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इक्कीसवीं सदी की जनसंवेदना एवं हिन्दी साहित्य की पत्रिका

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हस्तक्षेप

धीरेंद्र बहादुर सिंह

हिन्दी आलोचना और अस्मिता का प्रश्न

साहित्य का मुख्य सरोकार समाज से है. सामाजिक, सांस्कृतिक समस्यायों, द्वंद्वों और संघर्षों की अभिव्यक्ति इसमें होती रही है. प्राचीनकाल के सगुण, निर्गुण, द्वैत, अद्वैत आदि से लेकर छायावाद, प्रगतिवाद, मार्क्सवाद, आदि सभी वाद विवाद साहित्य में रूपायित हो उसे गति देते रहे. लेकिन ये वाद भी समाज के सभी कोनों को नहीं छू पाये थे. वामपंथ ने तो वर्ग की बात की तो लेकिन भारतीय संदर्भ में जाति उनके दायरे से बाहर ही रह गयी. स्त्रियों की आधी दुनिया तो किसी भी सैद्धांतिकी का विषय ही न बन सकी. इस प्रकार धर्म, नस्ल, जाति, लिंग, क्षेत्र, भाषा आदि के रूप में विभिन्न अस्मिताएँ आ खड़ी हुईं और उत्तर आधुनिक विमर्श के रूप में दर्ज़ हुयीं.

अस्मिता एक आधुनिक अवधारणा है. यह आत्म और अन्य के सापेक्ष अलग और विशिष्ट मानती है लेकिन उन समूहों या समुच्चयों से उभयनिष्ठता भी चाहती है जो विशिष्टता की श्रेणी में आ चुके हैं "अस्मिता सिद्धांत एक ही परिस्थिति में विभिन्न लोगों द्वारा किये गये विभिन्न आचरणों में अपनी व्याख्या खोजती है." 1.

उत्तर आधुनिक विद्वानों ने इतिहास के अन्त की बात की है लेकिन अस्मितावादी चिंतक इतिहास के अंदर से ही अपनी सार्थकता की तलाश करता है. अपने को तार्किक और न्यायपूर्ण सिद्ध करने के लिये यह इतिहास की ही शरण में जाता है. पुरूषोत्तम अग्रवाल के शब्दों में "अस्मिता परिभाषित ही होती है, स्मृति से.. बात उत्पीड़ित अस्मिता की हो या उत्पीड़क अस्मिता की" 2 अतीत में हुये उत्पीड़न के आधार पर ही यह अपना स्वरूप ग्रहण करती है. जैसे दलित अस्मिता, ब्राह्मणवादी वर्चस्व के विरूद्ध, स्त्री अस्मिता पुरूष वर्चस्व के विरूद्ध तथा क्षेत्रीय अस्मिता केंद्रीय सत्तावाद के विरूद्ध. उत्पीड़न की स्मृतियाँ अस्मितावादी विमर्श को तटस्थ नहीं रहने देती. क्योंकि अपने अस्तित्व के लिये इसे उत्पीड़क के विरूद्ध कार्यक्रम बनाने ही पड़ते. इस प्रकार स्वतंत्रता, समानता और न्याय के लिये खड़ी हुई अस्मितावादी धारणा अन्तस्थ बदले की भावना में बदल जाती है. अंतत: बदले की भावना की लपेट में यह अपने आपको इस हद तक सीमित और संकीर्ण कर लेती है कि दूसरी अस्मिताओं से इसकी टकराहट हो जाती है.

अस्मितावादी चेतना के साथ ही 'हम' और 'अन्य' का बोध पैदा होता है. एक सीमा तक यह अनिवार्य भी था जब "अस्मिताबोध से जातीय चेतना और फ़िर राष्ट्रवाद इसी क्रम में गण समाजों से राष्ट्र, राज्य तक की यात्रा संपन्न हुई" 3 लेकिन "इसी के साथ "हम" और "अन्य" के बोध का भी उदय हुआ इसी "हम" और "अन्य" के बोध का जब ब्रिटिश साम्राज्यवादी लिप्सा से मेल हुआ तो दुनिया में उपनिवेशों का उदय हुआ." 4 यह अकारण नहीं कि अनेक युद्धों की पृष्ठभूमि में राष्ट्र राज्य जैसी बड़ी अस्मिताओं की टकराहट ही थी. आज भी अस्मितावादी विचार संदर्भित परिदृश्यकों 'आत्म' और 'अन्य' के घेरे में बाँट देता है. वह समूचे "आत्म" की प्रतिनिधिकता का दावा करते हुये 'अन्य' के विरूद्ध मोर्चा खोलता है. अपनी इसी 'एकाधिकारी' प्रवृत्ति के कारण अस्मितावादी आलोचक दावा करता है कि दलित या स्त्री जीवन के लेखन में नुमाइंदगी सिर्फ़ दलित या स्त्रियाँ ही करें." 5.

