अर्गला

इक्कीसवीं सदी की जनसंवेदना एवं हिन्दी साहित्य की पत्रिका

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कथा साहित्य

विजय सिंह मीणा

सिसकियाँ

अरावली शृंखला की उपत्यका में बसा यह यह गाँव ढाई तीन सौ घरों की एक खुशहाल बस्ती है. पश्चिम की और अरावली की उन्मुक्त एवं रमणीक पहाड़ियाँ अपने पूरे यौवन का आनंद बिखेर रहीं हैं. यहाँ की भूमि उपजाऊ है. इस गाँव में अधिकतर परिवार कृषि पर निर्भर हैं. भरपूर फसल होने के कारण यहाँ के अधिकतर किसान ठीक ठाक स्थिति में हैं. गाँव के ठीक पश्चिम में एक घर जिसमें तीन प्राणी रहते हैं. यह घर भरोसी का है जो सीधा साधा और दुनियादारी से बहुत दूर अपने आप में ही मगन रहता है. इसकी पत्नी रामकली, जो हाल ही में नवविवाहिता के रूप में इस घर की सदस्या बनी है. इनके अलावा इनके छोटे भाई हरिया राम जो कि हमेशा ही दन्द-फन्द की चोपड़ रचते रहते हैं. ये गाँव में जब तक दो चार लोगों से उल्टी सीधी नहीं भिड़ते तब तक इनका खाना हजम होना मुश्किल है.

रामकली रूप लावण्य से भरपूर एक सुंदर नवयौवना है. वह अपने पति के साथ अपने बेमेल और असंतुष्ट महसूस करती थी. इधर पहले दिन से ही हरिया की गिद्ध दृष्टि रामकली के इर्द-गिर्द मंडराने लगी थी. हरिया लंबी कद काठी का सुडौल और गौर वर्ण का युवक था. वाक चातुर्य उसमें कूट कूट कर भरा था. अब वह रात दिन रामकली के सपनों में ही डूबा रहता. रामकली भी कभी कभार उसे कनखियों से देख लेती मगर अंदर उठ रहे तूफान को वह बाहर नहीं लाना चाह रही थी.

एक दिन मध्यान्ह का समय. सुनहरी धूप. बल खाकर इठलाती हुई पवन महक रही थी. पत्ते पायल बन कान झुन्न कर उठते थे. चारों ओर सरसों के पीले-पीले खेतों कि अनुपम छठा ऐसी दीख रही थी कि मानों संपूर्ण प्रकृति काम-लिप्त हो रही हो. रामकली अपने खेत में भैंसो के चारे के लिए सरसों के पत्ते तोड़ तोड़ कर इकट्ठा कर रही थी. उधर हरिया ना जाने कब से टकटकी लगाये उसे देख रहा था, रामकली इससे बेखबर अपने काम में मगन थी. रामकली का रूप लावण्य उसे मदमस्त बना रहा था. रामकली के सुर्ख रंग की तंग कुर्ती, घेरदार छींट का घाघरा उसके उपर पीत रंग की लुगड़ी से उसके रूप लावण्य छन छन कर सफेद धूप सा प्रतीत हो रहा था. उसके सुर्ख होंठों से गीत की निर्झर धारा भी प्रवाहित हो रही थी. उसके कंठ में कोयल थी, गीत में वाग्देवी थी. गीत का निश्छल, पुनीत और मर्मस्पर्शी था. पत्ते तोड़ने के साथ साथ गाये जाने वाला गीत का भाव था' हे ईश्वर, मुझसे जाने अनजाने में ऐसी क्या भूल हो गई जो मुझे मनचाहा पति नहीं मिला. क्या मैं इस विरह वेदना में ही जीवन काटूँगी?'

अचानक किसी का स्पर्श पाकर वह सीधी खड़ी हो गई. सामने हरिया अपने अधरों पर कामुक मुस्कान लिए खड़ा था. रामकली ने गर्दन झुका ली और आशिक्त नजरों से जमीन को कुरेदने लगी. इससे पहले हरिया से उसका इस तरह कभी सामना नहीं हुआ था.
'काफी दिनों से मैं तुमसे कुछ कहना चाह रहा था लेकिन हिम्मत नहीं हो रही थी.? हरिया ने मुख रामकली की ओर करके कहा.' ऐसी क्या बात है?' कहकर रामकली ने गर्दन झुका ली.
'मैं भाई के बारे में सब कुछ जानता हूँ, वह तुम्हारे लायक नहीं है.'
'सो मेरा भाग्य' रामकली ने नजरें झुकाये धीरे से कहा.
'तुम्हारी तो पूरी जिंदगी पड़ी है, यह कैसे कटेगी? सिर्फ भाग्य को कोसने से ही तो जिंदगी नहीं चलती.' हरिया ने दार्शनिक लहज़े में तीर छोड़ा

रामकली मन ही मन तड़प उठी. उसका मन चीत्कार कर उठा. वह कह उठा, मुझे तो अब ताउम्र अनपेक्षित दुखों की छाया में ही जीना है. यह सत्य है कि किसी की दुखती रग पर हाथ रखने की जो पीड़ा होती है वह असह्य होती है. रामकली का हृदय धक धक कर रहा था. उसने एक बार चारों ओर देख. जंगल की साँय-साँय करता शून्यांचल जैसे उसे निगल जाएगा. कनखियों से हरिया उसके रूप लावण्य को निहार रहा था. उसके रतनारे नेत्र पलकों के अवगुन्ठन में छिपे जा रहे थे. उसका आरक्त मुखमण्डल सूर्य के प्रकाश में द्विगुणित आभायुक्त हो रहा था. चूडियों की खनक हरिया के दिलो-दिमाग में काम लहरियाँ उत्पन्न कर रही थी. अंत में हरिया ने इस मौन को तोड़ते हुए कहा, 'मुझसे तुम्हारा ये दुख देखा नहीं जा रहा था इसलिए तुमसे बात करना चाह रहा था. अब तुम्हें सारी जिंदगी यूँ दुखों के सहारे छोड़ने किसी भले मानुष को शोभा नहीं देता. तुम्हारे प्रति मेरा कुछ भी फर्ज बनता है साथ ही हमारे घर की इज्जत का प्रश्न भी अहम है.' हरिया नम आँखें लिये याचक की भांति रामकली के सामने खड़ा था. रामकली ने अपनी लुगडी का पल्ला ठीक करते हुए एक बार तिर्यक नेत्रों से हरिया को देखा. नारी हृदय में कितनी कोमलता और निर्कलंकता होती है. उसका दिल अंदर ही अंदर पसीजने लगा और क्षणभर में ही उसके विचारों ने पलटा खाया. वह अब हरिया के बारे में न जाने क्या क्या गलत धारणाएँ बनाए बैठी थी. यह तो बहुत समझदार है जो मेरे दुख को अपना दुख मानता है. हरिया में पहली बार उसे अपनत्व की झलक नजर आई.
'अब यह सब सोचने से फायदा भी क्या है? ईश्वर ने जो मेरे भाग्य में लिखा है उसे भोगना ही मेरी नियति है. यह निर्प्राय है.' रामकली ने गहरी श्वाँस छोड़ते हुए कहा.
'यदि इस घर की इज्जत बचाना चाहती हो तो एक उपाय है.' हरिया कहते कहते रुक गया.
'मैं तो सदा यही चाहती हूँ कि मेरी वजह से इस घर को कभी आँच ना आये.'
'यह तभी संभव है जब.. ..'
'कब'
'जब मैं आजन्म कुँवारा रहूँ. अब हम दोनों मिलकर इस घर को चलायेंगे, हमें पति पत्नी की भांति रहना होगा. मैं सिर्फ तुम्हारी खातिर ही तो आजीवन कुँवारा रहने को तैयार हूँ. सिर्फ और सिर्फ तुम्हारे जीवन को सुखी बनाने के लिए. अब फैसला तुम्हारे हाथ है.' हरिया ने तरकस का आख़िरी तीर छोड़ा. कुछ देर ठहरे के पश्चात हरिया कुटिल मुश्कान अधरों पर लेकर चला गया. वह भी जल्द बाजी नहीं करना चाहता था क्योंकि रामकली की चुप्पी में उसे मौन स्वीकृति का आभास हो गया था.

