अर्गला

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कथा साहित्य

सीमा शफ़क़

पुनर्पाठ - 'संगसार'

'जिसको कह दे नब्ज़ ऐसी मेरी बीमारी नहीं'

प्यारी आसिया,

सलाम,

इस वक्त जब मैं तुम्हें ये ख़त लिखने बैठी हूँ सामने न्यूज़ टेलीविज़न पर श्रीनगर में मौसम की पहली भारी बर्फ़बारी की ख़बरपट्टी तस्वीरों के साथ चल रही है. बेदाग़, सुफ़ैद, नई नकोर बेकराँ चादर में लिपटा श्रीनगर, अपने और ' अपनों ' तक हाइबरनेट करने के उस सूकूनों - इत्मिनान में डूबा हुआ जिसका तसव्वुर कभी पाब्लो नेरूदा ने अपनी ख़ूबसूरत नज़्म 'कीपिंग क्वाइट 'में किया था. जम्मू ख़ुश्क है. एक उदास, मनहूस, मल्गिजे अँधेरे की चादर में सिखर दोपहरों में जम्मू के आसमान पर इन दिनों तन जाती है गलन और सिर्फ़ गलन.

ख़ामख़ाह का रौला रप्पा नहीं मचाया था इन गर्मियों में जम्मू वालों ने. मस अले वाक़ई संगीन हें.

मेरी सुनो ! हरिद्वार में थी तो मसूरी में किन मिन सी बर्फ़ गिरने की ख़बर मेरे लिए ऐसे ही सख़्त नज़ले की वज़्ह बनती थी जैसे पुराने, गए वक्तों के किस्सों में शालीन, पतिव्रता बीवियाँ गैर के तौलियों से बेख़्याली में बदन पोंछकर हामला हो जाया करती हैं. ये तो जम्मू दो - दो स्वेटर पहने रजाई में गर्म पानी की बोतल सीने से दबाए 'बड़ी वी ' सी गुड़ी - मुड़ी पड़ी हूँ फ़र्क बस इतना कि मेरे हाथों में तस्वीह नहीं कलम है और मैं अल्लाह से नहीं उसकी प्यारी लाड़ली, बेटी यानी तुम से मुख़ातिब हूँ.

मेरी बेतकल्लुफ़ी पर हैरान मत हो ओ दोस्त कि हम एक दूसरे से अनजान नहीं. एक दूसरे को ख़ूब जानते पहचानते हैं. मैं ही क्यूँ हर वो शख़्स जो ' मक्कू ' का मुरीद है तुमसे शनासा है तुम उससे! तुम्हारे यहाँ जाने उसे क्या कहते होंगे! पर यहाँ बर्फ़ की ईंट रंदे पर घिस उसके बुरादे को लड्डू या ओवल शेप दे कर बनाया जाता है फिर उसे नीले, पीले, हरे, गुलाबी, कत्थई इतने ही गीले मीठे रंगो से शराबोर कर दिया जाता है. तिनके पर टिका बर्फ़ का ये नन्हा सा मीठा पहाड़, मँहगी आइस्क्रीमों के प्रलोभन ताक पर रख, सारे हाईजीन, फाईजीन की ऐसी तैसी फेर, माँ बाप की नसीहतों, तमाचों से बेपरवाह, बेख़ौफ़. जिन्होनें आनन्द से आँखे मींच, होंठ भर - भर का चूसा है. उन सबका तुमसे क़रीबी रिश्ता निकलता है आसिया ' अपनी कहती हूँ. आज जब भी उम्र की निस्क़ सदी मुझसे बस पाँच बरस के फ़ासले पर खड़ी है तब भी ' मक्कू ' का ठेला देखकर मुँह में पानी भर आता है. ख़्वाह इसमें पड़ने वाले रंग ज़हरीले नुकसानदेह हों और ग़रीब ठेले वाले मुर्दों तले बिछने वाली बर्फ़ की सिल्लियाँ पोस्टमार्टम हाउस वालों से औने पौने में खरीदने में रत्ती गुरेज़ ना करते हों तो भी सब कुछ जानते समझते,

