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विरासत

जगदीश गुप्त

लम्हों का एक सफर: डॉ. जगदीश गुप्त की स्मृति में

दारागंज की ढलान भरी तंग गलियों से गुजरते हुए संकरी सी एक गली में घुसते ही एक तरफ निराला का मकान और चंद फासले पर हरे-हरे पौधों और तमाम रंगीन फूलों से लदा, भीनी-भीनी खुशबुओं में बिंधा डॉ. जगदीश गुप्त का मकान. पहली मुलाकात सन 1995 में हुई. गर्मियों की धूप में साइकिल पर सवार एक किशोर था मैं. लोहे की सीकचों वाला दरवाजा तकरीबन 4 फुट ऊंचा, मेरे कदमों में थकान और पहली बार इतने बड़े साहित्यकार से मिलने का उत्साह कहीं भरपूर था. ये जिंदगी का सबसे खुशगवार दिन था. मध्यकालीन कविता के मर्मज्ञ डॉ. किशोरी लाल के हाथों दिया गया पत्र जो कि मेरे बारे में डॉ. जगदीश गुप्त को लिखा गया था उसे अपनी डायरी में सम्भाले मैं अपने मकान तक सुभीते से पहुंचा था. कुछ ही फासले पर बना था नागवासुकि मंदिर. गंगा नदी के किनारे नागवासुकि आखिरी शिरा था कितना मोहक, ऐतिहासिक गतिविधियों, साहित्यकारों, संगीतकारों, कलाकारों की पावन भूमि. ये एकमात्र ऐसा स्थल है प्रयाग का, जहाँ वाणी की साधना, लफ़्जों का योग सृष्टि को मूर्तिवत करने वाले कलाकारों का जमावड़ा हमेशा लगा रहता है.

एक बड़े से चबूतरे पर मंदिर की सीढ़ियों से चढ़ते ही हनुमान की विशाल मूर्ति विश्राम की अवस्था में वहाँ देखते ही मन को एक सुकून, शांति तथा एकाग्रता का एहसास होता था. हाँ तो इन हाथों ने जगदीश गुप्त के सीकचों वाले दरवाजे के उपरी हिस्से में 'वी' नुमा आकार का दो कपाटों को जोड़ने वाला शिरा हटाया और अस्त व्यस्त से फैले हुए किंतु फूलों से लदी टहनियों, पौधों वाले छोटे से बगीचे को निहारते हुए कदमों ने ईंटों की बिछी हुई एक फुट की डगर ले चलते हुए छोटे-छोटे पत्थरों से नक्काशी-नुमा दो बड़े-बड़े खंभों पर निगाह रुकी तो देखती ही रह गयी किशोरवय आँखें. बाईं तरफ से लेकर सामने तक बने तीन दरवाजे जालीनुमा, जिसके भीतर बीच वाले दरवाजें से एक महिला बेहद साधारण साड़ी पहने हुए बाहर आईं और मेरा पहला परिचय उन्हीं से हुआ. उस वक्त उनके माथे पर हल्का सा तनाव साफतौर पर दिखाई दे रहा था. मगर उन्होंने भी उस तनाव भरी मुद्दा को जाहिर न होने और होने के बीच उलझन से भरी मुझसे इतना ही कहा - "वे अभी विश्राम कर रहे हैं. आप को थोड़ी देर प्रतीक्षा करनी होगी, उनके जागने तक." दालान के बने हुए बेहद खूबसूरत फर्श पर पड़ रही परछाई की ओर मेरी निगाहें कुछ देर को ठहर गयी थीं. तभी महिला भीतर से जाकर एक कटोरी में कुछ मिठाई के टुकड़े और एक ग्लास पानी लेकर आई थीं. दालान ने एक छोटी सी रंगीन लकड़ी की मेज और आराम कुर्सी पड़ी थीं.

