अर्गला

इक्कीसवीं सदी की जनसंवेदना एवं हिन्दी साहित्य की पत्रिका

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शिखर

गंगा प्रसाद विमल

अन्धेरों से आलोकित अतीत

बाहर जो खुलापन है
वह वास्तव में
शून्य का मंडोपा है
और विस्तार के आवरण के पार
देखना असंभव है

इसलिए नहीं कि हमारी आँखों की सीमा है
बल्कि इस सीमा के खुलेपन के बाहर
सीमाओं का
वह अंधकार है जो अंतरिक्ष में
विद्यमान है
इन बाहरी अँधेरों के रास्ते
हम कहीं नहीं पहुँचेंगे

हम पहुँचते हैं तो केवल
अपने उजालों से दूसरों के अँधेरे तक

मसलन
वह खिड़की जिससे मैं
बंदर पुच्छ शिखर का हिममंडित चेहरा देखता हूँ
उसी से मैं
ढलानों के पार
घाटियों में खिलते फूलों को भी देखता हूँ
हाँ उन्हें मैं
स्मृति की खिड़की से देखता हूँ

अचकचाकर
हिमशिखर देखते ही
खुल जाती है वह खिड़की

शायद यह लिखित ही है
रात के घुप्प अँधेरे में
जब आँखें टोह नहीं सकती दृश्य
स्मृति की खिड़की से
देख लेता हूँ चन्द्रवदनी
नीचे ढलान पर बसे गाँव

कहीं कहीं
भटके मन का विचित्र सा पड़ाव है
जो अँधेरे में भी
उजाले सा खुला है

भीतर के किसी
अज्ञात आमन्त्रण पर
जब भी मैं
अतीत से फिर अपनी ओर
यात्रा करने लगता हूँ
तो वर्तमान से एकदम भविष्य में
छलाँग लगाकर
खुद को वहाँ बैठा देखता हूँ
जहाँ वक्त के बीतने के बाद

मेरे सिवा
शायद सब कुछ होगा

यही सब कुछ
बाहरी रास्तों से
अंतरिक्ष के अँधेरों में
इस तरह द्रवित हो जायेगा
जैसे असँख्य अतीत
बाहर के खुलेपन के रास्ते
उन अँधेरों में डूब गये हैं
जो विस्तार के गाढ़े आवरणों में
तना है.

जिनसे मैं जन्मा हूँ

मिट्टी या पानी से
जिनसे मैं पनपा हूँ
वे पदार्थ
अर्धमय हैं अवाक किन्तु चेतन हैं

जहाँ से भी आए हों पदार्थ
अपने आधारों को पुष्ट कर
भरा है उन्होंने जागतिक शून्य
कृतज्ञ हूँ क्योंकि वाणीहीन होकर भी
मुखर हैं वे मुझमे

रूप-रंग
जिन जिन कल्पनाओं में देखता हूँ
टोहता हूँ या कि चाह है वैसा हो
वैसा ही होता है कुछ कुछ
जिनसे मैं जन्मा हूँ उनकी प्रतीति
पाता हूँ ठिठकी हुई धरती से
अर्थ के भीतर प्रवाहित वह
निरन्तरता अटूट.

खिड़की से बंदर पुच्छ

जब भी खोलता हूँ स्मृति की खिड़की
सामने बंदर पुच्छ दिखता है
चमकीला शिखर
पर्वतों और घाटियों से
उठकर
देखने लगता है मुझे
और अंकित हो जाता है

फिर स्मृति में
दूसरी बार
देखता हूँ खुद को
खिड़की से बाहर
शिखर की ओर
अचरज में
देखता हूँ खुद को
बंदर पुच्छ छूते हुए
इस मैदानी सीमेंटी रेगिस्तान में
देखता हूँ
अपने तकिए पर आराम करते
बंदर पुच्छ शिखर
सिर टिकाए

मेरी तरह ही बैठा है
चिंतामग्न
मेरे साथ
घटता है सब कुछ
फिर भूल के सहारे
दूर छिटक जाता है
लेकिन कभी कभी
बुरी तरह
झंझोड़ता है बंदर पुच्छ
वहाँ सब कुछ है
और यहाँ
स्मृति में कुछ नहीं की जगह
बैठा हुआ है
खिड़की तकिए से सटा
बंदर पुच्छ.

