अर्गला

इक्कीसवीं सदी की जनसंवेदना एवं हिन्दी साहित्य की पत्रिका

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काव्य पल्लव

सुजाता दुआ

क्यूँ शिला वो हो गयी

क्या दिखा था तुम्हें
पत्थरों से उलझ कर
हुआ हृदय छलनी सरिता का
जल पूरित आँचल में ही
घुल गया कहीं अश्रु-जल उसका

टूट कर बिखरी धारा
असंख्य जल कणों में खो गयी
और तुमने था कहा
प्रकृति विभूषित हो गयी

क्या कभी हृदय में
रंच मात्र न संदेह जगा
क्यूँ शुष्क नदी मार्ग
शैल कण से है सजा
कहीं ताप सहते हुए
शीतला शिला तो न हो गयी
स्याह वक्त से हार
हो थक कर सो रही.

पारदर्शिता

लोग अक्सर बनाते हैं
शब्दों के खूबसूरत घर
फिर उसे सजाते हैं
उपमाओं से
और खुश हो जाते हैं
अपनी वाक्कौशल पर

पता नहीं
नादान होते हैं या अनजान
जो इतना भी नहीं जानते
बिना भाव के शब्द
खोखले होते हैं
इतने पारदर्शी की
उनमें देखा जा सकता है
आर-पार की फिर
उन्हें (लोगों को)
आजमाने की
जरूरत भी नहीं रहती.

© 2009 Sujata Dua; Licensee Argalaa Magazine.

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