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इक्कीसवीं सदी की जनसंवेदना एवं हिन्दी साहित्य की पत्रिका

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हस्तक्षेप

असित

नन्दीग्राम, तसलीमा नसरीन और अस्मिता की राजनीति

कलकत्ते की घटनाओं को अग़र सांप्रदायीकरण भटका देता है.परस्तावित विशेषार्थिक क्षेत्र (सेज़) से किसानों का विस्थापन, नव-उदारवाद का आक्रमण एवं पुनर-उपनिवेशीकरण के ज्वलंत मुद्दे को दिग्भ्रमित एवं दिशाहीन कर दिया है. संगठित वामपंथ और दक्षिणपंथ, विभिन्न प्रकार के कुंठाग्रस्त व हासिये के सांप्रदायिक संगठनों के दबाव में आ रहे हैं. उपरोक्त परिघटना को सन 2002 की गुजरात का लोमहर्षक सांप्रदायिक नरसंहार, रामजन्म भूमि एवं रामसेतु के संदर्भ में देखना होगा. जिसमें संघ परिवार के नेतृत्व वाली हिन्दू फ़ासीवादी ताक़तों ने विघटनकारी इरादों के द्वारा पूरे देश को गिरफ़्त में ले लिया है. सांप्रदायिक हिंसा की पीड़ा को हम विभाजन के बाद से ही समझ सकते हैं जिसमें जबलपुर, टाटानगर, भागलपुर, मेरठ, बॉम्बे आदि जगहों में सांप्रदायिक हिंसा की एक लंबी श्रन्खला है. जिसमें फ़ासीवादी सांप्रदायिक हिन्दू ताक़तों की भूमिका स्पष्ट उजागर है. इसका यह मतलब कतई न मान लिया जाए कि कांग्रेस का चरित्र बिलकुल साफ़ है. इसकी नरम हिन्दुत्ववादी राजनीति ने संघ परिवार को इन मुद्दों को आसानी से मुहैया करवाया. नन्दीग्राम का मुद्दा किसानों का विस्थापन एवं उससे जुड़ी वहाँ पर घटित महिलाओं के साथ यौन उत्पीड़न, घर जलाना, मानवाधिकार का हनन आदि था. इन मुद्दों की माँग यह है कि इन्हें गंभीरता से लिया जाए लेकिन (ऑल इन्डिया मायनॉरिटी फ़ोरम) का कोलकाते तसलीमा नसरीन के निर्वासन की माँग को नव उदारवाद का एवं उसके परिणामस्वरूप किसानों का विस्थापन जैसे गंभीर मुद्दों को पीछे ढकेल दिया है. इसके अतिरिक्त मेहनतकश किसान एवं मज़दूरों की रोज़ी रोटी से जुड़ी समस्या को सांप्रदायीकरण के फ़लस्वरूप बहलाने की कोशिश की जा रही है. इसके द्वारा दक्षिणी एशिया में महिलाओं का अधिकार अभिव्यक्ति की आज़ादी के मुद्दे को हासिए पर ढकेल दिया है.

अमरीकी साम्राज्यवाद एवं इसके (नाटो) सहयोगियों का तथाकथित आतंकवाद के ख़िलाफ़ युद्ध का विमर्श एवं इस्लाम के प्रति दुष्प्रचार के फ़ंदे में अड़े बग़ैर हम लोगों को दक्षिण एशिया में अल्पसंख्यक समुदाय के अंदर महिलाओं का उत्पीड़न एवं अभिव्यक्ति की आज़ादी के मुद्दे को गंभीरता से लेना होगा. इन सभी समस्याओं को हमें तीसरी दुनिया के समाजों के अधूरे पड़े जनवादी कार्यभार एवं विखण्डित आधुनिकता के संदर्भ में देखना होगा.जहाँ पर शासन कर रहे आभिजात्य वर्ग ने मध्ययुगीन, संकीर्ण, ब्राह्मणवादी, पुनरुत्थानवादी, रूढ़िवादी ताक़तों के साथ गंभीर समझौता किया है दूसरी तरफ़ अपने देशों को साम्राज्यवादी लूट के लिए खोल दिया है.

कॉमरेड विमान बसु के द्वारा तसलीमा नसरीन को कोलकात्ता छोड़ने को कहना अत्यंत दु:खद है. हालाँकि उन्होंने अपने वक्तव्य को दूसरे ही दिन बदल दिया. इसके द्वारा पुनर उत्थानन्वादी, रूढ़िवादी, मुस्लिम कट्टरपंथी ताक़तों को बढ़ावा देना है. तसलीमा नसरीन का मुद्दा केवल अभिव्यक्ति की आज़ादी का नहीं बल्कि दक्षिण एशिया में महिला अधिकारों के तमाम आयमों के साथ जुड़ी हुई समस्याओं का मुद्दा है. तसलीमा बंग्लादेश एवं दक्षिण एशिया में महिलाओं के मध्ययुगीन उत्पीड़न एवं शताब्दियों की यंत्रणा के बारे में मुखर रूप से लिखती रही हैं. यह वाम और जनवादी ताक़तों का कारनामा है साम्यवादी और विशेषकर महिला आंदोलन का कर्तव्य बनता है कि तसलीमा के साथ मज़बूती से खड़ी हों और भारत सरकार से माँग करें कि उन्हें नागरिकता एवं सुरक्षा मुहैया करायी जाए.

