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कथा साहित्य

जगदीश जैन

नियमानुसार

धर्म दास मेंहदीरत्ता का आज तड़के ही देहांत हो गया. सारा मोहल्ला उनके घर के सामने खड़ा था. तरह - तरह की बातें हो रही थी. धर्म दास मेंहदीरत्ता का अब कोई नहीं है. दो साल पहले वे और उनकी पत्नी थे. पत्नी के देहांत के बाद वे अकेले रह गये थे. पिछले दो साल से अकेले ही जीवन व्यतीत कर रहे थे. उनका अधिकतर समय सामने वाले मंदिर में प्रभु भजन में बीतता था.

धर्म दास जी एक बहुत ही नेक, नैतिकता से विभूषित इंसान थे. किसी को भी जानबूझकर उन्होंने चोट पहुँचाई हो, ऐसा शायद ही कभी हुआ हो. धर्म दास जी सेंट्रल गवर्नमेंट में एक उच्च अधिकारी पद से पाँच वर्ष पूर्व रिटायर हुए थे. रुपये पैसा उनके पास उनकी ज़रूरत भर के लिए पर्याप्त था. किसी भी प्रकार के अभाव की बात उनके मुँह से शायद ही कभी किसी ने सुनी हो. अभाव भी क्यों होता रिटायरमेंट के बाद भी अच्छा पैसा मिला था, पेन्शन भी अच्छी-ख़ासी आती थी, और उनकी ज़रूरत ना के बराबर थी. सुना तो यहाँ तक जाता था कि उनके पास पुश्तैनी कई किलो सोना है.

आज के जमाने के हिसाब से बस उनमें एक ही दुर्गुण था कि वह नियमानुसार कार्य करते थे. नियमानुसार कार्य तो वह रुटीन में ही कर देते थे, और अगर नियमाविरुद्ध उनसे कोई अपेक्षा करता था तो वे उसे करते नहीं थे, हाँ माफी माँग लेते थे. लोग तो कह देते थे कि नियमानुसार कार्य करके क्या वे किसी पर कोई एहसान कर रहे हैं? वह उनकी ड्यूटी है, उसके लिए सरकार उन्हें वेतन देती है. एहसान तो तब है जबकि किसी का न हो सकने वाला काम भी कर दे.

धर्म दास जी के नियमानुसार कार्य करने की आदत के कारण दुनिया में उनका कोई अपना सा न हो सका. मोहल्ले भर के लोग यही ख़ुसर - पुसर कर रहे थे. ये वही धर्म दास जी हैं जिन्होंने कभी किसी की कटी उँगली पर भी नहीं मूता है. पड़ौसियों का कहने का शायद यही आश्य रहा होगा कि अब हम क्यों इनके क्रियाक्रम में हाथ लगाए. भीड़ घंटों से जुड़ी थी. तभी एकाएक आकाश में गर्जना सी हुई. पाँच सुंदर कारें एक के पीछे एक आकर धर्म दास जी के मकान के सामने रुकी. पीछे - पीछे एक टेम्पो भी आकर रुका. देखने से ही लग रहा था कि जैसे आगंतुक उनके कोई सगे संबंधी हों, और टेम्पो में अन्त्येष्टि हेतु सामग्री आई हो. एकाएक चारों ओर शुद्ध चन्दन की खुशबू फैल गयी. जाहिर हो रहा था कि टेम्पो में चन्दन की लकड़ी थी, और शायद अन्त्येष्टि के लिए आई थी.

