अर्गला

इक्कीसवीं सदी की जनसंवेदना एवं हिन्दी साहित्य की पत्रिका

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हस्तक्षेप

अशोक कुमार पांडे

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Coming Soon.

अर्थ-अनर्थ

ईश्वर ने अर्थशास्त्रियों को इसलिए बनाया कि
मौसम विज्ञानियों की इज्जत बची  रहे
यह इससे बिल्कुल अलग बात है कि
ईश्वर को भक्तों की इज्जत बचाए रखने के लिए बनाया गया था
फिर अर्थशास्त्रियों ने इस अनर्थ की इज्जत बचाने के लिए गढे अर्थ.

इस नए शब्दकोष में
सबसे पहले गढा गया एक शब्द
प्रगति

कैम्ब्रिज से लौटा अर्थशास्त्री प्रसन्न मुद्रा में
जब उवाचता है यह शब्द
तो अपने ठिये पर रामवृक्ष की दुकान के
असेम्बल्ड ब्लैक एंड व्हाईट टीवी के सामने बैठे
बरन बरेठा सुरती की अंतिम ताल के साथ
सुर साधते हुए कहते हैं – धै ससुरी परगति!

किसी दूसरे चैनल से
झक सफ़ेद कुर्ते पाजामे से झरता है एक दूसरा शब्द
विकास

और ठीक उसी वक़्त होठों के कोरों में बजबजाती
झाग के बीच उस झोपडी में भर जाता है
एक शब्द सल्फास,
जहाँ कुछ दिन पहले मेथी के साग के साथ
बाजरे की आखिरी रोटी खा चैन की नींद सोये थे युवराज...

शब्द ठहरे रहते हैं
और पानी की तरह बदलती रहती है उनकी तासीर
एक उम्र गुजरती जाती है शब्दों के सहारे
और शब्द तिनकों की तरह कुचले जाते रहते हैं
शब्दकोशों की कब्रगाह में हज़ार बरस सोये रहने के बाद
एक दिन जब आता है क़यामत का दिन तो बदल चुके होते हैं
बहिश्त और दोज़ख के मानी
और बहिश्त का इंतज़ार करते-करते
दोज़ख से दिल लगा बैठते हैं शब्द

और फिर
बतर्ज केदार जी

जहाँ-जहाँ लिखा हो उदार
वहाँ-वहाँ लिख दो हत्यारा
कोई फर्क नहीं पड़ता...

मैं एक सपना देखता हूँ

मैं एक सपना देखता हूँ
रात के इस तीसरे पहर जब सपनों को सो जाने के आदेश दिए जा चुके हैं
जब पहरेदारों ने कस दिए हैं मस्तिष्क के द्वार
जब सारे सपनों के हकीक़त बन जाने की अंतिम घोषणा की जा चुकी है
उन्माद और गुस्से की आखिरी खेप के नीलाम हो जाने की खुशी में बह रही है शराबें
शराबों की ज़हरीली महक से बेपरवाह
मैं एक सपना देखता हूँ....

मैं एक सपना देखता हूँ
जिसमें बिल्कुल सचमुच के इंसान है
खुशी, दुःख और गुस्से से भरे हुए
जब होठों और मुसकराहट के बीच फंसा दिए गए हैं तमाम सौंदर्य प्रसाधनों के फच्चर
मैं उन लहूलुहान होठों से झरते गीतों की रुपहली आवाज़ सुनता हूँ

मैं देखता हूँ इस निस्सीम विस्तार के उस पार
मैं देखता हूँ इस भव्य इमारत का झरता हुआ पलस्तर
मैं रास्ते में गिरे हुए चेहरे देखता हूँ
मैं देखता हूँ लहू के निशान, पसीने की गंध, आँसुओं के पनीले धब्बे
मैं इस शव सी सफ़ेद सड़क से चुपचाप बहती पीब देखता हूँ
मेरा देखना एक गुनाह है इन दिनों
मैं सपने में इन गुनाहों की तामीर देखता हूँ

वहाँ दूर उस तरफ एक बागीचा है जिसमें अब तक बचा हुआ है हरा रंग, वह निशाने पर है
वहाँ एक बावडी है पुरानी जिसमें अब तक बचा हुआ है नीला पानी, वह निशाने पर है
वहाँ एक पहाड़ है जिसमें अब भी बची हुई है थोड़ी सी बर्फ, वह निशाने पर है
वहाँ एक नदी है जिसके सीने में अब भी बची हुई हैं थोड़े सीपियाँ, वह निशाने पर है
वहाँ एक घर है पुराना जिसकी रसोई में बची हुई है थोड़ी सी आग, वह निशाने पर है
और ऐसे में अपने बचे हुए सपनों के साथ मैं घूमता हूँ इस बियाबान में अपने डरों के श्वेत अश्व पर सवार

