बचती माँ से लगकर बैठ गई.

"बेटी अफ़ज़ल को अंदर ले जाओ." माँ ने बेटी से कहा.

"हाँ, हम बूढ़ों में बँधे बैठे न रहो तुम लोग, " सास ने कहा.

आसिया ने अपना सामान समेटकर बांध लिया. माँ ने बेटी की बलाएँ लीं और दामाद के कंधे पर प्यार से हाथ रखा. सास ने उनकी हालत देखकर कहा, "बहन, मैंने लड़की पैदा नहीं की तो क्या, आसिया ने इतने दिन दूर रहकर एहसास दिला दिया कि लड़की होती बड़ी मोहिनी है. आपके दामाद के जाने के बाद उसे मैं आपके पास कुछ दिनों के लिए फिर भेज दूँगी."

आसिया के जाने के बाद माँ थोड़ी देर आँसू बहाती रहीं, फिर उठकर उन्होंने शुक्राने की नमाज़ अदा की और आसमा को फोन मिलाने लगीं.

"आसिया ससुराल गई, मेरे सिर से ज़िम्मेदारी का बोझ हटा. अगले महीने अगर राशिद को छुट्टी हो तो मन्नत बढ़ा लेते हैं."

"ठीक है." उधर से आसमा की ख़ुशी में डूबी आवाज़ उभरी.

"मैं तुम्हारी ख़ाला को भी इत्तिला दे दूँ." कहकर माँ ने फोन रख दिया.

आसिया ससुराल आकर अफ़जल के कपड़े ठीक करने, नये कपड़े सिलवाने, ज़रूरत की चीजें खरीदने जुट गई थी. अफ़ज़ल अपनी फर्म की तरफ से छ: महीने के लिए यूरोप जा रहा था. उसका इरादा था कि कोर्स के खत्म होते ही वह आसिया को वहाँ बुला लेगा और फिर वे दोनों पूरा घूमकर लौटेंगे.
काम की व्यस्तता में अकसर आसिया का दिल भटक जाता. फोन पर हाथ जाता, नंब घुमाती मगर फिर घबराकर रख देती और बजते टेलीफोन को कभी खुद नहीं उठाती थी. मगर उस मुलायम बिस्तर की यद, जिसने उसे जिंदगी का अर्थ समझाया था, उसे पूरी तरह भूलने की कोशिश करती.

"अपने बंदों से यह दोहरा खेल कैसा? जब जज्बा दिया था तो बहाव भी सीधा देता? एक साथ दो आशिकों को मेरे दामन में डालने का अर्थ आसिया बेदम होकर कह उठती.

रात को वह अपने को ढीला छोड़ देती. अफ़ज़ल उसकी इस अदा पर मिट जाता. आखिर एक दिन उसने कह दिया, "बहुत बदल गई हो."
"यानी?" आसिया की आँखें फैलीं. चेहरे पर से डर की परछाई गुजर गई

"कुछ दिन मां के घर हो आया करो, वहाँ से आकर पहे की तरह भोली, हसीन औरा" बाकी बातें हँसी में डूब गई

सब कुछ समझकर आसिया की आँखें झुक गई अफ़ज़ल ने उस पर बोसों की बौछार कर दी.

कुछ दिन अच्छे गुजर गए मगर जल्द ही दिल अफ़ज़ल के नाम पर टिका नहीं रह सका. दिल और दिमाग पर काबू पाती तो बदन बेकाबू होकर अपना साथी तलाश करता. उसे भी एक खास तापमान पर चढ़ने और उतने की आदत हो गयी थी.

अब अफ़ज़ल के स्पर्श उसे तनाव में ला रहे थे. उसकी मांसपेशियाँ इस तरह से तन जातीं और उसकी खुजली बंद होती मुट्ठी कई बार अफ़ज़ल को परे धकेलना चाहती. एक खौलता आक्रोश ज्वालामुखी बनकर उबलता हुआ दिलो-दिमाग पर छाने लगता जैसे कोई जबरदस्ती अपनी हदें पार कर रहा हो. तैश में आकर उसे लगता कि वह अपनी पूरी ताकत से चीखे कि घर की हर नाजुक चीज चकनाचूर हो जाए.

