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इक्कीसवीं सदी की जनसंवेदना एवं हिन्दी साहित्य की पत्रिका

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शिखर

केदारनाथ सिंह

बाघ के बारे में

बाघ का लिखना कब शुरू हुआ ठीक-ठीक याद नहीं. याद है केवल इतना कि नवें दशक के शुरू में कभी हंगरी भाषा के कवि यानोश पिलिंस्की की एक कविता पढ़ी थी. और उस कविता में अभिव्यक्ति की जो एक नयी संभावना दिखी थी, उसने मेरे मन में पंचतंत्र को फ़िर से पढ़ने की इच्छा पैदा कर दी थी. उस कविता में जो एक पशुलोक था - बल्कि एक भोली-भाली पशुगाथा - मुझे लगा कि पंचतंत्र में उसका एक बहुत पुराना और अधिक आत्मीय रूप पहले से मौज़ूद है. पंचतंत्र की संरचना की अपनी कुछ ऐसी खूबियाँ हैं जो सतह पर जितनी सरल दिखती हैं वस्तुत: वे उतनी सरल हैं नहीं. हर कालजयी कृति की तरह पंचतंत्र का ढाँचा भी अपनी आपात सरलता में अनुनकरणीय है पर मुझे लगा कि पंचतंत्र एक ऐसी कृति है जो एक समकालीन रचनाकार के लिये जितनी चाहे बड़ी चुनौती हो, पर जरा सा रुककर सोचने पर वह सृजनात्मक संभावना की बहुत सी नयी और लगभग अनुद्घाटित परतें खोलती सी जान पड़ेगी. मुझे यह भी लगा कि एक बार यदि उस ढाँचे की कार्यकारणबद्ध श्रंखला को थोड़ा ढीला कर दिया जाये तो इस संभावना को कई गुना और बढ़ाया जा सकता है. वस्तुत: सृजनात्मक सत्य के इसी नये साक्षात्कार से बाघ का जन्म हुआ था - लगभग आड़ी-तिरछी रेखाओं के बीच घिरे एक शिशु की क्रीड़ा की तरह.

पंचतंत्र के गुंफ़ित ढाँचे से निकलकर पहली बार जब बाघ का बिंब मेरे मन में कौंधा था, तब यह बिल्कुल स्पष्ट नहीं था कि वह एक लंबी काव्य-श्रंखला का बीज बिंब बन सकता है. वस्तुत: पहले टुकड़े के लिखे जाने के बाद ही यह पहली बार लगा कि इस क्रम को और आगे बढ़ाया जा सकता है. फ़िर तो एक खंड के किसी आंतरिक दबाव से दूसरा खंड जैसे अपने आप बनता गया. कथात्मक ढाँचे की इस स्वस्फ़ूर्त प्रजननशीलता से यह मेरा प्रथम काव्यात्मक साक्षात्कार था.

आज का मनुष्य बाघ कि प्रत्यक्ष वास्तविकता से इतनी दूर आ गया है कि जाने अनजाने बाघ उसके लिये एक मिथकीय सत्ता में बदल गया है पर इस मिथकीय सत्ता से बाहर बाघ हमारे लिये आज भी हवा पानी की तरह एक प्राकृतिक सत्ता है, जिसके होने के साथ हमारे अपने होने का भविष्य जुड़ा हुआ है. इस प्राकृतिक बाघ के साथ उसकी सारी दुर्लभता के बावज़ूद मनुष्य का एक ज़्यादा गहरा रिश्ता ही, जो अपने भौतिक रूप में जितना आदिम है, मिथकीय रूप में उतना ही समकालीन.

इस पूरी काव्य श्रंखला में मेरी एक कोशिश लगातार यह रही है कि बाघ को किसी एक बिंदु पर इस तरह कीलित न किया जाय कि वह अपनी ऐंद्रिक मूर्तिमत्ता को छोड़कर किसी एक विशेष प्रतीक में बदल जाये. इसलिये श्रंखला की हर कड़ी में हर बार बाघ एक नये बाघ की तरह आता है और लगभग हर बार अपने बाघपन के एक नये अनुषंग के साथ. इस कोशिश में मैं कहाँ तक सफ़ल हुआ इसके बारे में में कुछ कह नहीं सकता. कविता के बारहवें खंड में जो कवि त्रिलोचन का संदर्भ आया है, उसका आना एकदम आकस्मिक था पर बाद में लगा और एक पाठक ने जब पत्र लिखा तो इसकी और भी पुष्टि हुई कि यह कविता के मिथक लोक में समकालीन संदर्भ का एक अचानक हस्तक्षेप था जो बिना किसी योजना के चुपचाप आ गया था.

बाघ एक

बिंब नहीं
प्रतीक नहीं
तार नहीं
हरकारा नहीं
मैं ही कहूँगा

क्यूँकि मैं ही
सिर्फ़ मैं ही जानता हूँ
मेरी पीठ पर
मेरे समय के पंजों पर
कितने निशान हैं

कि कितने अभिन्न अंग हैं
मेरे समय के पंजे
मेरे नाखूनों की चमक से

कि मेरी आत्मा में जो खुशी है
असल में वही है
मेरे घुटनों में दर्द

तलवों में जो जलन
मस्तिष्क में वही
विचारों की धमक

कि इस समय मेरी जिह्वा पर
जो एक विराट झूठ है
वही है वही है मेरी सदी का
सब से बड़ा सच

यह लो मेरा हाथ
इसे तुम्हें देता हूँ
और अपने पास रखता हूँ
अपने होंठों की
थरथराहट

एक कवि को
और क्या चाहिये!

बाघ दो

आज सुबह के अख़बार में
एक छोटी सी ख़बर थी
कि पिछली रात शहर में
आया था बाघ

किसी ने उसे देखा नहीं
अँधेरे में सुनी नहीं किसी ने
उसके चलने की आवाज़
गिरी नहीं थी किसी भी सड़क पर
खून की छोटी सी एक भी बूँद

पर सब को विश्वास है
कि सुबह के अख़बार में छपी हुयी ख़बर
गलत नहीं हो सकती
कि ज़रूर-ज़रूर पिछली रात शहर में
आया था बाघ

सच्चाई यह है कि हम शक नहीं कर सकते
बाघ के आने पर
मौसम जैसा है
और हवा जैसी बह रही है
उसमें कभी भी और कहीं भी
आ सकता है बाघ

पर सवाल यह है
कि आख़िर इतने दिनों बाद
इस इतने बड़े शहर में क्यूँ आया था बाघ

क्या वह भूखा था
बीमार था
क्या शहर के बारे में
बदल गये हैं उसके विचार

यह कितना अजीब है
कि वह आया
उसने पूरे शहर को
एक गहरे तिरस्कार
और घृणा से देखा

और जो चीज जहाँ थी
उसे वहीं छोड़कर
चुप और विरक्त
चला गया बाहर

सुबह की धूप में
अपनी-अपनी चौखट पर
सब चुप हैं
पर मैं सुन रहा हूँ
कि सब बोल रहे हैं

पैरों से पूछ रहे हैं है जूते
गर्दन से पूछ रहे हैं बाल
नखों से पूछ रहे हैं कंधे
बदन से पूछ रही है खाल
कि कब आयेगा
फ़िर कब आयेगा बाघ?

© 2009 Kedarnath Singh; Licensee Argalaa Magazine.

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