अर्गला

इक्कीसवीं सदी की जनसंवेदना एवं हिन्दी साहित्य की पत्रिका

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काव्य पल्लव

रवीन्द्र गौतम

उड़ान

खेलना
आता नहीं ज़िन्दगी से
क्या करूँ
परिंदा हूँ
मैं बँध पाता नहीं
है फितरत फड़फड़ाहट की
तड़प उड़ जाता हूँ
असीमित गगन है मेरे लिए
चाह कर रुक पाता नहीं
कवि हूँ इस हाल का
मुस्कुराता नहीं
सीमायें तो हैं अनन्त
मैं बँध पाता नहीं
हवा के विरूद्ध
है उड़ना मुश्किल
चाह कर भी
दूर तक उड़ पाता नहीं

खेलना
आता नहीं ज़िन्दगी से
क्या करूँ
परिंदा हूँ
बँध पाता नहीं.

छाया

एक था, पेड़ जहाँ
बारिश में आ गया जोड़ा वहाँ
तिनकों से बनाया घरौंदा जहाँ
फिर दो से तीन
तीन से चार
इस तरह वे हो गये
मिलकर आठ
डर
एक एक कर सिखाया उड़ना उन्हें
एक एक कर उड़ चले सब
अपनी अपनी उम्मीद से जुड़ गये
लगाव का तनाव रह गया वहाँ
फिर क्या
एक था, पेड़ जहाँ.

© 2009 Ravindra Gautam; Licensee Argalaa Magazine.

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