अर्गला

इक्कीसवीं सदी की जनसंवेदना एवं हिन्दी साहित्य की पत्रिका

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संपादकीय

अनिल पुष्कर कवीन्द्र

अरगला, संस्करण ३, अंक १

दुनिया बदलने में जन-आन्दोलनों की क्या भूमिका है? दुनिया कैसे बदलती है? जनता के सामूहिक प्रयासों और हस्तक्षेपों का सत्ता-व्यवस्था पर क्या असर पडता है? व्यवस्था परिवर्तन कैसे होते हैं? आज हम जिस रूप में जन-आन्दोलन देख रहे हैं ये रूप कब से दिखाई देने लगा था ?आज से पहले जब औपनिवेशिक शासन था, तब आंदोलन का क्या रूप था? आज सत्ता तंत्र साम्राज्यवादी शासन से होते-होते पूंजीवादी और नवउदारवादी स्तर तक पहुँच चुका है ये पहले के समय में किस तरह से अपनी भूमिका अदा करते थे?साहित्य और कला, कला के अन्य रूप जन-आन्दोलन की रफ़्तार पर क्या असर डालते हैं? जनसंचार माध्यमों में इलेक्ट्रानिक मीडिया और प्रिंट मीडिया अन्य संचार माध्यम किस तरह से आंदोलन को आगे बढाने में सहायक होते हैं? राजनीतिक-सांस्कृतिक पृष्ठभूमि व परिवेश किस तरह से जन-आन्दोलनों को प्रभावित करते हैं? सफल-असफल जन-आन्दोलन क्या होते हैं, उनके मुख्य कारण क्या हैं ? ऐतिहासिक सन्दर्भों में आंदोलन की सफलता-असफलता की पड़ताल कैसे की जा सकती है?

जन-आन्दोलन के लिए ऐतिहासिक-भौतिक परिस्थितियाँ कैसी होती हैं? ऐसे अनेक कारकों का अध्ययन एवं विश्लेषण का आधार क्या होता है. किस वर्ग की जनता जन-आन्दोलन करती आई है? जन-आंदोलन शब्द कहाँ से और कैसे प्रयोग में आया? किन अर्थों में पहले-पहल यह इस्तेमाल हुआ? आम आदमी की आकांक्षाएँ शासकों से हमेशा अलग होती हैं. तो ऐसे में जनता को पहली बार कब लगा कि जन-आंदोलन सबसे शसक्त माध्यम है यह चेतना कब कहाँ कैसे आयी? दुनिया भर के चुनिन्दा आंदोलनों का विस्तृत फलक से अध्ययन करने के पश्चात यह किसके पक्ष में हुए? अब तक हुए तमाम छोटे बड़े जन-आन्दोलनों की सफलता-असफलता नाकामयाबियाँ, सीमाएं, विचारधारा की वैज्ञानिक चेतना किस तरह से मुखर होकर सामने आयी? किन जन-आन्दोलनों को लेकर सबसे ज्यादा बहसें हुईं? जिसने विश्व के पैमाने पर जनता की दिशा और दशा बदल दी. ऐसे कौन से आंदोलन हैं जिनका विरोधी शक्तियों ने फायदा उठाया. ऐसे आंदोलन जो सिर्फ मध्यवर्गीय समाजों में उठे. अब इस तरह के आंदोलन सामने आ रहे हैं जिसमें आधुनिक विचार, हथियार, तकनीक का सहारा लिया जा रहा है. इन सब के साथ ही यह सवाल जुडा है कि भविष्य में किस तरह के आंदोलन होंगे? और इनकी लीडरशिप उनकी ताकत - विचार होंगे या हथियार? इन तमाम विषयों को लेकर गंभीर चर्चा इस अंक में की गयी है.

