अर्गला

इक्कीसवीं सदी की जनसंवेदना एवं हिन्दी साहित्य की पत्रिका

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कथा साहित्य

ब्रज कुमार मित्तल

आपा

छिंप्पियों के मौहल्ले का आखिरी बछोर, जहाँ से शेख़ों की बस्ती शुरू होती है, वहीं पर एक बड़ी पुरानी हक़ीम की दुकान थी. जिससे लगे पीछे के घर में हक़ीम जी और उनकी एक मात्र बेटी रहते थे. हक़ीम जी के परिवार में इस बेटी फातिमा के अलावा अब कोई न था, यूँ हक़ीम जी सारी बस्ती को ही अपने खानदान की तरह प्यार करते थे. इस बस्ती में इनका बड़ा आदर था, वे चमकदार गोल चेहरे पर सफेद दाढ़ी और सिर पर मुगलई टोपी में बेहद खूबसूरत लगते थे और इनसे भी खूबसूरत थी उनकी सादगी-पसंद बेटी फातिमा.

मैं यह सब क्यूँ बता रहा हूँ? शेख़ तो खूबसूरत होते ही हैं पर ऐसा नहीं कि ये दोनों सिर्फ सूरत से ही अच्छे थे बल्कि सीरत से बहुत नेक थे. मैं जब बारह चौदह बरस का था एक दिन बुख़ार के कारण मुझे पिताजी के साथ हक़ीम जी के यहाँ जाना पड़ा, मैं बुख़ार से बहुत बेचैन था. दुकान में जाते ही हक़ीम चाचा मुस्कुराये और बोले, "क्या हुआ शहज़ादे, इस उम्र में बीमार?" मैं कुछ नहीं बोला, पिताजी ने बताया "दिनभर टांग बजाता है, घर टिका ही नहीं, धूप-छाँव भी नहीं देखता, बहुत कहते पर ये आजकल के छोकरे भला सुनते हैं किसी की?" हक़ीम चाचा ने मेरा पक्ष लेते हुए कहा, "अरे तुम्हारी क्या खाक सुने, कुछ सुनने लायक बात हो तो कुछ सुने भी, भला उस उम्र में टाँग को सम्भाल कर रखेंगे तो फिर कब काम आयेगी टांगें. अरे जगदीश बुढ़ापे में टांगें अपने आप बैठ जायेंगी, खेलने दो, यहाँ तो दिन है जीने के. याद है तुम्हें, तुम्हारे बाप कितनी बार मुझे साथ लेकर तुम्हें ढूँढ़ने निकलता था, तब?" कह कर हक़ीम जी जोरों से हंस दिये और देर तक हँसते रहे. हक़ीम चाचा बड़े जिंदादिल आदमी हैं. हक़ीम चाचा ने मेरी नब्ज़ पर हाथ रखा और स्थिर हो गये, तब मुझे लगा कि ये जो भी कहेंगे और भले के लिए ही कहेंगे, थोड़ी देर तक वे गंभीर होकर सोचते रहे. पिताजी से बोले "बच्चा ज्यादा बीमार है, थोड़ा वक्त लगेगा. इसी बीच मुझे जोरों की प्यास लगी, होंठ सूखने लगे, मुझे चक्कर आ गया और मैं बूढ़े से जमीन पर गिर गया.

जब मुझे होश आया तो मैं एक कमरे के पलंग पर लेटा था और एक खूबसूरत लड़की पंखा झलते हुए मुस्कुराहट मुझे देख रही थी. यह अजीब-सा दृश्य था मेरे लिए, मैं पिताजी को ढूँढ़ रहा था पर वहाँ मेरे और उसके सिवा कोई न था. उसने कहा," अब कैसे हो भारत?" "अच्छा हूँ." वो अपनी नर्म हथेली से मेरा, माथा सहला रही थी, बहुत अच्छा लग रहा था. उस स्पर्श में माँ की ममता का अहसास था जिसका कोई विकल्प नहीं होता. मुझे माँ की याद आ गई, दो बरस पहले भी ऐसा ही बुखार था, तब माँ ऐसे ही मेरे माथे को सहला रही थी. वो बोली, "अब कैसा लग रहा है?" "अच्छा" "सिर्फ अच्छा य बुरा अच्छा?" मैं हँसते हुए बोला, "हाँ बहुत अच्छा, पिताजी कहाँ गए?" वे दवाइयाँ लेने गए हैं, अगर नहीं आए तो रातभर यहीं रहना पड़ेगा. "इतना कह कर वो हंसी और मेरा माथा दबाने लगी; मैंने पानी माँगा तो वो उठ कर पानी ले आई, पानी पीकर मुझे अच्छा लगा, अब मैं यहाँ अच्छा महसूस कर रहा था. यह मेरा पहला अनुभव था जब मैं किसी अनजान घर में अपने आपको अकेला महसूस नहीं कर रहा था. मेरे घर में मेरे दो बड़े भाई एक भाभी और पिताजी हैं पर माँ की याद मुझे अक्सर आती है. आज लगा जैसे मैं अपनी माँ के पास हूँ. शायद पिता जी आ गए, वे हक़ीमजी से बातें कर रहे थे. मुझे अब सुकून था. थोड़ी देर में चुपचाप लेटा रहा, मुझमें बहुत ताकत नहीं थी. वो मेरे पास बैठी थीं उनके हाथ में पंखा था. हक़ीम चाचा के साथ पिताजी अंदर आए. शहद में मिलकर चाचा ने मुझे दवाई चटाई, "बेटे अब तुम ठीक हो जाओगे, थोड़े दिन आराम करना, फिर खूब खेलना." पिताजी ने कहा, "चल घर चलते हैं बहुत परेशान किया चाचा को." हक़ीम चाचा ने मना कर दिया, "नहीं अभी नहीं शाम को आकर ले जाना, अभी इसे यही दवाई कई बार देनी होगी, यह काम तुमसे न होगा, फातिमा है ना इसके पास, क्यों बेटा भारत रहोगे आपा के पास?" मैंने "हाँ" कह दी तो पिताजी चले गए. पता नहीं उस दिन मुझे इस घर से जाने का मन नहीं हुआ? मुझे एक शब्द मिल गया "आपा" जिसमें ढेर सारे अर्थ छिपे थे, जिसमें अजीब-सा आकर्षण था, एक महत्व और अपनत्व भी.