मुझे तब तक यह बात ज्ञात न हो सकी ये महिला कौन थी? मैंने उस समय हिचकिचाहटवश कुछ भी न पूछना ही उचित समझा. कुर्सी पर इत्मिनान से बैठते ही थकान का उतार साफ तौर देखा जा सकता था. दोपहर के तकरीबन 2. 30 बजे थे. हाँ इतना जरूर था बड़ी भली महिला थी उनके व्यवहार में भले ही थोड़ी सी कटुता का भाव कुछ क्षणों को झलका था. उन्होंने एक जग पानी से भरा लाकर मेज पर रख दिया था. 'उनकी नींद पूरी होते ही मैं आपके बारे में जरूर कह दूँगी.' कहकर वो भीतर चली गई. मैंने गर्मी की वजह से जल्दी-जल्दी दो ग्लास भर-भरकर पानी पिया. चेहरे पर श्वेत कणों का टपकना तेजी से जारी था. बाहर की हवा के गर्म झोंकों में जरा भी नर्मी नहीं थी कि राहत का क्षण भर भी महसूस होने दें. मैंने निगाहें इधर-उधर घुमाई देखा, दीवार पर हर तरफ कुछ तैलचित्र बड़े कैनवस पर रंगे थे. प्राकृतिक छटा को अपने रंगों में भरे, एक चित्र में शाम को ढलते सूरज का विहंगावलोकन करती पहाड़ियों भूरी पोशाक में ढकी, नदी की लहरें मदोन्मत मुझे लगा कि मैं उन्हीं पहाड़ियों में जा बसा हूं. कुछ पता ही नहीं विस्मृत, मोहपाश में बेसुध सा ताकता रहा तैलचित्र. वापस यथास्थिति में आते ही अपने सामने की गर्म हवाओं के थपेड़े मुझे अब और भी परेशान कर रहे थे. एक बार मन किया कि क्यूँ न तब तक नागवासुकि मंदिर में जाकर वक्त बिताऊँ. कशमकश में बार-बार मन विचलित था. मुझे एक तरकीब सूझी कि एक पेपर के टुकड़े पर लिखकर रख दूँ मेज पर यह मैं नागावासुकि मंदिर पर बैठा हूं कुछ देर में वापस मिलने आऊँगा. फिर लगा, नहीं, यह ठीक होगा? क्या मालूम वो कहीं चले गए तो मेरी सारी कोशिशें आज मिलने की बेकार साबित होंगी. जगदीश जी से मिलने की बेकरारी और विवशता कुछ-कुछ ऐसी ही थी ज्यों कोई अपने बेहद प्यारे और पसंदीदा प्रेमपूर्ण व्यक्ति से मिलने की उत्सुकता से भरा हो. बगैर मिले पाँव कहीं जाने को राजी नहीं थे. मन को बेचैनी थी एक झलक जी भर देखने की. और कवि हृदय उन्होंने अपनी प्रेरणा जो मान बैठा था फिर ये कैसे मुमकिन था कि कहीं और भी कुछ है जिसे बिना जगदीश जी से मिले पूरा किया जा सकता था. नई कविता उस वक्त तक मेरे लिए वैसी ही थी जैसे किसी बीमार के लिए औषधि. मगर मरीज दवा के बारे में वो बातें नहीं जानता कि कितनी मात्रा में क्या-क्या जड़ी बूटी मिलाकर किस विधि के इस्तेमाल से औषधि तैयार की गई. बस मैं इतना ही जानता था कि यही औषधि मेरी कल्पनाओं, विचारों, अनुभवों चेतना की बीती हुई कड़वाहट भरी जिंदगी को नवीन आयाम देने में समर्थ है. बुरी स्वप्न गाथाओं को डरावनी अवचेतन में लगातार आने वाली शक्लों से छुटकारा दिला सकती है. बचपन से ही मैं बेहद भयभीत प्रवृत्ति का आदी था जागती आँखों में दुनिया का सामना कर पाने का काम और नींद में दुनिया की बदसूरत शक्लों की जकड़ में जीते-जीते कितने बरस बीते.

एक रात नींद से उठकर जल्दी-जल्दी कलम हाथ में लिए मैंने जो कुछ भी सपने में देखा उसे लिखना शुरू किया. पहली बार का अनुभव बेहद संतोषजनक था. जैसे ही लिखना बंद हुआ मुझे कम समय को ही सही ठीक-ठाक नींद आई थी. उसी दरम्यान मैंने ढेरों कविताओं से पूरी तनमयता से अध्ययन करना शुरू किया था तभी मैंने किसी पत्रिका में डॉ. जगदीश गुप्त की कुछ कविताएँ पढ़ी थीं कविता की समाप्ति पर उनका इलाहाबाद वाला पता भी लिखा था.. .. डॉ. जगदीश गुप्त से मिलने की ख्वाहिश इसी क्षण मेरे भीतर पूरी तरह समा चुकी थी. खैर.. ... मैं अपनी स्मृति से बाहर आया. 4. 30 बज चुके थे. वही महिला पुन: दरवाजें से निकलकर बाहर आईं और मुझे भीतर आने का संकेत दिया मैंने नन्हें बालक सा उनके पीछे-पीछे हो लिया था. भीतर के कमरे पर पहुँचकर देखा एक बिस्तर पर जो कि एक छोर की दीवार से सटा था. डॉ. जगदीश जी लेटे हुए थे. उनका पेट काफी ज्यादा था डीलडौल से एक उम्रदराज आदमी की तरह कभी आँखों की नींद से इस कोशिश में थे कि कब बाहर निकल आएँ. उनके ललाट से कपाल के बिल्कुल चिकना और उनका रंग बेहद गोरा था. उस वक्त उन्होंने पायजामा पहना हुआ था और कंधे से कमर तक पूरा बद खुला सिर्फ एक दो तीन सूत का धागा डाल रखा था.

