अर्गला

इक्कीसवीं सदी की जनसंवेदना एवं हिन्दी साहित्य की पत्रिका

Language: English | हिन्दी | contact | site info | email

Search:

हस्तक्षेप

गंगा प्रसाद विमल

मानव अस्तित्व और हिमालय

हिमालय भारत अर्थात हिंदोस्तान के भौतिक और मनोलोकीय अस्तित्व की एक अटूट कड़ी है. भारत के अस्तित्व में इतिहास और मिथकीय लीलाओं के अपूर्व संचरण इस तरह प्रवाहित हैं कि वे काल की परिसीमाओं का अक्सर संस्क्रमण कर जाते हैं. वे एक साथ प्रागैतिहासिक अतीत भी हैं तथा सांस्कृतिक प्रतीतियों के रूप में अद्यतन से लगने वाले व्यावहारिक उपकरण भी हैं जिनका उपयोग अनेक रूपों में सभी भारतीय करते हैं. संसार का यह सबसे नया पर्वत मण्डल अपने ढंग का एक अलग ही किस्म का पहाड़ है. इससे भारतीय के जुड़ाव की दास्तान काफ़ी जटिल है. इसीलिये एक ज़र्मन विद्वान ने भारत और भारतीयों के संदर्भ में इसे पर्वताकार प्रारब्ध कहा है.

संसार की दूसरी पर्वतमालाओं के निवासियों को वहाँ के वे पर्वत अच्छे लगते हैं पर्वतवासियों के अधिवास के कारण केवल पर्वतवासियों के दिलों में ही वे पर्वत बसते हैं किंतु हिमालय केवल हिमाद्रि क्षेत्र में रहने वालों के लिये विशेष नहीं है. अपितु वह तमाम भारतीयों के लिये एक अपना निजी अविभाज्य अँग की तरह उनके अस्तित्व का उनकी पहचान का हिस्सा हैं रण्दीज या आल्पस या यूराल सैलानियों को जोहते हैं किंतु भारतीयों का आराध्य वहाँ बसता है इसलिये वह चाहे कभी हिमालय क्षेत्र में न जाएँ सैलानी की तरह जाने का तो अर्थ ही केवल सैर सपाटे जैसी उपभोग की वस्तु जैसा है. वह सैर के लिये वहाँ कदापि नहीं जाता. उसके मनोलोक में बसे श्रद्धा क्षेत्र में जाने की भारतीय मनुष्य की कामना कुछ-कुछ लोकोत्तर से जुड़ी है. यह जुड़ाव तर्क और बौद्धिकता से बाहर है. इस जुड़ाव को बोध के स्तर पर अन्तस्थ करने का एक ही आधार है और वह है-हिमालय की दिव्यता. ऐसा नहीं कि दिव्यता से अन्य क्षेत्रों के पर्वत शिखरों को मंडित न किया गया हो. ज़ापान का माउंट फ़्युजियामा से लेकर विश्व के अन्य अनेक क्षेत्रों के शिखरों को किसी न किसी रूप में इस पक्ष से याद किया जाता है. तथापि संपूर्ण हिमालय जैसी अन्य क्षेत्रों की नहीं.

भारत के उत्तरी सीमांतों में पूर्व से पश्चिम तक फ़ैला हुआ यह पर्वत ऐतिहासिक कालखंडों से नैसर्गिक सीमांत की तरह विद्यमान है. कैनेथ मैसन ने इसीलिये इसे पृथ्वी का महान भौतिक प्रारूप माना है. महान कवि कालिदास ने इसे पृथ्वी का मेरुदंड कहा है. इतना तो वैज्ञानिक अध्ययनों से स्पष्ट हुआ है कि मध्य एशिया, दक्षिण एशिया और दक्षिण पूर्व एशिया की जलवायु का हिमालय से गहरा संबंध है. स्थूल रूप से मानना चाहिये कि एक बड़े भू-भाग का अस्तित्व हिमालय से जुड़ा है. इसीलिये पर्यावरण वादी बार बार चिंता व्यक्त करते हैं कि हिमालय के साथ ज़्यादा छेड़छाड़ न की जाय नये अध्ययन संभवत इसे महान कालिदास के काव्यकथन के समीप मानें कि इसका संबंध पृथ्वी की सजगता से है. अभी तक उपलब्ध अध्ययनों ने यह तो स्पष्ट किया है कि हिमालय की भूगर्भ तलीय स्थिति में महाद्वीपों की तलीय टकराहटों का ज़ोरदार हाथ है. भूगर्भीय हलचलों ने न केवल भूकंपन की ख़तरनाक तस्वीर सामने रखी है. अपितु सागरों की जलीय हलचलों पृथ्वी के अनेक तटबंधों पर सुनामी के भीषण ख़तरों को रेखाँकित किया है. जो भी हो हिमालय से एशिया के भूगर्भीय हलचलों का गहरा संबंध है और पृथ्वी में जल हलचलों वैज्ञानिक भी कभी लघुक्षेत्रीय समस्या के रूप में संबोधित नहीं करते.