सामाजिक अस्मिताओं का उभार हिंदी साहित्य में नब्बे के दशक से दृष्टिगत होता है, जब दलित और स्त्री लेखन के रूप में इसकी पारम्परिक रचनात्मक भूमि को चुनौती दी जाती है. स्त्री और दलित साहित्य का उद्गम ही संघर्ष और आंदोलन से हुआ है. अभी तक के हिंदी साहित्य में इन अस्मिताओं की बहुत ही सीमित और अप्रामाणिक अभिव्यक्ति रही है. हिंदी आलोचना अस्मितावादी लेखन के प्रति बहुत सहज और सहिष्णु नहीं रही है. बात स्त्री लेखन से शुरू करें तो सन चौरासी की 'सारिका' में 'पीढ़ियाँ: आमने सामने' के अंतर्गत डेढ़ दो दशकों के स्त्री जीवन के बारे में नामवर सिंह कहते हैं "कहानी लेखिकायें जितनी हैं उनमें से दो तीन को छोड़कर इसलिये प्रकाशित हो रही हैं कि वे महिलायें हैं" 6 स्त्रियों की रचनात्मकता के बारे में संदेह नामवर सिंह को ही नहीं है, संपूर्ण इतिहास लेखन इस बात की गवाही देता है कि स्त्री साहित्य के इतिहास से ग़ायब ही है और यदि है भी तो अपने व्यक्तित्व के कारण नहीं बल्कि किसी की पत्नी, बेटी या बहन बनकर. आचार्य शुक्ल ने मीरा का परिचय इस प्रकार दिया है. "ये मेड़तिया के राठौड़ रतनसिंह की पुत्री, राव दूदा जी की पौत्री और जोधपुर के बसाने वाले प्रसिद्ध राओं जोधाजी की प्रपौत्री थीं" 7 शुक्लजी ने हिंदी की प्रथम कहानियों में शुमार होने वाली "दुलाई वाली" की लेखिका "बंग्महिला" का परिचय भी कुछ इसी प्रकार से दिया है कि ये "मिर्जापुर निवासी प्रतिष्ठित बंगाली सज्जन बाबू राम प्रसन्न घोष की पुत्री और बाबू पूर्ण चंद्र की धर्मपत्नी थीं" 8 इस परिचय से यही साबित होता है कि उपयुक्त पुरूष संबंधों से जुड़कर ही वह सार्थक हुई है. "यदि पुरूषों के परिचय और विवेचन के साथ इनकी तुलना की जाय तब पुरूषवादी निहितार्थ उभरकर सामने आने लगते. ऐसे इतिहासों को भला स्त्रियों द्वारा स्वीकृति की उम्मीद क्यों करनी चाहिये."9

आचार्य शुक्ल के साहित्यिक प्रतिमान "लोकधर्म" और "लोकमर्यादा" के दायरे में शिक्षित जनता आती है. स्त्रियाँ वैसे भी अधिकतर अशिक्षित हि हैं. अत: उनके इतिहास की परिधि में वे नहीं आती. आचार्य हज़ारी प्रसाद द्विवेदी ने "बाणभट्ट की आत्मकथा" में निपुणिका के चरित्र की रचना की है. निपुणिका और "बाण" के चरित्र से यह स्पष्ट झलकता है कि भारतीय चिंता में स्त्री को ज़्यादा से ज़्यादा निपुणिका जैसी बनने की छूट दी जा सकती है. नामवर सिंह ने भी "कविता के नये प्रतिमान" में स्त्री के लिये कोई जगह नहीं छोड़ी है. "नये प्रतिमानों में स्त्री को सिरे से ख़ारिज़ किया गया है. साहित्य की चिंताओं के लिये आधी आबादी के लिये कोई तनाव पैदा किया हो ऐसा इनके मंतव्यों से नहीं लगता. छायावाद में महादेवी को जितना स्थान दिया है. वह अपने आप में बड़ा प्रमाण है. कुल मिलाकर महादेवी की सत्ताइस पंक्तियों का उल्लेख है और वह भी छायावादी रूप विधान और भाषायी संरचना पर बात करते समय. ऐसा करते समय हिंदी के विद्वान आलोचकों के दिमाग में यह पूर्वाग्रह ठोस रूप में घर किये रहता है कि कोई वैचारिक तर्कपूर्ण और निर्णायक मत रखने की क्षमता स्त्रियों में नहीं पायी जाती." 10.