"क्या बात है?" कभी-कभी उसके तनते-अकड़ते बदन की ऐंठन को अफ़ज़ल महसूस करता. उसे लगता कि आसिया उसकी बाँहों में होने के बावजूद उसके पास नहीं है.

"कुछ नहीं, थक जाती हूं जल्दी." आसिया उसकी आवाज सुनकर होश में आ जाती. ख्वाब से हकीकत में उतर आती और कहीं बात खुल न जाए, इस घबराहट में वह अफ़ज़ल से लिपटकर उसके बाजुओं को चूम लेती, मग दिल में दर्द उठता.

"अपने बदन का यह अपमान आखिर क्यों सहती है. "आँखें जल उठतीं.

"आँसू भला क्यों? कहो ते न जाऊँ?" दीवानगी में भरकर अफ़ज़ल उसे झिंझोड़ता.

"नहीं नहीं, बस यों ही", कहकर हँस पड़ती आसिया और अफ़ज़ल उसके चेहरे पर, बदन पर चुंबनों की मुहरें लगा देता.

अपने तन पर काबू पाते, अपनी इच्छाओं का गला घोंटते और अपने उपर अत्याचार करते-करते आखिर वह हार गई जानती है कि अफ़ज़ल ने उसे प्यार का सबक सिखाया मगर प्यार करना, बदन की जबान में एक-दूसरे तक पहुंचना और उस विस्तार में अपने साथ किसी को पाने, फिर सारे जहाँ को उसमें देखना यह सब तो उसको किसी और ने बताया है. क्या मर्द भी एका-दूसरे से इतने जुदा होते हैं. इस दूसरे मर्द ने उसे ऐसा क्या दिया है कि जो चाहक भी पहले से जुड़ी नहीं रह पाती है? क्या इस हकीकत को वह कबूल कर ले कि तन हर एक से अपनी जबान में बात नहीं कर सकता है?

वह अपने बहकते कदम पर पहरा लगाती और खुद को तलाश करती हुई यह बात समझने की कोशिश करती कि कहीं दो जगह बंटी जिंदगी उसे समझा तो नहीं रही है कि दुनियावी जिंदगी से हटकर एक रूहानी जिंदगी भी होती है और इन दोनों के बीच तालमेल बिठाकर, अपनी पहली जिंदगी का विस्तार मानक दूसरी जिंदगी को जीना होगा. एक का संबंध समाज में होगा और दूसरे का उसके निज से?

आसिया के दिमाग ने दिल को समझाया मगर दिल तन को न समझा सका. यह कोशिश भी जब बेकार गई तो हिम्मत करके आसिया ने तय किया कि वह अफ़ज़ल को सब कुछ बता देगी, कुछ नहीं छिपाएगी. इस तरह तनाव में हर रातबसर करना उसके बस की बात नहीं है. उसके सारे तंतु टूट रहे हैं. वह अफ़ज़ल को सुख देने की जगह एक जिंता में डुबो देती है. फैसला कर वह उस रात आराम से सोई मग सुबह उठते ही उसे दूसरी फिक्र लग गई

"दुनिया क्या कहेगी? उसे बुरी औरत का नाम देगी, मगर उसने तो कभी अपने को अच्छी औरत कहलाने का सपना नीं देखा. सच्ची ईमानदारी ज़रूरत की बात करना बेईमानी है क्या? अच्छी औरत के परदे में वह दोहरी जिंदगी कब तक जिएगी? वह खराब औरत है, हाँ वह बदकार और आवारा औरत है." आसिया सिर पकड़कर बैठ जाती और उसे लगता कि अब इस घर में पल-भर भी ठहरना उसके लिए मुश्किल है. जब वह उठक अफ़ज़ल से बात करने जाती तो रास्ता रोककर आसमा खड़ी होती.