चाहे कोई भी देश रहा हो, जब कभी भी जन-आन्दोलन जनता के हाथों में आया तब तब वह प्रतिशोध नहीं आम-आदमी के अधिकारों की लड़ाई को लेकर बिलकुल स्पष्ट रहा है. अगर हम इतिहास पर नजर डालें तो जाहिर है कि जब-जब किसी भी देश की सरकारें, तंत्र, सत्ता, ने पूंजीपतियों के साथ प्राकृतिक सम्पदा पर जबरन कब्जा किया करने की कोशिश की. बदनीयती से सर्वहारा वर्ग को आघात पहुंचाया. असमय ही बर्बरतापूर्वक, हिंसक कदम उठाये यहाँ तक कि नृशंस ह्त्या भी की . निचले तबके के समूहों समाजों का शारीरिक, मानसिक उत्पीडन किया. हमला करके बुनियादी सहूलियतों, जरूरतों को हथियाने की कोशिश की है तब-तब बुनियादी सम्पदा पर हमले के खिलाफ जनता एकजुट होकर सामने आ खडी हुई. तमाम युगों, दशकों, पीढ़ियों से अत्याचार, शोषण, उत्पीडन के विरुद्ध आम आदमी ने जुलूस, हड़तालें, अनशन, विद्रोह आन्दोलनों के जरिये अपने संघर्ष को पुख्ता किया है. समाजवादी और समतामूलक समाज के निर्माण के लिए अपनी जान दे दी. व्यवस्था परिवर्तन को लेकर कठिन से कठिन परिस्थितियों में जनता ने संघर्ष को जीवित और चलायमान बनाए रखा. अपने अधिकारों के लिए सजग होना, बुनियादी संसाधनों के लिए सांगठनिक तैयारी से लैस उत्पीडित वर्ग ने वर्ग-संघर्ष को अपना हक पाने का जरिया बनाया. यह भी सच है कि हर देश के बुद्धिजीवी वर्ग ने समय-समय पर लड़ाइयों में शामिल वर्ग को जन-आंदोलन के लिए वैज्ञानिक चेतना से भरे विचारों की तेज धार दी है. इसके साथ ही उत्पीडन, शोषण से मुक्ति के लिए समाजवादी व्यवस्था की मांग की है. क्रांतिकारी योद्धाओं ने समतामूलक समाज की स्थापना के लिए प्राणों की आहुति तक दी है. न ही समझौता किया, न आंदोलन की ऊर्जा को बुझने ही दिया.

जैसा कि हम सभी का इस बात से गहरा सरोकार रहा हैं कि पहली मजदूर यूनियन १७५२ में इंग्लैण्ड के मजदूरों ने बनाई थी. सन १३४९ से चले आ रहे श्रमिक अधिनियम के तहत मजदूरों को संसद में याचिका देने का अधिकार प्राप्त था १७३१ तक मजदूर यूनियन बनाने पर सख्त प्रतिबन्ध था. १७८९ में फ्रांसीसी क्रान्ति के जरिये मजदूरों के अधिकारों की स्वीकृति की आधारशिला रखी गयी. जबकि सन १८०० में हड़ताल दामक षड्यंत्रकारी कानून को, जोकि १५४८ में बना था उसे कन्विनेशन एक्ट के नए नाम से पुनः पारित किया ताकि श्रमिकों की बढ़ती शक्ति को कुचला जा सके. इसका नतीजा यह हुआ कि लुद्राईट आंदोलन या मशीन भंजक आंदोलन मजदूरों के जरिये अपने आरंभिक स्वरूप में उभरा. १८१९ में पहली बार पीटरलू ने सामजिक और राजनीतिक मांगें उठाईं. जिसको कुचलने के लिए ह्यूक विलिंगटन ने इन सभाओं पर फौजी कत्लेआम मचा दिया. परिणाम स्वरूप १८२४ में इस अविस्मरणीय बलिदान ने ट्रेड यूनियन की लहर पैदा की और कानून बना. १८३० तक आते आते समस्त यूनियनों को मिलाकर राष्ट्रीय श्रमिक सुरक्षा संघ बना. १८३४ में ‘विशाल सहकारी संघ’ बना तत्पश्चात ‘विशाल राष्ट्रीय एकीकृत ट्रेडर्स यूनियन’ के नाम से श्रमिक संगठन बना. कुछ समय के भीतर ही राजसत्ता और पूंजीपतियों ने इस पर हमला बोल दिया. १८३८ में ३० लाख श्रमिकों आर्थिक संकट से उभरने के लिए चार्टर पर हस्ताक्षर किए. इस प्रयास से मजदूरों ने अपने काम के १० घंटे भी निर्धारित कर लिए . नतीजतन विश्व भर में श्रमिकों को मौलिक अधिकार मिले. विश्व में पहला श्रमिक आंदोलन चार्टिस्ट आंदोलन था इस आंदोलन में सर्वहारा दृष्टिकोण का सुस्पष्ट युग-परिवर्तन कारी कार्यक्रम हुए. तात्कालिक दलितों की स्थिति में सुधार हुआ. पूंजीवादी व्यवस्था की कमियां उजागर हुईं. उन पर प्रहार हुए. श्रमिक आंदोलन के वर्ग-संघर्षीय स्वरूप और राजसत्ता के चरित्र को बखूबी पहचाना गया.