मैं आज यहीं रहा, हक़ीम चाचा और आपा ने मुझे कई बार दवा चटाई और लगभग पूरे वक्त आपा मेरे पास बैठी रही. उनसे ढेर सारी बातें हुईं, उनसे मैं धीरे-धीरे खुलने लगा, और फिर स्वभाव के अनुसार मैंने उन्हें बताया कि मैं दिन भर कैसे अपने दोस्तों के साथ मटरगस्ती करता हूँ, मुझे खाने में क्या पसंद है, मुझे कौन अच्छा लगता है कौन नहीं, एक बार भगवान की बात आई तो मैंने आपा से पूछा, "आपा! भगवान अच्छा है य हमारा? आपा ने मुझे एक नन्हें बच्चे की तरह गोद में लेकर कहा," मेरा जो भगवान है वही तेरा भी है, उसके नाम अलग अलग हैं, ये अलग-अलग भगवान इन लोगों ने बनाये जो मिल कर नहीं रहना चाहते, जो सिर्फ लड़ना चाहते हैं. इतना कहकर आपा फफ़क कर रो पड़ी, और फिर मुझे सकपकाया छोड़कर अंदर चली गई. मुझे बहुत बुरा लगा, मैं उठकर उदर आया, आपा अब भी रो रही थी. मुझे यह असहनीय लगा. मैं आपा को पकड़कर रूआँसे गले से गया, "आपा अब मैं आप से कुछ नहीं पूछूँगा, मुझे माफ कर दीजिए." आपा ने पलट कर मुझे अपनी गोदी में उठा लिया और मुस्कुराकर अपने आँसू पोछ लिये. हम दोनों आकर आंगन की सीढ़ियों पर बैठ गए. वो बोली, "आज से तेरा भगवान एक होगा, पर आपा की बात अच्छी लगी और मैंने अनायास ही आपा की गोद में अपना चेहरा छिपा लिया.

