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पुस्तक समीक्षा

बिपिन कुमार शर्मा

समकालीन कहानी की समानांतर धारा

पुस्तक: भेम का भेरू माँगता कुल्हाड़ी ईमान (कहानी संग्रह)
लेखक: सत्यनारायण पटेल
प्रकाशक: अंतिका प्रकाशन
संस्करण: 2007
मूल्य: 90 रुपये (पे. बै.)

आज हिंदी साहित्य में 'युवा पीढ़ी' के प्रपंच में जितने रचनाकारों को शामिल करके साहित्य के परिदृश्य को परिभाषित करने का खेल चल रहा है, उतना ही मात्र नहीं है आज का प्रतिनिधि साहित्य. आज का रचनात्मक विज्ञान संपादकों के कुछ अतिप्रिय युवा लेखकों को रखकर पूरा तो क्या, अधूरा भी नहीं बन सकता. वर्तमान समय में सृजनरत सभी संघर्ष रचनाकारों को साथ रखकर ही हम इस दौर की रचनाशीलता का आकलन कर सकते हैं. आजकल धूम-धड़ाके से जिन कथाकारों की बारात निकाली जा रही है उनमें से ज्यादातर की कहानियों निराशा करती हैं. क्या यही रूपवादी व्यामोह और ढुलमुल बातों से भरी कहानियाँ ही हैं वर्तमान दौर की प्रतिनिधि कहानियाँ? कहाँ खो गईं प्रतिरोध की वह धारा जो प्रारंभ से आज तक साहित्य का मेरुदंड रही है! बाज़ार के व्याभिचार का विरोध, साहित्य में प्रचलित विमर्शों के घटाटोप से परे की सच्चाई, भूमण्डलीकरण के द्वारा स्थानीय बोलियों और संस्कृतियों की ओर बढ़ते पंजों को मरोड़ देने की मनचली इच्छाएँ कहाँ सिर धुन रही हैं?

अगर आज 'संघर्षशील आमजन की कहानियों' को अन्य गौण समस्याओं का धुंध फैलाकर अप्रासंगिक बनाया और बताया जा रहा है तो आज के वैसे आलोचकों और संपादकों की शिनाख़्त कल के इतिहास में जरूर होगी और वे स्वत: उपेक्षित हो जाएंगे. अनायास नहीं है कि आज आलोचना अनुपयोगी और अप्रासंगिक होती जा रही है. हालत तो यहाँ तक आ पहुँची है कि कुछ बड़े आलोचक केवल अपने भक्तों के होकर रह गये हैं तो कुछ केवल स्त्री रचनाकारों के आलोचक रह गए हैं.

साहित्य के ऐसे चापलूसित वातावरण में कथाकार सत्यनारायण पटेल की कहानियों पर गंभीरता से विचार करना, प्रतिरोध में खड़ा होना भी है. प्रसन्नता की बात यह है कि सत्यनारायण पटेल इस धारा में अकेले नहीं है बल्कि कई रचनाकार अपनी जनपक्षधरता के साथ सृजनरत हैं. सत्यनारायण युवा कथाकार हैं और यह इनका पहला संग्रह है. इनमें नयापन विषय और ट्रीटमेंट के स्तर पर ही नहीं, भाषा के स्तर पर भी है. ये अपनी कहानियों में यथार्थ की तह तक जाते हैं, उसके राग-द्वेष को परखते हैं, उनसे अपनापा बढ़ाते हैं और अनायास ही अपनी भाषा भूलकर अपने पाठों की बोली बानी में बतियाने लगते हैं. यही कारण है कि कई बार उनके पात्रों की भाषा अबूझ होते हुए भी अपनी लगती है. संग्रह में कुल छह कहानियाँ हैं जो पत्रिकाओं में प्रकाशित होने के बाद काफी लोकप्रिय हुई हैं.

