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इक्कीसवीं सदी की जनसंवेदना एवं हिन्दी साहित्य की पत्रिका

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हस्तक्षेप

उपेन्द्र कुमार सत्यार्थी

साहित्यिक मूल्यांकन के मानदण्ड

कोई भी साहित्य समय और समाज-सापेक्ष होता है. समय और समाज के विविध यथार्थों का अभिज्ञान कराना साहित्य का मूल उद्देश्य होता है. समय परिवर्तनशील है और यह उसकी नियति भी है जिससे समाज में भी परिवर्तन आता है. इस परिवर्तन से साहित्य में भी बदलाव सहज एवं स्वाभाविक रूप में आ जाता है और ऐसी स्थिति में मूल्यांकन के मानदण्डों में बदलाव अथवा साहित्यिक कृति की सम्यक पहचान स्थापित मानदण्डों के आधार पर नहीं की जा सकती है. वास्तव में साहित्यिक मूल्यांकन के मानदण्डों के निर्धारण की समस्या अति प्राचीन है. आधुनिक काल में यह समस्या आलोचकों व पाठकों के समक्ष अत्यधिक प्रगाढ़ता से उपस्थित होती है. साहित्यिक मूल्यांकन के साथ सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि इनके कोई शाश्वत प्रतिमान या मानदण्ड नहीं है और हो भी नहीं सकता क्योंकि यह मानदण्ड प्रत्येक युग के अनुकूल अलग-अलग होता है. इस संबंध में यह प्रश्न भी उठता है कि सामान्य पाठक, सुशिक्षित व्यक्ति और लेखक या कवि, इन तीनों में सर्वोत्तम मूल्यांकन एवं विश्लेषण करनेवाला कौन है और कौन उसका मानदण्ड निर्धारित करता है?

आधुनिक काल में जब किसी विशेष वर्ग को ध्यान में रखकर कोई कृति प्रस्तुत की जाती है तो इस वर्ग के सामान्य पाठक से उचित मूल्यांकन की उम्मीद नहीं कर सकते. उसका विश्लेषण एक सीमा में बंध जाने का खतरा बना रहेगा. किसी भी रचना का मूल्यांकन करते समय आलोचक को अपनी व्यक्तिगत धारणाओं पर नियंत्रण रखना जरूरी होता है, अन्यथा जातिगत, धर्मगत, वंशगत, सामाजिक, राजनीतिक आदि पूर्वग्रहों के कारण मूल्यांकन व विश्लेषण के साथ सही न्याय नहीं होगा और आलोचक किसी रचना को उस रूप में देखने लगता है जिस रूप में साहित्यकार ने कभी कल्पना न की थी. ऐसे में न तो कोई मानदण्ड बनेगा और न रचना का सार्थक मूल्यांकन. आलोचक का दायित्व होता है कि रचना के भीतर प्रवेश कर उसकी भीतरी अन्विति को सही परिप्रेक्ष्य में जाँचे और युग-सापेक्ष-दृष्टि से परखते हुए उसकी श्रेष्ठता प्रतिपादित करे और उसकी ऐतिहासिक-सामाजिक अर्थवता को सही आधार पर स्थापित करें.

आधुनिक युग विभिन्न वादों एवं विचारधाराओं का युग है. साहित्य भी इन वादों और विचारधाराओं से मुक्त नहीं है. अब साहित्य केवल पूराने भाव व विचारों से बंधा नहीं है बल्कि एक साथ नये-पुराने विचारधाराओं को समेटे हुए हैं. प्राचीन मानदण्डों में संशोधन एवं परिवर्द्धन करके उसे नवीन मानदण्ड की स्थापना करना आलोचकों के दृष्टिकोण पर निर्भर करता है.

कोई भी महान साहित्यिक-रचना में शाश्वत सौन्दर्य और अखण्ड सत्य की व्याप्ति होती है फलत: वह समस्त युगों के विभिन्न प्रतिमानों या मानदण्डों पर महत्ता को धारण करती है. यही कारण है कि तुलसी, सुर, कबीर, प्रेमचन्द, शेक्सपियर, मिल्टन, टाल्स्टाय आदि की कृतियाँ विभिन्न कालों और परिस्थितियों में भी प्रासंगिक रहती है. जिस तरह से सोना की शुद्धता कसौटी पर कसकर परखा जाता है और यदि सोना शुद्ध हो तो किसी भी कसौटी पर खरा उतरेगा और मूल्यांकन समुचित होगा. वास्तव में सोना की शुद्धता ही उसके मूल्यांकन का मान निर्धारित करती है, कसौटी तो केवल पारखी के विश्वास की पुष्टि के लिए होती है, उसी तरह महान कृतियाँ भी होती है. चूँकि साहित्य सूक्ष्म संवेदनाओं एवं अनुभूतियों का पुंज होता है ऐसे में किसी भी आलोचना के लिए एक मानदण्ड का निर्धारण मुश्किल ही नहीं असंभव-सा होगा. साहित्यिक मूल्यांकन के मानदण्डों के निर्धारण में समीक्षक को तब तक कठिनाईयाँ आएंगी जब तक प्राचीन और नवीन विचारधाराओं का संघर्ष, नवीनता का आग्रह, वैचारिक विभिन्नता, पूर्ववती आदर्शों के प्रति निष्ठा, युगीन यथार्थ का आकर्षण, व्यक्तिगत अभिरूचि का प्रभाव आदि कारणें रहेंगी.

प्राचीन भारतीय आचार्यों ने काव्य समीक्षा के लिए रस, ध्वनि, अलंकार, रीति, वाक्रोति आदि मानदण्डों को निर्धारित की थी. आचार्य रामचन्द्र शुक्ल तथा डॉ. नागेन्द्र ने भी रस को साहित्यिक मानदण्ड माना. हजारी प्रसाद द्विवेदी ने कवियों के चितगत उन्मुक्तता को आवश्यक बताया और मूल्यांकन के लिए दृष्टिकोण की नवीनता की अपेक्षा की थी. दो भिन्न युगों और विचारधाराओं को एक ही मानदण्ड पर परीक्षित नहीं किया जा सकता. परिस्थितियों के साथ-साथ मनोभाव और संस्कार परिवर्तित होते रहते हैं. साहित्य की विषयवस्तु इन परिवर्तनों से प्रभावित होती रहती है.

© 2009 Upendra Kumar Satyarthi; Licensee Argalaa Magazine.

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