अब मैं बिल्कुल ठीक हो गया था, मन करता था कि किस तरह फिर दिन भर आपा के पास रहूँ, पर कोई उपाय न था, मैं भगवान से यह भी कहता कि वो मुझे फिर से बीमार कर दे पर भगवान नाम से अब मुझे डर लगता था क्योंकि आपा के पास भी वही भगवान था जो मेरे पास था. आपा को भी मेरी सब बातों का पता चल जायेगा. एक दिन पिताजी ने मुझे बुलाया और एक डिब्बा मिठाई देकर बोले, "जा हक़ीमजी के यहाँ मिठाई देकर अ, कहना कि तू उनकी दवाई से जल्द ठीक हो गया, और देख ठीक से आदाब करना, जा." मुझे मन माँगी मुराद मिल गई, मैं डब्बा रखकर कपड़ा बदलने अंदर चला गया. फिर चल पड़ा अपनी आपा से मिलने, कई दिनों बाद. मैं दौड़ता हुआ छिंप्पियों की गली पार कर गया, शेख़ों को गली के उस नुक्कड़ पर पहुँच गया जहाँ आपा का घर था. अंदर गया, गद्दी पर बैठे हक़ीम जी कोई किताब पढ़ रहे थे, मैंने हाथ जोड़कर उन्हें नमस्कार की. वे खुश होकर बोले, "आओ शहजादे अब कैसे?" बिल्कुल ठीक हो गया, आपकी दवाई से. यह मिठाई पिताजी ने भेजी है. "मैंने डिब्बा उनके सामने रख दिया. "अरे इसकी क्या जरूरत थी? अच्छा जाओ अंदर ले जाओ अब तुम खूब खेलना." कहकर हक़ीमजी जोर से हंस दिये. मैं डिब्बा लेकर अंदर गया, आपा से मिलने की उमंग लेकर. वहाँ कोई न दिखा कुछ देर आंगन में खड़ा रहा, देखा आपा नहाकर आई थी अपने बाल सुखा रही थी उन्होंने जब मुझे देखा तो वो खुशी से चिल्लाई, "भारत! तुम???" आपा ने मुझे ममता भरी बाँहों में बाँधते हुए कहा. मैं उनके प्यार के साये में ढक गया. थोड़ी देर आपा निश्चल मुझे देखती रही और मैं आपा को, इस अनाम रिश्ते की खुशबू में डूब हम कहाँ थे पता नहीं. मैं आपा के मातृत्व में डूबा था और वो मेरे वात्सल्य की गहराई में. मैं अपने खाये मातृत्व को पाकर मदहोश था और आपा अपने मातृत्व की पूर्णता में डूबी थीं, कौन कहता है अनजान-अनाम, रिश्ते अनन्त और शाश्वत नहीं होते? कहाँ था धर्म? कहाँ थी जाति? कहाँ था अंतराल? आपा ने मेरे हाथ से डिब्बा लेकर खोला और एक मिठाई उठाकर मेरे मुँह में भर दी, "भुल्लन हलवाई की है?" हाँ, तुम भी खाओ न आपा.

"तुम नहीं खिलाओगे अपने हाथ से?" मैंने मिठाई लेकर आपा के मुँह में डाली, आपा की बड़ी-बड़ी आँखों से आँसू की दो बूँदें बह गई, उनके गले में तरलता आ गई वे बोलीं, "मेरे लिए लाया क्या, क्या तू जानता है भुल्लन हलवाई की मिठाई मुझे पसंद है?" मैंने चुपचाप हाँ में गर्दन हिला दी. आपा ने एक पेड़ा उठाकर फिर मेरे मुँह में डालते हुए कहा, तूने खाली तो समझ मैंने खाली" पता नहीं कब मैंने एक पेड़ा फिर आपा को पकड़कर उनके मुँह में ठूँस दिया, आपा ने कोई विरोध नहीं किया. आपा मुझे एक टक देख रही थीं उनकी आँखों में अजीब-सा स्नेह था. हम दोनों आंगन की सीढ़ियों पर बैठ गए अगल बगल कुन-कुनी धूप में, आपा के खुले बालों से कुछ बूँद पानी मेरे उपर गिरीं, मुझे लगा मैं अमृत से नहा गया, और अमृत क्या होगा? आपा जैसे कुछ कहना चाह रही थी. थोड़ी देर बाद वो बोली, "तू इतने दिनों तक क्यूँ नहीं आया? बोल. कर दूँ कुट्टी?" मैं डर गया, उनके चेहरे पर दर्द और विवशता की लकीरें थीं. मैं देख रहा था उनके चेहरे पर पिघलती पीड़ा को. "तू क्यूँ आता? भला मैं कौन हूँ तेरी, तू भूल गया होगा." कह कर आपा अपने आप में गुम हो गई, अपनी विवशता को कुरेदकर खाली हाथ लौटती हुई. मैं पास आई आपा से लिपट गया, "भूला नहीं आपा, तुम्हें हर पल याद करता था पर कैसे आता? हम दोनों थोड़ी देर यूँ ही बैठे रहे, आपा एक नन्हें अबोध बच्चे की तरह मेरे आदर की बाँहों में निश्चल थीं." अभी तो रुकेगा तू? "" हाँ, जब तक तुम कहोगी. पता नहीं कैसे मैंने झूठ कह दिया कि आज मेरा स्कूल नहीं है. इस सत्य के आगे सारी सच्चाईयाँ बहुत छोटी लगीं. मुझे. आपा का चेहरा खिल उठा, वो बोली, "ठीक है मैं तेरे लिए एक चीज पकाऊँगी, खायेगा मेरे घर की? "मेरे हाँ करने पर वो अपने लंबे बालों को बाँधती हुई बड़ी उमंग से अंदर चली गयी.