रामकली इस प्रस्ताव को सुनकर सोचने को बाध्य हो गई. उसका मन कह रह रहा था कि क्या गलत कहा है हरिया ने? वह तो मेरे दुखों को अपने में समेटना चाहता है. रामकली को लग रहा था कि सपने नाच उठे हैं. एक साथ अनेक रंगों में, अनेक जन्मों के और अनेक मादक इच्छाओं के. लगता था यौवन महक उठा है पलाश बनकर झम-झम करता, गजरे महकाता और सावन गाता.

कुछ महिनों के बाद एक दिन भरोसी ने कहा कि घर में दूद-दही का अभाव है क्यों ना एक भैंस खरीद ली जाये. प्रत्युत्तर में हरिया ने कहा कि' परसों ही रामपुरा के रतन के यहाँ मैंने एक भैंस देखी थी. तुम एक बार जाकर देख आओ. मोल भाव मैं बाद में करवाकर ले आऊँगा.
'तो मैं आज ही चला जाता हूँ.'
भरोसी के जाने के बाद काफी दिनों में हरिया आज घर में अकेला था. आज उसकी हसरतों की संपूर्ण परिणति का स्वर्णिम अवसर था. आज उसके मन ही मन लड्डू फूट रहे थे. रह रह कर उसके बदन में हजारों बिजलियों का करंट दौड़ रहा था.

शाम को रामकली सारा कामकाज निपटाकर अपने कच्चे घर के आगे वाले छप्पर में लेटी हुई थी. उस दिन बड़ी उदास थी. काम समाप्ति पर आ रहा था. इधर उधर बादल के छोटे छोटे टुकड़े टालमटोल सी करते दिख रहे थे. शीघ्र पानी बरसने का कोई आसान न था. थोड़ी ही देर में हवा मंद मंद चलने लगी, परंतु बाहर आने वाले पसीने को ठंडा ना कर सकी. झोंपड़ी में खटिया पर रामकली लेटी हुई बीजणें से हवा कर रही थी. फिर भी पसीना झलक आता था. रामकली के मुँह पर चमचमा रहे स्वेद कण उसकी आभा को द्विगुणित कर रहे थे. इस दृश्य को हरिया बड़ी देर से झोंपड़ी के दरवाजे के एक छोर से निहार रहा था. हरिया दबे पाँव अंदर दाखिल हुआ और रामकली की खाट पर जा बैठा. उसे देखकर रामकली भी बैठ गई. थोड़ी देर सन्नाटा छाया रहा. दोनों के ही अंदर विचारों की तंद्रा अंगड़ाई ले रही थी. हरिया धीरे से अपना दाहिना हाथ रामकली की पीठ पर रखकर सहलाने लगा. रामकली निशब्द सी नजरें झुकाए बैठी रही.

जीवन का यह कैसा सतरंगी मोड़ था. हरिया की दृष्टि में रामकली के चेहरे पर थी. कैसा भावपूर्ण चेहरा है उसका. कितना निश्चल और कितना भोला. एकदम रक्ताभ. उसकी बड़ी बड़ी आँखें किसी फिल्मी अभिसारिका को परस्त करती नजर आ रही थी. उसके अधरों की लाली सम्मोहन मंत्र से कम न थी. हरिया ने उसकी सुडौल कमर को अपनी बाँहों के आगोश में ले लिया. रामकली घबरा कह उठी' यह क्या.'
'प्यार सिर्फ प्यार.'
'छोड़ो भी'
'देखते हो, आज स्वयं जीवन फाग बनकर नाच उठा है. कितना मादक है यह जादुई स्पर्श.' हरिया ने उसे अपनी बाँहों में कसते हुए कहा.
'कुछ तो सोचो. यहाँ कोई आ गया तो?'
'यहाँ कोई नहीं आयेगा, यहाँ आयेगा तो सिर्फ प्यार आयेगा, मधुमास आयेगा. आज पहली बार जीवन में यथार्थ से परिचय हो रहा है. तुम अभूतपूर्व सुंदरी हो. तुम्हारी देह का अंग-अंग तरासा हुआ है. इतने पास रहते हुए भी कभी इसका आभास नहीं हुआ.' मादकता की इस घड़ी में दोनों इतने डूब गये कि उन्हें पता ही नहीं चला की कब वे शरीर की सीमाओं को लांघकर एकाकार हो गये. इसके बाद तो वे दोनों दांपत्य की संपूर्णता में लीन हो गये. एक वर्ष के बाद रामकली ने एक बच्ची को जन्म दिया.

पुत्री के पैदा हाने से रामकली बहुत खुश थी. हरिया भी अपने अंश को देखकर खुश था. हरिया और रामकली की मुराद पूरी हुई थी. अत: उन्होंने इसका नाम मगनी रखा. वे उसे बड़े लाड प्यार से पाल-पोस रहे थे. अब उस घर का स्वामी हरिया ही था. और घर के सारे फैसले वही लिया करता था. हरिया स्वभाव से दन्दी-फन्दी तो था ही साथ ही जबान का बड़ा चटोरा था. रोज वह रामकली को अच्छे - अच्छे पकवान बनाने को कहता रहता था. उसके घर आये दिन खीर - पुए, चूरमा और अन्य पकवान बनना आम बात हो गई थी जबकि गाँव के अन्य लोग खेतों में उगे जंगली घास इत्यादि की सब्जी और रोटी से जीवन यापन करते थे. कुछ ही दिनों में हरिया की इस आदत ने उसे कर्ज के बोझ तले दबा दिया. इसका परिणाम यह हुआ कि उसने सारे खेत गिरवी रख दिये. अब उसके पास आमदनी का जरिया भी खत्म हो गया. सारा परिवार अभाव और जिल्लत की जिंदगी जीने को मजबूर हो गया. हरिया का शरारती दिमाग बड़ी उहापोह में था. वो भी इन सबसे पीछा छुड़ाना चाहता था.