संग्रह की पहली कहानी 'पनही' तो बहुत चर्चित हुई है. लेकिन पटेल की 'रंगरूट' कहानी पर बात करें. 'रंगरूट' एक ऐसे युवक की कहानी है जो पुलिस ट्रेनिंग के दौरान एक भेंड़ चराने वाली एक बुरी तरह (या पूरी तरह) फिदा हो जाता है. आठों पहर उसी की यादों में डूबता-उतराता रहता है, नींदें हराम करके सपने देखता रहता है परंतु इससे आगे बढ़ने का साहस नहीं जुटा पाता. पुलिस ट्रेनिंग में सजा मिलने या नौकरी छूटने के भय से वह प्रेम करने की तड़प को स्थगित कर देता है. मुख्तसर यह कि 'तुझसे भी दिल फरेब है गम रोजगार के.' यह एक साधारण-सी प्रेम कहानी है, एक-तरफ़ा प्रेम की क्या, महज़ आकर्षण की कहानी, जिसकी डोर बार-बार ढीली पड़ जाती है और अंत तक कोई मार्मिक असर भी नहीं छोड़ पाती. कहानी में पुलिस ट्रेनिंग स्कूल के अनावश्यक विवरण भरे पड़े हैं जिनसे पाठक खुद को जोड़ नहीं पाता. दरासल, सत्यनारायण इस मिजाज के कथाकार हैं भी नहीं. उनकी जमीन संघर्ष और आंदोलन पर टिकी है और उसे उन्होंने जीवन में जीकर अर्जित किया है, फैशन के तौर पर नहीं.

प्रेमचंद साहित्यकार को निर्देश देते हैं कि 'जो दलित है, पीड़ित है, वंचित है - चाहे वह व्यक्ति हो य समूह, उसकी हिमायत और वकालत करना उसका फ़र्ज है.' अपनी कहानी 'बोंदा बा' में पटेल एक ऐसे वृद्ध व्यक्ति की कहानी कहते हैं जो अपने बेटे-बहू की नजर में व्यर्थ हो चुका है. यह विषय कितना यथार्थपरक और प्रासंगिक है इसे प्रमाणित करने को कथाकार से ज्यादा हमारा समाज उतावला है. इस समीक्षा के लिखे जाने से चंद रोज पहले जवाहरलाल नेहरू युनिवर्सिटी के शॉपिंग कांपलेक्स के पास एक वृद्धा को उसके घर वाले सबकी नजर बचाकर छोड़ गये. छात्रों ने पुलिस को सूचित किया और उसके बाद पता नहीं उसका क्या हुआ. इस घटना का गवाह इन पंक्तियों का लेखक भी था. कहानी के प्रारंभ होते ही 'बोंदा बा' की खांसी की घुटी-घुटी सी आवाज पाठकों को सुनाई देती है - 'खों... खों...! आक्क थू!' यह केवल खाँसने और थूकने की आवाज भर नहीं है, यह एक वृद्ध व्यक्ति की अशक्तता भी है और इसी कफ और थूक की तरह घृणित समझे जाने की पीड़ा भी. बोंदा बा चुन्नीलाल का पिता है, उसकी बहू का नाम है चम्पा. बोंदा बा की वृद्धा पत्नी चत्तर चाह कर भी कुछ नहीं कर पाती.

चुन्नीलाल के घर में किसी तरह की कमी नहीं है, घर में कई रजाईयाँ पड़ी हैं फिर भी उसके माता-पिता ठंड में ठिठुरते रहते हैं. बोंदा बा चिलम की आँच से इस सर्दी का मुकाबला करने उतरता है लेकिन ऐसी खांसी उठती है कि लगता है कि दम निकल जाएगा. अपने बेटे बहू की उपेक्षा से बोंदा बा का मन बहुत व्यथित हो जाता है. यह याद करता है इसी बेटे-बहू की खुशियों के लिए वह क्या-क्या नहीं करता था! परंतु उम्र के इस अंतिम पड़ाव पर उन्हें उपेक्षा और अपमान के सिवा कुछ न मिल सका. चत्तर जब अंदर कमरे से रजाई लाने गई तो बहू ने हाथ से रजाई छीन ली - "लेकिन सर्दी की उस रात में जब चत्तर के हाथ से रजाई छीन ली. वह अपने जाये पर दुखी और शर्मिंदा हो गई. उसका चेहरा भावहीन और सख्त हो गया. वह सिगड़ी के सामने बैठी लाश लग रही थी." यह कहानी लगातार शिखर की ओर गतिशील है. सबसे मार्मिक प्रसंग अंत में है. ठिठुरता-काँपता और खोखली छाती वाला बोंदा बा विजयी मिथ के इकट्ठे कागजों को सिगड़ी में डाल कर, फूँक-फूँक कर सुलगा लेता है और उसके बाद आसपास टँगे बेटे और बहू के सारे कपड़े जलती हुई सिगड़ी में डालता जाता है - 'लगातार सिगड़ी के जलने से ओसारी गरमाने लगी थी. खाट पर सोई चत्तर ने भी गरमाहट महसूस की और उसने टाँगे फैला कर लंबी कर ली थीं. बोंदा बा की खों.. .. खों.. कुछ कम और चिलम धकधक जल रही थी. उसकी बूढ़ी आंखों और झुर्रियों पर खुद के होने के अहसास की चमक थी.. .. वह ठंड को ओसारी से भगाने की खुशी में ताली बजा-बजाकर हँसने लगा था. उसके जर्जर ढाँचे में कमाल की फुर्ती आ गई. उसकी आंखों के सामने बचपन और जवानी की यादें गड्डमड्ड होने लगीं. यह कहानी 'बूढ़ी काकी' (प्रेमचंद) और 'चीक की दावत' (भीष्म साहनी) से आगे की कहानी है. बोंदा बा अंत तक अपनी सार्थकता और स्वाभिमान को अद्भुत ढंग से साबित कर देता है.