इस प्रकार हिंदी साहित्य का इतिहास लेखन वस्तुत: पुरूषों के द्वारा और पुरूषों के लिये ही है. यह स्त्री को पहचान दिलाने में अक्षम सिद्ध हुआ है. इसीलिये महिला लेखन के रूप में स्त्री अस्मिता की खोज जारी है लेकिन अस्मितावादी लेखन "स्त्री दलित" की सीमाओं की और इशारा करते हुये नामवर सिंह लिखते हैं कि इसमें "संपूर्ण समाज की अभिव्यक्ति नहीं होती दरसल इस प्रकार के लेखन छोटे समुदायों के हितों में रखकर किये जाते. ऐसा साहित्य अर्धसाहित्य को प्रतिबिंबित करता है. यह लेखन तात्कालिक प्रतिक्रिया का परिणाम है, जबकि साहित्य का मूल स्वरूप मानव को मुक्ति प्रदान करने वाला है. खंड खंड में मुक्ति साहित्य का लक्ष्य नहीं है." 11.

अस्मितावादी साहित्य सार्वभौमिक मूल्यों को नकारता है और खंड खंड में मुक्ति को अपना लक्ष्य मानता है. इसी के जवाब में रोहिणी अग्रवाल कहती हैं कि "बेशक सारे देशी विदेशी क्लासिक्स खँगाल जाइये, क्या सार्वभौमिक और सनातन मूल्यों के अमूल्य अलंकृत बाने के तले उनके युग का सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक, आर्थिक और भौगोलिक जीवन अपनी समूची भदेस विकृतियों और उत्कट जिजीविषाओं के साथ धड़कता नज़र नहीं आता? दूसरे क्या एक व्यक्ति का सत्य उतना ही शिद्दत से दूसरे व्यक्ति का सत्य भी हो सकता है?. सच की अनेक तस्वीरें हो सकती हैं? सच की अनेक तस्वीरें होती हैं और अनेक स्तर? और यह कि दृष्टिगत भिन्नता ही सच के भीतर परत दर परत छिपे अनेक चेहरों में किसी एक ख़ास चेहरे को उजागर करती है? तीसरे क्या हम एक भी ऐसी रचना गिना सकते हैं जहाँ परंपरागत सवर्ण व्यवस्था की रहनुमाई में शंबूकों का वध न किया गया हो, एकलव्यों के अँगूठे न काटे गये हों, द्रौपदियों का चीरहरण न हुआ हो, शूर्पणखाओं को महज़ विवाह प्रस्ताव रख देने के संगीन जुर्म में "नाक" से हाथ न धोना पड़ा हो? अपने-अपने वर्गों का प्रतिनिधित्व करते हुये यदि ये चारों नाम भी मानव हैं तो यकीनन आज "खंड खंड में मुक्ति" ही साहित्य का लक्ष्य बन गया है क्योंकि सवर्ण-मानव और अवर्ण-मानव की "मनुष्यता" में अभी गहरा अंतर शेष है." 12.

