अर्गला

इक्कीसवीं सदी की जनसंवेदना एवं हिन्दी साहित्य की पत्रिका

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काव्य पल्लव

किरण सिन्धु

बाध्य

प्राण-दीप की लौ प्रकम्पित हो रही,
श्वास की गति भी अनियमित हो रही;
जीर्ण-शीर्ण काया की मैं क्या कहूँ,
आयु की अवधि अनिश्चित हो रही.

दृष्टि धूमिल, अंगशिथिल, लुप्त होते स्मृति अवशेष,
चेतना-अर्धचेतना मध्य छिन गए निर्णय, निवेश;
इछाहीन कर लिया स्वयं को, शेष नहीं कोई उद्देश्य,
न किसी से मोह रह गया और ना किसी से कोई क्लेश.

आजीवन किये कर्मों का विश्लेषण,
सही-गलत, उचित-अनुचित का समीकरण;
मस्तिष्क की जटिलता बढ़ती जा रही,
शक्तिहीन हो ग्रीवा झुकती जा रही.

श्रवण-शक्ति क्षीण हो चली फिर भी,
मृत्यु की पदचाप सुनती जा रही हूँ;
इस लोक के पश्चात क्या गति होगी,
कल्पना के जाल बुनती जा रही हूँ.

जीवन के पथ पर चलते-चलते,
अकस्मात अवांछित भी घटित हुआ;
पूर्वजन्म के कर्मों को कैसे सुधारें?
"प्रारब्ध" शब्द से ह्रदय अति व्यथित हुआ.

बहुत कुछ इस जीवन में त्याज्य था,
बहुत कुछ स्वयं को स्वीकार्य था;
प्रश्न जब भी आया आस्था का,
हृदय मेरा समर्पण को बाध्य था.

छोड़ आयी थी जिसे

गहरे सन्नाटे को चीरती हुई,
किसी के क़दमों की धीमी सी आहट,
अक्सर सुनाई देती है मुझे;
और यह आहट मुझ तक
पहुँच कर थम जाती है.
अपने बहुत करीब,
किसी के होने का एहसास होता है,
गौर से देखा चेहरा उसका,
और धीरे - धीरे उसके पूरे आकार को,
सहमी हुई मुस्कराहट के साथ उसने कहा...
" पहचाना नहीं मुझे? "
मैं तो वही की वही हूँ,
बिलकुल वैसी ही,
वर्षों पहले छोड़ आयी थी जिसे.
मेरी आँखों में सपने भरे थे तुमने,
हौसले भी बुलंद किये थे मेरे,
दिशाएँ अपनी थीं और
आसमान को छूने की आस,
कुछ भी असंभव नहीं था.
तुमने मुझे कितना सँवारा था!
अवहेलना और तिरस्कार
मेरे लिए अपरिचित थे.
पर ना जाने क्यों तुमने,
स्वयं से मुझे अलग कर दिया,
तुम तो खो गयी दुनिया की भीड़ में;
दब गयी जिम्मेदारियों के बोझ तले,
चल पड़ी कंकरीली-पथरीली राह पर,
सहने लगी जो कुछ था असह्य.
कभी मुड़ कर देखा नहीं मुझे;
कभी सोचा भी नहीं मेरे बारे में,
मैं रोती रही तुम्हारी दुर्दशा पर;
प्रतीक्षा करती रही, कब तुम मेरी सुध लोगी,
कब सोचोगी मैं क्या चाहती थी
मैं तुमसे विमुख ना हो सकी;
क्योंकि मैं तुम्हारी ही अस्मिता हूँ
वर्षों पहले छोड़ आयी थी जिसे.

© 2009 Kiran Sindhu; Licensee Argalaa Magazine.

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