'उसी को देख कर जीते हैं जिस काफ़िर पे दम निकले,

जीवन ऐसा ही है दोस्त. अपनी अपनी ज़िद. अपना अपना जूनून! अकसर ज़िद और जूनून का इस्तेमाल, बेख़्याली या जल्दबाज़ी में इकठ्ठा कर दिया जाता है पर दोनों में बड़ा फ़र्क़ है. ज़िद मस्लहत पसंद होती है पाला बदल जाती है. जूनूँ मस्लहतों से कोसों दूर भागता है. जभी ना देखो ज़िद की बेशुमार कहानियों से अदबी, ग़ैर अदबी, सियासी, मज़हबी. गरज़ की दुनिया का सारा ही तो कारोबार चल रहा है ये किस्से इक़रात में है पर जूनूँ के ये मक्कू सबके हिस्से नहीं आते आसिया कि ज़हर गले उतार पाना सब के बस की बात नहीं होती! गलाज़त अफोर्ड कर लेना सब से कहाँ बन पड़ता है. समझदारों से तो क़त्तई नहीं.

पर फिर भी कमाल देखो (अगर तुम्हारे ही संदर्भ में बात करूँ) आसिया की समझदारी सीने पर पल्लू सँवारने फिर सँवेरे पल्लू पर भी ब्रोच खोबने में उम्र ख़्वार कर लेती है... फिर भी दुत्कारी जाती है फरामोश कर दी जाती है. जूनूँ खड़ाऊँ पहने, अलफ़नंगा: कभी 'राविया ' कभी मोजेल ' की शक्ल में सड़क पर दौड़ता है और पूजा जाता है. याद रखा जाता है. लिहाज़ा तुम भी ऐसी ज़लील मौत कैसे मर सकती हो? हैरान हूँ.

मैंने बहुत सर पटका आसिया पर समझ नहीं पाई कि तुम्हें आसिया (चक्की) पुकारने से नासिरा जी की क्या मुराद है जबकि दाना ए गंदुम की तरह पिसी तुम! सद शुक्र उस माँ के कि जिसके पाँवो तले जन्नत होती है कि वही (चाहे गुस्से में सही) तुम्हें, तुम्हारे सही नाम से पुकारती है. "देखे जाओ ये 'आतशापारा ' क्या गुल..... " मैंने फौरन लुग्त देखी लुग्त में ' आतश 'यानी आग फारसी का शब्द स्त्रीलिंग के रूप में दर्ज है. 'आतशपारा 'अंगारा शब्द ये भी फ़ारसी का है पर पुल्लिंग. तुम आतश होती तो क्या मुश्किल थी कि आग को औरत से मंसूब करके मैं जम कर लफ़ज़ों की कबड्डी खेलती और तुम्हें लेकर अपने फ़र्ज़ से ऐसे ही सुबुकदोश हो जाती है जैसे इस बिना पर तुम्हें अदब का 'बेजोड़ शाहकार ' साबित करने वाले बागी हो गए होंगे. पर तुम्हारे आतशपारा होने ने मुझे चक्कर दे दिया. फिर एक कज भी है मुझमें! दुनिया कर ले दोस्त, मैं 'थैया - थैया ' को 'चल ' छैया - छैया ' तस्लीम कर बंदरिया बनी ट्रेन के टाप या घर के आँगन में नहीं नाच सकती. मेरे लिए ' थैया ' और छैया के बीच का फ़र्क मौत और ज़िन्दगी के दरमियाँ फ़ासले जितना वसीह है. और अब जब कि मैंने तय ये किया है कि मैं आइन्दा तुम्हें आसिया नहीं ' आतशपारा ' पुकारूँगी तो फिर मैं ये भी जानती हूँ दोस्त, कि एक बार को कपड़े पे मोमिया की गोट लगाकर उसमें पानी क़ैद किया जा सकता है. पर अंगारे को कोई लिबास नहीं पहनाया जा सकता तो फिर ये भी तय ठहरा कि किसी बायलॉजिकल प्रॉसेस से नहीं हुआ तो तुम्हारी अपनी ही राख से प्रोडूयूज होगा.

लिहाज़ा मैं तुम्हारी कहनी का पुनर्पाठ ' संगसार ' नही आतशपारा ' के ज़ेरे उन्वान इसलिए किए जाने की तज्वीज़ करती हूँ कि

क़हर है थोड़ी सी भी गफ़लत तरीक़े इश्क़ में
आँख झपकी क़ैस की और सामने महमिल ना था.