मैं अंदर जाकर एक मूढ़े पर बैठ गया. मैं उस पलंग को गौर से देख रहा था जिस पर आपा से मेरे रिश्ते की शुरूआत हुई थी. थोड़ी देर बाद आपा आ गई, उनके हाथ में एक तश्तरी थी जिसमें बादाम किशमिश थी. "तुझे तश्मई खीर बहुत पसंद है?" हाँ बहुत पसंद है आपा. "बस फिर क्या था आपा अंदर गईं और जुट गईं मेरी पसंद की खीर बनाने में. अंदर से बर्तन की खनक आती रही. रसोई से धुँआ उठा. थोड़ी देर तक आपा रसोई से नहीं निकली. मैं सोच रहा था, अच्छा हुआ आज पिता जी ने.. ... आपा वहाँ नहीं थी फिर भी लग रहा था जैसे मैं आपा के स्नेह की गोद में बैठा सारी दुनिया से सुरक्षित हूँ कितना बड़ा होता है किसी का किसी से सच्चा प्यार. मेरा यहाँ होना मेरे लिए सबसे सुखद घटना थी. थोड़ी देर बाद आपा आई और बोली, "बस थोड़ा इंतजार और करो, मुँह में पानी तो नहीं भर सकता था, मुँह में पानी भरा हुआ है." पता नहीं क्यों आपा ने बहुत संजीदा होकर कहा, "भारत! सुखी रहने के लिए जिंदगी में इंतजार करना सीखो, यहाँ कोई मनचाही चीज उस वक्त तक नहीं मिलती, जब तक उसका इंतजार न हो और वैसे भी नहीं मिलती जैसे हमें चाहिए. जो जितना इंतजार कर सकता है वह उतना ही सुखी है. मैंने महसूस किया कि आप जितनी खुबसूरत है उतनी ही दिमागदार और समझदार भी. थोड़ी देर में आपा इधर-उधर की बातें करते रहे. एक बार आपा ने कहा, "बस यहाँ से जाकर तुम फिर भूल जाओगे आपा को." नहीं अब मैं बार-बार आऊँगा. "लेकिन स्कूल छोड़कर नहीं." वे उठकर रसोई में चली गईं, और दो प्यालियों में खीर लेकर आई, एक मेरे हाथ में थमा कर बोली, "लो खाओ, कुछ बनी की नहीं?" मैंने खीर खाई; वाकई बेहद स्वाद थी, ऐसी स्वाद खीर में पहली बार खा रहा था. मैं आपा को देख रहा था, "आपा! इतनी अच्छी खीर मैं पहली बार खा रहा था. मैं आपा को देख रहा था, "आपा! इतनी अच्छी खीर मैंने पहले कभी नहीं खाई." वे अपनी खुशी में डूब गईं, "सच!"

उस दिन आपा से मैं भगवान के बारे में एक बात कहना चाहता था, पर डर गया लेकिन आपा ने खुद ही एक बात पूछ डाली, "भारत! तूने इधर कभी ईश्वर को याद किया?
"हाँ आपा मैंने तो अपने भगवान से एक बात कही थी, कि किसी तरह मुझे मेरी आपा से मिला दो. कल आंगन में एक चिड़िया थी, मैंने जिससे कहा जा और आपा के घर जाकर कह दे कि मैं उन्हें मिलना चाहता हूँ.
क्या सच? कितने बजे
सायं पांच बजे?
अच्छा ये बता कैसी थी वो चिड़िया?
काली सफेद छोटी-सी.
काल लगभग पांच बजे एक ऐसी ही चिड़िया आकर मेरे पैरों के पास फुदकती रही, कहीं वही तों नहीं थी तेरी चिड़िया?"
हाँ वही होगी. देखो आज ईश्वर ने भेज दिया मुझे तुम्हारे पास.
मन तो करता है तुझे यही रख लूँ पास; आपा?
क्यूँ कि सबके भगवान अलग हैं न.
"कब एक होंगे? मेरे तुम्हारे भगवान की तरह."
"नहीं होंगे, जब तक उसे एक-एक जर्रे में महसूस नहीं किया जाएगा, पर इंसान में इतनी ताकत पता नहीं कब आएगी?
"तब तक तो हम मर जाएंगे. तब क्या फायदा." कह कर मेरा मन निराशा की अंधेरी गुफा में डूब गया." इसी तरह हम दोनों देर तक बातें करते रहे.
"भारत! मेरी बात मानोगे."
"हाँ तुम जो कहोगी वही करूँगा."
"सुना है पढ़ने से ज्यादा वक्त तुम खेल-कूद में लगाते हो. देखो तुम बड़े हो गये, अब अपनी तालीम पर ज्यादा वक्त लगाओ, अच्छा यह बताओ तुम जिंदगी में क्या बनना चाहते हो?"
"हक़ीम चाचा की तरह मैं डॉक्टर चाहता हूँ."
"इंसानों का दर्द खत्म करने के लिए डॉक्टर बनना चाहते हो?"
"हाँ आपा."
"मेहनत बहुत करनी पड़ेगी."
"करूँगा."
"खेल-कूद भी कम करना पड़ेगा."
"करूँगा."
"ठीक है, मैं रात-दिन खुदा से कहूँगी कि वो तुम्हे एक बड़ा डॉक्टर बनादे, वो बहुत रहमदिल हैं."
"सच" आपा आँखें बद किये बैठी थी."
"देख एक दिन तू बहुत बड़ा बनेगा, तेरा नाम दुनिया में रोशन होगा, पर बड़ा बन कर, गरीब बेसहारा लोगों को मत भूल जाना."
"नहीं आपा तुम जैसा कहोगी अब मैं वैसा ही करूँगा."
"ठीक है और देख अपनी इस आपा को भी मत भूलना, आज से तेरा खेलना बंद, तालीम की मेहनत शुरू इसके लिए चाहे मुझसे भी मत मिलना. कह कर नम आँखें पोंछ कर आपा ने मुझे अपने सीने से चिपका लिया, एक ममतामयी उदारता ने मुझे ढक लिया,

