अर्गला

इक्कीसवीं सदी की जनसंवेदना एवं हिन्दी साहित्य की पत्रिका

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अनुसृजन

गंगा प्रसाद विमल

स्व चित्र

देर गये पेरिस के कला क्षेत्र
मेरे टूटे अंधेरे.
अभी पीड़ित करते हैं.
अभी बरसता है
और दुबारा

कहवा घर में
घुसता है कलाकार
उलझती हैं आँखें उस सुंदर चिन्ह पर
चेहरे पर टंकी है जबरन एक मुसकराहट.

अब मैं खुद को एक तसवीर की संज्ञा दूँगा
और अदा करूँगा खुद
दो गिलास मदिरा का मूल्य
अच्छा, आओ

करो शुरू........
ओंठ..... दबी बारूद
मेरा माथा
उचित है पिस्तौल के लिए
मेरी आँखें...........
उन्हे तो मैं खुद भी नहीं समझ पाया.
(वे बंदीगृह के सींखचे नहीं बल्कि तलवार हैं)
परन्तु पलकों के सींखचों से
भाग खड़ा होऊँगा मैं
खुद से ही.

फिर तय कर लूँगा हिसाब
अपनी अस्मिता के इस पिंजरे से
यह यातनादायी पिंजरा.
तुम्हारे लिए तो रह जायेगा यह
स्वनिर्मित चित्र
यह है
जैसा तुम देखते हो
अतिरिक्त रूप से वास्तविक.
ले जाओगे साथ
ले जाओगे अपना खाद्य
मारोगे मुझे रुचेगा तुम्हे यह
जबकि?
छिपाओगे
लोगों के
हृदयों के अंतर में
जो बनाते हैं दहलीज
बनाते हैं
रात में क्रूर
सीढ़ियाँ
सीते हैं
अजाने ध्वज

एक छोटा गीत

अन्तहीन घासीले मैदानों पार
मेरे और
तुम्हारे बीच
बहती है दर्द की वोल्गा
और वहाँ हैं ऊँचे किनारे.
वहाँ है एक ऊँचाई
वहाँ एक भयंकर शत्रु.... वहाँ
वहाँ से वापसी का कोई रास्ता नहीं

गोलियों से
गूँथ दिया था तुम्हे
हाँ-- बख्तरबंद गाड़ियों के चिन्ह हैं
कुचला था तुम्हें
आग बरसाने वाले गोले से
भून दिया था तुम्हें.

परन्तु जोड़ रहे थे तुम शक्ति.
क्षरित हो गया था जीवन
पर अन्त नहीं आया था अभी
साँस नहीं लेते थे
ओह! अभी साँस नहीं ले रहे थे
ठीक ऐसे ही चीखा था कोई
ठीक ऐसे ही
और जो प्रतिपक्ष में थे
भयंकर हंसी जर्मन वर्दी में
पगला गये थे डरकर
उनके लिए तुम
अमर थे.....

हर एक का अपना पवित्र शिखर है
और वह
अंत तक रक्षित हिना चाहिए.
और तुमने
मृत्यु का वरण किया
बंधन का नहीं
वह महान विवेक
मामायेव कुर्गान है
और विवेक का अमानुषीपन है
फासीवाद!
एक बिम्ब
जो करीब-करीब भयासन्न करता है
तुम उस रहस्य के नरक में
प्रविष्ट हुए

प्यार
यह मामायेव कुर्गान है शेष
बस सनक.
और अब रूसी काल में
और व्यतीत कल के बाद
आज में
उभरते हो
जन-सम्मान के अमापे
शिखर में.

करुणा और मान के साथ
दहकते मुकुट
मेरे प्यारे
मेरे पावन्क्ष
मामायेव कुर्गान!

शक्ति

जन्मी है शक्ति
गरीब की उपजाऊ धरती से
बेबसी में ही बढ़ी है
हमारी महान
सामर्थ्य

दो मुझे
दो शक्ति
जिसे हृदय ने रोपा है
जिसे रोप कर काटा है आदमी ने
और मापा है
फांसी के फंदों से.