पुन: वही महिला दो कप चाय, कुछ बिस्कुट, नमकीन लिए तश्तरी दोनों हाथों से थामे मेज पर रख कर चली गईं. उन्होंने एक कप चाय तश्तरी उठाकर जगदीश गुप्त के विश्राम की अवस्था में ही थमा दिया था. जगदीश जी ने तश्तरी को अपने पेट पर रखे-रखे ही चाय के दो घूंट लिए थे. फिर मुझसे उन्होंने जो पहले दो लफ्ज कहे थे. आप तकल्लुफ न करें, इसे गहण करें, इसके बाद ही बात होगी. कुछ देर बाद वे बोले.. .. हाँ, जनाब बताएँ कैसे आना हुआ? मैंने जगदीश जी को डायरी में रखा खत निकालकर थमा दिया था. जब तक वो पत्र पढ़ते मैं वापस डायरी के पन्नों में उलझा रहा. पत्र पढ़कर उन्होंने उसी पत्र में अपना जवाब लिखा. और मुझे कहा - "इसे आप उन्हें मेरा सादर प्रणाम कहकर अवश्य दे दें." फिर बातें इत्मीनान से जारी रहीं वे बोले तो आप कविताओं में दिलचस्पी रखते हैं, काफी कम उम्र में ही. ये बताएँ आपने किन-किन कवियों को अब तक पढ़ा है. मैंने लड़खड़ाते लहज़े से उन्हें कुछ नाम बताए थे. बोले - "तो आप आधुनिक कवियों को इसका मतलब पढ़ने में खूब दिलचस्पी लेते हैं." मैंने सिर्फ स्वीकृति में सिर हिलाया था. आप अपनी कुछ रचनाएँ यदि लाए हों तो दिखाएँ मैंने उन्हें अपनी कविताएँ पहले ही उनके सुपुर्द कर दी थी जब वो पत्र लिख रहे थे. वो थोड़ा रुककर बोले गालिब और मीर को पढ़ा है आपने? आपकी उर्दू शब्दों की नुक्ता सम्बंधी त्रुटियाँ उन्हें अध्ययन करने से अवश्य कम होंगी. वैसे आपका लेखन नया है किंतु बेहद गहन और गंभीर अच्छा है. फिर उन्होंने गालिब और मीर के कई सारे शेर और नज़्में मुझे सुनाईं. उनमें आए अरबी, फारसी शब्दों के अर्थ भी बताते गए. मेरे दिलचस्पी उन्होंने भाँप ली थी. मैंने तमाम शेर स्मृति बनाए रखने की खातिर डायरी में बक़ायदा सलीक़े से लिख लिया था. जब वो गालिब की बातें कहते थे तब उनके चेहरे पर एक शक्ति एक अदभुत ऊर्जा बार-बार कौंध जाती थी. मुझसे कविता पर जितनी भी बातें कहीं, उनमें यही था कि वे ब्रज, अवधी संस्कृत के गुण मर्मज्ञ थे. ब्रजभाषा में रचित काव्य को श्रेष्ठ मानते थे. बावजूद इसके खड़ी बोली में रची जा रही काव्य धारा को वह उसी मिठास, गेयता राग में देखना पसंद करते थे. उनकी एक किताब थी "बहुलोचना नदी". कई मुलाकात के बाद उनसे भेंट में मिली थी. उसमें इलाहाबाद के सजीव चित्र, नदी, तट, नाविक, किश्ती, पुल आदि को प्रतीकों के रूप में इस्तेमाल कर जो कुछ भी भावोत्सर्जना की थी उसमें एक नई दृष्टि, नया अर्थ, नये प्रतिमान साफ देखे जा सकते थे.