ठंड जाने को थी, परंतु बसंत का आगमन नहीं हुआ था. संध्या होते ही घोर अंधकार छा गया. ठंडी हवा के झोंके ने तारों के धुँधलके को पोंछ दिया और वे चमचमा उठे. चने के खेतों से खार की सोंधी गंध आई और गेहूँ के खेतों से हरी बलों की हल्की हल्की महक. अरहर पक रही थी, गदरा रही थी और फूल झड़ने पर थे. पास के खेतों से उसकी खुशबू बीच बीच में हरिया के छप्पर में विचर जाती थी. हरिया अपनी खटिया पर लेटे लेटे किसी उधेड़ बुन में लगा हुआ था. सोचते-सोचते रात्रि का अंतिम प्रहर आ गया. वह खाट से उठा और दबे पाँव थैले में कुछ जरूरी सामान रखकर एक सकरी पगडण्डी से चल पड़ा. परिवार को असहाय अवस्था में छोड़कर वह गाँव से भाग गया. सुबह जब रामकली ने देखा कि हरिया कहीं नजर नहीं आ रहा तो उसने भरोसी को बताया. उसने गाँव में उसे सब जगह देखा परंतु व्यर्थ रहा. रामकली को समझते देर नहीं लगी कि हरिया उन सबको छोड़कर चला गया. सो रामकली अपनी दुधमुंही बच्ची और भरोसी के साथ अपने पीहर चली गई.

परिस्थितियाँ का फेर और समय का करिश्मा मनुष्य को कहाँ से कहाँ घसीट ले जाता है. क्या यह विविध का विधान है य मेरे पूर्वजन्मों का दण्ड? इस समय रामकली का मन बुद्धि से परे जाकर अपने ही अस्तित्व की पीड़ा से घुट रहा था. दिन महिने और साल बीते चले गये. रामकली अपने पीहर में रहकर अपनी बेटी का पालन पोषण कर रही थी. भरोसी अपनी ससुराल वालों की खेती के काम में हाथ बँटाता. उसे फसल होने पर खाने पीने की आवाज दे दिया जाता था. इस प्रकार वे अपना जीवन यापन कर रहे थे. पंद्रह वर्ष का लंबा समय गुजर गया परंतु हरिया ने उनकी कोई सुध नहीं ली और ना ही उसका कोई पता चला कि वह कहाँ है?

मगनी पंद्रह वर्ष की नवयौवना हो चुकी थी. उसके अंग प्रत्यंग में यौवन ने दस्तक दे दी थी. उसकी कजरारी आँखें और उन पर धनुषाकार बाँहें किसी कवि की कल्पना से कम न थे. उसकी सुराहीदार गर्दन मानों किसी संगतरास की वर्षों की मेहनत हो. उन्नत ललाट पर उभरी रेखाएँ ऐसा प्रतीत होती थी मानो साक्षात कामदेव मंत्रमुग्ध होकर सर्पों के साथ नृत्य की चरम परिणति पर हो. यौवन के परिचायक उसके रक्ताभ गाल किसी साधारण मनुष्य के लिए वशीकरण मंत्र से कम न था. कमल तक फैले स्याह घने बाल मदमस्त हाथी की अठखेलियों की तरह लापरवाह थे. जब वह हँसती थी उसकी सुडौल दंतावली ऐसी लगती थी मानों बिजली चमक रही हो.

रामकली दिन भर खेतों में काम करती, रात को मगनी के साथ अपने सुख दुख की बातें करती थी. बीच बीच में गुजरे स सालों की स्मृति उसके चित्तपटल पर उमड़ घुमड़ आती थी. उसे आज तक यह समझ नहीं आया कि आखिर हरिया ने उसके साथ ऐसा क्यों किया? अभी तक भी वह हरिया को अपने से अलग नहीं कर सकी थी. नारी मन की यही विवशता है. वह जब समर्पित होती है तो अपना सर्वस्व न्यौछावर कर देती है.

उधर हरिया गाँव छोड़कर कमाने के लिए किसी अनजान गंतव्य की ओर रवाना हो गया था. वह रेल में बैठा था. उसके बगल वाली सीट पर हरफूल नाम का व्यक्ति सफर कर रहा था. दोनों में बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ. हरफूल अहमदाबाद में समान ढोने की लारी मजदूरों का मुक़ादम था. हरिया की बातें से वह काफी प्रभावित हुआ. उसने हरिया को अपने पास काम देने की हाँ कर दी. हरिया की मुराद पूरी हो गई.

अहमदाबाद पहुँचकर हरिया ने लारी खींचने का काम शुरू कर दिया. उसकी वाक कला ने मुक़ादम को गहरा दोस्त बना दिया. उसने प्रसन्न होकर उसे लारी खींचने के बजाय मजदूरों का हिसाब किताब रखने का काम दे दिया. पैसे भी वह अब अच्छा कमाने लगा. अब खतका देहाती से शहरी बन गया था. धोती कुर्ता की जगह पेंट शर्ट और जूते ने उसके व्यक्तित्व को और भी निखार दिया. अच्छा खाना अच्छा पहनना उसके शुरू से ही शौक थे परंतु इन सबके बावजूद वह बचत भी कर लेता था. पिछले दस पंद्रह साल में उसने अच्छा पैसा इकट्ठा कर लिया था.

आज जब वह अपनी कोठरी में सोने की तैयारी कर रहा था तो अचानक उसके स्मृति पटल पर रामकली का प्रतिबिंब रह रह कर आने लगा. नींद उससे कोसों दूर चली गई. उसे मगनी की भी याद आने लगी. सोचने लगा कि अब तो मगनी काफी बड़ी हो गई होगी, परंतु मैं कितना निष्ठुर और बेशर्म हूँ कि उन्हें दयनीय स्थिति में छोड़कर भाग खड़ा हुआ. कौन सा मुँह लेकर अब उसके पास जाऊँ? रामकली ने मुझे अपना सब कुछ दिया लेकिन मैंने सिर्फ दुखों के अलावा उसे दिया ही क्या है? मैं सदा ही उसके रूप को प्यार करता था. मुझे बहुत जोश आता था, मैं उससे गुस्सा भी हो जाता था, पर उसे पास देखकर मैं जानवर का बच्चा सरीखा बन जाता था. मैं उसके बदन को देर तक सहलाता था. वह ऐसे हँसती थी जैसे उसकी खूबसूरती की ताकत उसे मालूम थी. उन दिनों मैं कटीला जवान था. मेरे बालों में सुगंधित तेल पड़ता था. सफेद कुर्ता और दुलंगी धोती मेरे व्यक्तित्व को असाधारण बना देती थी. मैं ताकत वर था, मुझे उसकी हमेशा चाहना रहती थी. मेरी सारी आग उसे छूकर बुझ जाती थी. इन्हीं विचारों में खोये हुए हरिया को पता ही नहीं चला कि कब सवेरा हो गया?

