अर्गला

इक्कीसवीं सदी की जनसंवेदना एवं हिन्दी साहित्य की पत्रिका

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काव्य पल्लव

विवेक शर्मा

हिंदी माँ

कितनी बार माँ मैंने देखा है तुमको संकोच में,
कब किससे, कहूँ, क्या, कब, कैसे, की सोच में,
अपने ही घर की बैठक में गुमसुम तुम,
परोस रही चाय - पकौड़ी अंग्रेजी मेज पर,
और खाली प्यालों में खोजती हस्ती अपनी,
जो बेजुबान हो गयी है अपने ही देश में

और कितनी ही बार माँ, बचपन में मैं शर्मसार,
सिखाना चाहता था तुमको विदेशी वार्ता - व्यवहार,
तुम्हारी गोद में हँसा रोया, पाया खोया, सब मैंने,
और तुमसे ही अर्थ, धर्म, कर्म, मोह, पथ पाया मैंने,
और तुमको ही ठुकरा आया कहकर पिछड़ी, व्यर्थ,
जो बेजुबान हो गयी है अपने ही देश में

माँ, अब भ्रमणों, वहमों, उम्र, अध्ययन करके है जाना मैंने,
कैसे सालों सौतेली के सामने था सामान्य, असक्षम तुमको माना मैंने,
तुम्हारी लोरियों की ममता, तुम्हारे सरल संवादों का साहित्य,
तुम्हारी आत्मीयता की महक जिसे किया बरसों अनदेखा मैंने,
अ गया हूँ वापिस सुनने, सुनाने तेरी उसी आवाज़ को,
जो बेजुबान हो गयी है, अपने ही देश में

हिंदी वादी

मेरा बचपन हिंदी में है, उसे अंग्रेजी - उर्दू संवाद नहीं आता,
माँ की लोरी, थपकी का मुझको अनुवाद नहीं आता

मुझसे क्यूँ चाहती हो अदब विलायती या लखनवी,
छोटे शहर के लड़कों को देना दाद नहीं आता

अशिक्षित हूँ, फ्रेंच, बंगाली, मराठी, तमिल, हिब्रू में,
मेरी कमी है कि मुझे इनमें करना विवाद नहीं आता

लिखता, कहता हूँ कई आधी, सीखी जुबानों में,
पर विवशता है, परदेसी परोसी में वो स्वाद नहीं आता

तुम जाओ जिस राह जाना चाहो, मेरा सुख मेरी मिट्टी में है,
मेरी सृष्टि है मेरी जन्मभूमि, मुझे बनना अपवाद नहीं आता

भुला-सा दिया है तुमने इस विवेक को, कह मेरी सोच पुरानी है,
सहस्त्रों वर्षों की संस्कृति का मुझको करना त्याग नहीं आता.

धैर्य, धर्म, कर्म, मैत्री, विपत्ति और तुम

दोस्त! निराश न हो, हताश न हो
अपने हुनर, अपने सुकर्मों पर विश्वास न खो

फलता है जब स्वप्न सुकोमल हृदय में,
चाहता है मनुष्य केवल सुख निलय में,
पर दृगों को नहीं दर्शन दुर्गम का हो,
तो सम्मान कैसे कर पायेगा समृद्धि का वो?

कहो कौन हुआ सफल इस जीवन में?
रंग्रलियों में रत, य लिप्त बहुमुखी चिंतन में?

धरती पर अवतरित आये राम जब,
पत्नी / पिता को मृत्यु - शैया पर पाए न थाम तब,
परशुराम पर तो मातृहत्या का कलंक लगा,
महाराणाओं ने हल्दी घाटियों में खून चखा,
टैगोर, भीष्म स्वजनों की मृत्यु, स्मृतियाँ सहते रहे,
पराक्रमी वह कम नहीं थे, जिनके साम्राज्य ढहते रहे,
गांधीजी, कर्ण, कबीर को कौन - कौन सा नहीं व्यंग लगा?
नेताजी, चाणक्य को एक समय था कौन संग दिखा?