हाँ एक बात का ख्याल हमेशा रखते, कविता को जटिल संश्लिष्ट होने से बचाए रखने का. जगदीश जी ने मुझसे पूछा क्या आप चित्रों में दिलचस्पी लेते हैं. मैंने कहा जी हाँ. यह जवाब सुनकर वे बहुत आश्वस्त हुए थे. और आहिस्ते-आहिस्ते अपने दोनों हाथों की मदद से बिस्तर से उठे. खड़ाऊँ जैसी चप्पलें पाँव की मोटी किंतु नर्म उँगलियों में डाले एक लोहे की छड़ का सहारा लेकर मुझे अपने साथ भीतर के एक तहखाने की ओर जाने लगे. एक घुप्प अंधेरे हॉल में मैं कुछ क्षणों के लिए गुम हो चुका था. फिर मध्यम रौशनी के साथ पूरा हौल जगमगा उठा. मैंने देखा हॉल पूरा तैल चित्रों और कैनवस से भरा था. दीवार के तीन छोरों पर जो तैलचित्र टँगे थे हर चित्र के उपर छोटे-छोटे रंगीन से बल्ब बेहद नाजुक सी रौशनी लिए हुए जल रहे थे. वे एक-एक तस्वीर की ओर करीब मुझे लेकर जाते और फिर उन तस्वीरों के बारे में मुझे पूरी रूचि के साथ विस्तार से बताते. मुझे अब जो तस्वीरें याद हैं उनमें मीरा की तमाम मुद्राएँ लिए हुए. कुछ तैलचित्र, कुछ आधुनिक चित्र शैली के नमूने, कुछ प्राकृतिक चित्र थे. इन चित्रों के साथ-साथ मीर गालिब उनकी जबान में रगों से तैरने लगे थे. हर चित्र के साथ चंद पंक्तियाँ वे खूबसूरती के साथ जरूर सुनाते. एक चित्र जिसे मैं कभी नहीं भूल सकता वो था एक छह फुट के कैनवस पर बना माँ और बच्चे का चित्र.

एक रोज का वाक़या याद है जब परिमल संस्था की ओर से जगदीश जी ने तमाम नए कवियों की एक गोष्ठी किसी मित्र के यहाँ रखी थी. मुझे वो साथ लेकर वहाँ गए थे. एक युवा कवि जिसका यहाँ पर विस्मृत हो रहा है वे भी शामिल हुए थे. दरासल खासतौर पर उनकी तमाम कविताओं का पाठ होना था. 15 साहित्यकार तकरीबन वहाँ मौजूद थे. सभी पास इन कविताओं की एक-एक प्रतिलिपि थी. कविता पाठ खत्म होने के बाद सभी मौजूद साहित्यकारों ने अपनी-अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की. गोलाई मैं बैठे हुए जब एक-एक वक्ता के विचार प्रतिक्रिया पूरी हो रही थी. जगदीश गुप्त ने मुझे इशारा करते हुए कहा. आप भी दो शब्द कहें. मैं संकोच से भरा था. पुन: उनके कहने पर मैंने उन कविताओं की जमकर आलोचना की. गोष्ठी की समाप्ति पर बाहर निकलते हुए गुप्त जी ने तब मुझसे कुछ बातें कहीं थीं. जब सभी गुप्त जी से इजाजत लेते हुए वापस अपने-अपने ध्येय की ओर बढ़ रहे थे. गुप्त जी के शब्दों में जो बातें निहित थी. वो कुछ ऐसी थी. मुझे उस कवि की आलोचना इतनी बेबाक़ी और निष्ठुर तरीके से नहीं करना था. तुम्हारी आलोचना की भाषा बेहद शुष्क और खुरदरी है. इसमें थोड़ी नाज़ुकी, लचीलापन ला कर देखो. इसके पश्चात घर ले जाकर उन्होंने मुझे साहित्यिक पत्रिकाएँ अध्ययन हेतु दी थीं. उन्हें पढ़कर भाषा के निखार की बात स्मृति में सदा के लिए डाल दी. अगली मुलाकात में जगदीश जी ने अपनी काव्य पुस्तिका 'साँझ' मुझे स्नेहपूर्वक भेंट की. इसके बाद तो जैसे किताबों के रूप में कविता के ज्ञानार्जन में बढ़ोत्तरी हेतु उनकी कई पुस्तकें मुझे आशीर्वाद के रूप में मिलीं.

जगदीश जी ने नई कविता में हो रहे प्रयोगों को लेकर बिम्ब प्रतीक, छंद मुक्तता आदि विषयों को संवेदनात्मक न होकर केवल भौतिक प्रयोजन को लेकर तमाम बातें कहीं. उनका मानना था इसमें विषय हृदयी न होकर बौद्धिक या मस्तिष्क का मानसिक योग बनकर रह जाता है. काव्य विषय हमेशा हृदय ग्राह्य होना चाहिए. न कि वो विषय शास्त्रार्थ हेतु हो. कविता संवेदना के धरातल पर ही जीवित रहती है. भावना से इतर बुद्धि के धरातल पर कविता का अर्थ बेमानी हो जाता है. कविता गणित, ज्यामिती या विज्ञान नहीं हो सकती. भले ही कविता में भावना के स्तर पर उनमें प्रयुक्त शब्दावली का प्रयोग क्यों न हो. ये शब्द एक विशेष प्रकार के धरातल से उठकर जब कविता में समाहित होते हैं तब उनकी जड़ें समूची गुणवत्ता को धारण किए हुए भी अपनी काव्यात्मक धर्मिता को बनाए रखते हैं. या कहें कि संप्रेषित या अभिव्यक्त करते हैं.