अफ़साना खुला है कि खजुराहो की गुफ़ाओं में से किसी एक ने अपने दरवाज़े वा कर दिये हैं. अंदर मद्धम नीली रौशनी में सब नज़र आ रहा है. लम्हों ने घुटनों के बल बैठ कौन सा इस्म पढ़ा है कि सदियों से दीवारों में मुंजमिद बुतों में जान पड़ गई है. सदियों की प्यास कहीं ओस चाटकर मिटती है? लिहाज़ा... !दूर बहुत दूर समन्दर साहिलों पर सर पटक रहा है कि कहीं जो रेंग कर क़रीब आ वो भी ये लम्हा विटनेस कर सकता. नादान, कभी ऐसी ज़िद ना करता गर उनका हाल देखता जो क़रीब बहुत क़रीब खड़े सब देख रहे हैं! सब कुछ! उदास, बहुत उदास, किसी पर भी इस जिसी मिलाप के बायस वो हैजानी कैफ़ियत तारी नहीं होती जो एक नार्मल इंसान में होनी चाहिए, ज़रूर होनी चाहिए. वजह साफ़ है 'बाज़ौक़ ' पड़ने वालों ने उन्वान (संगसार) में ही तुम्हारा ख़ते पेशानी जो पढ़ लिया है. लिहाज़ा अब क्या देखें? बिस्तर पर वस्ल में डूबी, अंजाम रसीदा तुम या जो ये कुछ कदमों के फ़ासले पर खून मिट्टी में लिथड़ी निष्चेष्ट हो चली तुम्हारी देह पड़ी है जिसके चारो तरफ़ छोटे बड़े गोल, नुकीले तुम्हारे लहू से सने पत्थरों का अंबार लगा है. माथे के ऐन बीच लटकता माँस का लोथड़ा, तुम्हारी खूबसूरत आँखे कोटरों से बाहर उबली हुई.. खूबसूरत, घने स्याह बाल खून सूख जाने के बायस रस्सी से बटे मिट्टी में लोट रहे हैं. आसमान में गिद्धों का झुण्ड उमड़ आया है. जाने मेरा वहम है कि तुमने सचमुच आह की है.. कुछ स्वास बाक़ी है शायद.. पर गिद्धों में सब्र कहाँ? टूट पड़ते हैं.

अब, जब मैं ये जानती हूँ आतशपारा कि मेरा ये ख़्याल, ख़्याले ख़ाम नहीं हक़ीक़त है कैसे मुमकिन है मैं तुम्हें वैसे तसव्वुर कर सकूँ जैसे देख रही हूँ. तुम्हारी ये दास्तान, मैं हजार राहें बदल कर देख लूँ, पर पहुँचेगी संगसारी तक, तब इसे आगे पढ़ना ऐसे ही था जैसे अमरीकियों के हत्थे चढ़े सद्दाम का कोर्ट ट्रायल उसका अंजाम जानने के लिए फालो करना. पर कमाल ये हुआ कि बजाए तुम्हारा हाथ छोड़ देने के तुम्हारी उँगलियों पर मेरी उँगलियों की गिरिफ़्त और मज़बूत हो गई आतशपारा मुझे तुम पर टूट कर प्यार आया तुम्हारा हाथ थामे - थामे मैं बेचैनी की सी हालत में पंलग की पुश्त से सर टिकाए पलकें मूँद कर बैठ गई. तेज़ बुखार की सी कैफ़ियत कि जब मुझे हमेशा ऐसा मालुम देता है कि पहाड़ से लुढ़क लुढ़क कर बड़े बड़े पत्थर मेरी तरफ़ आ रहे हों कुदरत का करिश्मा तो देखो दोस्त कि पहाड़ के तसव्वुर के साथ ही उसपे उतरी सूरज की किरनों की तरह मेरे जेहन की तारीकियों को रसूल हमजातोव की 'मेरा दागिस्तान ' की वो सतरें रौशन कर गई जिन्हें मैनें सैकड़ो दफ़ा गीता के मुकद्दस श्लोक की तरह बाँचा है.