मैं थोड़ी देर यूँ ही उस अमृत सागर में खामोश डूबा रहा. वो सारा दिन आपा के पास बिताकर मैं जब चलने लगा, तो वे मुझे अजीब तरह से देख रही थीं जैसे मैं खो जाऊँगा, मैं भी बहुत उदास था, मैं आपा की बात टाल नहीं सकता था. जानता था कि पढ़ाई करूँगा तो आपा से मिलना भी नहीं होगा, पर अब पढ़ाई तो करनी ही होगी. भारी मन से मैं जब चलने को हुआ तो आपा बोली, "रुक, मैं अभी आती हूँ." वो अंदर गई और एक कलम मेरे हाथ में देते हुए बोली, "ले इसे सम्भाल कर रख, जब डॉक्टरी के इम्तहान में बैठेगा तो इसी से लिखना. कलम लेकर मैं आपा को देख रहा था, उनका चेहरा खुशी और तनाव भरा था, आँखों से प्यार का बादल बरसने लगा जिसने मेरे वर्तमान और भविष्य को भिगो दिया, मैं उनके कदमों में गिरकर धन्य हो गया.

उस दिन के बाद मेरा मन बदल गया - बस्ती, मोहल्ला, यार-दोस्त सब कुछ मेरे लिए बेमानी हो गया. मुझे कुछ भी नजर नहीं आता था, सिवाय पढ़ाई और आपा के. सब कोई आश्चर्य चकित थे. सब मुझे देखते, पूछते, समझते, सोचते, पर मैं किसी को समझ में नहीं आ रहा था. भाई, भाभी, पिताजी सब आश्चर्य चकित थे. मैं आपा के शब्दों का पीछा कर रहा था, उनकी दी हुई कलम मैंने अपने बॉक्स में सुरक्षित रख दी थी उस दिन के लिए जब मैं डाक्टरी की परीक्षा देने जाऊँगा, मुझे पूरा यकीन था कि वह कलम जरूर मुझे डॉक्टर बना देगी. आपा ने जो हिदायतें दी हैं बड़ा डॉक्टर बन कर मैं गरीबों और बेसहारा मरीजों को नहीं भूलूँगा. मैं पढ़ रहा था, वक्त गुजर रहा था, आपा कैसी होगी यह मैं रोज सोचता था. और हाँ आंगन में किसी चिड़िया को भी रोज तलाशता था, दिखने पर उससे कहता था, "आपा से कह देना मैं मेहनत से पढ़ रहा हूँ", अब मेरा कोई दोस्त नहीं मैं बाहर जाकर समय बर्बाद नहीं करता, उनकी कलम.. .. अब आपा से मेरा मिलना आंगन की किसी चिड़िया के द्वारा ही होता था. मेरे दो वर्ष न जाने किस शक्ति के सहारे बीते, इनमें मैं एक दो बार आपा से मिला पर बहुत नया कुछ नहीं हुआ.