"इस तन की खातिर सब कुछ दांव पर लगा दिया?

"हाँ, कौन, इससे बचा हुआ है? तुम भी नहीं तुम तन को आबादी मानक घर का बहाना बनाती हो और तन को रूह से अलग देखती हो मगर मैं किसी बहाने की ज़रूरत महसूस नहीं करती हूं. मेरे लिए तन ही सब कुछ है, वही जिंदगी की हकीकत और वही मेरे जीने का लक्ष्य"

आसमन से जाने क्या-क्या वार्तालाप ख़यालों में कर जाती आसिया. अंत में उसने फैसला ले लिया कि अफ़ज़ल को अभी आराम से जाने दे मगर जिस दिन वह वापस जाएगा उसे वह अपना यह फैसला सुना देगी. इस छा: महीने के अरसे में तीनों को एका-दूसरे के प्रति अपनी जिम्मेदारी का भी अहसास हो जाएगा और वे परख भी लीं कि खुद वे कितने पानी में हैं.

अफ़ज़ल चला गया. घर सूना और दिल उदास हो गया. कई दिन सोते-जागते, थकान उतारते गुजर गए. मां और आसमा ने बहुत जोर दिया मगर वह उनके साथ नहीं गई उन्हीं यह जानकर खुशी हुई कि बेटा माना-मर्यादा का अर्थ समझने लगी है.

अब आसिया को उसके टेलीफोन का इंतजार था, खुद फोन करना उसे पसंद न था क्योंकि वह बड़े आराम से अब एक दूर खड़े दर्श्क की तरह अपने साथ होनेवाली घटनाओं और दुर्घटनाओं का अवलोकन कर सकती है. वह अंदर से इतनी बड़ी और पुख्ता हो चुकी है कि दूसरे के किए गए फैसले का केवल कारण ही नीं समझ सकती है, बल्कि उसको सम्मान देना भी जान गई है.

एक दिन दोपहर को फोन की घँटी बज उठी. बेख़याली में उसने फोन उठाया. आवाज सुनकर धक से रह गई इतने दिनों के इंतजार ने उससे उम्मीद छीन ली थी. उन खूबसूरत गुजरे क्षणें को महज एक इत्तफाक समझकर, उसकी हसीन यादों को संजोकर रखने का मन बना चुकी थी, मगर अब वह आसमा को कैसे समझाए कि उसका तजुर्बा किसी और का सच नहीं हो सकता है और कसी दूसरे का सच उसका अपना तजुर्बा नहीं बन सकता है.

"कुछ देर के लिए हो आओ न, आज महीना भर हो गया है घर से निकले, न कहीं आई-गई" सास ने पीछे से बहू की मुनहार की.

"फिर कभी", कहकर आसिया ने फोन रख दिया. वह घबरा गई थी. इन्हें क्या पता यह किसका फोन था और वे उसे कहाँ भेजने का इस तरह इसरार कर रही हैं.
दो महीने के इस लंबे बिरहा ने मिलन की इस घड़ी को नया अर्थ दे दिया था. मेंह टूटकर बरसा, प्यासी नदी उबलने लगी, आबशार दोगुने वेग से गै मगर न तपिश ठंडी पड़ी न प्यास बुझी. दोनों अपनी शक्ता, इ अपनी मजबूरी और अपनी-अपनी ज़रूरत समझ चुके थे. दोनों में से कसी ने कुछ कहने पूछने और सफाई देने की ज़रूरत नहीं नहीं महसूस की, जहाँ से बिछुड़े थे वहीं आकर फिर मिल गये थे. जैसे साथ-साथ बहना ही उनकी तकदीर हो.

