अर्गला

इक्कीसवीं सदी की जनसंवेदना एवं हिन्दी साहित्य की पत्रिका

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काव्य पल्लव

रश्मि मल्होत्रा

बचपन से आज तक

बचपन से जवानी तक
और जवानी से अब तक
आते-आते
छाती में उगे कई बार
वो इंद्रधनुष-
वीर बहूटियों के
लाल रतियों के
पीली तितलियों के!

जो जाने-अनजाने
में कभी
डिब्बियों में, कभी मुट्ठी में,
कभी झोली में
बंद कर रखती थी.

कई-कई बार उतरा
सीने में वो सोंधापन पोखरों का
जहाँ माँ का आँचल पकड़,
पीछे-पीछे, छूट जाने के डर से,
बेवसाई बेल सी
थी साए की भाँति लहराती!

कई-कई बार
गाड़ी लाल स्मोकिंग वाली
घेरेदार फ्रॉक में मैंने,
पीले गुलदाऊदी फूलों को भरा था
और लुढ़का दिया था पार्क में बैठे

ओस-भीगी घास में,
सुई धागे से फूलमाला कलईबंध पिरोकर,
कई बार पहने थे,
कई बार टांके थे वर्णफूल
अपने उन नन्हें सपनों पर
जो अभी भोले थे.

अल्हड़ उम्र में
गिट्टे, कोकला-छपाकी व छुप्पन-छुपाई खेलते-खेलते
लगता था
बस हवा में उड़ती ही रहूँगी मैं
इसी तरह
खुले आकाश की नीजिमा
भरते हुए अपनी साँसों में!

अकारण ही उन सपनों को
पकड़ने की
लाख-लाख कोशिशो में,
वे लाख, लाखों बार
हाथों से छूट-छूट गए!

हाथ में आता केवल
टुकड़े-टुकड़े होता चाँद
भोर का तारा,
कुछ बनते बिगड़ते रेखा-चित्र....
इस तरह मेरे 'आज' का गला भी
मानो रुंधने लगता.
और मैं,
घास की दूधिया जड़ को
मुँह में डाले, दाँतों से चबाती.
बैठी रह जाती हूँ
घंटों-पहरों
अचानक
हैरान-सी रह जाती हूँ!

बीते पलों को निहारते रहना भी
कभी-कभी सुखद लगता हैं
पर पकड़ की छूट का दु:ख भी तो
भारी है, बहुत भारी
वह कल का नहीं होता,
आज का होता है?

'आज' की आँखों में भी
थोड़ी ओस इकट्ठी होती है तो
गला अवरुद्ध होने लगता है
वही दु:खद है.

चिहुँक कर
घुटनों पर बैठना
छूटते हुए किशोरावस्था को,
जाने कब फलांग गया,
पता ही न चला!
पकड़ना चाँद तारों की रोशनी को
दूधिया सफेद बिस्तरों पर सोना, छतों पर निहारना घंटों,
एकटक तारों भरा स्याह आकाश
और डुप्प डूब जाना
उन तारों का भी
नींद भरी आँखों में!

गर्मी की लम्बी दोपहरियों में,
बेराक-टोक सोना,
छातियों पर धरी कविता-कहानी की किताबें
पढ़ना कभी,
पहरों शरत का विप्रदास देवदास,
रवींद्रनाथ की गीतांजलि,
अमृता प्रीतम कि.'धरती, सागर व सीपियाँ',
अज्ञेय क.'नदी के द्वीप' और
'शेखर की जीवनी'
में ढूँढ़ना
उस जीवन के दर्शन को,
जो निपट अनजान था
घंटों लता मंगेशकर,
कमल बारोत और नूरजहाँ को सुनना.

अलसाए से,
अपनी मौज में, बस तभी उठना
जब ममतालू माँ के
हाथों से तले हुए लजीज परमल-करेल,
हींग छुक्की दाल व बासमती चावल,
कभी पूरियाँ या तंदूरी सजरी रोटियों की गंध
सीधी समा न जाती हो
नथुनों से उतर कर छाती में!
स्वाद और भूख के
जिह्वा, मुख व आँतों के सफर को
जल्दी से पार कर लेने की
जल्दी-जल्दी न मच जाती हो!

