अर्गला

इक्कीसवीं सदी की जनसंवेदना एवं हिन्दी साहित्य की पत्रिका

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गीत माधुर्य

मनोज कुमार मनोज

कामिनियों की जल क्रीड़ा

शुभ्र चाँदनी से ज्योतित है, नदिया की निर्मल धारा.
कामिनियों की जल- क्रीड़ा से चंचल जल मानो पारा.

रजनी-बाला मुस्काती है, देख लहरियों का नर्तन
झाँक रहा है अंग-अंग से नदिया सा पावन यौवन
निर्वसना धारा सिकता- तटा की बाहों में सो जाए
जैसे नई-नवेली दुलहिन पिय साँसों में खो जाए

घूम रहा है पर्वत-पर्वत चन्दा जैसे बनजारा
कामिनियों की जल- क्रीड़ा से चंचल जल मानो पारा.

कल-कल छल-छल हलचल करती, चलती है सरिता बाला
पेड़ों की काली छाया है, मानो तन का तिल काला
धवल चाँदनी में देखा, उसके नवल उरोजों को
आँखें करनी पड़ी बंद तब, तट पर उगे सरोजों को

घाटी के पीछे जा बैठा निर्वासित सा अँधियारा
कामिनियों की जल- क्रीड़ा से चंचल जल मानो पारा.

अम्बर से तारावलियाँ ज्यों उतरी हों मझधारों में
दीपों की उल्काओं से है आग लगी अँधियारों में
तरुवर लतिका चूम रहे हैं उसकी कोमल सी काया
आसमान झुक चरण दबाने क्षितिज छोर पर है आया

ये छवि ही जीवन का रस, हर टूटे मन का इकतारा
कामिनियों की जल- क्रीड़ा से चंचल जल मानो पारा.

प्रिये! अब नींद नहीं आती

प्रिये! अब नींद नहीं आती
उर में उठती नई तपन हैं
अभिलाषाएँ हुई मगन हैं
जेठ मास-सा जीवन अपना,
तप्त रेत है जलता सपना

स्वार्थ हृदय में जाग रहे हैं, सुलग रही जीवन-बाती.
प्रिये! अब नींद नहीं आती

काली नागिन रात अँधेरी
विष-दाहों की पीर घनेरी
बैरागी-सा तन-मन मेरा
खोज रहा है किसका डेरा

आँधी तूफाँ रहे डराते, फिर भी याद नहीं जाती.
प्रिये! अब नींद नहीं आती

मेरे मीत लौट कर आना
आकर मुझसे प्रीत लगाना
आँख खुली है जब से मेरी,
राह देखता हूँ नित तेरी

मन के द्वार खोलकर बैठा, आने की लिख दो पाती,
प्रिये! अब नींद नहीं आती

जीवन की नदिया के टट से
लहरों के उस घूँघट-पट से
तेरी ही छवि रहा देखता,
उस चितवन को रहा तरसता.

ऋताम्भरा के मोह-जाल में, तेरी ही मूरत भाती
प्रिये! अब नींद नहीं आती

मेरा अन्तस रहा तड़पता,
बरबस तन में प्राण खनकता
कितनी मैंने टेर लगाई,
क्या तुझको कुछ याद न आई

मेरी चेतनता स्वप्निल-सी, जीवन की कजरी गाती
प्रिये! अब नींद नहीं आती

भोर समय जब सूरज झाँके

भोर समय जब सूरज झाँके, आसमान की कोर से
तब सुधियों के सागर में लहरें उठती हर छोर से

चिड़िया गाती सलोने याद तुम्हारी आती है
मन के कोने में नूपुर की रुनझुन ध्वनि आ जाती है
आसमान में घिरी घटा जब यहाँ -वहाँ मँडराती है
सारे जग का दर्द समेटे, गीत विरह के गाती है

जब किरणें अटखेली करती फूलों के चितचोर से
तब सुधियों के सागर में लहरें उठती हर छोर से

मन-आँगन में ठुमक-ठुमक कर कौन नृत्य-सा करता है
स्वप्निल रंग से कौन चितेरा जीवन में रंग भरता है
कौन थपकियाँ देकर मुझको जीवन भर सहलाता है?
और अंत में तन-मन मेरा चिर-निद्रा को पाता है

प्रक्रिति-नटी जब सहलाती है, कोमल-कोमल पोर से
तब सुधियों के सागर में लहरें उठती हर छोर से

एक रुपहली यादगार का सदा बना उपमान रहा,
सब-कुछ मैंने जुटा लिया है, फिर भी मन वीरान रहा,
मैंने तेरा गेह न जाना, जब तक तन में प्राण रहा,
कस्तूरी हिरन जैसा मैं, जीवन-भर अनजान रहा

जब मेरा मन बँध जाता है, तेरे मन की डोर से
तब सुधियों के सागर में लहरें उठती हर छोर से

प्यार मेरे ये बता

प्यार मेरे ये बता इस पीर को कैसे छुपाऊँ

तुम गए परदेश क्या, मन-छंद सब रोने लगे
इस धरा के सब प्रलोभन, हर दिवस बौने लगे
कल्पनाएँ मौन हो कुछ, कह रही हैं प्राण से
अनमना सा मन हुआ है, हर्ष के अवसान से
दर्द के दर्पण नयन का नीर अब कैसे छुपाऊँ
प्यार मेरे ये बता इस पीर को कैसे छुपाऊँ

ज़िंदगी को ढक रहा है, अब तमस का आवरण
कैद में बुलबुल सरीखा, है बँधा अज्ञान मन
दस दिशाएँ खोज ली हैं, किन्तु अब क्या शेष है?
तू बता अब वो नगरिया, घर कहाँ, किस देश है?
धैर्य की बातें न कर, इस तीर को कैसे छुपाऊँ
प्यार मेरे ये बता इस पीर को कैसे छुपाऊँ

उस नदी की हूँ कहानी, जो न सागर से मिली
वो अभागी बूँद हूँ मैं, जो न गागर से मिली
कामना की अग्नियों में, जल रहा दिन-रात मैं
हो न पाए सूर्य के दर्शन, वही तो प्रात मैं
इस हृदय के काँपते, प्राचीर को कैसे छुपाऊँ
प्यार मेरे ये बता इस पीर को कैसे छुपाऊँ

© 2009 Manoj Kumar Manoj; Licensee Argalaa Magazine.

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