एक दिन गुप्तजी से मुलाकात की प्रतिक्षा में मैं नदी के किनारे स्थिति नागवासुकि मंदिर की चैखट में बैठे हुए सोच विचार में डूबा था. नदी की लहरें मंदिर के विशाल खंभों से टकराती हुई संगीत के तमाम सुर छेड़ रही थी. कभी-कभी हल्की वाद्य यंत्रों की ध्वनियाँ हौले-हौले विचार कल्पना को बांधे सभी वास्तविकताओं से दूर ले जाती हैं. और भँवर में जाकर भिगोते हुई वापस आने वाली लहरों के साथ मंदिर के रेतीली घाटियों के बीच अपनी उँगली छुड़ाकर वापस लौट जाती. गुप्तजी ने एक बार कहा था कभी मंदिर के शांत वातावरण में जब ये लहरें गुनगुनाती हैं, नृत्य की मुद्राओं में, तब उन सुरों में घुलकर तुम्हारी चेतना यह महसूस करेगी कि दुनिया का सब रहस्यमय प्राकृतिक संगीत इन्हीं में छिपा रखा है. नदी की यह विराट छवि पहले कभी मेरे हृदय में ऐसी न थी. गुप्त जी कहते हैं इन लहरों का उन्मत्त उफान देखकर यह लगता है कि कोई दुल्हन अपनी पहली रात सारे आभूषण वस्त्र निकाल कर मंदिर के किनारे सहूलियत से रख आई भंवर के साथ संसर्ग की असीम गहराईयों में डूबी बरसों बरसों तक संयोगी दशा में चलती है. ये बरस लहरों के आने जाने के बीच ही आते-जाते हैं. और दुल्हन इन्हीं लहरों को किश्ती की तरह अपनी इंद्रिय भोग की जिजीविषा तृप्त करने को उपयोग करती है. सच, नदी की यह सार्थक तस्वीरें गुप्त जी की ही उपज थी और मंदिर उस दुल्हन को उस भंवर के साहचर्य भंगिमा में जाने वाला संरक्षक बना सदा उसी जगह अडिग खड़ा रहता है.

गुप्त जी जमीदार घराने से थे. उनके दादा का लगाव इस मंदिर के निर्माण में नींव का पत्थर बना. नदी के किनारे बसे दारागंज के निवासियों के पास अपनी इच्छाओं और भक्ति के लिए कोई आस्था आवास न था. जगदीश जी ने बताया उनके दादा ने सभी ग्रामीण वासियों की परेशानियों और भक्ति की अपेक्षा की पूर्ति के लिए एक मोटी रकम इस मंदिर की स्थापना हेतु दान की थी. बाकी राशि चंदे के तौर पर एकत्रित की गई थी. गुप्त जी अपने दादा को बेहद प्रिय थे. और उन्हें याद करके उनको नमन करने वह रोज सुबह मंदिर में जाकर ध्यान लगाते थे. दादा की स्मृतियों से बातें करते थे. बचपन के खिलंदड़ दिनों का विचरण करते थे और फिर दादा की आत्मा के साथ महसूस कर खुद को उससे अपना लगाव रागात्मकता हमेशा बनाए हुए थे. दादा से परंपरा के तौर पर गुप्त जी को नदी की सर्जनात्मक ऊर्जा और दर्शनीय मोहकता के बारे में संवेदनात्मक ज्ञानात्मकता तमाम कथाओं विचारों से मिली थी. और उससे जुड़े रहते हुए आजीवन गुप्त जी ने ज्ञानात्मक संवेदना को निखारते हुए अपने भीतर जीवित रखा.