'पनही' सवर्ण अथवा शोषक वर्ग के खिलाफ दलितों के संगठित होने की कहानी है. इस कहानी को सुप्रसिद्ध कथाकार स्वयं प्रकाश ने इस दशक की 'क्लासिक' कहानी बताया है. कहानी का नायक पूरण, जो पटेल के डर से पूरी कहानी में पनही नहीं पहनता वहीं अंत में जाकर पहल लेता है - 'उसके पाँव में वही पनही थी, जो ब्याह में उसने गढ़ी थी, जिसे पहनने पर पंचायत के सामने नाक रगड़ने और गाँव में झाड़ू लगाने की सजा भोगी थी. उसके हाथ में मरे ठोरों की खाल उतारने वाली एक-सवा फीट की छुरी थी. उसने बैठकर धार करने वाला पत्थर दोनों पाँवों से पकड़ा और उस पर छुरी घीसकर धार करता बोला - "अब मेरा मुंह क्या देख रहे हो, जाओ टायरे में जो कुछ हो-लाठी, हंसिया लेकर तैयार रहो, पटेल के छोरे आते ही होंगे और हाँ, उबागे पत्र मत धाजो कोई."

कहानी के बिल्कुल अंतिम परिच्छेद का यह उद्धरण पूरी कहानी कह लेता है. यह उस गाँव की कहानी है जहाँ अच्छा खाना और पहनना ऊँची जातियों का अधिकार समझा जाता है. पूरण जब जूते की नई खूबसूरत जोड़ी बनाकर पटेल को देने जाता है और बदले में पहले से कुछ ज्यादा अनाज की मांग करता है तो पटेल कहता है - 'बता दी न अपनी जात. एक सेर अनाज कम पड़े, तो क्या एक जोड़ी पनही का मन भर लेगा? कुछ भी करो, तुम ठेड़ियों का पेट नहीं भरता. सालों की नेत ही खराब है. हमारे ढोर मरने पर तुम्हें खाल मोफत में मिलती है. खाने को मांस मिलता है. ढोरों के हड्डे बेच पैसा जोड़ते हो, फिर भी एक सेर अनाज कम पड़ता है?' लेकिन पूरण गाँव के इस माई-बाप के आगे गिड़गिड़ाकर माफी नहीं माँगता बल्कि तमाचे की तरह जवाब देता है - 'ढोर घीसने के काम में इतरो ही तमारे फायदो नज़र आवे तो तम करो, म्हारे नी करनू है.'

यह है प्रगतिशील चेतना जिसका असर पुरानी पीढ़ी के पूरण पर भी हो रहा है. यही है विद्रोह की वह चिनगारी जो बदलते वक्त के साथ सुलगते हुए लपट बन जाती है. यही घटना पटेलों के खिलाफ संगठित होने की पृष्ठभूमि बनती है.
इस कहानी में एक सहृदय सर्वण पाक देवा बा भी है जो किसी नीची जाति वालों पर जुल्म नहीं करता परंतु उनका कभी खुलकर समर्थन भी नहीं करता. यह पात्र कहानी में अनफिट लगता है, इसका उद्देश्य केवल यह सूचित करना है कि सवर्णों में सभी लोग बुरे नहीं होते. वस्तुत: देबा बा एक कमजोर चरित्र है जो कहानी को भी कमजोर करता है. वैसे ही अंत में पूरण की पत्नी पीराक को अनावश्यक रूप से विद्रोहिणी बना दिया गया है. इन गौण कमियों के होते हुए भी पनही एक उत्कृष्ट कहानी है.

