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हस्तक्षेप

बिपिन कुमार शर्मा

उदय प्रकाश प्रकरण पर एक फौरी प्रतिक्रिया

19 जुलाई, 2009 के जनसत्ता में अविनाश की टिप्पणी छपी है. यह बहुत ज़रूरी लेख है जिसे पढ़कर हिंदी के लेखकों को अपने ऊपर कुछ विचार अब कर लेना चाहिए. उन्हें शायद यह नहीं मालूम है कि उदय प्रकाश बनने में एक जमाना लगता है और उदय प्रकाश को किसी विवाद में घसीटकर या हस्ताक्षर-अभियान चलाकर मिटाया नहीं जा सकता. उदय प्रकाश जैसे लेखक बनने की ललक किसी के भी मन में हो सकती है, उनके लेखन से एक स्वस्थ ईर्ष्या ज़रा भी अस्वाभाविक नहीं है, किंतु उदय प्रकाश का मान-मर्दन करके उदय प्रकाश जैसा कहलाने की दुष्टता बिल्कुल अक्षम्य है. वे लोग जो खुद को बहुत क्रांतिकारी और धर्मनिरपेक्ष साबित करने के लिए उदय प्रकाश पर कीचड़ उछाल रहे हैं, पाठकों को मालूम है कि उनसे बड़ा पाखंडी, चमचा और चापलूस हिंदी साहित्य में बहुत कम मिलेंगे. जो उदय प्रकाश के विरुद्ध हस्ताक्षर अभियान चलाने के लिए उतावले हो रहे हैं, सामने पड़ने पर वे उदय प्रकाश के ही चरणों में अपनी जान-पहचान बढ़ाने के लिए किस क़दर लोट लगायेंगे, यह भी हिंदी का पाठक जानता है. रोज़ गोष्ठियों और सेमिनारों में उनके द्वारा की जा रही चमचागीरी किसी से छिपी हुई नहीं है.

अविनाश ने यह बहुत सही लिखा है कि " यह उदय प्रकाश के इस कृत्य के खिलाफ विरोध-पत्र पर हस्ताक्षर करने वाले लेखकों में कई ऐसे हैं, ज.'सांप्रदायिक फासीवादी सरकारों' के कार्यकाल में लाभ पाने वालों में शामिल रहे. ऐसे में हमें यह समझाना होगा कि उदय प्रकाश के खिलाफ यह मोर्चाबंदी महज एक दंगाई के साथ उनकी उपस्थिति से असहज और असहमत होकर नहीं, बल्कि किन्हीं और निहितार्थों के चलते की गई है."

अपने लेख में अविनाश ने वीरेन डंगवाल की जो टिप्पणी उद्धृत की है वह अत्यंत फूहड़ और निंदनीय है. शायद वीरेन भी जानते हों कि उदय प्रकाश उनसे कितनी बेहतर कविताएँ लिखते हैं! लिखकर तो वे उदय प्रकाश होने से रहे, इसलिए यही तमाशा सही. जितनी फूहड़ टिप्पणी उन्होंने उदय प्रकाश पर की है, उनकी कविताएँ भी इससे बेहतर उदाहरण नहीं प्रस्तुत करतीं.

जो सम्मान उदय प्रकाश ने ग्रहण किया वह हिंदी में जाना भी नहीं जाता, सम्मानजनक तो खैर क्या होगा. कोई राशि उससे जुड़ी हुई नहीं है कि धन का लोभ साबित किया जा सके. आज तक उदय प्रकाश ने जितना लिख है उसमें से दो पंक्ति भी आदित्यनाथ अपनी राजनीति में उपयोग नहीं कर सकते. फिर भी कितना सहज लगने लगा उदय प्रकाश को लालची और सांप्रदायिक ठहराना! यह सही है कि उदय प्रकाश ने जो किया वह प्रशंसनीय नहीं था, लेकिन इसके बावजूद समाज-परिवार से जुड़ी कुछ और बातें भी तो हो सकती हैं. बहुत स्वाभाविक है कि हमारे घर-परिवार के लोग धार्मिक आस्था रखते हो और उनके लिहाज में हमसे कोई चूक हो जाए. हर पल कोई व्यक्ति वैचारिक प्रतिबद्धता ही नहीं दर्शाते चलता, वह भावुकता के सहारे भी जीता है. हम अपने परिवार में किसी ऐसे मेहमान से भी मिलने को विवश हो सकते हैं जिससे वैचारिक असहमति हो. हाँ, इसका प्रमाण तो नहीं मिला कि उदय प्रकाश ने उस मंच से आदित्यनाथ या उनकी राजनीति की प्रशंसा की है. अगर वीरेन जी को मिला है तो पाठकों को भी बताएँ. उन्हें शायद नहीं पता कि फ़कत आवेश या सनक की साहित्य में कोई उपयोगिता नहीं है.

कहा जा रहा है कि उसी समारोह में परमानंद श्रीवास्तव भी उपस्थित थे. इतना ही नहीं, यह भी सुनने में आ रहा है कि कुछ बरस पहले उन्होंने यही पुरस्कार आदित्यनाथ के पिता, सीनियर महंथ जी से ग्रहण किया था. तब लेखन और यश को कोई अपने लिए चुनौती नहीं मानता?

अनावश्यक विवाद हिंदी को पतनशील बना रहा है. कुछ समय पहल.'पहल' को लेकर ऐसा ही विवाद सामने आया. कुछ लोग ज्ञानरंजन की की केवल आलोचना या निंदा में मज़ा लेते रहे तो कुछ लोग अपने ज्ञान दा की प्रशंसा में. क्या कोई पत्रिका अमर हो सकती है, या उससे संपादक निजी तौर पर जुड़ा नहीं होता? क्या यह सही नहीं क.'पहल' को और कुछ बरस पहले ही बंद हो जाना चाहिए था क्योंकि वह निरंतर पतनशील था? ज्ञानरंजन ने उसे बंद करके ठीक किया. क्या यही बात आज हिंदी की कुछ महत्वपूर्ण पत्रिकाओं पर लागू नहीं होती? 'हंस' का एक विशेषांक कुछ वर्ष पहले ( 2006 ) गौरीनाथ के संपादक में आया था जिसका शीर्षक था "संघर्षशील आमजन की कहानियाँ". क्या राजेंद्र यादव उससे कुछ पहले या बाद में वैसा एक अंक भी संपादित कर पाए? तो उदारता दिखाते हुए और अपनी अयोग्यता स्वीकार करते हुए क्यों नहीं 'हंस' गौरीनाथ को दे दिया? भले हि.'हंस' लगातार अवसान के निकट जा रहा हो, वे उसकी कुर्सी से चिपके रहेंगे. 'समायांतर' में ही पंकज बिष्ट कुछ समय से अपना व्यक्तिगत राग-द्वेष साधने के अलावा ज्यादा कुछ नहीं कर रहे. फिर ऐसी हालत में पत्रिका को व्यक्तिगत लाभ के लिए ढोने से बेहतर बंद करना नहीं? प्रतिबद्धता की बात केवल वह करे जो अपनी प्रतिबद्धता को साबित कर सकता हो. हर किसी की प्रतिबद्धता पर बकवास अब हिंदी बर्दाश्त नहीं कर सकता.

© 2009 Bipin Kumar Sharma; Licensee Argalaa Magazine.

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