कारों में से बीस सुंदर, सजीले जवान उतरे, और पाँच ड्राइवर. कुल मिलाकर पच्चीस युवा कारों में थे, और चार टेंम्पो में. सभी युवा सफेद परिधान में थे. उनमें से एक ने आगे होते हुए मोहल्ले वालों की ओर इशारा करते हुये कहा, "डैडी का स्वर्गवास कब हुआ है?" एक पड़ोसी ने उत्तर दिया, "हमें तो सही मालूम नहीं. सुबह सात बजे काम वाली आई थी. रसोई की चाबी उसके पास भी रहती है. वह अंदर गयी तो पता चला. तब उसने सबसे पहले मुझे खबर की." आगंतुक युवाओं में धर्म दास जी के लिये दो युवा डैडी बोल रहे थे, और बाकी सब अंकल. देखने से लगता था कि वे सब धर्म दास जी के कोई निकट के परिजन हैं. परिजन हैं तो उनके जीते जी कभी भी खबर लेने क्यों नहीं आए? यह प्रश्न मोहल्ले वालों में मन में उठ रहा था. उस युवा ने मोहल्ले वालों को संबोधित करते हुए कहा, "मेरे पूज्यों, क्या मेरे डैडी ने कभी किसी का अहित किया है?" एक साथ आवाज़ आयी, "नहीं, कभी नहीं, ऐसा तो वे सोचते भी नहीं थे." "तब आपने उनकी अन्त्येष्टि करने की क्यों नहीं सोची? " और फिर कुछ रुककर बोला, "इसीलिए कि उन्होंने किसी के नाजायज़ काम नहीं किए, सदैव नियमानुसार कार्य किये. अगर कोई नियमानुसार कार्य करने वाला अकेला होगा तो उसकी तो कोई अन्त्येष्टि भी नहीं करेगा?" मोहल्ले के लोग यह सुनकर दंग रह गये. उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि इस युवा ने उनके मन की बात कैसे जान ली है. लेकिन अपने मन का सच सुनकर सब मौन थे, और यह भी लगा रहा था कि यह युवा उनके मन की बात जानने की कला जानता है.

युवा पुन: बोला, "सज्जनों, नहीं ऐसा नहीं है. जो नियमानुसार और नैतिकता से कार्य करते हैं, उनकी पूछ धरती पर तो क्या देव लोक में भी होती है. वे आत्माएँ तो ब्रह्मांड की शान होती हैं. अब आप स्वयं देखेंगे कि ऐसी महान आत्माओं का क्रियाक्रम कैसे होता है?" पाँच - छ: युवा अर्थी बनाने लग गये, और बाकी अन्य व्यवस्थाओं में जुट गये. सामान्यत: जिस कार्य को घंटों लगते हैं उन्होंने उसे मिनटों में कर डाला. चार बिल्कुल एक से कद काठी के युवाओं ने अर्थी उठाई. ये चारों ऐसे लग रहे थे कि जैसे चारों एक दूसरे का प्रति रूप हों. स्वयं ही मधुर ध्वनि में घंटे - घड़ियाल बजने लगे. वायु मंडल में भीनी-भीनी खुशबू व्याप्त हो गयी, और राम नाम सत्य है के जयघोष के साथ शव यात्रा प्रारंभ हुई.

समाचार फैलते देर न लगी. शहर दुर्लभपुर से ही नहीं आसपास का जनसमूह भी इस शव यात्रा को देखने के लिए उमड़ पड़ा. धर्म दास मेंहदीरत्ता की शव यात्रा देखते ही बनती थी. तभी डैडी कहने वाले युवक ने यात्रा को कंधा बदल के लिये रुकवा लिया ताकि लोग सुस्ता ले, और बोला, "भाइयों, क्या आप में से कोई मेरे डैडी को कंधा देने का सुख प्राप्त करना चाहेगा?" मोहल्ले वाले लज्जित थे. एक साथ बोले, "क्यों नहीं अवश्य, यदि आपकी सहमति हो तो." "क्यों नहीं, मेरे डैडी आपके पड़ोसी थे. आपका यह अधिकार बनता है. किंतु आप कंधा देते हुए यह महसूस करेगें कि आपके कंधे पर अर्थी का कोई भी भार न आएगा. क्योंकि ऐसा आत्माएँ तो कभी भी, किसी भी रूप में, किस पर भी भार नहीं बनती हैं, बल्कि दूसरों का भार वहन करती हैं. मेरे डैडी ने इस कलयुग में, इस ओछे युग में, इस भौतिकता के युग में, जीवन भर सहर्ष सत्यवृत्ति का बोझ उठाया है."