'गाँव और कंकड़ के बीच' भी शोषक और शोषित के बीच संगठित होने वाली लड़ाई की कहानी में इसमें 'वर्ण' की जगह 'वर्ग' की चेतना प्रखर है. यह जिस गाँव की कहानी है उसमें एक दबंग और दुष्ट चौधरी रहता है, उसके कुछ मुँहलगे दरबारी रहते हैं और साथ में एक ब्राह्मण महाराज भी लगा रहता है, ये सभी मिलकर शोषण और अत्याचार को अंजाम देते हैं. उसी गाँव में एक गरीब युवक है बालू जो जाति का चौधरी ही है. उसके शरीर पर सफेद दाग हैं जिसकी वजह से अपने ही लोगों के बीच वह उपेक्षा का शिकार है. उसकी प्रताड़ना का वास्तविक कारण सफेद दाग नहीं बल्कि थोड़ी सी पुश्तैनी जमीन और घर है जिसे चौधरी हड़पना चाहता है. इसी प्रक्रिया में वह पहले बालू को जाति से बहिष्कृत कर देता है, फिर सवर्णों के कुएँ से उसका पानी भरना बंद करवा देता है और इसके बाद जब उसके पिता की मृत्यु हो जाती है तो कर्मकांडों का भार बलात उस पर लाद कर उसका घर हड़प लेता है. बाकी रह जाते हैं खेत जिनसे अपनी आजीविका चलाते हुए बालू दलितों की बस्ती में पनाह लेता है. उसकी हालत ऐसी हो जाती है कि - 'चौधरियों ने उसे चौधरी नहीं मान बाहर फेंक दिया था और कांकड़ वाले उसे चौधरी मानकर उससे दूर-दूर रहते.' लेकिन बालू बहुत कम समय में अपने व्यवहार से उन सबको अपना बना लेता है. वहाँ रहते हुए उसे पीरू चमार की बेटी झुन्नू से प्रेम हो जाता है और वह उससे विवाह करना चाहता है लेकिन जाति की खैर मनाते हुए चौधरी बालू को धमकाता है. परंतु बालू अपने फैसले पर कायम रहता है. वह भली भांति समझ चुका है कि जाति-पाँति केवल अपनी सुविधा को बनाए रखने के लिए बुने गये जाल हैं. ' इन सबका परिणाम यह होता है कि झुन्नू से शादी के कारण बालू की जान चली जाती है. इसके बाद कांकड़ वाले एकजुट होकर बालू की लाश कंधे पर उठाए चौधरी के घर की ओर चल पड़ते हैं, सदियों से हो रहे शोषण और जुल्म का हिसाब माँगने के लिए. बालू अपनी जान देकर दलितों को चेतना संपन्न बना देता है और वे संगठित होकर अपनी लड़ाई लड़ने के लिए कमर कस लेते हैं. बालू की शहादत सार्थक हो जाती है.