'राई का पहाड़ मत बनाओ. पहाड़ को राई तो कभी मत करो'

रवायत तो ये ही है. किया तो यही जाता है आतशपारा. इसके ख़िलाफ़, इससे पलट कुछ करना, कुछ कहना यानी गैब से हुक्म मुझे ये कि

'है जुनूँ तेरा नया, पैदा नया वीराना कर'

और अब जब मैं ये जानती हूँ सब कुछ कितना आसान हो गया है

एक मुकम्मल अफ़साने के मुत्तालिक़ मार्खिज़ ने जो कहा उसे इस एक शेर के ज़ाविए से कितनी खूबसूरती से समझा जा सकता है

वो जलवा जो ओझल भी है, सामने भी
वो जलवा चुराने को जी चाहता है

जो सामने है वो है तुम्हारा गुनाह जानकारी और उसके कारण तुम्हें मिली 'संगसारी' की सज़ा जिसका कि शरीयत की सारी किताबों में कहीं ज़िक्र नहीं है. ऐसा कोई कानून नही है मैं जो सामने है जो दिख रहा है उसके बारे मैं क़त्तई बात नही करूँगी. इसलिए बिल्कुल नहीं कि अपने एक अफ़साने में एक मुस्लिम लड़की के हाथों एक सुअर की जान बचा कर सख़्त मुशिकलों में आई मैं आइन्दा के लिए चेत गई या ख़ौफ़ज़दा हूँ बिल्कुल नही कोई वक्त हो जो भी कीमत चुकानी पड़े मेरी परवरिश में इंसानियत का कलमा बुंलद आवाज़ में इस तरह पढ़ने की तालीम दी गई जैसे देहात के स्कूलों में मास्साब बच्चों को इस तरह पहाड़े याद कराते हैं कि अपना नाम भूल जाए भले... ताज़िंदगी पहाड़े नही भूलते. मैं इसलिए ऐसा नही करूगीं कि अस्सी के दशक में जब कभी तुम्हारा वुज़ूद अमल में आया होगा, से आज 2008 तक जब हम एक सदी उधर से इधर आ गये है तब मैं तुम्हें तनक़ीद के उस घुनाए बोसीदा रैंप पर बार बार वाक नही करा सकती जिसपे पहले दसियों मर्तबा चल तुम्हारी टाँगो में सूजन उतर आई हो. तुमने कहा नही तो क्या हुआ आतशपारा मैं समझ सकती हूँ कि ऐसी वज़ादार के लिए ये कितना मुश्किल रहा होगा जो सामने हैं उसमें दसियों बार लिया गया होगा आगे भी लिखा जाएगा. मैं तुम्हारे दास्तान के सिर्फ़ उस हिस्से की बात करूँगी जो ओझल मगर तुम्हारी और अफ़साने दोनों की रूह है. कुचले, रौदें रास्तों को छोड़कर आओ उधर चलें जहाँ कोई आता जाता नहीं.

"भूल मत करना कि मुझे अपना अंजाम पता नहीं मगर मोहब्बत को लौटाने का दम मुझमे नहीं था इस तन को सुलाना अब मेरे बस की बात नही"

ज़ाहिरा ये जुमले अपनी बहन आसमा से तुमने कहे हैं पर जो तुम्हें जानने के ढब जानते हैं आतशपारा जिनकी शिरयानों में तुम लहू की तरह बहती हो वो इस बात के लिए परमात्मा से भी शर्त बद सकते हैं कि तुम लफ़ज़ों का ऐसा बेजा और गैरज़रूरी इस्तेमाल कभी नहीं कर सकतीं. तुम किसी रैदास की हाँक "कौन है"? के जवाब मैं मीरा.... मैं मीरा... कहकर उलझ सकती हैं पर तुम 'मैं' भी और 'आतशपारा' भी दो बातें क़तई नईं कहोगी. ख़ामोश भले ही खड़ी रहो. 'मुहब्बत भी और 'तन' भी. ना ये जुमले तुम्हारे नहीं.

तो फिर "तन ही मेरा सब कुछ है. वही मेरी जिंदगी की हक़ीकत वही मेरा लक्ष्य " भी तुम्हारा कैसे हो सकता है? कैसे अपनी सारी सोच समझ ताक पर रखकर मैं ये मान लूँ कि सावन में बीनाई खो बैठी तुम सब हरा हरा देखती हो. कितना बड़ा झोल है इस मसल में. कोई जन्म से आँखे खो बैठा हो तो फिर उसकी रंगो की तो राम जाने या वो. पर सावन में जिसकी रौशनी गई हो उसने गर्मी, सर्दी, पतझड़, बहार के ये सब रंग बीनाई खो देने से क़ब्ल देखे तो होंगे. जाने तो होंगे. कैसे मुमकिन है कि मुख्तलिक़ मौसमों में देखे वो बेहिसाब रंग 'बिसर कर बस एक हरा' रंग अस्पताल के पर्दो की तरह आपके तसव्वुर के गिर्द कनात की तरह तन जाए. बीनाई गई है.... याददाश्त थोड़े ही.