सम्मान की खातिर

ओ मेरे प्रपिता
दूरस्थ प्रपिता
सौ साल से भी उपर होंगे
उस उत्सव दिन की शाम को
जब तुमने दिया था मुझे
नाम.
यही तो है बूढ़े चरवाहे की कथा
तुमने प्यार किया सुन्दरी को
पर उसका बाप था थुलथुल महाजन
और दे दी लड़की एक तुर्क को
पैसों के लिए
लेकिन उत्सव दिन ही था
जब विवाह के ढोल डगमगाना शुरू हुए थे
तुमने छीन ली थी लड़की
उनके कब्जे से
साथ ही
मार दिया था दूल्हा अपने मुक्के से
और कसमें खाते हैं चरवाहे
कि तुमने मार दिया था उसे
बाएँ हाथ से ही
बस तभी से रह गया
छुटका-सा नाम
जो रक्षित करता है हमारा सम्मान
'खपचू' (बाएँ हाथ से काम करने वाला)
वाह, मेरे दादा!
दूर गये प्रपितामह!
तुम्हारा ही खून बहता है मेरी नसों में
और मुझे दिया गया है तुम्हारा नाम......
दो मुझे अपनी प्राचीनता
और शक्ति
इसलिए कि जब उकता जाऊँ
हस्तक्षेप से
या डुबाने वाली गप्पों से
नहीं हो सकता आज्ञाकारी
न सुन सकता हूँ आदेश
बन्द करता हूँ उन्हें अपने मुक्के से
बदमाश
बकवादी
तो देता हूँ भयानक लताड़
किसी के मान का मूल्य क्या है.
क्योंकि जिसे प्यार किया था और करता हूँ
किसी को भी नहीं
दादा
उसे नहीं देता समर्पण
अच्छा होता खत्म ही कर देता
इस सिर को
पर इसे होना ही है
सम्मान के निमित्त.

संगीत सुनते युद्धबंदी

भूल चुके वे
कैसे किया जाता है जीवन
वे जानते हैं
कैसे मरते हैं.
और अब वे छाया की तरह
रास्ते पर
चलते हैं आदेश से
रुकते हैं हुक्म से ही
और हर तरह की विवसता में ही बस हँसते हैं.
परन्तु क्रूर हैं
क्रूर हैं लोग.
लापरवाही से खोलते हैं गवाक्ष
और उड़ेल देता है पुराने गीतों की धुनें ग्रामोफोन....
और धूल सने युद्धबन्दी रुकते हैं भौंचक
जैसे कोई पशु-समूह आँधी देख सिर उठाता हो
और काँपता हो भय में

यह प्यारा पुराना गीत,
उभार देता है असंतोष उनकी आँखों में
और जल्लाद चकित हैं
किस बात से भौंचक हैं वे
छायाओं ने क्या पाया है?
किसने दिया है संगीत युद्धबंदियों को?
ओह! कितने क्रूर हैं क्रूर हैं लोग!

अक्तूबर 2009, संस्करण 1, अंक 4

इस बार हम हिन्दी के एक विरल कवि कैलाश वाजपेयी से इस अंक की शुरुआत कर रहे हैं. इसलिये भी कि कैलाश वाजपेयी एक ऐसे कवि हैं जिनके भीतर उन जैसे और उससे अलग कई कवि विद्यमान हैं. वे एक तरफ़ बहुत गम्भीर किस्म के संत कवि हैं जिनके तार सुदूर मध्यकाल में कहीं जुड़े नज़र आते हैं तो वे ऐसे कवि भी हैं जो भविष्य के अदृश्य दरवाज़ों पर अदृश्य सी दस्तकें दे रहे हैं उनकी खुद अपनी एक कविता इसका बयान करती है कि वे इकट्ठा कई शताब्दियों को ढोये लिए जा रहे हैं. विचित्र सी बात है कि जिस ज़माने में नयेपन के ढोल पीटे जा रहे थे उस ज़माने में कैलाश बहुत गम्भीर होकर सातत्य की परम्पराओं की तर्ज़ पर छन्दोबद्ध गीतात्मक लयसिद्ध कविताएँ बाँच रहे थे जब थोड़ा शोर कम हुआ तो कैलाश एकदम अर्थात अत्याधुनिक या आधुनिकता के उपरान्त के विमर्श में एक गम्भीर कवि की तरह निरत पाए गए. देखने में यह विचित्र सा कोलाज जैसा एक दृश्य पटल लग सकता है, सोचने में भी कभी कभी यह अर्थहीनता की दीर्घ परम्परा पर टिप्पड़ी जैसा प्रतीत होता रहा परन्तु गहरी पड़ताल करें तो कैलाश वाजपेयी के कवि कर्म का यह एक जादुई वितान है. और इसीलिए आज उनका कवि कर्म विचारणीय है. वे इसी अंक में प्रकाशित सबसे नये कवि के समकालीन भी लगते हैं और क्लसिकी कवियों की तरह सदियों से बेपरवाह दरवेशी जान पड़ते हैं. एक अर्थवान सृजन की यह वास्तविकता है जो फैंटसी से अधिक उलझावदार लगती है, इसी की अंतर्धाराओं में सृजन की दूसरी जटिलताएँ भी अभिव्यक्ति पा जाती हैं, शब्द से तस्वीर रचने वाले जगदीश गुप्त भी कमोबेश इसी परम्परा के आधुनिक कवि हैं जो इस अंक में उपस्थित हैं.