इन आत्मिक सुखों, मुलाकातों में,
मैं रोज कहती हूँ अपने सपनों से-
'तुम आना और आते ही रहना'
फिर कभी विश्वास भी होने लगता है जैसे
सपने, अब मुझे कभी
छोड़कर नहीं जायेंगे, बल्कि
मेरे मस्तक पर, हथेली रखकर, सहलायेंगे,
मेरे 'आज' के उलझे केश,
प्यार से सुलझाएंगे मेरी मुश्किलें
इस तरह छू लेंगे और
भरेंगे मेरे जीवन का खालीपन!

मैं कहती हूँ अक्सर उनसे-
ऐ मेरे सपनों!
मन की नदी में उतरना,
सुबह-सवेरे की,
अनगिनत बाँसुरी की धुनें बन
अठखेलियाँ करना,
सूर्य-रश्मियों से!

कभी नींद से लड़ाई करती
जलकुम्भी की तरह तैरती,
रतजगा करती आँखों की पुतलियों में
उस एक-आध जलती रोशनी के साथ-साथ
घंटियों, शंखध्वनियों की तरह
रुनन-झुनन बजना!
उन दिनों की तरह,
कभी आहें, नदी, झरना, पूर्णिमा,
हेमन्त की हवा, दूधिया-बर्फ की शीतली छुअन और पीले बोगन-बेलिया
की नाजुक सी बेल बन लिपट जाना
गुलाबों की खुशबू लिए-लिए
मेरे तन-मन से
पर तुम आना न भूलना
कभी न भूलना.

सचमुच तुम आना-
एक महकते जीवन की तरह,
जरा फुर्सत से आना
पर आकर चले नहीं जाना,
मुस्कुरा कर आना,
फिर कभी नहीं जाना
और जाने के लिए नहीं
सुनो! बिल्कुल भी नहीं!

मैं प्रार्थना में करबद्ध
जिंदगी को आमंत्रित करती रहूँ
पुन: दोहराए जाने के लिए
उस दौर को!
चाहे कोई नहीं पकड़ पाया है अभी तक
बीता हुआ समय,
बंद मुट्ठी में से भी यह,
रेत-सा खिसक जाता है
क्योंकि
दौर एक जुगनू है,
एक गति है
जो एक बार चला जाता है तो
मुड़कर नहीं आता.
जिंदगी के सारे अर्थ
चाहे आज बदल गए हैं
आज बुलबुल उदास है
साँझ के विदा गीत ही गाती है शायद
सामने की अंधकारमयी राह में
न कोई आवाज, न कोई गूँज थरथरती है,
सिर्फ एक भागम-भाग का महज शोर है,
समय के आगे समर्पण है,
पूर्ण समर्पण है,
ठहराव है
अपने भीतर कहीं!

फिर भी मैं पुन: पुकार उठती हूँ
आज भी-
जिंदगी आना प्रिय!
जरा फुरसत से आना
मुस्कुरा के आना तनिक,
पर आना जरूर!

फिर भी
तुम आना
जिंदगी आना
तनिक जरा फुरसत निकाल कर आना!
पर जरूर ही आना!

बनवास-1

पहला बनवास
अकेलेपन का नहीं था
तब तुम मेरे साथ थे
मेरा हाथ अपने हाथ में पकड़े हुए
मुझे बाँहों में समेटे हुए
एक अम्बर का सा एहसास था
मेरे चारों ओर
और मैं धरती बनी
बिंधती रही, सिमटती रही,
अम्बर के आगोश में!

बनवास-2

दूसरा बनवास भी
हम दोनों ने ही भोगा था संग-संग
एक सुरक्षा के लिए,
घर की सुरक्षा, भविष्य की सुरक्षा
अपनी, बच्चों की,
और सिर पर भी छत की
क्योंकि पहले बनवास में,
हम बहुत से अनुभवों के भोगी थे
बिना छत के घर में
आती आँधियों का,
बरसातों का,
कड़क धूप का,
चमकती प्यास का
और कसकती भूख का,
नन्हीं कोपलों को फूलों में परिवर्तित करने का,
वह साथ-साथ भुगता
बड़ी जोश-उमंग से भुगता,
सो किसी से भी
किसी शिकायत का प्रश्न ही नहीं पर....