और इसके साथ ही शव यात्रा पुन: प्रारंभ हुई. कंधा देने वालों के चेहरे के भावों से धर्म दास जी के बेटे द्वारा कहीं गयी बात की सत्यता की पुष्टि हो रही थी. कंधा देकर जो भी हटता वही विस्मयकारी अनुभव की चर्चा करता. चंदन की लकड़ी से स्वत: ही स्वचलित ढंग से चिता सज गयी. धर्म दास जी की देह चिता में सज़ा दी गयी. उनका बेटा पुन: बोला, "आओ आपको डैडी के मुख के दर्शन करा दूँ." कहते हुए उसके शव का मुँह उघाड़ दिया. शव के चेहरे की दिव्य आभा देखकर दर्शक किंकर्तव्य मूढ़ थे. सबके मुँह से निकल रहा था, "ओह, वाह क्या बात है?" तब बेटा बोला, "सज्जनों, मैं और मेरे बराबर में खड़ा यह अनुज, धर्म दास जी के धर्म पुत्र हैं. हमें आप सबकी प्रतिक्रियाओं की पूर्ण जानकारी है, किंतु हम इससे खिन्न नहीं हैं. हम आपको केवल यह बताना चाहते हैं कि जो सत्यवृत्ति से अपना कार्य करते हैं, वे इस लोक में तो जिस आत्म संतुष्टि को पाते है वह तो है ही, परलोक में भी उन्हें सम्मान मिलता है. आओ आपको डैडी के परलोक का भी दर्शन करा दूँ." कहते हुए उस बेटे ने अपनी जेब में से एक हथेली भर का आयना निकाला और सबके सामने कर दिया.

उपस्थित जन उसमें धर्म दास मेंहदीरत्ता जी की आत्मा को एक सिंहासन पर शांत मुद्रा में बैठा देखकर विस्मित हो गये. उनके दरबार की अलौकिकता देखते ही बनती थी. इसके बाद उनके धर्म पुत्र द्वारा चिता में अग्नि प्रज्वलित कर दी गयी, पंद्रह मिनट के अंदर ही सम्पूर्ण चिता सुगंध बिखेरते हुए कपूर की भांति वायु मंडल में विलीन हो गयी. केवल देह पुष्प शेष थे, वो भी बिल्कुल शीतल अवस्था में. अंत में बेटे ने कहा, "भाइयों, मनुष्य अपने संस्कार, अपनी शिक्षा के अनुसार कार्य करता है. किंतु यह भी शाश्वत सत्य है कि सत्यवृत्ति का आचरण अच्छा होता है. जो लोग सत्य के मार्ग पर चलते हैं वे इस लोक और परलोक में अजेय हैं. हम देव लोक से आए है, और इसकी पुष्टि के लिए आप स्वयं ही देखेंगे…." कहते - कहते सब गाड़ियाँ, सभी आए युवा गायब हो गये, और दे गये थे जनमानस को सत्यवृत्ति की राह पर चलने की एक सीख.