तुमसे बेहतर कौन समझेगा आतशपारा 'इश्क ' वस्ल की ही नहीं हिज्र की रातों को भी रौशन करता है. जब आपको आपका तसव्वुर उस मुकाम पर ले जाता है जहाँ से जवाल (पतन ) मुमकिन नहीं.. रूह चिरागा हो जाती है.

तुम्हे लेकर मेरा तसव्वुर उसी मुक़ाम पे है आतशपारा.

तुम्हारे पुनर्पाठ में 'उस' कफ़स की तीलीयों का टूटना लाज़िमी है जिसमें तुम्हारी और कितनी ही और आतशपारा की परवाज़ क़ैद हैं. किसी सूरत अगर 'नासिरा आपा ' ये काम अंजाम दे सकें तो तुम्हारे किरदार, तुम्हारी रूह को वो वुस अत मिल सकेगी जो तुम्हारा हक़ है. ये इसलिए भी बेहद ज़रूरी है कि तुम्हारी ' आखिरी ख़्वाहिश ' जो मिज़गाँ पर ठहरे अश्क़ सी थरथरा रही है इस ख़ौफ़ से कि "मैं बचूँगी या मिलूँगी धूल में" भी अपनी पूर्णता पा लेगी. जन्नत एक पल के लिए नहीं मुस्तकिल तौर्पे तुम्हारे नाम लिख जाएगी. जन्नत ही तो चाहिए ना..
आपा दे दीजिए आतशपारा को, प्लीज़ दे दीजिए (लो कह दिया ) दुनिया ने तुम्हारे ख़ाली हाथ देखे. पर जो दौलतें जो नेमते तुम्हारे हिस्से आई वो उन कई तथाकथित ' आबाद ' जिंदगियों के लिए रश्क की वजह बन सकती हैं जिन्होंने तुम्हारी बरबादी पर जी भर कर तन्ज़ कसे हैं, तुम्हें करूणा नहीं हिकारत की नज़र से देखा है. रोको मत, मुहे कहने दो.

किसी तबाही की ऐसी दास्तान में सबसे ज़रूरी दो इन्ग्रेडियेंट्स..... अव्वल तो मर्द की बेवफ़ाई, और अगर वो बदकिस्मती से शौहर है तो ' राज्य ' की तरह दूसरी 'आवश्यक बुराई' तस्लीम किया जाता है! देखो ज़रा आतशपारा महबूब और शौहर दोनो में से कोई भी सितमगर, बेवफ़ा नही तुम्हारे दोनो हाथ भरे हैं. दोनों तुम्हें टूट कर चाहते है.. तुम्हें 'कन्सीव ' करते कित्ती सी रही होगी आज की अव्वल सफ़ की अफ़सानानिगार ' सोचो जब आसान सुरक्षित रास्ते खुले हों तब एक सूनी पुरख़तर राह चुनना और फिर उसपे पूरी पुख़्तगी से आगे बढ़ना, बने बनाए स्वीकृत ढांचे को तोड़ अपनी एक नयी सोच क़ायम करते वो जिस नन्ही क्रान्ति को रच रही थी उसी के बहाने तुम्हें कितना बड़ा सुकूनो इत्मिनान बख्श रही थी. ये कहना जितना आसान होता है. करना बहुत मुश्किल होता है. मैं लिखती हूँ...... मैं जानती हूँ. तुम अगर मरी कुचली मर्द की सताई औरत होतीं औ महबूब भी दगाबाज़ तो ऐसी कमाल की रहम की भुरभुरी मिट्टी तैयार होती कि जिसमें अफ़साना फ़ौरन जड़ पकड़ लेता. एक नहीं दो मरदों की बेगरज़ मुहब्बत बेदाग़ वफ़ादारी. अफ़साने के लिहाज़ से उन वक्तों में क्या आज भी पथरीली ज़मीन. तुमने कभी सोचा वो मर्द जिसके बाजुओं में तुम अपने को 'ढीला' छोड़ देती हो और वो मर्द जिसके वुजूद को समन्दर कर तुम अलमस्त डाल्किन सी 'तैरती' हो सिर्फ़ और सिर्फ़ तुम्हारे हैं. ख़ुदा से पहले अपनी मुसन्निका का शुक्रिया करो सर झुकाके आतशपारा कि उसने अपनी जान पर से जो गुज़ारा हो पर तुम्हें 'वो कहीं पे भी गया/ लौट के मुझ तक आया' ऐसे खट्टे अंगूर मीठे कह के नहीं खिलाए.