बनवास-3

पर अब तीसरे बनवास को,
परिभाषा क्या दूँ भला?
क्या अपने में समेटा सब कुछ
औंधा कर उघाड़ दूँ सबके आगे??
जिसको कैसे-कैसे
स्वयं अपने पर झेला है मैंने,
कैसे कतरा-कतरा कर
पीया है अपने दुखों को
किस तरह कुछ विलापों को
अपने माथे पर सजा लिया है
अलापों की तरह!
किस-किस तरह चाहा था
साँसों के यातना शिविरों से भी पाषाण युग का झण्डा गिरा कर
अपने संस्कारों को झण्डा गाड़ना
जो करेगा नेतृत्व वरदानों में बदलने का
उन शताब्दियों पुराने?
नारी जाति पर पड़े
अभिशापों को
जिसकी भुक्त-भोगी नारी-प्रतिमा?
आज भी अटकी पड़ी है
ज्यों की त्यों
पुरुषों के मस्तिष्क में.

विद्रोह की भाषा

तुम कहोगे तो
आँख बंद कर लूँगी
होंठ सी लूँगी.

पर सच जानो
सच्चाई-
किस रहमत की
गुलाम नहीं होती.

सच्चाई को
किसी की इंतजार
नहीं करती होती.

सच्चाई को
किसी की तलाश नहीं होती
आर,
सच्चाई को किसी रहनुमाँ की
आस भी नहीं होती.

पर, मेरी हर चुप का टांका,
जब खुलेगा
तो उसकी हर चटक
जिस भाषा में बात करेगी
वह भाषा विद्रोही की होगी.

विद्रोह की शायद
एक ही भाषा होती है-
अत्याचार के खिलाफ
लड़ाई,
तानाशाह के खिलाफ
लड़ाई,
लड़ाई, लड़ाई
और धर्म की लड़ाई!

कभी-कभी

कभी-कभी
कोई पंक्ति, गुनगुनाते गुनगुनाते
क्या कौंध जाता है
कि आवाज
रुँध जाती है.

कभी-कभी
पंक्ति के बोल
होंठों पर आते-आते
थम जाते हैं.

कभी-कभी
कोई शब्द,
कोई मिसरा
अचानक बीच ही में
कोई ऐसा सवाल कर बैठता है
कि उत्तर ही नहीं सूझता.

कभी-कभी
मुस्कुराहटें
एकाएक आँसुओं में
बदल जाती हैं.

और
कभी-कभी
बहते आँसुओं में से भी
कोई स्मित कौंध जाती है
कि मुस्कुराने को जी चाहने लगता है.

और यह सब
इतना अचानक होता है
कि पता ही नहीं चलता.

घर

घर, नाम है
एक सकून भरी गर्माहट का!

घर नाम है
खुनक हवा में
गर्म बिस्तर में दुबक जाने का!

घर नाम है
जीवन की तल्खियों से
राहत पाने का!

घर नाम है
पाँव तले की आँच सोखती
ओस भीगी नर्म दूब का.

घर नाम है
नरम हाथों की
हल्की छुअन का,
घर नाम है
महकती, संदली खुशबू का!

घर नाम है
थकन भरे माथे पर के
स्वेद सोख लेने का!

घर नाम है
प्यार भरी आवाजों का
आपसी समझ का!

घर नाम है
भोजन पकने की सजरी गंध का
भिस्सी रोटियों के स्वाद का
और भुट्टे की मीठी बालियों का!

घर नाम है
पिता के संरक्षा भरे वरद-हस्त का!

घर नाम है
माँ के आँचल में छुप जाने का,
हर दर्द भुलाने का,
हर शिकन मिटाने का!

घर, घर होता है
जहाँ गर्माहट होती है,
बच्चों की मुस्कुराहट होती है,
महकती सजरी गंध होती है
पिता का संरक्षण होता है
माँ का स्पर्श होता है
पत्नी का स्पर्श और
आमन्त्रण होता है
हर दर्द का दर्दमंद होता है,
घर, घर होता है.

© 2009 Rashmi Malhotra; Licensee Argalaa Magazine.

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