मेरी मेहनत का यह परिणाम हुआ कि मैं यू. पी. में तीसरे स्थान आया और तब आपा के पैर छूने गया, तब वे इतनी खुश थी कि शायद कभी नहीं हुई होंगी, उन्होंने मेरे सिर पर हाथ रखकर इतना ही कहा, "बहुत कमजोर हो गया है तू, बहुत मेहनत करने को कहा दिया मैंने थोड़ा सेहत का भी ख्याल रखो." मैं डॉक्टरी परीक्षा में बैठा और तब तक उसका परिणाम नहीं आया था, मैं आपा से मिलने गया. आपा ने मेरे लिए वैसी ही खीर बनाई थी. वे मुझे ऐसे देख रही थी जैसे मैं उनकी कोई कीमती चीज हूँ, उन्होंने आँखें बंद कर दुआ की, उसमें क्या माँगा मैं नहीं कह सकता, मैंने कुछ पूछा भी नहीं. अब मैं बड़ा हो गया था, आपा का व्यवहार अब कुछ गंभीर था, मैं भी वैसा नहीं था. हम दोनों में दुनियादारी की बातें होती रहीं, कुछ इधर-उधर की. मैंने आपा को बताया कि मैं इम्तहान में बैठा, आप के कलम से ही लिखा, जरूर पास हो जाऊँगा.
"अगर न हुए तो अपनी आपा को.. .."
"नहीं मेरी आपा सारे इम्तहानों से बड़ी हैं, उन्हें मैं कभी कुछ नहीं कहूँगा." उनके चेहरे पर खुशी की झलक साफ दिख रही थी.
यह दिन बड़ी खुशी का था और थोड़ी पीड़ा का भी मैं मेडिकल परीक्षा में पास हो गया, यह सब आपा की चाह का परिणाम था, इसलिए उनसे मिलने को उतावला था. मैं लगभग दौड़ता हुआ हक़ीम जी के घर पहुँचा, हक़ीम जी को आदाब कर मैं सीधा अंदर चला गया. आपा बैठी किताब पढ़ रही थी, "आओ भारत! मैं तुम्हारे बारे में सोच रही थी.
"क्या?"
"कि जब तुम डाक्टर बन जाओगे तो बुढ़ापे में मेरा इलाज मुफ्त करोगे?"
और क्या सोच रही थी, आपा?
"यही कि तुम्हारी खूबसूरत, पढ़ी-लिखी बीबी कहेगी जब सबसे फीस लेते हो तो इस बुढ़िया से भी लो, यह तुम्हारी क्या लगती है? इतना सुनकर मैं अचानक आपा से लिपट कर रोने लगा, उन्होंने एक नन्हे बच्चे की तरह मुझे प्यार किया - यह सब अद्भुत था बहुत सुखद बहुत आत्मीय. मैं चुप था पर देर तक मेरे आँसू बोलते रहे. थोड़ी देर यह मूक संवाद यूँ ही बनी रही फिर आपा ने पूछा "तू इस बस्ती से दूर जाएगा क्या? बड़ा बनने के लिए?"

"आपा! आज आप के चरणों की धूल लेने आया हूँ आज आपकी वजह से मैं डॉक्टरी की परीक्षा में पास हो गया. अब मुझे बाहर तो जाना ही होगा, आपा मन बहुत खिन्न है इस खुशी में भी. जब तब यहाँ था तो तुमसे मिले बिना भी तुम्हारे पास था और अब मद्रास चला जाऊँगा, इतनी दूर पता नहीं कैसे रह पाऊँगा वहाँ." सुनकर आपा खाली आँखों से मुझे देखती रही; फिर उठ कर अंदर गई और एक ताबीज लेकर आई, देख! तू वहाँ अकेला रहेगा, इसे हमेशा अपने पास रखना, कोई फिक्र न करना, बड़ा बनने के लिए तो घर द्वार, परिवार छोड़ना ही पड़ता है यही तो किस्सा है इस दुख भरे सुख का. खुदा मेरी उम्र भी तुझे लगाये. आज तक मैंने उपर वाले से कुछ नहीं माँगा, आज तेरी खुशहाली की दुआ माँगती हूँ. कहकर आपा आँख बंद कर बैठ गई, उनकी बंद आँखों के कोरों से ममता के निर्झर फूट पड़े मैं धरती की उस आत्मिक सत्ता को अपने अस्तित्व के लिए पिघलते देखता रहा. मैंने उस कीमती ताबीज को चूमकर जेब में रख लिया. उस दिन आपा ने मुझे बहुत कुछ खिलाया वे अंदर से बहुत उत्साहित थी, थोड़ी देर रुक कर मैं घर चला आया. यह दिन मेरे लिए खुशी और विषाद का मिला जुला अनुभव था, जिसे मैं कभी नहीं भूल सका, दो चार दिन तैयारी करके मद्रास चला गया.

ज्यों ही मैंने अपने घर में कदम रखा तो मुझे आपा से मिलने की उत्सुकता सताने लगी, मैं जल्दी-जल्दी सबसे मिला, थोड़ा नाश्ता किया और कुछ बहना बनाकर घर से निकल गया. गली पार करता हुआ मेरे मन में कई तरह की बातें थीं आप से क्या कहूँगा, वे उस शहर का हाल चाल पूछेंगी, मैं आपा के लिए कुछ लेकर क्यूँ नहीं आया मद्रास से? आदि आपा क्या कहेगी, फिर वैसी ही खीर खिलायेंगी, आज भी रोयेंगी, पर अब क्यूँ रोयेगी? फिर मुझे कुछ देंगी. पर अब क्या देंगी? दुनिया की सबसे बड़ी चीज तो उन्होंने दे दी मुझे. यह सब सोचते हुए जब मैं उनके घर पहुँचा तो देखा बाहर एक मोटा ताला लटका है, मेरे होश उड़ ये मद्रास से यहाँ तक आने का सारा उत्साह ठंडा पड़ गया, जैसे एक बड़ा-सा पत्थर मेरे उपर गिर गया हो. आपा तो कभी कहीं जाती नहीं थीं, हक़ीमजी का घर तो हर समय खला रहता था. शंकाओं का काला नाग मन में फुंफकारने लगा, अब किससे पूछूँ, मैं घर वापस लौट आया पिताजी से पता चला कि एक बदमाश ने हक़ीमजी को बहुत तंग किया, उनकी बिरादरी के कुछ लोगों ने उन पर हिंदू परस्त होने का इल्जाम भी लगाया बस्ती में जातीय झगड़ा हो गया, वह बदमाश जबरदस्ती हक़ीम जी की लड़की से निकाह करना चाहता था कुछ और लोग भी उसके पक्ष में थे. हक़ीमजी ने बहुत बुरे दिन देखे, हम लोग चाहकर भी कुछ नहीं कर सके. पिताजी ने इतना भी कहा, "बेटा! यह बहुत बुरी दुनिया है, इसमें अच्छे लोगों का रहना बड़ा मुश्किल है.