चूंकि सत्ता और पूंजीवादी व्यवस्था हमेशा ही अपने प्रारूप, संरचना नीतियों में परिवर्तन करती है जिसके कारण शोषण के नए नए रूपों से जनता को तमाम तरीके की वर्जनाएं, प्रताड़नाएं दी जाती रही हैं. और वर्ग संघर्ष में जीता हुआ सर्वहारा वर्ग नए नए आन्दोलनों को पैदा करता रहा है जिससे उसकी तकलीफें कम हो सकें. तमाम बार ऐसे मौके भी आये जब जनता के छोटे-बड़े आंदोलनों की शक्ल बड़ी बड़ी क्रांतियों ने ले ली. काफी हद तक सफलता भी मिली किन्तु पूरी तरह से श्रमिकों का शोषण कभी भी बंद नहीं हुआ. यह सच है कि जन-आन्दोलन प्रतिशोध न होकर अधिकारों की लड़ाई के रूप में उभरा. मजदूर आन्दोलनों पर गहराई से पड़ताल करने पर स्पष्ट होता है कि आन्दोलनों से क्रान्ति तक का रास्ता बहुत कठिन दौर से हमेशा ही गुजरा है. क्रान्ति की कभी भी कोई पूर्वनिर्धारित रूपरेखा न रही है न भविष्य में होगी. क्रान्ति एक सतत घटित होने वाली प्रक्रिया है जो उस वर्ग के भीतर ही पैदा होती है जिसे डरा-धमकाकर, मार-पीटकर, श्रम का शोषण करके, मूल अधिकारों का हनन करके सताया गया है, क्रांति एक ओर युग और काल की सीमाओं का अतिक्रमण करती है दूसरी ओर युग और काल को एक नयी दिशा देती है है. श्रमिक वर्ग जिन बुनियादी जरूरतों के लिए ताजिंदगी लड़ता है क्रान्ति उन जरूरतों को पूरा करने का सबसे सशक्त जरिया है. जिसे हमेशा ही नए नजरिये और विचार, संगठन की ताकत संघर्ष की ऊर्जा जब तलक मिलती रहेगी तब तक क्रान्ति की जुम्बिश आदमी के भीतर पनपती और ज़िंदा रहेगी. आप ही बताइए बिना क्रांति के आदमी होता क्या है? एक मुर्दा शान्ति से भरा हुआ मांस का जीवित लोथडा. जो पूंजी और सत्ता की मशीनों में अपना श्रम, अपना लहू जलाकर जीवनभर खटता है और अंत में हासिल क्या होता है? हज़ारों-लाखों जिस्म इस निर्दयी पूंजी की मशीनों में, अराजक, हिंसक, सत्ता की भट्ठी में सुलगते रहे है. अनेकों पीढियां इनसे लड़ते-लड़ते स्वाहा हो गयीं. इसीलिए हम जानते हैं कि क्रान्ति हमारी सबसे बड़ी जरूरत है. हमारी बुनियादी जरूरतें क्रांति के लक्ष्य तक पहुँचने पर स्वयम ही पूरी हो जायेंगी. अगर आप यह सोचते हैं कि क्रान्ति के लिए जरूरी क्या है? हम यही कहेंगे कि सिर्फ क्रान्ति की धारणा, क्रान्ति का जुनून, क्रान्ति को बनाए रखने वाले आन्दोलनों की ऊष्मा, क्रान्ति की आवाज को न दबाये जाने वाली लोक बोली और जुबान. यहीं से के अधिकारों को पाने के लिए संघर्ष की ताकत मिलती है. क्रान्ति हमारी मूलभूत जरूरत है, क्रान्ति ही हमारे लक्ष्य तक पहुँचने का आखिरी रास्ता है. आप पूछ सकते हैं क्रान्ति किसके लिए? क्रान्ति कभी ईश्वर की सत्ता और शक्ति के भरोसे नहीं आती. न ही प्राकृतिक घटनाओं की तरह, न ही प्राकृतिक उपहार की भाँती हमारे भीतर पैदा होती है क्रान्ति सायास होकर भी स्वतः स्फूर्त ऊर्जा की तरह महान विचारों से उद्भूत होती है. यह मानवतावादी, संघर्षशील विचारों का समुच्चय है जोकि व्यक्तियों की सामूहिक इच्छाशक्ति, सामुदायिक प्रयास से, सांगठनिक क्रियान्वयन से फलती फूलती है. और बुनियादी जरूरतों, के लिए संघर्षरत समुदाय, वर्ग, समाज, संगठन, संस्कृति का हिस्सा बनकर लहू के साथ रगों में