"तुम्हारे इस पाक जिस्म पर आज मैं नमाज अदा करूँगा ताकि यह एबादतगाह मेरे लिए और मैं उसके लिए सदा महफूज रहूँ." कहकर वह आसिया के पहलू से उठा और उसके पैरों के पास आकर खड़ा हो गया. सीने पर हाथ रखकर नियत बांधी, फिर दोनों हाथ उठाकर खामोशी से उस खुदा को याद किया जिसका दूसरा नाम मोहब्बत है फिर रूकू में झुका और उस नंगी छाती के बीच सिजदे में गिरा.

दोनों संगमरमरी गुंबदों के बीच बालों से भरा सिर आस्ताने पर टिका, अपनी निष्ठा और वफ़ादारी की कसम आता रहा. सूरज ढलने लगा. चारों तरफ से उड़ते परिंदे थके-हारे-से इन गुंबदों में पनाह लेने लगे ताकि नई सुबह के नमूदार होने पर वे और ऊँची उड़ान भर सकें.
आदम-हव्वा के इस खामोश समर्पण में किसी तीसे के वजूद की कोई गुंजाइश नहीं बची थी. तन एक हो गए. धड़कन एक हो गई अपने को देखने, इस दुनिया को पहचानने और खुदा तक पहुंचने का रास्ता एक होकर बदन में पेवस्त हो गया, जिसको वे बेतहाशा चूम रहे थे.

शाम ढले जब आसिया घर नहीं लौटी तो सास बेचैन हो उठी. ससुर जब दतर से लौटे तो अपने साथ खबर भी लाए कि किसी जवाना-मर्द औरत को जानकारी के जुर्म में पकड़ा गया हैअइ. सुनकर सास की जान निकल गई शहर में बम फटने से फिर हंगामा, ऐसी हालत में आसिया कहाँ अटक गई
"लगता है जिधर कर्फ्यू लगा है उसी इलाके में गई होगी", ससुर ने कहा.

"अगली दफा से घर का पता और फोन नंबर लिख लूँगी, बेचारी को आज जाना नसीब हुआ तो यह आफत आ पड़ी." सास ने हाथ मलते हुए कहा
रात आँखों-आंखों में कट गई कहाँ फोन करें? मां और आसमा मन्नत बढ़ाने शहर गई हैं सहेलियों का न नाम पता है, न टेलीफोन नंबर. जब कर्फ्यू हटने का ऐलान हो गया और दोपहर तक आसिया नहीं लौटी तो दोनों परेशान हो उठे.

"अफ़ज़ल को क्या जवाब दूँगी? कहेगा कि अम्मा आसिया की हिफाजत न कर सकीं?" सास ने आँखें पोंछी.

"समधिन भी क्या सोचेंगी कि बहू का ख़याल न किया, अकेले जाने दिया." ससुर लस्ता-से पड़ गए.

दोनों ने मुशकिलकुश की तस्वीह घुमाना शुरू कर दिया. आए गए के सामने मुंह नहीं खोला. फिक्र ने उन्हें चंद घण्टों में अधमा बना दिया था.

दोस्तों ने उसे किसी तरह जेल जाने से पहले ही छुड़ा लिया था मगर वह इस बात से उन सबसे खफा था. जब वह बका-झककर खामोश हुआ तो सादिक ने कमरे की खामोशी तोड़ी.

"उसका और तुम्हारा रिश्ता मैं मानता हूं, तुम्हारी अपनी निजी जिंदगी से ताल्लुक रखता है मगर जो कुछ तुम लोगों के साथ आज घटा वह अब तुम्हारा मामला नहीं रह गया बल्कि उसका ताल्लुक हम से और इस समाज से है. इसलिए अभी तक हम चुप थे, मगर इस मामले में अब तुम चुप होगे और हम अपना फर्ज निभाएँगे."

"कुछ सोचो तो, गुनाहगार तो बराबर का मैं भी हुआ, सजा सिर्फ उसे क्यों मिले? वह तड़पा.

"तुम्हें छुड़ाना आसान थ, तुम छूट गए. अब हम उसे छुड़ाने की कोशिश करेंगे, इतमीनान रखो. असलम ने समझाया.

