अर्गला

इक्कीसवीं सदी की जनसंवेदना एवं हिन्दी साहित्य की पत्रिका

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युवा प्रतिभा

दिपाली सांगवान आब

तू

तू एक दुआ था
जो बिन माँगे फल गयी थी
खुदा की यह नेमत
मुझे अज़ीज़ थी बहुत
मगर मैं
इस बात से अनजान थी
की तू एक नेमत थी

जब मैने तुझ पर
हक़ जताया
वो नेमत मुझसे छीन ली गयी
सच
माँगने पर तो भीख भी नही मिलती

तू
वो वक़्त है
जो मैने जिया है
जिसने मुझे रुलाया भी
हँसाया भी
मुझे मुझ से मिलाया भी
मगर
वक़्त की आदत है
बीत जाना

तू वक़्त था

तू
वो रिश्ता है
जो मेरा हमदर्द भी है
हम राज़ भी
जिसकी छाँव में
मैं महफूज़ थी

शायद मुझे ही
रिश्ते संभालना नही आया

तू
एक ख्वाब था
ज़िंदगी का
ख़ुशी का

ख्वाब भी कभी
सच हुए हैं भला

तू
एक कसक है
याद आता है
तो होंठों पर
ख़ुशी की एक लक़ीर खिंच जाती है
और जाते जाते
एक तड़प छोड़ जाता है

तू बस एक कसक बन गया है

मैं तेरे दोस्त से कहती हूँ
कह दे तुझसे
कि मैं अब नही रही

कि तुझसे जुड़ के ही तो
पाई थी खुद की पहचान मैंने
तू जाते जाते
मेरे होने का एहसास भी ले गया

तू मुझे साथ ही ले गया…!!

( कुछ लोग रूह में बस जाते हैं
और जाते जाते
उसे साथ लिए जाते हैं!)

मुलाक़ात

मुद्दतों बाद तुझसे दोस्त आज कैसे मिले?
कुछ तकल्लुफ की बेड़ियों में हैं जकड़े पाँव
कुछ ताल्लुक की डोर फासलों से झीनी हुई
ओढ़ रखा है तूने मैंने नकाब ए अना जो
अपने पिन्दार पे उसकी परत है फैली हुई

तुझसे दिल से गले मिलूँ तो गिले धुल जाएँ
आज दिल आँसुओं से भीग नर्म हो जाए
मौसमों का हिसाब रखें फिर
किसने कैसे ये दिन बिताएं हैं
किसने कुर्बत की गजलें जोड़ी हैं
किसने हिज्राँ में गीत गाये हैं

प आज ये नहीं है जो कल था
या तो ये झूठ है या वो छल था
तेरी मेरी तो एक हस्ती थी
आज दो हो गए हैं तो कैसे?
दिल ये चाहे के नोच दूँ चेहरे
दिल ये बदले हैं तो बदले कैसे?

हमने सोचा न था ये वक़्त इक दिन
रंग बदलेगा तो अज़ाब होगा
जो गुजारे थे साथ में लम्हे
वक़्त वो सच नहीं फिर ख़ाब होगा
दश्त ओ सेहरा में तिशनगी जैसे
आज मिलते हैं अजनबी जैसे

तो ये बेहतर है कि हम न ही मिलें
मुद्दतों बाद जो हम ऐसे मिले!

© 2009 Dipali Sangwan Aab; Licensee Argalaa Magazine.

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