अस्मिताबोध के कारण स्त्री की अपनी पहचान ज़रूर हुयी है लेकिन अन्य अस्मिताओं के बरख़्स इसकी अस्मिता आत्मपरक होती गयी है क्योंकि "अस्मिताबोध बुनियादी तौर पर विभेद की धारणा रखता है और जब यह ऐतिहासिक प्रक्रिया से विच्छिन्न होकर अपनी अलग पहचान बनाने के लिये उत्तेजित होता है तो स्वाभाविक रूप से अन्य उत्पीड़ित अस्मिताओं के प्रति कटु हो जाता है. अमेरिका में स्त्री ने यौन-मुक्ति के लिये आंदोलन किया पर श्वेत स्त्रियों के बीच अश्वेत स्त्रियों के प्रति हिंसा का भाव पैदा हुआ. बेल्हुक्स ने अपने एक लेख में नस्लवाद और नारीवाद के टकराव पर विचार करते हुये उल्लेख किया है कि स्वेत स्त्रियाँ किस प्रकार अश्वेत स्त्रियों का अँग-भंग कर देती थी." 13 इसलिये बात सिर्फ़ अपनी अस्मिता की खोज से नहीं बनने वाली, दूसरी अस्मिताओं के लिये भी उतना ही अवकाश देना होगा क्योंकि "अस्मिता के सशक्तीकरण का यह अनिवार्य परिणाम होता है कि वे आपस में टकराने लगती हैं." 14 इसलिये अस्मितावादी साहित्य को उस "वैकल्पिक आख्यान" की खोज करनी होगी जिससे वह "खंड खंड में मुक्ति" को मानवता की मुक्ति से जोड़ सके.

अस्मितावादी लेखन के रूप में सर्वप्रथम दलित साहित्य ने ही अपना सौंदर्यशास्त्र विकसित करने का प्रयास किया है. चूँकि इस साहित्य का उद्गम ही संघर्ष और आंदोलन से हुआ है इसलिये अपने प्रारंभिक चरण में यह बहुत ही उग्र और आक्रामक रहा है. दलित सौंदर्यशास्त्र को विकसित करने में ओमप्रकाश वाल्मीकि, सूरजपाल चौहान, मोहनदास नैमिराश्य और कँवल भारती जैसे रचनाकारों का महत्वपूर्ण योगदान है. दलित सिद्धांतशास्त्र यह कहता है कि दलितों के बारे में लिखने का अधिकार सिर्फ़ दलितों को ही है क्योंकि वे ही दलित की संवेदना को पकड़ सकते. ग़ैर-दलित लेखकों में संवेदना की इस ज्वाला को सहन करने की शक्ति नहीं है. दलितेत्तर लेखक महज़ सहानुभूति दिखा सकता है. रचना और आलोचना के स्तर पर वह दलित-लेखन के साथ न्याय नहीं कर सकता. हिंदी आलोचना में दलित चिंतन के सरोकारों को कबीर की विभिन्न व्याख्याओं में देखा जा सकता है. इस सिलसिले में धर्मवीर की पुस्तक "कबीर के आलोचक" ग़ौरतलब है. इस पुस्तक में उन्होंने जिन आलोचकों की जाँच पड़ताल की है. वे सभी ब्राह्मण ठहरते हैं. धर्मवीर ने यह दिखाने का प्रयास किया है कि आलोचकों ने अपने संस्कारों और विचारों के अनुरूप ही कबीर को ढालने का प्रयास किया है लेकिन इस सिद्धांतशास्त्र की सबसे बड़ी कमज़ोरी तब उजागर होती है. जब उनके द्वारा कबीर की कविता एक दलित द्वारा दलितों को संबोधित कविता मान ली जाती है. कबीर को हिंदू, मुसलमान जैसी धार्मिक अस्मिताओं के बरख़्स दलित अस्मिता का वाहक मान लिया जाता है.

अस्मितावादी लेखन के इस "अतिचार" से कबीर को बचाने के लिये पुरूषोत्तम अग्रवाल सशक्त और सार्थक हस्तक्षेप करते. वे लिखते हैं कि "जाति की तथाकथित विशेषताओं को मूल्याँकन की कसौटी बनाने वाले से कबीर और दीगर निर्गुण संतों का यही कहना है.

जात न पूछो साधु की पूछ लीजै ज्ञान
मोल करो तलवार का पड़ी रहन दो म्यान."