ज़ानकारी के इल्ज़ाम में धरी गयी तुम घर नहीं लौटी हो. घर पर तुम्हारे लौटने का बेताबी से इन्तज़ार करते दो बुर्जुर्गी के क़दमों की आवाज़ मेरे कानों में 'नाद' की तरह उतरती है वो तुम्हें मायके नहीं, ससुराल वाले हैं. तुम्हें लानते, मलानते भेजने की कौन कहे वो बूढ़े तुम्हारी ख़ैरियत को लेकर फ़िक्रमंद हैं खुद को कोसते हैं कि तुम्हें अकेले जाने क्यों दिया. ऐसा कहीं होता है आतशपारा? सोचो! 'सज़ा' के बाद तुम्हारे अपने कोर्ट से 'रहम' की अपील करते हैं यानि तुम्हारा किया 'गुनाह ' है चुपचाप कुबूल लेते हैं. और तुम्हारे सास - ससुर संगसारी की सज़ा को 'आरोप' कह उसके ख़िलाफ़ अपील करते हैं. अप्रोच का फ़र्क तो देखो.

कितनी देर लगती तुम्हारी सास को. एक ढू खटोला खीचती, घसीटती सेहन के बीच लाती और पटक का धप से उसपर बैठ जाती सर से बार - बार उतरने पे माइल दुपट्टा..... हाथ में सरौता सुपारियाँ. सरौंता ज़रा आहिस्ता सुपारी कतरता, पर कतरनी सी ज़बान तुम्हारे किरदार के इतनी तेज़ी से और इतने टुकड़े करती कि संगसारी की तो नौबत ही ना आती. उन सात सौ कबूतरों की तरह जो बॉम्बे में ताजमहल होटल में हुई बमबारी की आवाज़ से मर गये तुम तोहमतो की कानफ़ोडू आवाज़ से अधमरी हो जाती इन धमाको की आवाज़ से तुम्हारी भी धज्जियाँ उड़ जाती आतशपारा. नहीं, मेरे क़लम में वो ताक़त नहीं जो ऐसे फ़रिश्ता सिफ़त इंसानों के किरदार पर लिख सके वो बुजुर्ग जिस ज़ज्बे जिस अहसास की ज़मीन पर ख़ड़े हैं वहाँ तक मेरे क़लम की रसाई नहीं! मैं बस इतना कर सकती हूँ कि उनके पावों को अपने आँसुओं से धो सकूँ.

उठो..... देखो आतशपारा... देखो अपनी ये दौलतें... उठो और बेख़ौफ़ बुलन्द आवाज़ में पूछो माँग में धड़ियों नारंगी सिंदूर भरे, गले में भैंस की सांकल ऐसी मंगलसूत्र लटकाए इन औरतों से कि इनमें से कितनों को ऐसी बेलौस मुहब्बत, बेदाग़ वफ़ादारी और अपने बुर्जुर्गों का ऐसा आशीष मिला है? पूछो!

देखा..... हो गयी ना सौ में से निन्यानबें धड़ाम. बिल्कुल चित्त. और वो जो तुम्हारी आँखों में आँखें डाले खड़ी है इसमें ताज्जुब क्यों कि हू ब हू न सही पर 'शक्ल' और कदो - काठी में तुमसे फिर भी कितना मिलती है.

ये किरिश्में काग़ज़ पर तब उतरते हैं जब ये लिखने वाले के शु ऊर में होते हैं.

तुम जिस रास्ते पर जा रहीं थीं महसूस मुझे ये हो रहा था कि 'अफ़साना' और 'तुम' वजह की कफ़स से हमेशा हमेशा के लिए आज़ाद हो जाओगे पर.......

मैंने एक बार अपने एक अज़ीज़ से कहा आतशपारा कि 'आज शाम की नमाज़ में मेरे लिए दुआ करना' उसकी उँगलियाँ मेरी नब्ज़ पर थीं, फिर भी सवाल तो देखो "दुआ में ज़ोर मक़सद पर होता है.. क्या माँगू तुम्हारे लिए "?

