अर्गला

इक्कीसवीं सदी की जनसंवेदना एवं हिन्दी साहित्य की पत्रिका

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कथा साहित्य

आलोक कुमार सातपुते

धुआँ

उसने कुछ अधजली मच्छर मारने की टिकिया इकट्ठी की, और उसे नारियल के छिलकों पर रखकर धुआँ किया. अधिक से अधिक मच्छर मरें सोचकर उसने घर की सभी खिड़कियाँ बंद कर दीं, और एक खाट बाहर निकालकर उसने घर के दरवाजे की कुण्डी भी लगा दी, और घर के सामने पीपल के वृक्ष के नीचे खाट बिछाकर सुस्ताने लगा. खपरैल से उठते धुएँ को देखते-देखते उसे झपकी सी लग आयी.

अचानक शोर सुनकर उसकी नींद खुल गयी. उसने देखा कि उसका घर 'महिला संगठनों', 'पर्यावरणविदों' और 'पत्रकारों' से घिरा हुआ है. महिला संगठन वाले नारे लगा रहे थे कि बहू जलाने वालों को फाँसी दो. वहीं दूसरी ओर पर्यावरणविद उस उठते हुए धुएँ को देखकर ओज़ोन पर्त पर चिन्ता व्यक्त करते हुए, उस धुएँ के रासायनिक परीक्षण की मांग कर रहे थे. पत्रकार अपने ढंग से घटना की रिपोर्टिंग में लगे हुए थे. उसने चिल्लाकर लोगों को वस्तुस्थिति बतानी चाही, पर सबने उसे यह कहकर झिड़क दिया - 'क्या तुम्हें इतना भी नही पता कि धुआँ वहीं से उठता है, जहाँ पर आग़ हो.' इतने में पुलिस भी आ गई.

अगले दिन अख़बारों की मुख्य ख़बर थी - अफ़वाह फैलाने के अपराध में उस घर का मालिक हवालात में.

आदमीपन

उसने दो कुत्ते पाल रखे थे. खाना खिलाते वक्त वह उन्हें ध्यान से देखता, तो पाता कि, उनमें से एक कुत्ता तो पूरा खाना ख़त्म होने तक लगातार दुम हिलाता रहता, जबकि दूसरे कुत्ते की दुम ज़रा भी नहीं हिलती. उसे उस दूसरे कुत्ते पर चिढ़ सी होने लगी, और उसने उसे प्रताड़ित करना शुरू कर दिया. उसे प्रताड़ित करने में उसे बड़ा ही मज़ा आता, और आख़िर में उसने उसे घर से निकाल बाहर किया, और बाज़ार से दूसरा दुम हिलाने वाला कुत्ता खरीद लाया.

बुद्धिजीवी

उस व्यक्ति ने पामेलियन नस्ल की दो कुतिया पाल रखीं थीं. वह अक़सर देखता कि जब भी कोई आवारा कुत्ता उधर से गुजरता तो, वे दोनों ही उसका मुँह चाटती, और दुम हिलाती हुई उस कुत्ते के आस - पास ही मण्डरातीं. उस दिन भी ऐसा ही हुआ, तो उस व्यक्ति ने उस आवारा कुत्ते को मारकर भगाना चाहा, तभी उसने ध्यान दिया कि कल तक आवारा कुत्तों का मुँह चाटने वाली दोनों कुतिया आज उस आवारा कुत्ते पर भूँक रही हैं.

धोखा

'गुरुजी वह धन्ना सेठ अपनी ग़रीबी का रोना रोता रहा, और यह जानते हुए भी कि, वह झूठ बोलकर आपको धोखा दे रहा है, आपने उससे कुछ नहीं कहा, बल्कि मंद - मंद मुस्कुराते रहे. आखिर क्यों?' शिष्य ने गुरु से पूछा.

'वत्स, झूठ बोलकर वह मुझे नहीं, बल्कि स्वयं को धोखा दे रहा था, और स्वयं को स्वयं से धोखा खाते देखकर मेरे अधरों पर मुस्कान तिर गयी. ' गुरू ने समाधान किया.

वस्तुत:

झूठ के दरबार में वाद - विवाद कर सच को परास्त करने की होड़ सी लगी हुई थी. झूठ के दरबार में 'छल', 'कपट', 'बेईमानी', 'निर्दयता', और 'धन' नामक पाँच रत्न थे. छल, कपट, बेईमानी और निर्दयता सच से परास्त हो चुके थे. अब 'धन' की बारी थी सो वह उतरा.

सच ने धन के वैभव को देखा, और सम्मोहित सा देखता ही रह गया, और वाद - विवाद का निर्धारित समय खत्म हो गया. धन जीत चुका था. तब से अक़सर ऐसा होता है कि, धन को देख सच की ज़ुबान बंद हो जाती है.

अभिजात्य

उस घर की बाल्कनी में खड़े दो पामेलियन नस्ल के कुत्ते गुनगुनी धूप का आनंद ले रहे थे तभी उनकी नज़र नज़दीक ही घूरे के पास एक रोटी के लिये लड़ते हुए दो आवारा कुत्तों पर पड़ी. इस पर एक ने दूसरे से कहा - 'कैसे कुत्ते हैं? साले, एक सूखी रोटी के लिये लड़ रहे हैं. 'अरे भई, रोटी नहीं मिलती तो बिस्कुट क्यों नहीं खा लेते.'

'तभी तो कुत्ते कहलाते हैं साले', दूसरे ने जवाब दिया. इस पर दोनों की नज़रें मिलीं, और वे बहुत देर तक हो-हो कर हँसते रहे.

© 2009 Alok Kumar Satpute; Licensee Argalaa Magazine.

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