सस्पेंशन

मुंडन हाथी को पता चला कि धांधू भेड़िये ने किट्टू खरगोश को दो दिन से पेड़ पर उलटा लटका रखा है. मुंडन हाथी उधर ही घूमने निकल चला, और यह दृश्य देखकर धांधू भेड़िये से पूछा, "यह क्या हो रहा है?"
इस पर धांधू भेड़िये ने कहा, "दद्दा, इस पर चोरी का इल्जाम है, इसीलिये इसे सस्पेंड कर दिया है."
"क्या चुराया है, इसने?"
"दद्दा, इसने धन्नों ऊँटनी की प्लेज से पेठा चुराया है."
"क्या तुम किट्टू पर लगाये इल्जाम को सही समझते हो?"
"दद्दा, मैंने किट्टू को सस्पेंड करके इसकी जांच बैठा दी है."
"रे मूर्ख, जब तुम्हें अभी सही-गलत का ही पता नहीं है, तब तुमने इसे दंड किस लिये दे दिया है?"
"सर, ही इज अन्डर सस्पेंशन एण्ड सस्पेंशन इज नॉट पनिश्मेन्ट."
इस पर मुंडन हाथी ने किट्टू खरगोश को नीचे उतरवा लिया, और धांधू भेड़िये को बांधकर पेड़ पर उलटा लटकवा दिया. " और फिर बोला, " मैंने सुना है तुमने पुरानी दुश्मनी निकालने के लिये किट्टू के साथ यह नाटक रचा है. रे मूर्ख, यह तो सोच लेता कि किट्टू का खुद का पेठे भर का वज़ूद नहीं है वह पेठा कैसे चुरा लेता?"
"दद्दा, मुझे माफ कर दें."
"नहीं - नहीं, अब तू ही बता कि सस्पेंशन पनिश्मैन्ट है कि नहीं."
"है."
"फिर तूने कहाँ सुना था कि सस्पेंशन इज नॉट पनिश्मैन्ट."
"मनुष्यों से."
यह सुनकर मुंडन की भौंहे तन गयी और बोला, " खबरदार जो भविष्य में जंगल में मनुष्यों की कार्य प्रणाली लागू करने की चेष्टा की. तुम क्या जंगल में भी लंगड़ा तन्त्र स्थापित करना चाहते हो?"
धांधू भेड़िये ने अपने कान पकड़ कर माफी माँगते हुये कहा, "नहीं दद्दा नहीं, भविष्य में ऐसी गलती कभी न होगी. इस बार क्षमा कर दें."
इस पर मुंडन हाथी ने धांधू भेड़िये को खबरदार करते हुये पेड़ से नीचे उतरवा दिया और भविष्य में मनुष्यों का अनुकरण न करने की नसीहत दी.

वर्तमान सबसे ज़्यादा महत्वपूर्ण है

अजनबी को देखकर वे बोले, "अरे, तू कौन है?"
इस पर वह अजनबी बोला, "पहले तुम बताओ तुम कौन हो?"
एक ने उत्तर दिया, "भैया जी, मैं तो भूत हूं."
"हूं, अच्छा भाई अब तू बता तू कौन है?" दूसरे की ओर मुंह करते हुए उसने पूछा.
दूसरे ने उत्तर दिया, "भैया जी मैं तो भविष्य हूं. अब आप भी बताएँ कि आप कौन हैं?"
"भाइयों, मैं वर्तमान हू."
परिचय सुनते ही भूत और भविष्य दोनों वर्तमान के पैरों में लेट गए. वर्तमान ने दोनों को उठाकर गले लगाते हुए कहा, "हम तीनों तो सगे हैं, तब यह सब क्यों?"
दोनों ने एक साथ कहा, "नहीं भाई जी, आप हम सब में सबसे ज़्यादा महत्व रखते हैं."
इस पर वर्तमान ने दोनों से पूछा, "सो कैसे?"
भूत बोला, "भैया जी, मैं तो भूत हूं, अब कभी वर्तमान नहीं बन सकता हूं, तब मेरा आपके सामने वजूद ही क्या है?"
फिर भविष्य बोला, " और भैया जी, मेरा भी महत्व तभी होगा जब मैं वर्तमान बन जाऊँगा. इस नाते आप हम तीनों में सबसे ज़्यादा महत्वपूर्ण हैं."
भूत बोला, "लो इस बात को मैं और साफ किए देता हूं."
जो भूत के लिये पछताते हैं, भविष्य के लिये चिन्तित रहते हैं लेकिन जिनके पास वर्तमान के लिये सोचने का समय नहीं है वो केवल मूर्ख हो सकते हैं.
इस पर भविष्य ने कहा, "हाँ भाई वर्तमान, बात तो बिल्कुल सही है. और जिसे इस शाश्वत सत्य की जानकारी होती है, उसका जीवन सुखद होता है."
वर्तमान बोला, "भैया जी, बहुमत का जमाना है. दो ने कही, एक ने मानी, कहे गुरुदेव, तीनों ज्ञानी."
और इस पर तीनों खिलखिलाकर हँसने लगे.

© 2009 Jagdish Jain; Licensee Argalaa Magazine.

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