प्रात: हरफूल उसके पास आया, दोनों ने साथ साथ चाय पी. हरिया आज उदास और विचलित नजर आ रहा था. हर फूल ने इसका कारण जानना चाहा तो हरिया ने एक साँस में ही हृदय का सारा गुबार निकाल दिया. हरफूल काफी सुलझा आदमी था. उसने हरिया से कहा कि अब भी समय है तू जल्दी गाँव जाकर अपनी गिरवी जमीन छुड़वाकर दोबारा परिवार को बसा दे. हो सकता है कि तेरे कर्मों का प्रायश्चित हो जाये. यह सुनकर हरिया का अंतर्मन चीत्कार उठा. अब उससे एक पल भी यहाँ रूका नहीं जा रहा था. उसने पहली रेल से गाँव जाने का निश्चय कर लिया.

जाड़े की शाम. डूबते सूरज की किरणें बेरों के सुगंधित जंगल पर पड़कर नीम और पीपल के पेड़ों पर फिसल रही थी. और फिर कच्चे दगड़े का गाय-भैंसों के खुरे से उठी धूल पर आर पार हो जाने का प्रयत्न कर रही थी. चारों ओर ठण्डक थी. गाँव की शाम की जिंदगी, परेशानी सब धीरे धीरे उतरते अंधेरे में छिपती चली जा रही थी और चारों ओर लौटते पक्षियों का कलरव अंधेरे के पावों के नीचे तिरता-तिरता दबा जा रहा था. ठाकुर जी के मंदिर की घंटी की आवाज दूर दूर तक सुनाई दे रही थी. दूर बिजली बैलों की घण्टियाँ और भी एक सूनापन भर भर देती थी. इसी दगड़े से हरिया गाँव की पुरानी स्मृतियों से झूझता गाँव की तरफ सरपट चला जा रहा था.

गाँव में घुसते ही एक तिवारी पर कुछ लोग अघाणा जलाकर ताप रहे थे. वह तिवारी हरिया के भतीजों की थी. हरिया ने जाते ही सबको राम - राम किया. हरिया के पहनावे को देखकर एक बार तो उसे किसी ने भी नहीं पहचाना. पास ही खड़ी खाट पर हरिया बैठ गया. धीरे धीरे यह समाचार गाँव में आग की तरह फैल गया कि हरिया आ गया. काफी लोग इकट्ठे हो गये. हरिया ने धीरे - धीरे विगत पंद्रह वर्षों की आपबीती सुनाई. उसने कहा कि अब मैं सबको यहाँ लाना चाहता हूँ. सभी लोग खुश थे कि कम से कम देर से ही सही ये सही रास्ते पर तो आया. उसके भतीजों ने भी पुराने गिले-शिकवे भुलाकर उसे अपना लिया.

अगले दिन हरिया ने पंचों के सामने पैसे देकर अपने दो खेत छुड़वा लिये, बाकी दो खेतों का ब्याज इतना हो गया था कि उन्हें वह नहीं छुड़वा सका. कम से अब इन दो खेतों से बच्चों का भर पोषण तो कर ही लेगा. उसने अपनी पुरानी झोंपड़ी के स्थान पर पत्थर की पाटोड़ डलवाली. अब उसने निश्चय किया कि रामकली और भरोसी को वह कल जाकर ले आयेगा.

हरिया तेज गति से रामकली के पीहर की तरफ जा रहा था. रास्ते में वह भयभीत भी था कि क्या रामकली उसे माफ कर देगी? मैं उसे क्या जवाब दूँगा? उस समय वह घात प्रतिघातों से व्याकुल हो रहा था. दोपहर की आखिरी झिल्ली उतर आई है और भीतर से वही काली सी शाम निकल आई है. उसकी उदासी आज उसे काटे जा रह है. हरिया आज डूबा जा रहा है. सीधे उसने बाड़े में प्रवेश किया. सामने रामकली चूल्हे पर खाना बना रही थी. हरिया ठिठका. उसका साहस कहाँ चला गया. आज वह कितना दुर्बल हो गया है? वह झोपड़ी की आड़ में रामकली को देख रहा है. और उसकी आँखें आज उसको देखती रहना चाहती हैं. जैसे वह प्रकृति की किसी अनुपम सत्ता को देख रहा हो जिसका कहीं अंत नहीं पा रहा है. हिम्मत कर हरिया रामकली की ओर चला आया. दोनों की नजरें मिली. रामकली अवाक सी उसे देखे जा रही थी. रामकली के लंबे लंबे लगने वाले नेत्र उसको देख रहे हैं, बाहर हवा पर तैरता अंधेरा नहीं रहा, वह सब उसकी पुतलियों में आकर इकट्ठा हो गया. आज बूझता हुआ दीपक जैसे अपनी लौ के अंतिम दीप्ति में आलोक का समस्त विगत इतिहास फिर से अंधकार पर लिख जाना चाहता है. इस पूर्ण शांति में निर्द्वंद्व आकाश की भांति पवित्र सम्मोहन है, जिसमें समस्त अतीत की प्रेम स्मृतियाँ अब इंद्र धनुष की भांति निकल आई हैं. इस मौन को तोड़ते हुए रामकली के भाई ने प्रवेश किया. उसने हरिया को प्रश्न भरी नजरों से देखा. शाम को खाना खाने के बाद हरिया पर प्रश्नों की बौछार होने लगी. सभी हरिया को दोषी ठहरा रहे थे. स्थिति की नजाकत को देखते हुए हरिया ने रामकली, भरोसी और बाकी रिश्तेदारों से क्षमा याचना की. हरिया कहने लगा,' शाम का भूला सुबह घर आ गया तो उसे माफ कर दिया जाता है. अब मैंने जमीन भी छुड़वा ली है और घर भी बनवा लिया है. जिंदगी भर अब मैं भाई और भाभी की सेवा में ही गुजारूँगा. शायद मेरे पाप कुछ कम हो जायें.' गहरी निश्वास के साथ हरिया ने गर्दन झुका ली.

सभी को हरिया की बातों ने रिरुत्तर कर दिया था. समय और भाग्य का दुश्चक्र समझकर पिछली बातों पर पर्दा डाल दिया तथा रामकली, मगनी और भरोसी को वापस हरिया के साथ भेजने का निर्णय लिया गया. मगनी भी अपने गाँव जाने की बात सुनकर प्रसन्न हो गई. अगले दिन खुशी खुशी सभी अपने गाँव आ गये और भावी जिंदगी के ताने बाने बुनने लगे.