कविताओं की चर्चा सचेत पाठक करेंगे ही. हमारा लक्ष्य केवल यह संकेत करना है कि सृजन की सबसे ज़्यादा जोखिम भरी राह कवि कर्म की है. आँकड़े पास नहीं हैं पर तकरीबन हर शहर, हर आयु, हर शैली के पचास एक कवि तो मुहल्ले में ही सक्रिय मिलेंगे. कोई शौकिया कह रहा है तो कोई अनुकरण कर रहा है. कुछेक लोग गुनगुनाते हुए पूरी सृष्टि को हड़काने में लगे हुए हैं. कुछ ऐसा जरूर है जो अभिव्यक्ति की पुरज़ोर ज़रूरतों के दबाव में कहने, सुनने, गाने और उगलने से परे है जो किसी महत्तम खोज में बेपरवाह सा निमग्न है. असल में वही एक साधक है जो भाषा को नये अर्थ से आवेष्टित करने की बेचैनी से भरा हुआ है. वह किसी अव्यक्त छन्द में या किसी लम्बी चीख में अपने ही ढंग से शब्दों को तराश रहा है.

निष्कर्ष यह है कि भाषा को नया रूप देने में केवल कविता और कवि कर्म समर्थ है. आज बाज़ार के कर्णभेदी शोर में कोई है जो सब कुछ से विमुख अपनी चिन्ताओं का केन्द्र मनुष्य और उसके भविष्य को बनाए हुए है. इस आशय से कविता की चर्चा ज़्यादा संगत होगी कि वह भाषा के संवर्धन की एकमात्र आधारशिला से उसी से हम अपनी दूसरी विधाओं के लिए संगत और अर्थवान भाषा उपलब्ध कर पाते हैं. भौतिक जगत में सृष्टि के विकास के लिए तात्कालिक कोशिशें लगभग अनुपस्थित हैं. ऐसे में सृजन का यह उपस्थित विधा रूप हर एक पड़ाव पर गौर करने योग्य है.

शेष जगत में जो उपेक्षा दिखाई देती है वह अकारण नहीं है दुनिया जिस ओर करवट ले रही है उसे कमोबेश सभी लोग वाक़िफ़ हैं. लेकिन दुनिया क्यों ऐसी हो रही है ? क्या परिस्थितियाँ हैं? क्यों विकराल दिखायी दे रही हैं ? यह सब कुछ एकदम मानव विरोधी क्यूँ दिखता है? इसका मोटा अनुमान हमारी कविताएँ देती हैं. इन सब का कोई मिला जुला निदान दूर दूर तक दिखाई नही देता पर इस जद्दोज़हद का आधार कविता की अंतर्दृष्टि संपन्न लय में स्पष्ट होता है. उस पर हम एक बहुआयामी अंतर्मंथन पाते हैं और यही कारण है कि हम इस बार सारी उथल-पुथल को इन कुछ कवियों की रचना दृष्टि से देख पाते हैं. आप सब यह दावतनामा ज़रूर कुबूल करें कि आपकी असहमति और आपके ज़िद भरे अस्वीकार से भी हमें अंधेरे रास्ते पार करने की हिम्मत मिलती है. आपकी प्रतिक्रियाओं की बेसब्री से प्रतीक्षा है.

- गंगा प्रसाद विमल

© 2009 Ganga Prasad Vimal; Licensee Argalaa Magazine.

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