तसलीमा नसरीन के साथ जुड़े पूरे घटनाक्रम को हमें मुस्लिम महिलाओं की (हमारे देश में) अरसे से विलंबित न्याय एवं समान अधिकार की राजनीति को सही परिप्रेक्ष्य में देखने की ज़रुरत है. भा. ज. पा. एवं कांगरेस ने मुस्लिम महिलाओं को अपने अधिकारों को देने के बारे में बहुत गंदी कूट्नीति अपनायी है. वोटबैंक की घिनौनी रजनीति के चलते इन लोगों ने ऐसे मुद्दों का साम्प्रदायीकरण कर दिया है. सुप्रीम कोर्ट के प्रसिद्ध शाहबानो का फ़ैसला आने के बाद राजीव गांधी ने मुस्लिम कट्टरपंथियों के दबाव में मुस्लिम महिला अधिकार कानून पारित करवाया. और इन महिलाओं की वाज़िब माँगों को नज़रंदाज़ करके दशकों पीछे ढकेल दिया. जिसके चलते अब यह एक मुश्किल सवाल, हालात बनकर हमारे सबके सामने खड़ा है.

भा.ज. पा. ने समान रूप से सदैव अवसरवादी और सांप्रदायिक रवैया अपनाकर संगीन स्थितियों का नाज़ायज़ फ़ायदा उठाया है. यह अवसरवादी सांप्रदायिक पार्टी एक समान नागरिक कानून और तसलीमा की नागरिकता की माँग कर रही है दूसरी तरफ़ ग़रीब बांग्लादेशी कामगारों को बहिष्कृत करने की माँग उठा रही है.इसके अतिरिक्त यह विषैली ग्रंथि यहीं नहीं ख़त्म होती बल्कि अपने शिकंज़े में पूरे मुस्लिम समुदाय को आतंकित कर दूसरे दर्ज़े की नागरिकता के दर्ज़े में ढकेल देना चाहती है. जिसके परिणामस्वरूप देश का पूरा अल्पसंख्यक समुदाय हमेशा भय और असुरक्षा की भावना से घिरा रहता है. सांप्रदायिक दंगे, बलात्कार की वीभत्स कथा को दुहराने की ज़रूरत नहीं है. संघ परिवार के हाथों से अनगिनत निरीह मुस्लिम, महिलाएं बच्चों का मासूम और निर्दोष खून बह चुका है.

सन 2002 में गुजरात का जघन्य रक्तपात स्वातंत्र्योत्तर भारत का सबसे घृणास्पद एवं कलंकित अध्याय है. जिसके द्वारा हर हिन्दुस्तानी नागरिक का सिर शर्म से झुक जाता है. समग्र रूप से इस देश में मुस्लिम समुदाय एक उत्पीड़ित समुदाय है. लेकिन हमें मुस्लिम समुदाय के अंदर महिलाओं के अधिकारों की माँग को उठाना चाहिये एवं व्यापक मेहनतकश जनवादी मुस्लिम, प्रतिक्रियावादी मुस्लिम, धार्मिक कठमुल्लाओं के चंगुल से बचाना होगा. आज यह ज़रूरी हो गया है कि हिन्दुस्तान के प्रगतिशील जनवादी एवं महिला आंदोलन को गंभीरता से लिया जाए. इस संदर्भ में हमें अल्पसंख्यक एवं बहुसंख्यक सांप्रदायिकता को सही परिप्रेक्ष्य में देखना होगा. ये दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं यह जनवादी आंदोलन के उत्कृष्ट कार्यों को पीछे ढकेल देना चाहता है और पूरी तरह से मध्ययुगीन पुनरुत्थानवादी एवं संकीर्ण ताक़तों को मज़बूत करता है. ताकि समाज में मध्ययुगीन बरबर्ता एवंव दासत्व की विचारधारा को मज़बूत किया जा सके हिन्दु और मुस्लिम तालिबानिज़्म मूल रूप से महिला व जनवाद विरोधी हैं.

उपरोक्त तथ्यों के आलोक में हमें अस्मिता की राजनीति को सही परिप्रेक्ष्य में देखना होगा. कई प्रकार की अस्मिताएं हैं-जातीय, लैंगिक, धार्मिक, यौन आदि. इनमें से कुछ उत्पीड़क हैं और कुछ उतपीड़ित महिला दलित समलैंगिक धार्मिक, भाषायी अल्पसंखयक आदि मुक्ति के संघर्ष में जनवादी अंतर्वस्तु है.

अत: प्रगतिशील एवं जनवादी आंदोलनों को इन संघर्षों का मज़बूती से समर्थन करना चाहिये. दूसरी ओर प्रतिक्रियावादी फासीवादी अस्मिता की राजनीति जैसे भारत में सा,घ परिवार की हिन्दुत्व की राजनीति, नाज़ीवादी और नस्लवाद आदि का विरोध करना चाहिए और इन बौद्धिक लोगों के साथ रहकर उनका साथ देना बेहद ज़रूरी है एवं दक्षिण एशिया में मुस्लिम महिलाओं की माँगों को ज़ोर ज़ोर से आवाज़ ठाना चाहिए. ताकि तमाम संकीर्ण रूढ़िवादि पुनर उत्थान वादी सांप्रदायिक ब्राह्मणवादी मध्ययुगीन सामंती ताक़तों का मुँह तोड़ जवाब दिया जा सके.

(अनुवादक: अनिल पु. कवींद्र)

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