अगले दिन पाटौड के सामने वाले छप्पर में बैठे हरिया ने मगनी को अपने पास बुलाया. स्नेह से उसके माथे पर हाथ फेरा. उस स्पर्श में अपनत्व का सागर मगनी के कोमल हृदय में हिलोरें मारने लगा. काफी देर तक दोनों के बीच बात होती रही. इतने में रामकली भी वहाँ आ गई. हरिया ने मगनी को अपने बगल में बिठा रखा था. 'इस बिटिया की शादी किसी अच्छी जगह बड़ी धूमधाम से करूँगा. कल से ही अब इसके रिश्ते के लिए हाथ पैर मारूँगा तब कहीं अगले साल तक बात बन सकेगी.' हरिया के मुख पर गर्व पूर्ण मुस्कान थी. रामकली का हृदय गदगद हो गया. अब धीरे धीरे उसके जेहन में दोबारा यह बात बैठने लगी कि हरिया को अपनी गलती का अहसास हो गया है और घर की सारी जिम्मेदारी के प्रति चिंतित है.

इस बार हरिया ने अपने दोनों खेतों के साथ दो खेत बटाई पर भी कर लिये. सभी खेतों में फसल इस बात अच्छी थी. सभी का परिश्रम इस बार रंग लाया. बाजरा, ज्वार, उड़द और मूँगफली की भरपूर फसल से इस घर के सभी सदस्यों के चेहरे पर एक अजीब सी खुशी थी. रामकली अब प्रसन्न थी. हरिया से उसे कोई शिकायत नहीं रही.

बैसाख का महीना पूरे उठान पर था. गाँव के सभी लोग अपने अपने खलिहानों में व्यस्त थे. हरिया ने भी आज दिन पर अनाज बरसाया था. शाम को रखवाली के लिए उसे खलिहान में ही सोना था. रात हो गई थी गहरी और गहरी. गरम हवा रूक रूक कर चल रही थी. हरिया गेहूँ के बूकड़ा के पास ही खाट पर लेटा हुआ कुछ सोच रहा था. तभी उसने किसी के पदचापों की आवाज सुनी. वह चौंककर उठ बैठा.
'कौन'?
'मैं हूँ ब्यालू लेकर आई हूँ' रामकली ने कहा.
उस आवाहन का सामीप्य हरिया के तार तार को छू गया. उस निकटता से हरिया के शरीर में झुरझुरी पैदा कर दी.
'खाना खालो आज तो दिन भर बहुत काम किया है'
हरिया खाना खाने लगा. रामकली जग भर दूध भी लाई थी. खाना खाने के बाद हरिया ने रामकली से कहा' ये दूध तू पी ले. तुमने भी आज बहुत काम किया है.'
'नहीं खास तेरे लिए घी मिलाकर लाई हूँ, गुड भी साथ में है. सारी थकान उतर जायेगी.'
'रामकली आज मेरी इच्छा है तेरे सामने फूट फूट कर रोऊँ. तुझे मैंने बहुत दुख दिये हैं और सचमुच हरिया की आँखों में आँसू बह निकले.
'ये आँसू मजबूरी के हैं या प्यार के? ये किसके हैं, तेरे या मेरे?'
'तेरे हैं रामकली.' हरिया ने रामकली का हाथ पकड़ते हुए कहा.
'तू मरद होकर रोता है बावले. तू ही हिम्मत हार जायेगा तो मैं किसका सहारा लूँगी? मैं तो औरत जात ठहरी. मेरी तो हिम्मत ही कितनी सी है.' रामकली ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा.

हरिया का मन घुमड़ आया था. आज बहुत दिनों में फिर रामकली उसके पास आई थी. दोनों की दूरियाँ खत्म हुईं और फिर एक हो गये. आज दूरी की डांगर टूट गई थी. आज दोनों का प्यार उस गेहूँ की तरह से निकल आया था, जो बैलों के खुरों से दांय से चिर चिरकर उपर की जाली फाड़ कर निकल आता है. आज दोनों के प्यार रूपी बूकड़ा से तुड़ा अलग, गेहूँ अलग हो गया था.

समय ने करवट ली. इनकी गृहस्थी दोबारा समय के भवर जाल से निकल कर सरपट दौड़ने लगी. आर्थिक रूप से भी यह परिवार अब उबरने लगा. कुछ ही दिन पश्चात इस आंगन से एक और किलकारी गूँजी. रामकली ने एक सुंदर लड़के को जन्म दिया. उस बच्चे का नाम प्यार से रामू रखा.

अंधेरी रात का सन्नाटा नीम के पत्तों से खेल रहा था. यह नीम बहुत पुराना था जो हरिया के छप्पर के पीछे बाड़े में खड़ा था. पास में ही कण्डों का बिटौरा था जिस पर चित्र बने हुए थे ताकि कोई कण्डों को चुरा न ले. इसके बगल में ही घूड़ा था जिसके बगल से एक छोटी पगडण्डी खेतों की ओर जाती थी. रात के इस सन्नाटे में उस पगडंडी से एक परछाई नीम की तरफ बढ़ रही है. वह नीम की जड़ों के पास जाकर रूक जाती है. उसी समय नीम की जड़ों में पहले से ही एक परछाई बैठी हुई है. दोनों नीम की जड़ों के उपर बैठ गये और आलिंगन बद्ध हो गये. दोनों में बात शुरू हुई.
'अब मुझसे तुम्हारे बिना नहीं रहा जाता अमर सिंह, तुम रोज यही आ जाया करो.'
'नहीं मगनी, रोज तो मुमकिन नहीं है. किसी दिन घरवालों ने देख लिया तो कहीं के नहीं रहेंगे.'
'यह तो ठीक है, लेकिन मेरा मन हमेशा तुमसे मिलने को बेचैन रहता है. तुम्हें मेरी कसम, रोज मिलने का वादा करो. मगनी धीरे से फुसफुसाई.
'मगनी तुम बहुत भोली हो, दुनियादारी नहीं समझती हो, हमें बहुत होशियारी से काम लेना है, क्योंकि प्रेम की राह में फूल नहीं काँटे बिछे होते हैं.'
'कांटों से मैं नहीं डरती, मैं तो तुम्हारे लिये धधकते अंगारों पर भी चल सकती हूँ.
'यह सत्य है मगनी कि हमारा प्रेम, हमारी समस्त भावनायें, सब पर समाज का भीषण अंकुश है. हमने ही अपनी स्वतंत्रता को मिटाया है ताकि हम अपनी स्वतंत्रता भाग सकें. यही तो समाज का नियम है.' कहते कहते अमर सिंह ने बाँहों का बंधन और कस दिया.