गुप्त जी की पत्नी के तेवर मुझे देखकर हमेशा चढ़े रहते थे. मुझे तमाम दिनों तक यह बात अखरती रही. मगर कभी इसका कारण जानने की हिम्मत न जुटा सका. हाँ... एक रोज तमाम दिनों की भाँति मैं गुप्त जी के बुलावे पर उनसे मिलने पहुंचा तो पत्नी ने कपाट खोलते हुए अपनी तीखे स्वरों में कहा सुबह से ही मिलने वालों का जमावड़ा लगा हुआ है, पता नहीं सबको आखिर क्या चाहिए? कोई भी यह नहीं देख रहा कि उनकी हालत बीमारी की वजह से सुधर नहीं रही. तुम उन्हें थोड़ा रूक कर मिलो अभी-अभी आँख लगी है. यह बात सन सत्तानबे की रही थी. मैं चुपचाप उस तीखे स्वरों के पीछे छिपी भावना को क्षण भर में ही भाँप गया था और चुपचाप बाहर पड़ी आराम कुर्सी पर बैठे बैठे गुप्त जी की सेहत की चिंता ने मुझे अश्रुपूरित भावना से भर दिया था. सच कितना बर्दाश्त करती होंगी मैडम. कितनी तकलीफ होती होगी. लोगों की भीड़ को गुप्त जी से इतर रखने में. गुप्त जी इतने व्यवहारिक और मजाकिया किस्म के स्वभाव वाले व्यक्ति थे उन्हें जरा भी फिक्र न थी अपनी सेहत की. उस पर भी पेण्टिंग्स बनाने के शौक के चलते कड़ा परिश्रम - शारीरिक व मानसिक, फिर अध्ययन व लेखन. कोई भी स्त्री इतनी लापरवाही गैर-जिम्मेदारी कैसे बर्दाश्त कर सकती थी. बेहद कठिन था गुप्त जी को मनाकर आराम गाह की तरफ जाने की गुज़ारिश करना. गुप्त जी को भी शायद इसी अस्त-व्यस्त दिनचर्या में मजा मिलता था. वह कभी तो पत्नी की बात उनका गुस्सा देख बच्चे की तरह भोले भाले बन कर मान जाते और कभी अपनी जिद्द को जबरन उन पर थोप देते. उन्हें कुछ पकवान बनाने के बहाने से किचेन में भेज देते ताकि मेरे साथ वे खुल कर बात कर सकें.

उस रोज गुप्त जी के पास मैं कुछ रेखा चित्र जिन्हें मैंने बनाया था दिखाने ले गया था. यह सन निन्यानबे की बात रही होगी. गुप्त जी खूब देर तक उन्हीं रेखाचित्रों को देखते रहे. थोड़ी देर बात खामोशी तोड़ते हुए बोले तुम्हारी कोशिश अच्छी है. विचारों को कागज़ पर उतारना तुम्हें आता है. इन्हीं बातों के बीच एक नवयुवक हम दोनों के दर्मियान तेज कदमों से गुजरा. गुप्त जी ने उसे आवाज दी. अभिनव यहाँ आओ. ये देखो. और रेखाचित्र उसके हाथों में थमा दिये. जब तक वह उन्हें देखे गुप्त जी ने कहा यह मेरा बेटा अभिनव है. इसे विचित्र कला में बहुत दिलचस्पी है. अभी निराला का एक चित्र जन्म दिवस पर अकादमी वाले खरीदना चाहते हैं. और इशारा करते हुए एक किनारे पर रखे कैनवस की ओर मुझे संकेत किया. मैंने निराला की वह जीवंत आकृति देखी तो हैरान सा एकटक देखता ही रह गया. क्या मानव आकृति का सजीव चित्रण था. लंबे-लंबे केश कंधे पर गिरे हुए. दाढ़ी का एक-एक बाल बढ़ा हुआ, मेरे मुख से निकला वाह! क्या खूबसूरत पेण्टिंग है. निराला के जन्मदिवस पर इससे अच्छी भेंट और हो भी क्या सकती है. अभिनव बिना कुछ कहे मेरे हाथ में रेखाचित्र थमाकर गांभीर्य धारण किए घर के भीतरी हिस्से की तरफ बढ़ गए थे. काफी देर तक बात करने के साथ ही गुप्त जी को थकान और बोझिलता मालूम दे रही थी. शायद तबीयत नासाद होने की वजह से वे अलसाए हुए नींद में वापस लौटने की तरफ बढ़ रहे थे. मगर एक ओर ऊर्जा उन्हें मेरे साथ लगातार बने रहने को विवश कर रही थी. उनमें भीतरी द्वंद्व साफ झलक रहा था, उन्होंने गिलास भर पानी अपनी ओर बढ़ाने को कहा. पानी पीकर वे यथावत बिस्तर पर लेट चुके थे.