"एक बार फिर मर्द दगाबाज साबित हो गया." उसने दोनों हाथों से कान के पास फड़कती रग पकड़ी.

"यार! बोर मत करो, बात को समझो. यहाँ साथ-साथ लैला-मजनूँ की कहानी नहीं दोहरानी, यहाँ ज़रूरत है उसे बचाने की, आज एक की शामत आई है, कल हजारों पकड़ी जाएँगी." नुईम ने झुँझलाकर कहा.

"इसको तनाव बहुत है, कहीं दिमाग की रग न फट जाए, कहो तो इंजेक्शन देकर सुला दूँ ताकि हम बैठक चैन से सलाहा-मशविरा कर सकें. "फारूख ने सादिक के कान में कहा.

दोस्तों ने जबरदस्ती उसे बिस्त पर लिटाया. फारूख ने अपना दवा का बैग खोला, इंजेक्शन तैयार किया और यह कहते हुए उसके बाजू में घोंप दिया, "बात तुम्हारी नहीं है बल्कि हम जो निजाम लाना चाहते हैं, आसिया जो पाना चाहती है या औरतें अपनी तरह जीना चाहती हैं, यह उसकी है. उनकी तिलमिलाहट इसलिए है कि आसिया अब उनके लिए चुनौती बन गई है और हमारे संघर्ष की मशाला"

"मगर मैं तो अपने को उन्हीं जाहिलों की पंक्ति में खड़ा पा रहा हूं." वह बैन करता सा चीखा.

"यकीन रखो, उसे सजा नहीं होने देंगे. हाँ, जब मुकदमा चलेगा और बहस शुरू होगी तो हम अपना नजरिया इस जोरदार तरीके से सामने रोंगे कि इन जालिमों को बराल झाँकने के अलावा कुछ समझ में नहीं आएगा. "सादिक ने तल्खी से कहा.

इधर वह गहरी नींद में डूब गया. उधर शहला और सादिया नाकाम लौटीं. अपने प्रभाव, जाना-पहान और रिश्वत की पेश्कश के बावजूद वे इस हकीकत से बुरी तह टकाई कि एक ही समाज में दो मापदंड हैं. मर्द के लिए क्षमा और औरत के लिए कड़ा दंडा सबके सिर झुक गए. आसिया कोतवाली से जेल पहुंचा दी गई थी. मामला अब संगीन हो चुका था.

ये सारे लोग समाज के उस वर्ग से हैं जो पढ़ा-लाइ प्रगतिशील कहलाता है. इनके सामने आज इतने गूढ़ सवाल आ खड़े हुए हैं कि उनसे बचकर भाग नहीं सकते हैं. ये डॉक्टर, इंजीनियर, वकील, लेखक, अध्यापक, पत्रकार अपने पेशे के बाद का वक्त समाज को गलत सियासत और धर्म के शिकंजे से निकालने में खर्च करते हैं ताकि आनेवाले दिनों में इनसान सेहतमंत जिंदगी जी सके.

बुद्धिजीवियों की चीखा-पुकार से सोये लोग जागने लगे. उनके सामने प्रश्न था कि यह कैसे मुमकिन है कि मर्द औरत के आकर्षण को नजरांदाज कर सारे दिन आमने-सामने बैठे सिर्र्फ कुअन की तलवत किया करें? इस रस्साकशी में संगसार की तारीख आगे बढ़ गई संसद में, समाचारा-पत्रों में, धार्मिक स्थानों में जमकर बहस शुरू हो गई मोलवियों के बीच गरम और नरम दिल बन गए. गम दल का पलड़ा भारी था क्योंकि सत्ता उनके हाथ में थी. नरम दलवालों के साथ पढ़ा-लिखा वर्ग और जनता का एक बहुत बड़ा हिस्सा था, इसलिए गरम दलवालों की दाल नहीं गल पा रही थी. लोगों में अजीब तनतनाहट थी. जैसे वे पूछना चाह रहे हों कि वे आगे जा रहे हैं या पीछे लौट रहे हैं?