अमर सिंह मोम की तरह पिघलने लगा. उसने मगनी के रक्तिम अधरों पर चुंबनों की झड़ी लगा दी. उनकी तंद्रा तब टूटी जब दूर खेत से कुछ कुत्तों के सियारों के पीछे भागने की आवाजें आने लगीं. दोनो उठे और अपने अपने घरों की ओर चल दिये. हरिया छप्पर के भीतर रामकली से कह रहा था कि जयसिंहपुरा गाँव में कल एक लड़का देखकर आया हूँ. खेती बाड़ी भी अच्छी है और सीधे लोग हैं. मगनी के लिए यह रिश्ता ठीक रहेगा. झोपड़ी के बाहर बने चूल्हे पर मगनी कंडे सुलगा रही थी. इनकी बातों को वह बड़े ही ध्यान से सुन रही थी. 'लड़के का नाम मगन है. देखने में सीधा है. मैंने बात भी चलाई थी रिश्ते की. वो लोग राजी हैं.' हुक्का गुड़गुड़ाते हरिया ने सारी बात रामकली को बताई.
'फिर तो ठीक है, एक बार तुम्हारे भाई से चर्चा कर लो. और कल ही तुम वहाँ जाकर बात पक्की कर दो.' रामकली ने खुश होते हुए कहा.

मगनी की साँसें उखड़ रही थीं. विचित्र भाव से उसके चेहरे पर आ जा रहे थे. मगनी की ये उलझन की घड़ियाँ निसंदेह कठिन थी. वह घात प्रतिघातों में किस प्रकार व्याकुल थी. वह आसक्ति भरी थी जिसने अमर सिंह के समस्त गुणों को अपने में बसा लिया था. मगनी के हृदय में अशांति थी और बहुत ऊँचे कगार की जड़ में बार - बार पानी आकर टकरा रहो हो. बिखर जाता हो, फिर टकरा जाता हो. मगनी यौवन की अबाध उच्छृंखलता पर थी, परंतु उसका वह खोलता पानी बर्फ की तरह जम गया था.

अगले दिन हरिया और मूलचंद जयसिंह पुरा पहुँच गये. बातचीत के बाद रिश्ता पक्का कर दिया. शादी जेठ के महीने तय कर दी गई. विस्तार से शादी का सारा कार्यक्रम तय कर दोनों भाई वापस गाँव लौट आये.
गाँव से पश्चिम दिशा की तरफ से एक दगरा पहाड़ की तरफ जाता है. गाँव के सारे पशुओं को चराने के लिए इसी पहाड़ से ले जाते हैं. आज मगनी भैंसों को चराने के लिए इसी दगरे से जा रही थी. रविवार का दिन था सो अमर सिंह की भी छुट्टी थी. घरवालों ने उसे भी भैंस चराने के लिए भेज दिया. पहाड़ के नीचे बालू के बड़े बड़े खड्डे हैं जिन पर गाँव वाले पशुओं को चराते हैं. मगनी एक ऊँचे टीले पर बैठी थी. इतने में अमर सिंह भी आ गया.

आज मगनी की आँखों में उदासी दीख रही थी. और फिर उनमें एक प्यार था, प्यार जिसमें एक आस थी. आज वह कुछ बदली सी लग रही थी. अमर सिंह ने उसे देखा. वह मुस्कुराई फिर उदास हो गई.
'बोलती क्यों नहीं'
'अमर सिंह.. .. ...' गहरी निश्वास के साथ मगनी ने कहा और उसकी दोनों आँखें डबडबा आईं.
'क्या बात है'
'मैं क्या करूँ?' मगनी ने कहा. वह जैसे बहुत ज्यादा थक गई हो. वह सोच में पड़ी हुई भूली सी दूर देखती रही. हठात उसमें एक विश्वास सा जागा. उसने सिर उठाया. उसके मुख पर एक चमक आ गई थी. मगनी ने अमर सिंह के कंधे पर हाथ रखकर कहा -
'मुझे अपने साथ ले के चलेगा.'
'कहाँ ?'
'यहाँ से कहीं बहुत दूर. जहाँ तुम्हारे और मेरे सिवा कोई ना हो.'
'मगर क्यों?' अमर सिंह ने विस्मित स्वर में कहा.
'घरवाले मेरी शादी तय कर रहे हैं. मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकती.
अमर सिंह अवाक सा उसकी तरफ देखता रहा.
'नहीं मगनी, यह सब इतना आसान नहीं जितना तू सोच रही है. तू मेरी बात मान कर शादी कर ले. तेरे घरवाले तेरे भले के लिए ही तो कह रहे हैं. हम दोनों एक ही गाँव के हैं. समाज की नजरों में इस तरह के रिश्तों को मान्यता नहीं दी जाती. मैंने हमेशा तेरी खुशी चाही है, अब मैं तेरी खुशी के लिए ही तुझसे प्रार्थना करता हूँ. तू घरवालों की मर्जी से शादी कर घर बसालो.' अमर के मुख पर गंभीरता छा गई.
'ये मुमकिन नहीं. मैंने सिर्फ और सिर्फ तुमसे प्यार की है.'
'हमारा प्यार तो आत्मा का प्यार है. ये शरीर रूपी दीवार एक दिन गिरेगी, फिर हम एक हो जाएंगे.' हमर सिंह कहते कहते एक झटके से खड़ा हुआ और गाँव की तरफ चल दिया. उसने निश्चय कर लिया कि अब मगनी का भला इसी में है कि मैं उससे मिलना जुलना छोड़ दूँ ताकि वह शादी के लिए राजी हो जाये.

जेठ की दामी तिथि का दिन. सूर्य की प्रचंडता सुबह से ही बढ़ रही थी. गाँव के चारों ओर खाली खेतों पर सूर्य की गरम किरणों का साम्राज्य था. अधिकतर लोग इन दिनों में अपने छप्पर य नीम, पीपल के पेड़ के नीचे खाट डालकर दुपहरी काटते हैं. इन दिनों में गाँव वाले पूरी तरह खाली होते हैं. फसल बैसाख से ही तैयार हो जाती है. इसीलिए गाँववाले इस मौसम में ही शादी ब्याह करते हैं. आज मगनी का ब्याह है. हरिया के नीम के नीचे हलवाई बरात के लिए लड्डू, जलेबी बना रहा है. सभी रिश्तेदार बरात की तैयारी के लिए भागा दौड़ी कर रहे हैं. औरतें ऊँचे स्वर में गीत गा रही हैं. मगनी उनमने मन से अपने हाथों में लगी मेंहदी को सुखा रही है. इतने में रामकली उधर आ गई. उसने मगनी की सहेलियों से कहा -
'बारात आने का समय हो गया है.'
सभी लड़कियों ने मगनी को उबटन लगाना शुरू किया. साथ साथ गीत भी गा रही थी. बीच बीच में मगनी को छेड़ भी रही थी थीं.

बिशन खवास ने आकर बताया कि बारात गाँव के स्कूल में पहुँच गई है. गाँव के बुजुर्गों ने जाकर बारात का स्वागत एवं कुछ पारंपरिक नेग किये. मिलनी और थांई का नेग सम्पन्न हुआ. छोटे बच्चे हाथ में जग लेकर बारात को ठंडाई पिला रहे थे.