इन वर्णाश्रमवादियों की तरह ये लोग भी मानते हैं कि महत्व किसी के विचारों और कर्म का नहीं, उसके वंश और जाति का है. इन लोगों के लिये कबीर ही नहीं आलोचकों और अध्येताओं की जाति भी महत्वपूर्ण हो उठी है. बल्कि जाति ही मूल्याँकन का प्राथमिक आधार बन गयी. कबीर और उनके समानधर्मी कवियों की कविता श्रोताओं के जिस समुदाय की रचना करना चाहती है. उस समुदाय का सदस्य होने की शर्त यह नहीं कि आप जाति विशेष से संबंधित हों, यह समुदाय रक्त या वंश की समानता पर आधारित समुदाय नहीं, बल्कि सरोकारों, भावनाओं, विचारों और मूल्यों की समानता पर आधारित समुदाय है." 15 धर्मवीर का मानना है कि कबीर हिंदू और मुसलमान धर्मों को नकारकर "दलित धर्म" की स्थापना करना चाहते हैं. कबीर को दलित अस्मिता का वाहक सिद्ध करने के लिये उन्होंने कबीर को दलित और उनकी कविता का संबोधन दलितों के लिये माना है. पुरूषोत्तम अग्रवाल के शब्दों में "हिंदू शब्द जिस तरह एक भौगोलिक विस्तार के निवासियों को अन्यों द्वारा दिया गया नाम है "दलित धर्म" उसी तरह कबीर संवेदना को धर्मवीर द्वारा दिया जा रहा नाम है. जिस तरह सिस्टर निवेदिता एक सावरकर के हिंदुत्व और हिंदू धर्म की परिभाषा में नहीं समा सकती, क्योंकि अंतत मामला "साझे रक्त" का है. उसी तरह धर्मवीर का "दलित धर्म" भी विशुद्ध रूप से जन्मना दलितों द्वारा दलितों के लिये ही हो सकता है. बुद्ध का अपराध यही था कि वे जन्मना दलित नहीं थे और अम्बेडकर की भूल यही थी कि इसके बावज़ूद उन्होंने बौद्ध धर्म को दलित अस्मिता का सांस्कृतिक वाहक बनाया." 16.

कबीर की कविता में शोषकों के प्रति आक्रोश और शिक्षितों के प्रति सहानुभूति का स्वर है. उनकी कविता ने सभी शोषितों, पीड़ितों, वंचितों और अन्यायपूर्ण व्यवस्था के विरूद्ध संघर्षरत आम व्यक्ति को स्वर प्रदान किया है. यह मनुष्यता की कविता है. जिसमें सार्वभौम मानवीय मूल्यों का निदर्शन हुआ है. इसे सिर्फ़ दलित अस्मिता की अभिव्यक्ति मानना, अस्मितावादी समझ की सीमा को रेखाँकित करता है. "कबीर की कविता को अस्मिता विशेष की अभिव्यक्ति और स्वप्न तक सीमित कर देना उतना ही समझदारी का काम है जितना कि उनकी सामाजिक आलोचना को जाति विशेष के प्रति विद्वेष का प्रमाण मानना है." 17 ऐसी ही आलोचना दृष्टि का शिकार "अस्मितावादियों के अनुसार कबीर काव्य का अधिकारी वह नहीं हो सकता, जिसे जुलाहे के दु:ख की आत्मानुभूति न हो. या जो दलित धर्म स्थापित करने के राजनीतिक प्रोजेक्ट से इंचमात्र भी असहमत हो" 18 साहित्य की दलित अस्मितावादी दृष्टि किसी भी दलितेत्तर लेखक द्वारा लिखित रचना और आलोचना को स्वीकार नहीं करती. वह चाहे निराला हों या प्रेमचंद. निराला की "कुकुरमुत्ता", "कुल्लीभाट", "वह तोड़ती पत्थर" जैसी रचनायें दलित अस्मितावादियों की दृष्टि में सिर्फ़ सहानुभूति की उपज है. प्रेमचंद की "कफ़न" कहानी तो दलित विरोधी रचना सिद्ध की जाती है." धर्मवीर की कल्पना में "कफ़न" कहानी की बुधिया के पेट में जो बच्चा पल रहा था, वह माधव का नहीं बल्कि किसी सवर्ण के जार कर्म की देन था. इसलिये प्रेमचंद यह नहीं पकड़ पाये कि घीसू माधव ने बुधिया को मरने देकर अपने कफ़न के लिये जुटाये गये रूपयों को शराब में उड़ाकर सवर्णों के "जारकर्म" का नैतिक प्रतिवाद किया था." 19.