मैं वहाँ हूँ

सपने में
था मैं
वह गाँव भी था
सीढ़ीदार खेतों में सोया
और मैं जागता हुआ सपने के भीतर
टोह रहा था कोई द्वार

वह द्वार-विहीन घरों का
गाँव था झरोखा-रहित
घर थे
निपट उजास में सोए हुए
न था कोई दिखता हुआ
सिवा सपने में भटकता मैं
मेरे उस सपने में सोया गाँव सच था
सपने में
जागने पर जितना मैं
इन दो सत्यों के बीच
सपने का भटका सा
भटकता हूँ मैं
मैं कहाँ सच हूँ
वहाँ
कि यहाँ.

पागल पर्वत

पागल पर्वत
सपने में

अपने सपने में
पहले से ही
पगलाए हैं अचल
जड़ पर्वत

जब मेरे सपने में
डोल रहे हैं वे
इधर-उधर

कभी बर्फ झटकाते
तो कभी लुकते छिपते
कभी सामने आकर मुझे छकते

पगलाए पर्वत
नशे में हैं
सब कुछ बदल जाए
परवाह नहीं

नशे का आदमी
यही भाषा बोलता है
यही

कि वह नहीं है जैसा कह रहे हो
और फिर जैसा वह है
यानी पर्वत

ठेठ ऊँचा पेड़ों से पटा
शिखरों में सफेद हुआ
घाटियों में पनियाला
और अपने सपने में
पगलाया है

ओ पागल पर्वत
मैं भी तो वैसा ही हूँ
सिर्फ तुम्हारी तरह
अचल नहीं

अलबत्ता धरती के ऊपर
बसने वालों ने
अपने करतब से
अचल कर दिया है मुझे

मैं कहीं नहीं जा सकता
पगलाये
आदमी की तरह
पर्वत की मानिंद.

संवाद

सुबह-सुबह बुलाता है एक कौवा
मुंडेर पर बैठा

बहुत फुर्ती से इधर-उधर ताकता
झपटता है वह किसी गिरे हुए लोथ पर

और मैं पूछता हूँ भाषा में
और ताकता है टुकुर-टुकुर वह
आँखें मुँह चोंच हिलाता हुआ
क्यों कैसे देखते हो धरती को?

झटके से उड़
उसी में उत्तर परोसते हुए
वह चला जाता है पार और पार

वह कवियों की तरह कूट भाषा में
बताता है शायद
धरती उर्वरा है बीट से
कवियों की भी
शायद कोई भूमिका हो
शब्दहीन संवाद में?

ठेलेंगे

जैसे भी होगा
उस पहाड़ को ठेलेंगें

आख़िर मैं भी
उसे ठेलकर आया हूँ मैदानों की ओर

आह सपाट फैलाव
कितना अच्छा है बिना थके
चुपचाप चले जाना

जैसे भी होगा
अँधेरे में पार कर लूँगा
विपदाएँ
उस पल जब असंभव होगा
मैं अपना गाँव याद कर लूँगा

तुम जहाँ भी हो
सुरक्षित हो तब तक
जब तक तुम्हें लोग पहचानते नहीं हैं
जैसे ही पहचाने जाओगे
ईर्ष्यालु दबोचने आएँगे
किसी न किसी षडयन्त्र से

पकड़े जाओगे
शायद तुम्हारी हत्या ही हो
जीवित जो भी होंगे
वे पछताएँगे

क्योंकि वे हत्यारों की तरह
जीवित हैं और निरापद
जब भी तुम
जड़ों की ओर जाओगे
खोखला पाओगे
परजीवी पहले ही वहाँ बसे हैं

ठेलने ही पडेंगे
अदृष्य पहाड़
उनके पार
आदमी के नरक हैं
दूर से
विज्ञापित स्वर्ग

इन यात्राओं में
नरक की ओर
लौट लौट कर मैंने पाया है
हर यात्रा का अंत ऐसा ही

फिर भी
जैसे भी होगा
अंत को ढकेलकर
सतत चलने के लिए ढकेलूँगा पहाड़

उन सबके पहाड़
जिन्होंने दुष्चिंताओं में
खड़े किए हैं
अपने और सबके सामने.

© 2009 Ganga Prasad Vimal; Licensee Argalaa Magazine.

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