मैं अपराधी हूँ इस शांत, इकरंगे समय के आक्षितिज फैले विस्तार का
मेरे सपने इस पर बिखेर देते हैं राई के दानों सी रपटीली असुविधा
क्षितिज पर जाकर चुपचाप देख आते हैं सीमाओं के पार का धूसर मैदान
रात को रौशन कर आते हैं चुपचाप और जलते हुए दिन पर तान देते हैं बादल का एक टुकड़ा
एक लुप्तप्राय शब्द का अभिषेक कर आते हैं अपनी खामोशियों से
और हजार मील प्रति घंटा दौड़ती रेल में बैठे एक मनुष्य के माथों के बलों के बीच खींच देते हैं सुनहरी रेखा

मैं देखता हूँ सपने और हवाओं में घुले ज़हर में घुलने लगती है आक्सीजन
मैं देखता हूँ सपने और विकास दरों के रपटीले पर्वतों में दरारें उभरने लगती हैं
गहराने लगता है नदी का नीला रंग
पर्वतों पर पसरने लगती है बर्फ
चूल्हों में सुलगने लगती हैं लुत्तियाँ...  

व्हाईट हाउस से जुड़े संसद भवन के बेतार के तार के बीच
किसी व्यवधान की तरह घुसती हैं मेरी स्वप्न तरंगें
मैं ठठा कर हंसता हूँ किसी उन्मादी की तरह और मेरी चोटिल देह से झरते हैं सपने
मैं देखता हूँ उनकी आँखों में पसरता हुआ डर 
और क्या बताऊँ फिर किस उमंग से देखता हूँ कैसे-कैसे सपने

मैं एक सपना देखता हूँ

#.माफीनामा

मैं एक सीधी रेखा खींचना चाहता हूँ
मैं अपने शब्दों में थोड़ी सियाही भरना चाहता हूँ
कुछ आत्मस्वीकृतियाँ करना चाहता हूँ मैं
और अपनी कायरता के लिए माफी माँगने भर का साहस चाहता हूँ

मैं किसी दिन मिलना चाहता हूँ तमाम शहरबदर लोगों से
मैं अपने शहर के फक्कड़ गवैये की मजार पर बैठकर लिखना चाहता हूँ यह कविता
और चाहता हूँ कि रंगून तक पहुंचे मेरा माफीनामा.

मैं लखनऊ के उस होटल की छत पर बैठ किसी सर्द रात ‘रुखसते दिल्ली’ पढ़ना चाहता हूँ
इलाहाबाद की सड़कों पर गर्म हवाओं से बतियाते भेडिये के पंजे गिनना चाहता हूँ
मैं जेएनयू के उस कमरे में बैठ रामसजीवन से माफी माँगना चाहता हूँ
मैं पंजाब की सड़कों पर पाश के हिस्से की गोली
और मणिपुर की जेल में इरोम के हिस्से की भूख खाना चाहता हूँ  

मैं साइबेरिया की बर्फ से माफी माँगना चाहता हूँ
मैं एक शुक्राना लिखना चाहता हूँ
हुकूमत-ए-बर्तानिया और बादशाह-ए-कतर के नाम 

कितनी आश्वस्ति थी तुम्हारे होने ही से बुद्ध

दुखों की कब कमी रही इस कुशीनारा में
अविराम यात्राओं से थककर जब रुके तुम यहाँ
दुखों से हारकर ही तो नहीं सो गये चिरनिद्रा में?
कितना कम होता है एक जीवन दुख की दूरी नापने के लिये
और बस सरसों के पीलेपन जितनी होती है सुख की उम्र...

आख़िरी नहीं थी दुःख से मुक्ति के लिए तुम्हारी भटकन
हज़ार वर्षों से भटकते रहे हम देश-देशान्तरों में
कोसती रहीं कितनी ही यशोधरायें कलकतिया रेल को
पटरियाँ निहार-निहार गलते रहे हमारे शुद्धोधन

उस विशाल अर्द्धगोलीय मंदिर में लेटे हुए तुम
हमारे इतिहास से वर्तमान तक फैले हुए आक्षितिज
देखते रहे यह सब अपने अर्धमीलित नेत्रों से
और आते-जाते रहे कितने ही मौसम…

