अर्गला

इक्कीसवीं सदी की जनसंवेदना एवं हिन्दी साहित्य की पत्रिका

Language: English | हिन्दी | contact | site info | email

Search:

काव्य पल्लव

शीला कार्की

भारत माँ

माँ तेरा आँचल चीर-चीर कर डाला तेरे पूतों ने
अबला असहाय तेरी तलवार जंग खा गई

माँ, बेटियाँ, बहनें सभी बिकती हैं बाज़ारों में
नन्ही सी गुड़िया और बड़ी उम्र वाली बुढ़िया,
सभी बलात्कार का शिकार हो चुकीं.

भूखा-प्यासा बचपन सड़कों पर भीख माँगता है.
खून, चोरी, डकैती, रिश्वत खुले आम होते हैं.
बोरियों में भरे लावारिश शवों को कफ़न भी नहीं मिलता.

कब तक बहायेगी तू बेबस अश्रु?
उठा तलवार, उतर युद्ध-भूमि में,
कर दे वध अपने हाथों से इन महिषासुरों का,

जो तेरी कोख से जन्म लेकर,
तेरे पूत कहलाने का दावा करते हैं.

माँ का पत्र बेटी के नाम

प्रिय बेटी,
तुम जवान हो चली हो,
और मैं बूढ़ी और शिथल.
तुमने जन्म लिया आधुनिक युग में,
टेलिविज़न, कम्प्यूटर, सिनेमा, यातायात
सभी साधन उपलब्ध हैं तुम्हें.
मैं, पुराने घिसे-पिटे संस्कारों का अवतार,
तुम्हें चेतावनी देती रहती हूँ
कि बहुत तेज रफ़्तार से चलने से
ठोकर लग सकती है, और चोट भी
किन्तु तुम बढ़ी चली जा रही हो,
कभी कभी मैं तुम तक पहुँच पाती हूँ
तो हाँफते हुए अपने विचार प्रकट करती हूँ
तुम बाल झटका कर पुरी बात भी नहीं सुनती,
क्योंकि जवानी और आधुनिकता का नशा है तुम्हें.
यह मत भूलो, कि यह युग, आधुनिक और जवान,
हमारे जैसे बड़े-बूढ़ो के कंधों पर चढ़कर बढ़ा
तुम हमारे बलिदानों और प्रयत्नों का फल भोग रही हो,
तुम्हारी माँ वृद्ध सही, सीने में कोमल नारी-हृदय रखती है,
वह तुमसे केवल प्रेम और आदर की आशा करती है,
ये शब्द तो बस अब शब्दकोषों तक ही सीमित रह गये,
इनकी गहराई और महत्व समझने का समय किसे?

काल्पनिक

तुम्हारे मधुर गीत आज भी
गूँजते हैं मेरे कानों में

तुम्हारा स्पर्श आज भी
अंकित है मेरी कंचन काया पर.

तुमसे मिलन के क्षणों की यादें
अब भी हरी हैं

फिर जीवन के किसी मोड़ पर
खो गये तुम,

कवि की कल्पना बन कर
रह गये.

मृग तृष्णा

बीते पल लौटे हैं कभी?
सुनहरी स्मृतियाँ ही सही.

माया-मोह छोड़ दिया
संबंधों को तोड़ दिया

फिर यह कैसी प्यास
जो बुझाये नहीं बुझती?

कौन करे तृप्त मुझे?
झरना ही सूख गया.

साँस टूटे भी तो कैसे,
आस जो है अब भी बाकी.

नचनिया

तेरे पैरों की थिरक
तेरे घुँघरूओं की छनक,
तेरे गहनों की दमक,
तेरी कमर की लचक,
तेरी चाल की गमक,
देखे कौन गोरी तेरे
मन की झलक.

© 2009 Sheela Karki; Licensee Argalaa Magazine.

This is an Open Access article distributed under the terms of the Creative Commons Attribution License, which permits unrestricted use, distribution, and reproduction in any medium, provided the original work is properly cited.