बस्ती के कुछ लोगों से भी मुझे पता चला कि हक़ीम जी यहाँ से कहीं चले पर यह पता नहीं चल सका कि कहाँ गये? मेरे लिए यह जिंदगी की सबसे दु:खद और बड़ी घटना थी. मैं सोच नहीं सकता था कि हक़ीम जैसे लोगों से कोई भी लड़ सकता है. कुछ उदास, हताश होकर मैं वहाँ रहता रहा, फिर पढ़ाई का बहाना बनाकर मद्रास लौट गया. जो बातें आपा से मुझे कहनी थी वो ही मेरी बेचैनी का सबब बन गईं. एक विश्वास मुझे अंधेरे में एक किरण की तरह अब भी था कि वे जहाँ भी होंगी मुझे याद जरूर करती होंगी.
डाक्टरी का यह मेरा दूसरा वर्ष था, थोड़ी फुर्सत थी, अब आपा को मैं खत लिख सकता था, पर... आपा.. ... घर से पता लगाया, हक़ीम जी अभी नहीं लौटे थे, फिर मैंने इस विषय को यहीं बंद कर दिया, सब कुछ नियति पर छोड़ दिया. इस सच्चाई का ऐसा अंत मेरे लिए एक जहरीले कांटे की तरह था. जो रह रह कर चुभता था मैं इस चुभन को खोना भी नहीं चाहता था. मेरे लिए अब यही बेहतर था कि मैं अपनी पढ़ाई में इतना डूब जाऊँ कि देखने के लिए कुछ न रह जाए.

जब मेरा आख़िरी साल का परिणाम आया तो मैं प्रथम स्थान पर था, इससे पूरे कालेज में मेरा बहुत नाम हुआ. मेरी मेहनत और आपा की दुआओं ने यह सब किया, उस दिन खुशी के आइने पर पीड़ा का एक बाल भी था, मैं यह सब आपा को बताता, पर कैसे? क्यों कि हक़ीम जी अभी भी नहीं लौटे थे. अजीब विडम्बनाओं से भरा यह संसार मेरी समझ से बाहर था.

मैं दो वर्ष के लिए पढ़ने अमेरिका चला गया. वहाँ मुझे बहुत अकेलापन लगा, लेकिन आपा का दिया कलम और उनका एक पाक ताबीज मेरे साथ था. उस पराये देश में ये दो चीजें मुझे कितनी अपनी लगती थीं कह नहीं सकता. बाहर रह कर अपने क्षेत्र में मैंने बहुत कुछ सीखा, मेरे लेख और मेरा काम बहुत सराहा गया मैं दिन-ब-दिन प्रसिद्ध होने लगा. मेरे पास काम और नौकरी के कई पैगाम आये, इंगलैंड से भी मेरे पास नौकरी का पैगाम आया, पर मुझे आपा की बात याद थी, बड़ा डॉक्टर बन कर मैं अपने देश के गरीब लोगों को नहीं भूलना चाहता. मैं कहीं न जा कर सीधा अपने देश वापस आ गया. यहाँ मेरा बहुत काम हो चुका था, यहाँ का लगभग प्रत्येक डॉक्टर मेरे लेखों से परिचित था. जब मैं भारत आया तो यहाँ पर भी मेरे पास नौकरी की खबरें आने लगीं. यह सब क्या हो रहा था पता नहीं मैं कब बड़ा हो रहा था य बहुत अकेला.

जब मैं अपनी बस्ती में पहुँचा तो लोगों ने मेरा एक बड़े आदमी की तरह स्वागत किया, पता नहीं कैसे यहाँ के लोगों को भी यह सब पता चल गया था. एक दिन यहाँ के सब लोगों ने इकट्ठे होकर मेरे गले को फूल-मालाओं से लाद दिया, पर उस भीड़ में दो कीमती चेहरे नहीं थे एक हक़ीम जी का और दूसरा आपा का. इसलिए वह भीड़ मुझे बहुत कमजोर लगी. मन करता था कि भीड़ में से कोई आकर मुझे बताये कि मुझे आपा बुला रही है. मुझे प्रयत्न करने पर भी आपा और हक़ीम जी का पता नहीं मिल सका. मेरी फीस समय के साथ बड़ी हो रही थी, अपना इतना बड़ा होना अब बहुत छोटा लग रहा था.