अगले दिन धूमधाम से मगनी की विदाई की. रामकली की तो आँखों से गंगा जमुना फूट रही थी. इस करूण दृश्य को देखकर आसपास खड़ी औरतों की भी आँखें नम थीं. मगनी को दूल्हे के साथ गाड़ी में बिठा दिया गया. दुल्हन को देखकर ससुराल की सभी औरतें खुश थीं. सभी उसके रूप सौंदर्य की बड़ाई कर रही थीं. रात्रि को वह घड़ी आई जिसका हर जोड़े को इंतजार रहता है. मगनी उनमने मन से कच्चे घर में बैठी हुई थी. उसको रह रह कर अमर की याद आ रही थी.

शादी को दो महीने से उपर हो गया था. मगनी अपने ससुराल में उदास सी रहती थी. एक दिन हरिया उसे लेने आ गया. वापिस आते वक्त रास्ते में हरिया ने उसकी ससुराल के बारे में पूछ तो मगनी ने कहा कि वहाँ वो बिल्कुल खुश नहीं है. उसका पति उसके मेल का नहीं है. एक बार तो हरिया सोच में पड़ गया. उसके कांईयाँ दिमाग में उथल पुथल होने लगी. उसने मगनी से कहा -' यदि तू वहाँ खुश नहीं है तो तुझे दूसरी जगह भेज दूँ. एक जगह मैंने लड़का देख रखा है. अच्छी जमीन जायदाद का मालिक है. तुझे खुश रखेगा. राज करेगी तू वहाँ. यहाँ थोड़े दिन हल्ला होगा बाद में सब कुछ ठीक हो जाएगा.' हरिया ने बड़ी ही चतुराई से मगनी के दिमाग में यह बात बिठा दी. मगनी भी इसके लिए राजी हो गई. मगनी को दूसरी जगह भेजने के पीछे हरिया का मकसद था कि उसके बदले उसे अच्छी रकम मिल जायेगी. उसे मगनी के सुख से कोई लेना देना नहीं था.

अगले दिन हरिया बिना कुछ बताए उसी जुगाड़ में चला गया. उसने एक गाँव में जाकर मगनी की बात पक्की कर दी. एक अधेड़ आयु के व्यक्ति से उसे दस हजार रूपये लेकर मगनी को उसके साथ भेजने की हाँ कर दी. उस व्यक्ति का नाम दीन दयाल था लेकिन गाँव में उसे लोग दूनी के नाम से पुकारते थे. हरिया पैसे लेकर वापस गाँव आ गया. दो तीन दिन बाद मगनी को चुपचाप उसके साथ रात में भेज दिया. गाँव में किसी को कानों कान खबर नहीं हुई. लोगों ने सोचा मगनी दुबारा अपनी ससुराल चली गई सो किसी को कोई अंदेशा भी नहीं हुआ. कुछ दिन बाद मगनी को लेने जगन आया. हरिया ने उसे खूब खरी खोटी सुनाई. 'तू हमारी लड़की के काबिल ही नहीं है. तू नामर्द है. तेरे जैसे के साथ मगनी की जिंदगी बर्बाद हो गई. अब कभी हम उसे तेरे साथ नहीं भेजेंगे. चला जा यहाँ से, फिर कभी इधर मत आना.'

बेचारा जगन हरिया के छल कपट को न समझ पाया. वो वापिस अपने गाँव को चल दिया. पड़ोस की एक औरत ने जगन को बताया कि मगनी को काफी दिनों से यहाँ नहीं है. ये लोग कह रहे थे कि वो तो दोबारा अपनी ससुराल चली गई. सुनकर जगन के मन में हलचल होने लगी. वो सीधा अपने गाँव गया और लोगों को इकट्ठा कर सारी बात बताई. गाँव के बुजुर्गों को समझते देर न लगी कि मगनी को जरूर किसी दूसरे के साथ नाता कर भेज दिया गया है. अब तय ये हुआ कि जल्दी हरिया के गाँव में जाकर पंचायत बुलायी जाए.

हरिया के घर मगनी के ससुराल वाले आकर बैठ गये. गाँव वालों को भी उन्होंने इकट्ठा कर लिया. हरिया से इस बारे में पूछा गया तो वह टाल मटोल करने लगा. गाँव वालों ने जब सख्ती की तो उसने बताया कि मगनी जगन के साथ खुश नहीं थी. तो उसने उसका नाता दूसरी जगह कर उसे वहाँ भेज दिया. गाँव वालों ने मगनी की ससुराल वालों से कहा कि हरिया दोषी है. इसे पकड़ ले जाओ और तुम्हारी जो इच्छा है वो करो.

जगन के गाँव वालों ने हरिया को पकड़ लिया. उसे अपने गाँव ले गये. वहाँ लोगों ने उसकी जब पिटाई की तो वह कहने लगा कि दो दिन का वक्त दो. मैं मगनी को लेकर तुम्हारे हवाले कर दूँगा. किसी को उसकी बात पर विश्वास नहीं था सो उसके गाँव से उसके भतीजे किसन को बुलवाया गया. किसन के आते ही हरिया से पूछा - तूने हमारी नाक तो कटवा ही दी साथ ही मगनी की जिंदगी भी खराब कर दी. अब तुम मुझे साफ साफ बताओ मगनी कहाँ है ताकि मैं जाकर उसे ले आऊँ. मगनी जेतपुर के खिलारी के घर है. तुम दस हजार रूपये का कहीं से भी इंतजार कर ले जाओ तो तभी मगनी को तुम्हारे साथ भेजेगा.' हरिया ने नीची गर्दन करके कहा. किसन ने अपने साथ गाँव में हजारी को साथ लिया. हजारी ने दस हजार रूपये का इंतजाम कर उसे दे दिये. दोनों जेतपुर पहुँचे.

खिलारी का घर जेतपुर गाँव में घुसते ही तीसरे नंबर का था. घर क्या था एक झोपड़ था. झोपड़े में दो हिस्से थे. एक हिस्से में खिलारी रहता था तथा दूसरे हिस्से में वो अपने पंद्रह बकरियों को बाँधता था. आगे खुली जगह थी. चारों ओर कटीली लकड़ियों की बाड़ लगा रखी थी. मगनी झोपड़े के आगे बर्तन साफ कर रही थी. किसन और हजारी को आया देखकर वह फूट फूट कर रोने लगी. उसने बताया कि - काका हरिया ने मुझे यहाँ फँसाया है. उसने मुझे कहा था कि लड़का बहुत सुंदर है, पैसे वाला है. भाई मुझे किसी भी तरह यहाँ से निकालो.' मगनी के चेहरे पर घबराहट और पश्चाताप झलक रहा था.