बहुत समय तक जमा की गई विभिन्न पत्रिकाओं में प्रकाशित अन्य रचनाएँ जब मैंने गुप्त जी को दिखाई उन्हें पढ़ कर गुप्त जी के चेहरे पर खुशी की लकीरें साफ देखी जा सकती हैं. तकरीबन पौन घंटे तक एक-एक रचना में डूबे बेहद दिलचस्पी और गंभीरता धरे व्यस्त रहे. फिर बोले शृंगार से युक्त रचनाओं में संयोग और वियोग का पुट तो देखा जा सकता है किंतु जो यथार्थपरक लेखन या रचना है उसमें श्रृंगारिकता को भले ही उस रूप में न पाया जाए तो भी यथार्थ की संजीदगी और रोमानियत में शृंगार को अन्य तमाम आयामों में आप जरूर देख सकते हैं. अत: कोशिश यह होनी चाहिए कि नई कविता यथार्थ की समूची दीर्घाओं को छू सके. इसी अर्थ में वह शृंगारिकता के अनछुए पहलुओं को भी छुएगी और तमाम ऐसे प्रतिमान भी गढ़े जा सकेंगे जिन्हें एक रस होकर छंद बद्ध कविता में कसने के जोखिम से भी बचा जा सकता है. प्रवक्ता और विभागाध्यक्ष के पद से सेवानिवृत गुप्त जी की उम्र अब अपने समूचे ढलान पर थी. बावजूद इसके रचनात्मक युवा लेखन के प्रति इतना बड़ा दायित्व, समर्पण का भाव, कविता की बारीकियों की तरफ रुझान बिरले ही लोगों में होता है. उस पर भी हृदय की बीमारी से लगातार जूझने का साहस साथ ही नामालूम कहाँ से इनकी सकारात्मक ऊर्जा का संचार उनमें सदा बना रहा कि किसी भी रचना के प्रति उदार, संवेदनशील और लगाव का जज्बा कभी भी उनके कर्मठ व्यक्तित्व में महत्वपूर्ण हिस्से के बतौर देखा जा सकता था. इस ऊर्जा का एक कारण तो मुझे वह नदी की इस विशालता का छोर और नागवासुकि मंदिर की शांति देने वाली पीपल की छाँव जिसके तले बड़े बड़े कवि, कलाकार, मजदूर और भक्त सभी बैठते थे. उसकी शीतलता और मंदिर की शांति देने वाली छटा, नदी की निश्छलता सभी जैसे ऊर्जा की बेजोड़ मिसाल थी. इसी पीपल की छाँव के नीचे दारागंज में उस वक्त प्रशासनिक अधिकारी बनने की कोशिशों में व्यस्त छात्र अक्सर वहाँ अध्ययन के लिए दिनभर बिताते थे. उस मंदिर के तट से जितनी दूर तक निगाहें चली जाएँ. दूर-दूर तक पानी का विशाल फैला समुद्र लगती थी नदी. हमने एक दफ़े मंदिर के घाट से जुड़ी सीढ़ियों से उतर कर नदी के पानी को उत्साहपर्वूक छुआ था. लगा कि अजीब ऊर्जा का संचार इस नदी में समाया हुआ हमेशा उफाने लेता है. यह उस वक्त की बात है जब निन्यानबे में जून की कहर बरपाने वाली गर्मियों के दिन थे. तरबतर पसीने से भीगा हुआ मैं घाट की सीढ़ियों पर बैठा मैं गुप्त जी के जागने की प्रतिक्षा कर रहा था. कि कब उनका ख़ादिम आए और मुझे बुलाकर ले जाए. एक समूचा इंसान या कवि, कलाकार बनने के लिए इससे अच्छा वातावरण और क्या हो सकता है. वैसे भी कवि या कलाकार किसी के द्वारा दी गई परिस्थितियों के अनुरूप न रचना करता है, न कृतिकार कृति ही बनाता है. इन स्थितियों को महसूस करके ही वह जो कुछ भी रचता है वह इस दुनिया का सच होकर भी यथार्थ के पार का सत्य ही होता है जिसे वह अपनी कला, कृति का मूल मानता है.