दुआ के साथ मक़सद. फिर उसपे भी ज़ोर! यानि एक तो कब्र, फिर उसपे भी वज़नी पत्थर. बिचारा मुर्दा!

हज़रते दाग जहाँ बैठे थे मैं भी वही थोड़ा दूर हट, मारे सदमें के मुस्तक़िल खटोला डाल कर बैठ गई. तुम अफ़ज़ल की बीवी होते हुए भी दूसरे मर्द के साथ इसलिए इन्वाल्व हुई कि तुम अफ़ज़ल के साथ बिस्तर में मुतमईन नहीं!

मुझे बेसाख़्ता हँसी आ गई! जैसे कि अगर तुम अफ़ज़ल के साथ 'बिस्तर में' मुतमईन होतीं तो वो ना करती जो तुमने किया या तुमसे हुआ.

' वजह ' हमेशा क़ब्र पर पड़ा वज़नी पत्थर नहीं होती ये झुनझुना भी होती है जिसे बजा कर मुझ ऐसे नाक बहते बच्चों को बहलाया जाता है और देखो हम बहल भी जाते हैं.

हम ऐसे सादालहों से ही अदब की दुनिया आबाद है हँसती हूँ तो हँसती चली जाती हूँ बेवक्त हँसी आ जाए तो ज़ब्त नही होता हमेशा लोटने लगती हूँ.

पर ख़्याल की दुनिया मेरे बाप की थोड़े न है जहाँ किसी और की रसोई ना हो.

"ख़ामोश... " तेज़ आवाज़ से पलटती हूँ बाप रे नासिरा आपा ये कहाँ से आ गईं ' आदाब ' किया तो जवाब नदारद.

"बड़ी हँसी आ रही है मैं भी तो सुनूँ, क्यूँ? अवाज़ में गहरा तन्ज है.

"वो मैं.. मैं वो.... " आह.. डूबते को कोई तिनका मयस्सर नहीं.

"पहले तो दुपट्टा तमीज़ से ओढ़ो.. अब सुनो कि तुम्हें तनकीद का ' त ' नही पता लड़की, ' द ' तो बड़ी देर में आता है दूसरी बात, ख़बरदार जो आज के बाद कभी मेरे किसी अफ़साने या नाविल की तरफ़ रूख़ किया"

"जी "... मैं सिरनिगूँ खड़ी हूँ

" जी और अब आप जाइये " मुझे झाड़ धोकर वो कागज़ पत्तर सम्हाले उस तरफ़ बढ़ जाती हैं जहाँ एक बड़े से बरगद के तले एक ऊँचा सा थड़ा है उस थड़े पर कोई नहीं बैठा पर उसके गिर्द तुम्हारी मौत का पुरखा करने आए लोगों की भीड़ जमा है उनके बीच रास्ता बनाती आपा थड़े पर जाकर बैठ जाती हैं बहुत देर तक जाने क्या सोचने के बाद उन्होनें कागज़ पर कुछ लिखा है जाने क्या? शायद 786 डरते डरते जान हथेली पर रख दबे पाँवों उनके पीछे आ उनके कंधो से उचक मैं कागज़ पर ताकती हूँ

कागज़ पर लिखी इबारत पढ़ते ही लम्हा भर पहले खिलखिलाती मेरी आँखों में 'जुगनू ' तैरने लगते हैं पढ़ो तुम देखो तो ' आतशपारा ' उनके नये अफ़साने का उन्वान.

' मेरी आपा ' मैं उनके गले में अपने दोनों बाज़ू लिपटा पीछे से लिपट गई हूँ वो बिना पीछे ताके मेरा गाल थपथपाती हैं... ' नालायक लड़की'

तुम्हारी मौत पर भी खुश्क रही मेरी और आपा की आँखे तुम्हें नई जिंदगी का आगाज़ करते देख खुशी से नम है आतशपारा

अल्लाह, उम्रदराज़ करे, (ामीन). ढेर सारे प्यार के साथ सीमा.

कभी वक्त मिले तो ख़त लिखना, गुड्डो.

सीमा शफ़क
दुआरा - आर - डी प्रसाद
एल - 17 फेज़ 3
शिवलोक कालोनी
समीप - रानीपुर मोड़
हरिदुआर - उतराँचल

© 2009 Seema Safaque; Licensee Argalaa Magazine.

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