गेरुआ काशेय में लिपटे तुम्हारे सुकोमल शिष्य
अबूझ भाषाओं में लिखे तुम्हारे स्तुति गान
कितने दूर थे ये सब हमसे और फिर भी कितने समीप
उस मंदिर के चतुर्दिक फैली हरियाली में शामिल था हमारा रंग
उन भिक्षुओं के पैरों में लिपटी धूल में गंध थी हमारी
घूमते धर्मचक्रों और घंटों में हमारी भी आवाज़ गूँजती थी
और हमारे घरों की मद्धम रौशनियों में घुला हुआ था तुम्हारे अस्तित्व का उजाला

हमारे लिये तो बस तुम्हारा होना ही आश्वस्ति थी एक…

कब सोचा था कि एक दिन तुम्हारे कदमों से चलकर आयेगा दुःख
एक दिन तुम्हारे नाम पर ही नाप लिए जायेंगे ढाई कदमों से हमारे तीनों काल
यह कौन सी मैत्रेयी है बुद्ध जिसे सुख के लिये सारा संसार चाहिये?
और वे कौन से परिव्राजक तुम्हारी स्मृति के लिए चाहिए जिन्हें इतनी भव्यता?

तुम तो छोड़ आये थे न राज प्रासाद
फिर...
कौन है ये जो तुम्हें फिर से क़ैद कर देना चाहते है?
कौन हैं जो चाहते हैं चार सौ गाँवों की जागीर तुम्हारे लिए
यह कैसा स्मारक है बहुजन हिताय का जिसके कंगूरों पर खड़े इतराते हैं अभिजन?

कहो न बुद्ध
हमारा तो दुःख का रिश्ता था तुमसे
जो तुम ही जोड़ गए थे एक दिन
फिर कौन हैं ये लोग जिनसे सुख का रिश्ता है तुम्हारा?

कहाँ चले जाएँ हम दुखों की अपनी रामगठरिया लिए
किसके द्वारे फैलाएं अपनी झोली इस अंधे-बहरे समय में
जब किसी आर्त पुकार में नहीं दरवाजों के उस पार तक की यात्रा की शक्ति
कौन सा ज्ञान दिलाएगा हमें इस वंचना से मुक्ति
आसान नहीं अपने ही द्वारों के द्वारपाल हो जाने भर का संतोष
कहाँ से लाये वह असीम धैर्य जिसके नशे में डूब जाता है दर्द का एहसास
वह दृष्टि कि निर्विकार देख सकें सरसों के पौधों पर उगते पत्थरों के जंगल
निर्वासन का अर्थ निर्वाण तो नहीं होता न हर बार
और ऐसे में तो कोई स्वप्न भी अधम्म होगा न बुद्ध

कहो न बुद्ध दुःख ही क्यों हो सदा हमारे हिस्से में?
बामियान हो कि कुशीनगर हम ही क्यों हों बेदखल हर बार?
मुक्ति के तुम्हारे मन्त्र लिए हम ही क्यों हों हविष्य हर यज्ञ के ?

कहो न बुद्ध
क्या करें हम उस अट्टालिका में गूंजते
‘बुद्धं शरणम गच्छामि’ के आह्वान का

इस महादेश के अनिवासी का एक बयान

हम एक घर चाहते थे सुरक्षित
हमसे कहा गया राजगृह में एक आदमी तुम्हारा भी है
तुम्हारी कमजोर भुजाओं में जो मछलियाँ हैं मरी हुईं
उस आदमी की आँखों में तैर रही हैं देखो
वह तुम्हारा आदमी है, उसका रंग तुम्हारे जैसा
इत्र न लगाए तो उसकी गंध तुम्हारे जैसी
तुम्हारे जैसा नाम तुम्हारे घर का ही पता उसका पुश्तैनी
वह सुरक्षित तो तुम सुरक्षित
वह अरक्षित तो तुम अरक्षित

इस विशाल महादेश में हम एक कोना चाहते थे अपने सपनों के लिए
हमसे कहा गया कि अयोध्या के राजकुमार की कथा में ही शामिल है सबकी कथा
वहीं सुरक्षित है इतिहास का एक अध्याय तुम्हारे लिए भी
और वहीं किसी कोने में संरक्षित तुम्हारे स्वप्न
क्या हुआ जो बचपन में नहीं सुनीं तुमने चौपाइयाँ
क्या हुआ कि राजा बलि के प्रतीक चिन्ह बनाते रहे तुम अपनी दीवारों पर
क्या हुआ कि तुम्हारे गाँव के डीह बाबा का चौरा ही रहा तुम्हारा काशी-मथुरा
हृदय है यह इस महादेश का
इसमें ही शामिल सारे देव-देवता - इसी कथा से निसृत सारी उपकथाएँ
यही तुम्हारी भाषा-बानी

