अर्गला

इक्कीसवीं सदी की जनसंवेदना एवं हिन्दी साहित्य की पत्रिका

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युवा प्रतिभा

सत्येन्द्र कुमार अग्रवाल

आँसू

आँसू है जो ये जीवन के.
गुज़रते बीतते वक़्त के गीले रंग हैं
कभी पालने की बोली थे ये.
फिर बचपन की हट
आँसू है जो ये जीवन के.
गुज़रते बीतते वक़्त के गीले रंग हैं
मिलते बिछुड़ते लोगों का संगम हैं ये.
खुशियों और कष्टों का पहला संग हैं. ये.
जीवन की हर उथल पुथल का अंग हैं ये.
जीवन के हर अंश के सप्तरंग हैं ये
आँसू है जो ये जीवन के.
गुज़रते बीतते वक़्त के गीले रंग हैं

नन्ही परी

बस यूँ ही अचानक एक दिन
एक नन्ही परी से मुलाकात हो गयी
वो कुछ घबराई शायद गुस्से मैं रहती थी
और आँखो के रूखेपण से दुनिया से
सदा प्रश्न पूंचछति थी …
मैं ना जाने कहा से उसकी
दुनिया मैं आया था.
फिर बिन सोच समझकर उसने
मुझसे आँखो का काजल माँगा था
उसके घावों को देखकर.
खुद और इंसानियत पर शर्मसार था
छोड़ जमाने को मैने उसको समझाया था
और अपने नाख़ून नॉचकर उंगलियों से उसे काजल.
लगाया था
बीतते वक़्त मैं उसकी अपने आप से.
पहचान हो चली
शायद अब अपनी चमक वो अब जान गयी
अब सूरज और चाँद छोड़ वो तारों से
बात करती है
वो आज सुन्दर और सजीव है
वो नन्ही पारी मेरी परियों की
रानी है
बस यून ही अचनका एक दिन.
एक नन्ही पारी से मुलाकात हो गयी
वो आज भी सुन्दर और सजीव है
वो नन्ही पारी मेरी परियों की

© 2009 Satyendra Kumar Agrawal; Licensee Argalaa Magazine.

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