अर्गला

इक्कीसवीं सदी की जनसंवेदना एवं हिन्दी साहित्य की पत्रिका

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युवा प्रतिभा

शाश्वत श्रीपर्व

दादी की आँखें

लिये हुए ममता का भण्डार
जब देखती है हमारी ओर
आँखें दादी की
लगता है कि अब भी सार्थकता
है हमारे जीवन में

लिये हुए एक प्यारा डर
कि हम फिर गिर न जायें
लगता है अब भी कोई चिन्तित
हमारे वजूद के लिये

जब निहारती हैं दादी की आँखें
लगता है जैसे
सारा संसार दे रहा है आशीष
उन आँखों के रास्ते
लगता है अब भी है
हमारे साथ के लिये
हमारे भलाई के लिये

एक टक निहारती है
जाब जाते हम परदेश
पूछती है पुचकरते हुए
कब लौटोगे फ़िर

आँखें सुनाती है लोरियाँ,
गाती हैं गुनगुनाती हैं,
कि फ़िर हम चैन की नींद सोए.

गाती है सोहर फ़िर
को कोई नया जीवन
जन्मे और पुकारे उस बूढ़ी देह को
जिसने बनाया कितनों को मजबूत

देखता नहीं अब कोई इन आँखों में
फ़ुर्सत नहीं अब किसी को
इन बूढ़ी-मरती आँखों मे झाँकने की

जब ये आँखें उठती है तो उठता है
एक आशीर्वाद से भरा हाथ
फ़िर से सिर पे फ़ेरने के लिए
कि कोई नजर न लग जाए हमें
किसी गलत नजर की

इन आँखों मे झाँकने की जरूरत है अब
कि ये हँसती हैं हमारी खुशी में
हमारे दुख के साथ रोती हैं
बस जरूरत है एक बार प्यार से पलटने की
फ़िर जिन्दा हो जायेगी ये
हमे खुश रखने की कोशिश में
क्योंकि ये माँगती नहीं कुछ
होती है देने को तैयार हमेशा हमें
खुशियाँ, आशीर्वाद, दुआएँ और प्यार.

मत बोलो हिन्दी

मत बोलो हिन्दी
गुनाह है ये,
बोलोगे तो कोई
रहस्य खुल जायेगा,
लौटने को करेगा मजबूर
अपने गरीब घर को
बोलोगे तो जरूर ही
ठूस कर भेज दिये जाओगे गाँव
ट्रेन के जनरल डब्बे में
कोई मार देगा गोली
कोई काट देगा गला खुखरी से
यहाँ बांग्लादेशी हैं बर्दाश्त
पर बर्दाश्त नहीं अपने हिन्दी बोलते भाई
अपने देश के ही.

कि गुनाह है ये
ना करो ये गुनाह
अपने संस्कृति से जुड़े रहने का
मत मनाओ छठ
मत खाओ सतुआ, भात और तरकारी
कि गले मे ही अटक जायेगा.
बाहर गया हुआ
तुम्हारा सगा
किसी अनजान के हाथों
किसी अनजान कारण
फ़ाँसी लटक जाएगा.

चले गाँव फ़िर से

गाँव कहता है सबसे, लौट आओ दुबारा
आओ परदेश छोड़े, घर के ईटों को जोड़ें

आओ परदेश छोड़ें, चलें गाँव फ़िर से
माँ क स्नेह मिलेगा, और दुलार बहन का
मिलेगी बगल की शादियों की खुशियाँ.
किसी अपने को अब एक कन्धा मिलेगा

फ़िर खेलेंगे कबड्डी
अमिया तोड़गें, और खायेंगे जामुन
फ़िर से कंचे की खन-खन गूँजा करेगी,
लुक्का-छुप्पी चलेगी, नहायेंगी नदियाँ.

बाबा के कन्धे को, चाहिये अब सहारा,
दादी की कहानियों को कान मिलेगा.
अपने खेतों की मीठी खुशबू मिलेगी
दौड़ेंगे भागेंगे, तेज बहुत तेज फ़िर से,
पतंगे उड़ेंगी, चलेंगी गुलेलें.

बहन बाँधेगी, राखी चहक के
चाची फ़िर गायेगी गीतों कि लड़ियाँ
कन्धे पे घूमेंगे चाचा के फ़िर से,
अब कोई यहाँ न गैर होगा.

चलो आओ, गाँव अकेला पड़ा है,
नीरस, अकड़ा और मरा - सा पड़ा है,
चल के फ़िर से उसे जिंदा करें हम,

अपने लोगों की टूटी खुशियाँ लौटाए
अपनी खुशियों के घुटते दम को फ़िर से
निर्गुण, निर्दोष शुरुआत दे आएँ
चलो आओ फ़िर हम
एक बार गाँव हो आएंँ.

© 2009 Shashwat Shriparv; Licensee Argalaa Magazine.

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