जेल की कोठरी में बैठी आसिया दिन गिनना भूल गई है. शहतूत के ढेरों पेड़ उसकी कोठरी के पस हैं. इसलिए अकसर जेल की कर्मचारी औरतें और लड़कियाँ वहीं शहतूत बीनने पहुंच जाती हैं कभी-कभी कोई लड़की हाथ सलाखों में डाल उसकी तरफ शहतूत से भरी मुट्ठी बढ़ाती है. कभीआसिया शहतूत का एक दाना मुंह में डाल लेती है, कभी इंकार कर देती है.

"हरजाई है?" लड़कियाँ आपस में फुसफुसातीं.

"नहीं, फाहिशा है!" शंका भरी अधेड़ आवाजें टकातीं.

"नहीं, वह भी नहीं, यह तो आयश है." बूढ़ी औरतें फैसला सुनातीं.

"आयशा, आयश, आयशा???"

पेड़ों पर चहचहाती चिड़िया उड़ जाती है. पके शहतूत डालों से झर जाते हैं और सन्नाटे में बैठी वह दिला-ही-दिल में उन हैरतजदा आवाजों को अपने से दूर जाता सुनती है.

"क्या मैं आसिया नहीं आयशा हूं? अगर सचमुच आयशा होती तो मेरा अंजाम यह होता?"

आसमान का रंग लाल हो जात, आसिया की आँखें अंगारे बन जातीं और रात की सियाही फैलते ही अंगारे धीरे-धीरे करके राख में बदल जाते.

सारी दौड़ा-धूप के बावजूद कोर्ट ने अपना फैसला सुना दिया. मां और आसमा की तरफ से रहम की अपील हुई सासा-ससुर ने इस सजा को आरोप मानकर उसके खिलाफ अपील दायर की. नरम दिलवाले मौलवियों ने शरीयत की सारी किताबें चाट डालीं. सबूत पेश किए गए कि संगसार का जिक्र कहीं नहीं है मगर कोर्ट ने अपना जल्दबाजी में लिया फैसला वापस नहीं लिया. उन्हें डर था कि इस तरह उनके हर कदम पर रोक लग जाएगी और हरकत पर सवाल उठेंगे. उनकी सत्ता की बुनियाद जिस खौफ और दशहत पर टिकी हएअइ वह खत्म हो जाएगी. इसलिए बिना किसी झिझक के एलान हुआ कि मौका-ए-वारदात पर आसिया के पकडे जाने की वजह से उसे कल संसार कर दिया जाएगा. उसका साथी फरार है और लाख कोशिशों के बावजूद भी अब तक पकड़ा नहीं जा सका है. मगर उसनकी तलाश जारी है.
कागज तैयार थे. देर करने की गुंजाइश नहीं थी. वरना बगावत अपने डैने फैला लेती. इसलिए उसी रोज, जब दिन शाम से गले मिलने के लिए आतुर था, कब्र में पैर लटकाए एक बुजुर्ग कोर्ट में आखिरी खानापूरी के लिए जेल पहुंचे.

"अपना गुनाह कबूल करो." काले जूते एकाएक आसिया के पास आकर ठहर गए और भारी आवाज की चोट ने खामोशी तोडत्री.

आसैय ने चौंककर नजरें उठाई और लरजती-सी उठ खड़ी हुई. सामने खड़े बुजुर्ग ने अपनी सफेद दाढ़ी पर हाथ फेरा और दाहिने हाथ में पकड़ी तस्वीह घुमाई उनकी आँखों में आश्चर्या-भरा कुतुहल कौंधा, जैसे वे अपने को यकीन दिलाना चाह रहे हों कि सामने खड़ी कुंवारी मरियम मां जैसी पाका-मासूम चेहरेवाली यह कमसिन लड़की भी गुनाहगार हो सकती है जिसको खुदा ने सब कुछ दिया है?