थोड़ी देर बाद खिलारी भी वहाँ आ गया. वो निहायत एक गरीब ग्वाला था. उसने कुछ अपनी बकरी बेचकर तो कुछ उधार लेकर हरिया को दस हजार रूपये दिये थे. मगनी को लाने के चक्कर में उसने अपनी उपर अपनी हैसियत से ज्यादा खर्च कर लिया. उसने आते ही राम राम कर दोनों से आने का कारण पूछा. हजारी ने बात की शुरूआत की - '.. ... देख भाई खिलारी, मगनी की ससुराल वालों ने हमारे गाँव में आकर पंचायत करवाई थी. वो लोग बहुत गुस्से में हैं. सारा गाँव एक ही मांग कर रहा है कि तुझसे झगड़े के बदले पच्चीस हजार रूपये लेंगे नहीं तो तुम्हारे गाँव में या तुम्हारे किसी रिश्तेदार की लड़की को उठा ले जायेंगे.' हजारी की बात सुनकर खिलारी के माथे पर चिंता की लकीर उभरने लगी.

'मेरे पास तो फूटी कौड़ी भी नहीं है. पहले ही मैं कर्जे के नीचे दबा पड़ा हूँ. हरिया ने मुझसे कहा था कि मगनी की ससुराल वालों से वो अपने आप निपट लेगा.' खिलारी के स्वर में निराशा थी. 'हरिया को उन लोगों ने बंदी बना रखा था. तुम्हारी भलाई इसी में है कि मगनी को हमारे साथ भेज कर अपने सिर से ये आफत टाल दो.' किशन ने दार्शनिक लहजे में कहा.
'मगर मैं तो हरिया को दस हजार दे चुका हूँ और वो भी कर्ज लेकर. भाई मैं तो पहले ही बहुत परेशान हूँ. मुझे मेरे दस हजार रूपये दिलवा दो और इस आफत को ले जाओ.' खिलारी बहुत परेशान दिखाई दे रहा था. किशन ने मौके की नजाकत को देखते हए अपनी जेब से दस हजार रूपये निकालकर खिलारी को थमा दिये.

दोनों ने मगनी को साथ लिया और साँझ तक जगन के गाँव पहुँच गये. मगनी को जगन के हवाले कर हरिया को छुड़वाया. हरिया गाँव में मुँह दिखाने लायक तो था नहीं सो वह रास्ते में रूक गया. हजारी और किसन दोनों अपने गाँव आ गये.

उधर मगनी के आते ही गाँव के पंच जगन के घर पर इकट्ठे होने लगे. चारों ओर से आवाज आ रही थी कि मगनी ने गाँव की नाक कटवा दी है सो इसे इसका दंड मिलना चाहिए ताकि कोई और औरत ऐसा करने से पहले दस बार सोचे. गाँव के पंच रामसुखा ने कहा -' मगनी ने हवस के लिए यह कदम उठाया था सो इसकी हवस का इलाज किया जाये.' गाँव के मनचलों को तो इशारे की देर थी सो वे जगन के घर में घुस गये. मगनी के साथ सार्वजनिक रूप से कुकृत्य किया गया. किसी ने इसका विरोध नहीं किया. मगनी चीखती चिल्लाती रही मगर बहरों की बस्ती में उसकी किसी ने पुकार नहीं सुनी. आज मगनी एक बुझे दीपक की भांति अपना अस्तित्व खोकर मौन हो गई. हरिया के षडयंत्रों की सजा आज मगनी को मिल रही है. जगन भी गाँव वालों के आगे लाचार और मजबूर दीन हीन सा कुछ भी नहीं कर सका. इसके बाद भी मगनी को उसने अपना लिया. उसने निश्चय किया कि अब वो इस गाँव में नहीं रहेगा.

कुछ दिन बाद जगन ने वो गाँव छोड़ दिया. सब कुछ बेचकर वो वहाँ से दस कोस दूर एक कस्बे में एक मकान खरीद कर वहाँ दूध का धंधा करने लग गया. ससुराल से तिरस्कृत होकर मगनी नई जगह आ गई.

उन दिनों उसके मन में भयंकर उद्वेग और भीषण क्रांति मची हुई थी. वह भयंकर उत्तेजना के उत्ताप में रात भर जलती रहती. उसका सब कुछ लुट चुका था. अब केवल उसका जीवन नीरस था जो उसे बार-बार तड़पा कर व्याकुल कर देता था. अक्सर मगनी रात को अतीत को याद कर व्याकुल हो जाती थी. वो भयंकर आंतरिक पीड़ा का अनुभव करती हुई रो पड़ती थी. नसें फड़क उठती, हृदय तथा मस्तिष्क, ऐसा प्रतीत होता जैसे मांस और पेशियाँ फट रही हों. पीड़ा की उन्मुक्त अवस्था में उसे आत्महत्या करने की घोर आकांक्षा होने लगती. पीड़ा के इन क्षणों में उसके मुँह से सदैव हरिया के लिए गाली और बद्दुआ ही निकलती थी. एक दिन खबर आई की हरिया तेज बुख़ार के कारण मर गया. इस समाचार से मगनी का अंतरमन खुश था. वो उसके मातम के लिए बिल्कुल नहीं गई. हालाँकि जगन ने उसे जाने को कह भी दिया.

आज पूरे दस साल बाद पहली बार मगनी ने अपने पीहर में कदम रखा है. उसे हरिया ने किसी के आगे मुँह दिखाने लायक छोड़ा ही कहा था. जब से वो आई है घर के अंदर ही रो रही है. अपने विगत 15 सालों के भंवर जाल में डूबी मगनी की आँखें रो रो कर लाल हो रही हैं. उसे रह रह कर विपत्ति और दुष्चक्र के वे पिछले क्षण याद आ रहे हैं जो उसकी जिंदगी में कभी ना मिटने वाला कलंक लगा गये. विचारों की इसी तन्द्रा में वो अपने अतीत में खो गई. उसके स्मृति पटल पर बचपन की सुनहरी यादें चलचित्र की भांति तैरने लगी और अनायास ही उसके चेहरे पर खुशी की एक पतली सी रेखा दौड़ गई. किसी तरह समझाने के बाद मगनी शाम को घर से बाहर निकल कर जंगल की ओर गई.

रास्ते में अमर से उसका सामना हुआ. दोनों स्तब्ध थे. मगनी की आँखें डबडबा रही थी. दोनों काफी देर तक एक टक रखते रहे. दोनों एक दूसरे को करुण भाव से देख रहे थे. मगनी आंतरिक ज्वाला से उत्तप्त हो उठी. चेष्टा करने पर भी वह अमर के सम्मुख कुछ न कह सकी. मगनी के मन के भाव आंसु बनकर निकल रहे थे. अमर आश्चर्य और करुण दृष्टि से उसे अपलक देखे जा रहा था. मगनी का वो करुण उद्द्वेग धीरे धीरे सिसकियों में बदल गया.

© 2009 Vijay Singh Meena; Licensee Argalaa Magazine.

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