सवर्णों को स्वभावत: "जारकर्म" में लिप्त मानने वाले दलित अस्मितावादी धर्मवीर के स्त्री विषयक विचारों को भी याद कर लिया जाये, क्योंकि स्त्री भी समाज की एक उत्पीड़क अस्मिता है. वे लिखते हैं कि "अउरत जब भी चाहे वैश्या बनकर उसके "मर्द के" बसे बसाये घर को उजाड़ देती है क्योंकि औरत खाली है इसलिये उसे सेक्स नहीं, चौबीस घंटे सेक्स की बक़वास चाहिये" 20. ये है. धर्मवीर का स्त्रियों के प्रति रवैया. एक अस्मिता का दूसरी अस्मिता से संबंध का रूप क्या हो? उस कसौटी की खोज करनी होगी. पुरूषोत्तम अग्रवाल के शब्दों में "अनय के प्रति रवैया, यही वह कसौटी है जिसके आधार पर परख़ा जा सकता है कि कोई अस्मिता विमर्श जनवादी राजनीति की ओर जा रहा है. या फ़ासीवादी मानसिकता की ओर किसी उत्पीड़ित, उपनिवेशीकृत अस्मिता की वेदना को स्वर देने का दावा वाला विमर्श अपरिहार्यत: जनवादी ही हो, यह ज़रूरी नहीं. सवाल अस्मिता को परिभाषित करने, अन्य उत्पीड़ित अस्मिताओं के साथ संबंध का रूप निर्धारित करने तथा स्वयं अस्मिता के भीतर की अस्मिताओं को जगह देने का है. यही है-कसौटी" 21.

अस्मितावादी साहित्य के मूल्याँकन विवेचन में हिन्दी आलोचना अक्षम रही है. हिन्दी आलोचकों की अभिजनवादी परंपरावादी दृष्टि दलित या स्त्री रचनाशीलता की व्याख्या मूल्याँकन में निरर्थक सिद्ध होती है. अभिजनवादी दृष्टि ऐसे साहित्य में "साहित्यिकता" की खोज करने लगती है. प्रगतिशील आलोचना भी अपनी विचार प्रक्रिया में वर्ण, जाति और लिंग के लिये जगह न बना पाने के कारण, दलित और स्त्री लेखन का विवेचन विश्लेषण एक सीमा तक ही कर सकी. दलितेत्तर लेखकों और आलोचकों की इस सीमा को रेखाँकित करते हुये मैनेजर पांडेय लिखते हैं कि "सारी सहानुभूति, करुणा, सहृदयता और परकाया प्रवेश की कला चाहे जितनी हों, परन्तु अनुभव की वह प्रामाणिकता नहीं होती, जो किसी दलित द्वारा अपने समुदाय के बारे में स्वानुभूति की पुनर्रचना से उपजे साहित्य में होती है. सचमुच राख ही जानती है जलने का अनुभव कोई और नहीं" 22.

साहित्य जीवन की पुनर्रचना है लेकिन जब यह जीवन पुनर्रचित होता है. तो क्या अनुभव की प्रामाणिकता उसी मात्रा में रह जाती है. मुक्तिबोध के शब्दों में "यह जीवन जब कल्पना द्वारा पुनर्रचित होता है, तब उस पुनर्रचित जीवन में तथा उस जगत में जिये और भोगे जाने वाले जीवन से निसारत: एक हो तो वह पुनर्रचित जीवन निष्फ़ल है. पुनर्रचित जीवन और वास्तविक जीवन के बीच जो अलगाव होता है. ज्यों प्रथक स्थिति होती है, उस अलगाव और प्रथक स्थिति के कारण ही कला में एक अमूर्तिकरण और सामान्यीकरण उत्पन्न होता है." 23.

सृजन प्रक्रिया जटिल होती है. "अनुभूति" से "कृति" तक के रास्ते को मुक्तिबोध के "कला के तीन क्षण" के माध्यम से समझा जा सकता है. मुक्तिबोध के शब्दों में "कला का पहला क्षण तीव्र उत्कट क्षण है. दूसरा क्षण है. इस अनुभव का अपने कसकते-दुखते मूल से प्रथक हो जाना और एक ऐसी फ़ैंटसी का रूप धारण कर लेना, मानों वह फ़ैंटसी अपनी आँखों के सामने खड़ी हो. तीसरा और अंतिम क्षण है फ़ैंटसी के शब्दबद्ध होने की प्रक्रिया का आरंभ. जिस फ़ैंटसी को शब्दबद्ध करने का प्रयत्न किया जा रहा है. वह फ़ैंटसी अपने मूल रूप से इतनी अधिक दूर चली जाती है कि यह कहना कठिन है कि फ़ैंटसी का यह नया रूप अपने मूल रूप की प्रतिकृति है." 24.