जे. एन. यू. में स्नातकोत्तर की परीक्षा में सफल होने की खबर को लेकर मैं गुप्त जी के पास गया था. शायद यह सुनकर उन्हें प्रसन्नता का वो अनुभव नहीं हुआ जिसकी कल्पना भर से मेरा अंतरंग रोमांचित हो रहा था या जो अनुभूति मुझे हुई थी. उनके अनुसार मेरे लिए इलाहाबाद विश्वविद्यालय में उच्च शिक्षा प्राप्त करना कहीं बेहतर था वह जे. एन. यू को वामपंथी विचारधारा का गढ़ मानते थे और प्रगतिशील विचारधारा के विकास की धुरी प्रयाग की पावन भूमि के रूप में देख रहे थे. प्रयाग ऐतिहासिक तौर पर अपनी तमाम खूबियों, साहित्य, कला, संगीत में पारंगत कला कर्मियों की जननी के रूप में जाना जाता रहा है. उन्हें कहीं न कहीं यह बात खटक रही थी कि राजधानी की तमाम बेदखल करने वाली कारगुजारियों के बीच मेरा कृति कर्म दब कर या पिछड़कर न रह जाए. और अवसरवाद की चपेट में मैं इसे खो न दूँ. उनकी चिंता एक हद तक जायज थी. उनकी एक कविता इन तमाम व्यस्तताओं के बीच मेरी प्रेरणा का स्रोत बनी रही. 'सत्य' शीर्षक से यह कविता गुप्त जी द्वारा रची गयी थी, जो अंग्रेजी माध्यम के उच्च माध्यमिक शिक्षा के कोर्स में भी सम्मिलित है. बाद के दौर में मैंने उनकी एक और रचना पढ़ी थी - 'शंबूक वध' जो मुझे एक अर्से तक कंठस्थ भी रही, तब लगा कि कविता का किरदार शंबूक महाकाव्य रामायण के किरदार राम की इस कदर आलोचना भी कर सकता है. पूरे महाकाव्य के केंद्रीय तत्व या चरित्र पर एक तीखी टिप्पणी थी शंबूक वध. 'साँझ' मुक्तक काव्य की परंपरा में सर्वोत्कृष्ट कृति थी. जिसमें गोधूलि बेला की जितनी खूबसूरत छवि गुप्त जी ने अंकित की थी वह अब तक के तमाम कवियों की कल्पना में मील का पत्थर साबित हुई है. उनकी प्रकाशित रचनाओं के साथ रेखाचित्रों का संयोग इतना प्रभावशाली था कि अन्य नई कविता के कवियों ने इसके मुकाबले यह समानांतर कोई भी ऐसी रचना या कृति नहीं दी. जिसे गुप्त जी की नई कविता, परंपरा की संवाहिका कहा जा सके. हालाँकि तब से अब तक बीते तमाम वर्षों में नई कविता अपने बदले हुए स्वरूप में निखर कर आई है. बदली हुई जमीन की चिंता उसमें घुली-मिली है. नए प्रतिमान भी खूब गढ़े गए. बिंब प्रतीकों का अंबार नई कविता के संसर्ग के धरातल पर बखूबी देखा जा सकता है. मगर कविता की चित्रमयता और कवि हृदय में चित्रों की काव्यात्मकता का कोई बेजोड़ रचनाकार गुप्त जी की रचनाधर्मिता के समकक्ष इस सदी में अपनी जगह नहीं बना सका.

खैर.. .. गुप्त जी से यह मेरी आख़िरी मुलाक़ात होगी, इस बात का जरा भी आभास न तब था न तो अब भी यकीन करने को जी चाहता हैं. मेरे हृदय को कवि हृदय कहने वाले गुप्त जी आखिर ऐसे कैसे मुझसे बिना मिले सांसारिकता से मोह त्याग कर सकते थे. इस सवाल का जोर जब तब मेरी रगों में तनाव भर देता है. सुनते आए हैं कि कवि हृदय की भावना का विस्तार और अनुभूति कोई कवित्त मन वाला व्यक्ति ही कर सकता है. फिर गुप्त जी मेरी इस भावना से अछूते क्यों रहे. जे. एन. यू आने के एक बरस बाद ही एक विशाद भरे रोज मुझे यह सूचना अखबार में छपी मिली - जगदीश गुप्त एक लंबी बीमारी के बाद आज नहीं रहे. इलाहाबाद जाकर मुझे उनके परिवार से मिलने का न तो साहस ही बचा था न ही सामना करने की हिम्मत उसी दर्मियान सुना कि अपनी अंतिम अवस्था में गुप्त जी साँसें विस्मृति के क्षणों में जाकर अंतिम समय तक जिये. न उन्हें पत्नी ही याद रहीं न बच्चों की सुध थी. सोचता हूँ एक कवि इतनी संवेदनहीनता के साथ कैसे पल-पल जिया होगा. सोच कर ही हृदय कंपित हो उठता है. अपने बुझते चरण में गुप्त जी विस्मृति में भी रेखाचित्रों में रमे हुए उँगलियों के सहारे कागज या हवा के कणों में रेखाएँ खींचते थे. शायद उन्हें अस्पताल के खाली कमरों का सूना कैनवस ही रास आया था. चित्रों के संग इतना लगाव और लकीरों की वायवीय आकृतियों में काव्यात्मक अनुभूति अलिखित हो कर रह गई थी. मुझे यकीन था कि मैं उन लकीरों में समायी कविता और चित्रों की अबूझ पहली को सुलझा सकता था. अगर संभव हो सका तो गुप्त जी की रचनाधर्मिता और कला-कौशलता को मैं सदैव अपनी कृतियों के जरिए अविस्मरणीय बनाने में सफल हो सकूँगा. उनकी रचनात्मकता जो रगों में उनके लहू में रवानगी से निरंतर बहती रही, उन रगों, लहू में मैं अपनी मौजूदगी दर्ज करूँगा.

उनका स्नेह और आशीर्वाद सदा बना रहे,
इसी उम्मीद के साथ!

- अनिल पु. कवीन्द्र

© 2009 Jagdish Gupt; Licensee Argalaa Magazine.

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