अर्गला

इक्कीसवीं सदी की जनसंवेदना एवं हिन्दी साहित्य की पत्रिका

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गीत माधुर्य

राम दास अकेला

लिख दास्ताँ

काट कर वो मेरी उँगलियाँ,
कह रहे हैं कि लिख दास्ताँ.

मैं सुनाता किसे और क्या,
संग दिल थीं सभी बस्तियाँ.

सो गये सुन के बच्चे मेरे,
हैं तवे पर चढ़ीं रोटियाँ.

आशियाने बने भी न थे,
और मचलने लगीं बिजलियाँ.

हो के बेघर वो कहता रहा,
आशियाँ आशियाँ आशियाँ.

भूल छोटी सी क्या हो गई,
रह गईं सब धरी नेकियाँ.

मुद्दतों पर खुली हैं तो फिर,
बन्द होगी न अब ये जुबाँ.

आप जितने करीब आये हैं,
और बढती गईं दूरियाँ.

आ अकेला यूँ मरहम करें,
ज़ख्म का रह न जाये निशाँ.

आदमी

ज़िन्दगी के वास्ते क्या क्या है करता आदमी,
अपनी ही परछाईयों से डरके मरता आदमी.

अपने हक़ में कोई भी तामीर क्या कर पायेगा,
खण्डहरों की ईंट सा खुद ही बिखरता आदमी.

थी ज़मीं था आसमाँ परवाज़ में इसके कभी,
परकटे पंछी सा है अब फड़फड़ाता आदमी.

दावतों के बाद जूठन फेंक देता जब कोई,
ढेर पर कूड़े के चुन कर पेट भरता आदमी.

किस क़दर नाराज़ लगता है ये अपने आप से,
बुदबुदाता फिर रहा है पागलों सा आदमी.

ज़िन्दगी भर दूसरों की फिक्र में उलझा रहा,
अपने बारे में कभी कुछ फ़िक्र करता आदमी.

एक मुट्ठी ख़ाक़ पर करता रहा इतना गुमान,
काश मिट्टी की हक़ीक़त को समझता आदमी.

अपनी इक पहचान तो इसको बनानी चाहिये,
क़ाफ़िले के साथ हो या हो अकेला आदमी.

कवितायें वही

बोलियाँ अब वो न भाषायें वही,
कब तलक गायेंगे गाथायें वही.

कारवाँ लेकर हमारा चल पड़े,
जो खड़ी करते हैं बाधायें वही.

आँख के अन्धे हैं लेकिन लिख रहे,
क़ौम के माथे की रेखायें वही.

हम रहे अब भी लकीरों के फ़कीर
तोड़ते अक्सर है सीमायें वही.

अस्मिता जिनसे वतन की दाँव पर,
हाय वन्दे मातरम गायें वही.

चीखते हैं जो धर्म के नाम पर,
नफ़रतों की आग भड़कायें वही.

हाथ में लेकर चले हो आइना,
देखना पत्थर न फिर आयें वही.

चल अकेला कुछ नई बातें करें,
मत सुनाना फिर से कवितायें वही.

जगाने के लिये

दर्द का इज़हार करता हूँ जमाने के लिये,
मैं नहीं कहता ग़ज़ल हँसने हँसाने के लिये.

ख्वाब आँखों में हमारी हैं तुम्हारी ही तरह,
कुछ तो करने दो जतन उनको सजाने के लिये.

आस्था के नाम पर बनवा रहे हो तुम महल,
घर हमें भी चाहिये सर को छिपाने के लिये.

जब दिया कोई जला है रोशनी के वास्ते,
आँधियों पर आँधियाँ आईं बुझाने के लिये.

सोने वाले सो रहे हैं कुम्भकर्णी नींद में,
कब से हम चिल्ला रहे उनको जगाने के लिये.

आदमी को आदमी रहने दो दुनियाँ में अभी,
क्यूँ लड़ें शेखो बरहमन आज़माने के लिये.

पीठ पर पत्थर लिये हम भूख के इस दौर में,
आ अकेला फिर चलें परचम उठाने के लिये.

© 2009 Ram Das Akela; Licensee Argalaa Magazine.

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