संचारित होती है. क्रान्ति का विचार ही इन समस्त समूहों के गठबंधन का सूत्रपात पैदा करता है. अगर आप कहेंगे कि क्रान्ति से हासिल क्या होगा? तो जो जिन्दगियाँ पूँजी की भट्ठी में सुलग रही हैं, जो अस्थियां शोषण की जमीन में में सड़-गल रही हैं, जो आवाम हर रोज मौत की सूरतों में ढल रही है, उन्हें बचाने की कूबत सिवाय क्रान्ति के और किसी तंत्र में नहीं है. हमें भरोसा करना होगा कि क्रांति हमारी आने वाली पीढ़ियों को खुली हवा में सांस लेने की आजादी देने में सक्षम होगी. वो युद्ध में झोंके जा रहे वर्गों को यकीनन बचायेगी. ये भरोसा हमें क्रान्ति पर करना होगा. अगर फिर भी ये सवाल आप करते हैं कि हम क्रान्ति का ही रास्ता क्यूँ चुनें? तो मेरी राय उन लोगों के लिए यही है कि वो अपना समय इसमें जाया न करें. उन्हें इसे चुनने की कतई जरूरत नहीं. आखिर हमें अब भी ये क्यूँ नहीं दिखाई दे रहा है कि क्रान्ति हमारे भीतर हजारों-हजार मील का सफर तय कर यहाँ तक पहुची है. उसे हारना मंजूर नहीं. उसे रुकना भी गवारा नहीं, उसे चुप रहना तो हरगिज़ नहीं आता. वो अपनी पूरी ताकत से जोर-आजमाईश से भरी सर्वहारा की नसों में तनाव और जज्बा भर रही है. क्या ऎसी हालत में हम उससे अलग रह सकते हैं? कतई नहीं. क्रान्ति की पीड़ा हमारी पीड़ा है, क्रान्ति की मांग हमारी माँग है, क्रान्ति की जरूरत हमारी जरूरत है, क्रान्ति ही हमारी संगठित शक्ति का एकमात्र उपाय है. वरना दुबककर जीने से हासिल कुछ नहीं होगा. किसका भला होगा? उन ताकतों को रोकना, हमें जो आहिस्ते-आहिस्ते खत्म करती जा रही हैं, और कोई सुबूत तक नहीं मिलते. हमें जो व्यवस्था गुलाम बना रही है, हमारी संतानों को सभ्यता, प्रगति की खातिर अपाहिज बना रही है, हमारी कल्पना, हमारी सोच, हमारे सपनों को मार रही है. हमारी उम्मीदें छली जा रही हैं, हमें इन ताकतों को बेनकाब करना होगा, हमें इन ताकतों से लड़ना होगा. क्रान्ति हमारी कोशिशों में जब तक शामिल है हम अपनी विरासत, कौम, वर्ग, समुदाय को बचा पाने में समर्थ हैं. क्रान्ति खुद हमारी दहलीज पर आ खडी हुई है. उसे यूं ही कैसे जाने देंगें. हमारी कुर्बानी बेजार न होगी. इसीलिए हमें क्रान्ति को अपना हथियार बनाना होगा, और घेरकर मार देना होगा उन ताकतों को, जो क्रान्ति को अपना गुलाम समझती हैं. क्रान्ति में विश्वसनीय नेतृत्व की हमें दरकार है, यह हमारी जहनियत का हिस्सा है. क्रान्ति में उतार-चढाव आते हैं हमें ऐसा मौका मिला है जहां कुछ भी संभव है हमें लड़ाई मजबूती से लड़नी है. सियासत हमेशा ही अपने वजूद को बनाए रखने की लड़ाई को अंतिम लड़ाई मानता है. और क्रान्ति अपने अधिकारों के लिए सीधे-सीधे लड़ना है. क्रान्ति ने हमें ये दायित्व सौंपा है. कहिये! अब आप की क्या राय है? क्या आप दुनिया बदलने के हमारे इस मशविरे से सहमत हैं? उम्मीद है आप भी समतामूलक, समाजवादी व्यवस्था को ही मान्यता देंगे. आप भी जनवादी मूल्यों को ही अपनाएंगे. आप भी मानवतावादी विचारों को अपना सब कुछ न्योछावर करेंगे.

- अनिल पु. कवीन्द्र

© 2012 Anil P. Kaveendra; Licensee Argalaa Magazine.

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