'बिरादरी मदारी की बंदरिया' शीर्षक कहानी में कथाकार ने दिखाया है कि बिरादरी के दबंग लोग बिरादरी का महज इस्तेमाल करते हैं, अपनी सुविधा के लिए और अपनी राजनीति चमकाने के लिए. दलित एकता के नाम पर बिरादरी के संगठन से गरीबों का भला तो कुछ भी नहीं होता, हाँ, बुरा जरूर होता है. जनाराम की बेटी कला सुंदर और बुद्धिमान है, वह मास्टर के बेटे से प्रेम करती है. जनाराम और मास्टर, दोनों ही नीची जाति के हैं परंतु उनकी जाति और आर्थिक हालत में अंतर है. फिर भी मास्टर को इस शादी से आपत्ति नहीं है. मास्टर सामाजिक जागरुकता फैलाने के लिए गाँव-गाँव जाकर बैठकें करता है और लोगों को शोषकों की पहचान बताता है, उनके खिलाफ लड़ने के लिए प्रेरित करता है. इन्हीं बैठकों में कला की मुलाकात मास्टर के बेटे से हुई और अब बात विवाह तक पहुंच गई. दूसरी तरफ बिरादरी का मुखिया पतराम अपने बेटे रामचरण से कला की शादी करवाना चाहता है जो बिल्कुल आवारा है और काना भी. वह कला से रामचरण का विवाह करवाने के लिए बिरादरी की धौंस भी दिखाता है और कुटिलता का सहारा भी लेता है. परंतु अंतत: कला का विवाह मास्टर के बेटे से ही तय हो जाता है. जनाराम इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि - 'जात बिरादरी में क्या रखा है जो पतराम बार-बार जात बाहर करने की धौंस देता है? आदमी जात क्यों नहीं छोड़ पाता? मैं खुद को जात की खोल से मुक्त करता हूं. आज से मैं बेजात ही भला. '

संग्रह की अंतिम कहानी का शीर्षक है - 'भेम का भेरू माँगता कुल्हाड़ी ईमान' जो कि संग्रह का भी नाम है. कहानी के बारे में कहने से पहले कहानी की प्रथम पंक्ति उद्धत करना जरूरी है - 'इस कहानी के पात्र कनीपावनाथजी पंथ के घुमंतू कालबोलिया जनजाति के हैं.' इसीलिए इस कहानी की भाषा और संस्कृति पूरी तरह उसी जनजाति की जिंदगी से रची-पगी है. यों तो कहानी बस इतनी सी है कि कालू और सकीना बचपन से साथ-साथ खेलते हुए जवान होते हैं. दोनो के घर वाले खुशी-खुशी इनका विवाह कर देते हैं. इनका आपस में बहुत प्रेम है, दोनों मेहनत करके अपना परिवार चलाते हैं. कालू सांप दिखाकर आस-पास के गाँवों से कमाई करता है, उसके अलावा सकीना भी कुछ मेहनत मजदूरी कर लेती है और वे अपने दोनों बच्चों को अच्छे स्कूल में पढ़ाते हैं. एक बार कालू कई महीने बाद घर लौटता है तो उसके बचपन के साथी बताते हैं कि सकीना का उसके बहनोई के साथ अवैध संबंध है और इसकी चर्चा पूरे गाँव में है. यह सुनकर कालू आग बबूला हो जाता है, इसकी सच्चाई जानने के लिए वह सकीना से एक बार पूछना तक जरूरी नहीं समझता और उसे मार-मार कर अधमरा कर देता है. उसके बाद उसकी ईमान की परीक्षा लेने का निर्णय लेता है, भरी पंचायत में सकीना अपने पति के द्वारा ही शर्मिंदा हुई पत्थर-सी खड़ी रहती है.

दूसरी तरफ सकीना के कुछ हमदर्द इस परीक्षा के विरुद्ध आवाज उठाते हैं, अचानक ही कालू का हृदय बदल जाता है, वह सकीना के प्रेम और उसकी सच्चाई को याद करके पश्चाताप करने लगता है. इसी के साथ-साथ कालू के दोस्तों का भी हृदय बदल जाता है, वे कालू से की गई झूठी शिकायतों के लिए पछताने लगते हैं और एक बारगी ही पूरा गाँव सकीना के साथ खड़ा दिखता है. लेकिन इस कहानी में सिर्फ कहानी ही नहीं है, इसमें इस जनजाति की पूरी संस्कृति जीवंत हो उठी है, रीति-रिवाज, खान-पान, रोजगार-पेशा और वेशभूषा के साथ. महिला-अधिकारों के साथ-साथ नागरिक अधिकारों की भी बात उठाई गई है. इस कहानी से कथाकार की शोधवृत्ति का भी परिचय मिलता है. वस्तुत: ऐसी कहानियों को युवा पीढ़ी के तौर पर दिखाने की जरूरत है. अंतिका प्रकाशन ने संग्रह को काफी सुंदर और कलात्मक बनाकर प्रस्तुत किया है. इससे प्रकाशक की साहित्य के प्रति गंभीरता का पता चलता है.

© 2009 Bipin Kumar Sharma; Licensee Argalaa Magazine.

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