पर विपत्तियाँ जब आती हैं, छाती कँपाती हैं,
कैसा भी वीर-ज्ञानी हो, उसका अहम मिटाती हैं,
रण में चूर होकर, सामर्थ विदित होता है,
अपमानित होकर तुलसी - कालिदास उदित होता है
अरे! हम मनु संतति हैं उसका तो संसार प्रलय में बह गया था
एक शृद्धा के सहारे, वह सृष्टि का प्रचंड सह गया था

जब फल कटता है, गिरता है, सड़ता है, मिटता है,
जाकर जब दाना ख़ाक में मिलता है,
फूटता नहीं पल भर में वो बन कर वृक्ष,
कई मौसमों तक तिमिर में भ्रमित छिपता है
कोई आसान मार्ग उसे बतायेंगे क्या?
बिना विध्वंस अशोक, पांडव नया राज्य बसायेंगे क्या?

टूट कर बिखरना है, तो बादल बनो,
हवा बहा ले चली है, बहा ले जाने दो,
अभी तो जाकर मरू से टकराना है,
फिर आसमान छोड़ धरती पर उतर आना है,
बनकर बूँद फिर गिरो, फिर उठो, क्यूँ भय है?
यह तो अनंत से चला आ रहा चक्र नित्य है

डाली पर खिले, तोड़े गए, फूल बिंधे मुक्ताहार के,
फिर बने तुम श्रृंगार हरि के, त्यौहार के,
फिर सूखे, मसले गए, फिर कलि बनो तुम,
अपनी श्रेष्ठता में बनो सर्वप्रिय, हर्ष संसार के,
मैं स्वयं हूँ, शंकाओं से त्रसित सदा,
मैं स्वयं हूँ, विफलताओं से भयभीत सदा,

पर जब तलक खड़ा हूँ, सांस है, समर्थ हूँ,
क्यूँ काल चक्र में फँसने पर सोचूँ, व्यर्थ हूँ?

पर सत्य यह भी है कि समय बदलता है, सूर्य ढलता है,
यूँ तो भाग्य को भारत में सभी कोसा करते हैं,
और कर्मशील सिर्फ बाहुबल पर भरोसा करते हैं,
कई छोटी - बड़ी चीज़ों पर नहीं बस हमारा चलता है,
भीड़ को चीर कर रास्ते बनायें कभी - कभार हम,
पर चक्रव्यूहों में तो अभिमन्यु तक फिसलता है,
उसकी क्या जय कीजे जो बस हर मंजर पर जीतता है,
जय उसकी हो जो खंजर को अपने लहू से सींचता है,
घाव भरने देता है, खुद को लगभग मरने देता है,
और फिर मूर्छा से निकल, नयी आहुति देता है

पेट भर कर भी कई प्यासे रहते हैं,
भरी तिजोरियों से उदासे रहते हैं,
नियत से नियति का क्रम हैं,
धर्म मंजिल का नहीं, राह का उपक्रम है,
कहो कैसे बने नचिकेता ब्रह्मज्ञानी
या विश्वामित्र, बुद्ध हुए परम ज्ञानी,
वीराने में बैठे, इच्छाओं से खिन्न,
करते रहे तपस्या वर्षों, प्रतिमाह, प्रतिदिन,
यूँ ही भगवन दर्शन देंगे क्या?
अधूरी स्तुति के लिए आरक्षण देंगे क्या?

हार कर क्यूँ बैठे हो, क्यूँ बैठे हो मायूस तुम,
कोई ऋण चुकाना होगा, जिसके सूद में तुम,
पड़े हो कठिनाइयों के कलेश में तुम,
या बौखलाए बैठे हो परदेश में तुम

प्रेमचंद रहे गरीबी में, विलायत में रामानुजम बीमार, नाखुश रहे
अपने ज़माने में सिख गुरुओं पे न जाने क्या क्या अंकुश रहे,
गालिब की किताबें छपती नहीं थी,
रानी झांसी की मुसीबतें घटती नहीं थी,
हम सुदामा - से कृष्ण - से स्वमित्रों से संकुचाते हैं
जाने क्यूँ अपने हितकारियों से भी नज़र छुपाते हैं,
विपत्तियों के समय ही तो मैत्री का वजन होता है,
सहयोग से हर समस्या का नियोजन होता है

क्यूँ न बनकर छंद की एक पंक्ति सुखमयी,
अपने दर्द को ही बना लूँ भजन सुरमई?
विपदा बड़ी आन पड़ी, पर क्या मिलेगा संशय से,
पुरुषार्थ करके ही दोस्त मनुपुत्र निकलेगा प्रलय से!

© 2009 Vivek Sharma; Licensee Argalaa Magazine.

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