इस प्रकार अनुभूति से शुरू होकर कृति तक आते-आते फ़ैंटसी उस रूप में नहीं रह पाती. साहित्य का माध्यम "शब्द" अनुभूति के इस प्रकटीकरण को और भी जटिल बना देता है. "शब्द" किसी समाज का साझा उत्पाद है. "शब्द" अनुभूति के प्रकटीकरण में सक्षम है. या नहीं यह चुनाव लेखक की मेधा पर निर्भर करता है, न कि उसकी जाति पर. कलाकार के लिये किसी जाति विशेष में जन्म लेने से अधिक महत्वपूर्ण है. जीवन यथार्थ को "संवेदनात्मक यथार्थ" और "ज्ञानात्मक संवेदन" से पूरी तरह पकड़ पाना. इसलिये हिंदी आलोचना में भी "किसी भी अस्मितावाद का महत्व सार्वभौम, मानवीय, नैतिक मूल्यों के प्रति उसके रवैये से निर्धारित होना चाहिये." 25 क्योंकि साहित्य का लक्ष्य अंतत: मानव की पूर्ण मुक्ति से है.

1 एड्गर एफ़ बोर्गेट एवं मेरी एल बोर्गेट, इंसाइक्लोपीडिया ऑफ़ सोसियोलोजी, पृ. 87
2 पुरूषोत्तम अग्रवाल, मुझको डर आतिशेगुल से है, साभार, कथादेश, फ़रवरी, 2003 पृ. 33
3 अजय वर्मा, मुक्ति का अस्मितावादी विमर्श और स्त्री, साभार जनमत, मई 2002 पृ. 20
4 पुरूषोत्तम अग्रवाल, तीसरा रूख, पृ. 21
5 पुरूषोत्तम अग्रवाल, मुझको डर आतिशेगुल से है, पृ. 34
6 चित्रामुद्गल, साहित्य में स्वचेतना और स्त्री, साभार, आजकल, मई 2001, पृ. 9
7 रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, पृ. 134
8 वही पृ. 275
9 अनुराधा, हिंदी साहित्य के इतिहास लेखन पर एक स्त्री के नोट्स, साभार, जनमत मई 2006, पृ. 61
10 वही, पृ. 63
11 अमर उजाला, 12 दिसंबर 1999
12 रोहिणी अग्रवाल, आकाश चाहने वाली लड़की के सवाल, साबार हंस, मार्च 2001. पृ. 171
13 अजय वर्मा, मुक्ति का अस्मितावादी विमर्श और स्त्री, साभार, जनमत, मई 2002 पृ. 22
14 वही, 23
15 पुरूषोत्तम अग्रवाल, जात ही पूछो साधु की. अस्मितावादी अतिचार के सामने कबीर की कविता, साभार, बहुवचन 6, पृ. 311& 12
16 वही, पृ. 317
17 पुरूषोत्तम अग्रवाल, कबीर से मेरा नाता, साभार, आलोचना, अप्रैल जून, 2000. पृ. 289
18 वही, पृ. 317
19 ब्रजकुमार पांडेय, दलित विमर्श का इतिहास चक्र, साभार आलोचना अप्रैल जून 2005. पृ. 71
20 पुरूषोत्तम अग्रवाल, मुझको डर आतिशेगुल से है, साभार कथादेश, फ़रवरी 2003, पृ. 34
21 पुरूषोत्तम अग्रवाल, जात ही पूछो साधु की. अस्मितावादी अतिचार के सामने कबीर की कविता, साभार, बहुवचन 6, पृ. 319
22 रमणिका गुप्ता, (सं) दलित चेतना साहित्य, पृ. 4, 5
23 नेमिचंद जैन, (सं) मुक्तिबोध रचनावली, खंड 5, पृ. 241
24 वही, पृ. 97
25. पुरूषोत्तम अग्रवाल, मुझको डर आतिशेगुल से है, कथादेश, फ़रवरी 2003, पृ. 36.

© 2009 Dhirendra Bahadur Singh; Licensee Argalaa Magazine.

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