जबकि हम जो बोलते थे वह राजभाषा से कोसों दूर थी
हम जो गाते थे वह नहीं था राष्ट्रगीत
हम जिन्हें पूजते थे नहीं चाहिए था उन्हें कोई मंदिर भव्य
दो मुट्ठी धान और कच्ची दारू से संतुष्ट हमारे देव
महज एक नौकरी के लिए चले आये थे हम छोड़कर अपना देस इस महादेश में
हमारा देस था जो उसकी कोई राजधानी नहीं थी
हमें दो जून की रोटी चाहिए थी, सर पर एक छत और थोड़े से सपने
जिसके लिए मान लिया हमने वह सबकुछ जो सिखाया गया स्कूलों में
और बिना सवाल किए उगलते रहे उसे जहाँ-तहाँ

अजीब से हमारे नाम दर्ज हुए किन-किन सूचियों में
हमसे जब पूछी गयी हमारी भाषा हमने हिन्दी कहा और माँ की ओर देख नहीं पाए कितने दिन
हमसे जब पूछा गया हमारे देश का नाम हिन्दुस्तान कहा और पुरखों की याद कर आंसूं भर आये
हमने समझाया खुद को समंदर होने के लिए भूलना पड़ता है नदी होना
हमारे भीतर की किसी धार ने कहा
वह कौन सा समंदर जिसके आगोश में बाँझ हो जाती हैं नदियाँ ?

तुलसी की चौपाइयाँ रटते अपने बच्चों को हम सुनाना चाहते थे जंगलों की कहानियाँ कुछ
उनकी पैदाइश पर चुपके से गुड़-रोट का प्रसाद चढ़ा आना चाहते थे चौरे पर
कंधे पर ले उन्हें सुनाना चाहते थे किसी गड़ेरिये का रचा कोई गीत
धान की दुधही बालियाँ निचोड़ देना चाहते थे उनके अंखुआते होठों पर
भोर की मारी सिधरी भूज कर रख देना चाहते थे कलेऊ में

किसी रात ताड़ की उतारी शराब में मदहोश हो नाचना चाहते थे अपनी प्रेमिकाओं के साथ
सात समंदर पार से आई किसी चिड़िया के उतारे पर खोंस देना चाहते थे उनकी लटों में
जंगलों की किसी खामोश तनहाई में चूम लेना चाहते थे उनके ललछौहे होंठ
और अपनी मरी हुई मछलियों वाली उदास बाहों में गोद लेना चाहते थे उनके नाम

कोई देश नहीं था जिसे चाहते थे हम अपनी जेबों में
किसी गड़े हुए खजाने की रक्षा करते बूढ़े सर्प की तरह नहीं जीना चाहते थे हम
इस हज़ार रंगों वाली दुनिया में सिर्फ एक रंग बचाना चाहते थे जो पुरखों न कर दिया था हमारे हवाले
पर कहा गया हमसे कि बस तीन रंग है इस देश के झंडे में

अपनी लाल-पीली-हरी-नीली-बदरंग कतरने सजाये इसी भाषा में लिखी हमने कविताएँ
पर कहा गया यह नहीं है हमारी परम्परा के अनुरूप
इसमें जो ज़िक्र है महुए और ताडी और मछलियों और जंगलों और पहाड़ों और कमजर्फ देवताओं का
वह सब नहीं हैं कविता की दुनिया के वासी उन्हें विस्थापित करो

लाल को लाल लिखो वैसे जैसे लिखते हैं हम
आसमान को नीला कहो तो बस नीला कहो  
बादल हों तो भी धूप हो तो भी कुछ न हो तब भी 
कुछ इस तरह कहो नीला कि आसमान न लिखा हो तो भी समझा जाए आसमान 
समंदर सा गहरा तो भी उसे हिमालय से ऊंचा कहा जाए अगर नीला कह दिया गया हो उसे 
जो नीला हो उसे कुछ और कहने की आजादी कुफ्र है
जो आसमान हो उसे कुछ और न कहो नीले के सिवा

हमने देखे थे काले पक्षियों और सफ़ेद बादलों से भरे आसमान
हमने लिखा और पंक्षियों की तरह विस्थापित हुए
हमने देखे थे महुए से टपकते रंग
हमने दर्ज किया और इस तरह तर्क हुई हमारी नागरिकता
हमारी स्मृतियाँ हमारे निर्वासन का सबब थीं और हमारे सपने हमारी मजबूरियों के
हमारी कविता राजपथ पर हथियार ढोते रथों के पहियों का शिकार हुई
जिनके ठीक पीछे चली आ रही थी हमारी स्मृतियों की कुछ क्रूर अनुकृतियाँ

हम क्या कहते
उन रथों पर हमारा ही एक आदमी था सैल्यूट मारता इस महादेश को.

© 2012 Ashok Kumar Pandey; Licensee Argalaa Magazine.

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