एक दिन एक बड़ी सेमिनार में बोलने के लिए मुझे मेरठ मेडिकल कालेज जाना पड़ा. मैं मेरठ स्टेशन पर अपनी बोगी से बाहर आया तो बहुत सारे डॉक्टरों की भीड़ ने मुझे घेर लिया. कालेज के प्रिंसिपल ने अपने सहयोगियों से मिलवाया, ज्यों ही मैं चलने को हुआ तो देखा थोड़ी दूर बेंच के पास एक पागल-सी भिखारिन बैठी है, मैं उसे साफ देख रहा था, मैं अपनी जगह ठहर गया, सभी मुझे देख रहे थे कि मैं उस भिखारिन को. मुझे एक पल ऐसा लगा जैसा सारी सृष्टि आश्चर्य के समंदर में डूब गई, जैसे सब कुछ जम गया हो, सब कुछ पत्थर हो गया हो. अपने साथ की भीड़ को छोड़कर मैंने उस भिखारिन का हाथ पकड़ लिया. वह मेरी आपा थी - युग-युग से खोई मेरी संपत्ति, मेरी आस्था, मेरी श्रद्धा, मेरा विश्वास. वह डरकर खड़ी हो गई, उसने मुझे देखा हाथ छुड़ा कर स्टेशन की एक ओर भागी, मैंने दौड़कर उसे घेर लिया, तब तक कुछ डॉक्टर भी वहाँ आ चुके थे. मैंने पकड़ कर उससे कहा, "आपा मैं तुम्हारा भारत, तुम्हारा भारत, आपा! तुम्हारा कलम, तुम्हारी ताबीज.. ... वह वहीं बैठ गयी जैसे उसकी सारी ताकत कहीं खो गई हो. फिर कुछ सम्भल कर उसने मुझे गौर से देखा और अपने गंदे-काँपते हाथों से मेरा चेहरा टटोलने लगी फिर फफ़ककर रो पड़ी उसकी आँखों से सात वर्ष का रुका हुआ स्नेह सागर बह चला और मैं उस सागर में डूब गया. मैंने उस पूरे वातावरण की परवाह न करके आपा को अपनी बाँहों में भर कर उठाया और साथ लेकर भीड़ के पास गया. वो अब घबराई हुई थी पर उनकी आँखें मुझ पर ही टिकी थीं. सभी आश्चर्य में डूबे थे. मैंने प्रिंसिपल से कहा, "ये मेरी माँ हैं, मेरे जीवन से कीमती इनका जीवन है अपने डाक्टरों से इनको किसी बड़े अस्पताल भिजवाइये. उन्होंने ऐसा ही किया दो डॉक्टरों के साथ आपा को शहर के सबसे बड़े अस्पताल पहुँचा दिया गया.

मुझे बहुत सुकून मिला. मन पर लदा हुआ भारी बोझ आज कुछ कम हुआ. मैं सेमिनार में बोलने चला गया. बिना वक्त खराब किये बोलने के पश्चात मैं सीधा आपा के पास पहुँचा, तब तक उन्हें एक कमरे में साफ सुथरे कपड़े पहनाकर लिटाया गया था. वे सो रही थीं, अब उनका चेहरा वैसा नहीं था पर चेहरे पर वो ही ममता की दिव्यता थी, मैंने सोई हुई आपा के पैर छुए और उनका मस्तक चूमा. मेरे साथ वहाँ के डॉक्टर भी थे. मैंने उनसे सलाह-मशविरा शुरू किया, सब बातें तय हो गईं. डॉक्टरों ने बताया कि थोड़ी देर बाद इनका सारा चेक-अप होगा. मैं वहीं रूका रहा. उनका दिमाग का परीक्षण हुआ जो ठीक निकला, मैं बहुत खुश हुआ क्योंकि मुझे यही सबसे बड़ा खतरा था बाकी सब तो ठीक हो जाएगा.

तीन दिन तक आपा का जमकर परीक्षण और इलाज हुआ और मैं उनके पास ही रहा, उनमें थोड़ी ताकत आ गयी थी, उन्होंने मुझे देखा और उनकी बड़ी-खूबसूरत आँखों से आँसू बह चले, दोनों हाथों में मेरा चेहरा पकड़ कर धीमी आवाज में बोलीं, "मेरे डाक्टर, मेरे बेटे! वे देर तक मुझे अपलक देखती रहीं और झुका कर मुझे चूम लिया. मेरे लिए यह एक तोहफा था. मानव जीवन की महायात्रा के ये दो पड़ाव थे - एक आपा का अपने घर में न मिलना और फिर मेरठ के स्टेशन पर मिलना.

© 2009 Braj Kumar Mittal; Licensee Argalaa Magazine.

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