अर्गला

इक्कीसवीं सदी की जनसंवेदना एवं हिन्दी साहित्य की पत्रिका

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काव्य पल्लव

सुरेशचंद्र निर्मल

1

दिल का आलम किस तरह हो गया तेरे बगैर
क्या बताऊँ कितना तन्हा हो गया तेरे बगैर

ज़िन्दगी मजबूर कितनी हो गयी है आजकल
अक्सर घबराता है ये दिल आज भी तेरे बगैर

हम तो शम्मा बनके जैसे हैं ये दिल आज भी तेरे बगैर
थरथराती काँपती है रूह भी तेरे बगैर

दूर है बेशक तू मुझसे फिर भी दिल में है छिपा
इस पे भी लगती है दूरी जाने क्यों तेरे बगैर

अपने दिल को किस तरह से काबू में रखता है तू
अपना दिल तो शून्यवत सा हो गया है तेरे बगैर

'निर्मल; के दिल को क्या कहिए हो चुका है लाइलाज
चोटें खाता फिर रहा है आज भी तेरे बगैर

2

मेरी तरफ झुकाव था लेकिन न अब रहा
पहले तो रख रखा था लेकिन न अब रहा

क्या क्या करें शिक़ायतें कितना गिला करें
पहले तो कुछ लगाव था लेकिन न अब रहा

किस्मत ने यारों हमको तो नाकाम कर दिया
मुझमे बहुत हिज़ाब था था लेकिन न अब रहा

उसके करम के सामने चलती न एक भी
मन में बहुत कसाव था लेकिन न अब रहा

खा खा फ़रेबें काटी है सारी उम्र
'निर्मल' मे जो भराव था लेकिन न अब रहा.

© 2009 Sureshchandra Nirmal; Licensee Argalaa Magazine.

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