"तुम्हें शैतान ने बहकाया है, और तुमने खुदा का रास्ता छोड़कर शैतान के कामों में हाथ बंटाया, खुदा का कहर तुम पर है, बेहतर है कि तुम खुद गुनाह का एतराफ कर लो."नसीहत में डूबी उनकी आवाज उभरी और बुजुर्गों ने आँखें बंद कर लीं.

आसिया के माथे और होठों के उपर पसीने की बूंदें छलकीं और फिर वह पूरी की पूरी पसीने में नहा गई बचपन का खौफ उसके सामने खड़ा था, मगर उसकी आँखें अब भी बुजुर्ग के चेहरे को ताक रही थी, जैसे उनकी कही बातों का सिरा-पैर उसकी समझ में न आ रहा हो.

आसिया के मासूम चेहरे पर फैली भोली आँखों को बुजुर्ग ने एक बार नजर भरकर देखा, मगर जल्दी ही नजरें हटा लीं. यह वजूद आखिर किस जज्बे से सरशार है? उनके अंदर से सवाल उभरा, मगर अपनी कही बात का जवाब न मिलने को वे अपनी तौहीन समझ ज्यादा देर ठहर न सके और मुड़ गए. साथ आए लोग भी लौट गए. उनका फर्ज पूरा हो गया.

आसिया घुटनों पर सिर रखकर बैठ गई जैसे सिजदे में माथा टेका हो. अगर यह गुनाह था तो फिर उपरवाले ने इस बदन में यह प्यास भरी क्यों? शाम को धुंधलका बड़े मैदान में दौड़ने लगा, शहतूत के पेड़ों ने अपनी डालियाँ झुका दीं और आसिया के चारों तरफ रात पसरक बैठ गई
बंद आँखों के सामने उसका चेहरा उभरा, आसिया के पपड़ी पड़े होठों पर मुसकान फैल गई फिर आसमा की आँसू-भरी आँखें, मां का छाती पीटते हुए बैन करना, सासा-ससुर का बेकरारी से रोना, अफ़ज़ल का हैरत से उसको ताकना, बचपन, जवानी - सारी जिदंगी रील की तरह खुलकर सामने आ खड़ी हुई आँखों में कुछ गरमा-गरम बहकर घुटनों के कपड़ों में जज्ब हुआ.

पौ फट गई कोठरी के बाहर शहतूत की नंगी डालियाँ हवा में लहराई और आसिया ने अपनी आँखें उठाक उस सवाल पूछनेवाले को ताज्जुब से देखा. पतझड़ की हवा सूखे पत्तों को उड़ाती गुजर गई

"कोई आखरी ख्वाहिशा"?

सुनकर हँस पड़ी आसिया और हँसती ही चली गई जब जीना चाहती थी तब सबने तन पर सौ-सौ पहरे लगाए, किसी ने पूछा कि औरत तेरी ख्वाहिश क्या है? और आज जब मौत सिरहाने खड़ी है तो उससे पूछा जा रहा है कि बता तेरी आखिरी तमन्ना क्या है?

"आखिरी इच्छा, किसी को देखना, मिलना, कुछ कहना, जो चाहो बिना झिण्झक कहो." सवाल फिर दोहराया गया.

"हाँ." एकाएक हँसते-हँसते आसिया रूक गई चेहरे पर गंभीरता फैल गई आँखों में जिंदगी की चमक लौट आईसलाखों पर कसी मुट्ठी ढीली पड़ी और आरजू की गहरी घुलाहट में दिल की अवाज, आखिरी ख्वाहिश में महक उठी.

"मेरी जन्नत, एक पल के लिए ही मुझे वापस कर दो."
......

उस रात औरतों ने चूल्हे नहीं जलाए, मर्दों ने खाना नहीं
खाया, सब एक दूसरे से आँखें चुराते रहे. यदि आसिया गुनहगार थी तो फिर उसके संगसार होने पर यह दर्द, यह कसक उनके दिलों को क्यों मथ रही थी.

© 2009 Nasira Sharma; Licensee Argalaa Magazine.

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