इसका अर्थ स्पष्ट है कि जलवायु संबंधी वैश्विक प्रकरण कहीं न कहीं पर्यावरण असंतुलन से प्रभावित है. तथा मानव निर्मित हस्तक्षेप का बहुत बड़ा हिस्सा हिमालय से जुड़ा हुआ है. क्वाइट इरोज़न के लेखन से हिमालय क्षेत्र में नेपाल द्वारा अवैज्ञानिक ढँग से प्रकृति के साथ छेड़छाड़ को पर्याप्त गंभीर मामला सिद्ध किया गया है. अत: हिमालय से जुड़ी राष्ट्रीय इकाईयाँ अफ़गानिस्तान, पाकिस्तान, चीन, नेपाल, भूटान तथा म्यामा भारत सहित क्या कुछ कर रही हैं इसके सम्मिलित अध्ययन स्पष्ट करेंगे कि हिमालय को कैसी क्षति पहुँचायी जा रही है. केवल एक ही हस्त्रन्त पर्याप्त होगा कि हिमालय क्षेत्र की सभी नदियों में पिछले कुछ दशकों से विनाशकारी बाढ़ें आ रही हैं यह आकस्मिक नहीं है. बल्कि इसका कारण हिमालय के हिमनदों का सिकुड़न तथा वर्षाजल संग्राहक प्राकृतिक स्रोतों का अत्यधिक वन कटान से खल्वार होकर मिट्टी धँसान की गतिविधियों में बढ़ोत्तरी होना. वैज्ञानिकों के ही अध्ययन बताते हैं कि हिमालय को एक इंच मिट्टी परत नैसर्गिक रूप से लगभग नौ सौ वर्षों में निर्मित होती है. किंतु एक ही वर्षा कितने फ़ीट मिट्टी परतों को बहा कर समुद्र की ओर ले जाती है. इसका आँकलन असंभव सा काम है. भारतीय उपमहाद्वीप में मौसम को प्रभावित करने वाली हिमालयी श्रंखलाएँ सर्दियों में पश्चिम से पूर्व की ओर आने वाले बादलों तथा गर्मियों में पूर्व से पश्चिम की ओर बढ़ने वाले मानसूनी बादलों से सतत वर्षा जल प्राप्त करती हैं और इस क्रम में अतिवृष्टि, हिमपात, तथा हिमधँसान की गतिविधियाँ निरन्तर ढलानों की वनस्पति संपदा को प्राकृतिक रूप से नष्ट करती रहती. हिमालय से जुड़े राष्ट्रों को उनके हिस्से का दुख तो मिलता ही रहता है. किन्तु कभी किसी स्तर पर ऐसी पहल नहीं हुई कि हिमालय के सीमांतों से जुड़े राष्ट्र किसी एक नीति पर सहमत हों. नेपाल, पाकिस्तान, बांग्लादेश और भारत नदियों के जल के उपयोग की एक नीति पर अभी तक सहमति नहीं बना पाये हैं जल और वन दोहन के कार्यों को क्षेत्रीय नहीं माना जाना चाहिये क्योंकि किसी एक जगह निर्मित बाँध का असर दूसरी जगह अवश्यंभावी होता है. ठीक इसी तरह किसी एक ढलान के वन दोहन का प्रभाव दूसरी तरफ़ की ढलानों पर भी पड़ता है.

हालाँकि एक ही पर्वतमाला की दो ढलानों का मौसम एक दूसरे से एकदम विपरीत भी हो सकता है. तथापि इस वैपरीत्य को प्रकृति के संतुलन के विज्ञान से ही समझा जा सकता है. किंतु हिमालय के दोहन के विभिन्न पहलुओं की क्षेत्रीय नज़र से देखना ख़तरनाक हो सकता है. यदि मद्द्य हिमालय में किसी भी दिशा और क्षेत्र में अंधाधुंध कटायी होती है. तो इसका सीधा प्रभाव हिमनदों पर पड़ता है. ढलानों और घाटियों की गर्मी से न सिर्फ़ अतिवृष्टि का ख़तरा बढ़ सकता है. बल्कि वह हिमनदों को भी प्रभावित करता है और हिमनदों के धीरे-धीरे क्षीण होने से जलागम क्षेत्रों में पानी की कमी होने लगती है. फ़लत: नदियों में पानी कम हो जाता है. प्रकृति प्रदत्त असंख्य झरने न सिर्फ़ सूख जाते हैं अपितु अपनी उर्वर भूमि को धीरे धीरे रेतीले ठंडे रेगिस्तान में तब्दील कर लेती है. हिमालय के कई क्षेत्र ख़ासकर लेह लद्दाख आदि विशाल रेगिस्तानों के रूप में पसरे पड़े हैं.

तीन हज़ार से कुछ ज़्यादा लंबी हिमालयी पर्वतमाला भारत के पूर्व से महादेश भारत के उत्तर पश्चिम की तरफ़ इस आकृति में फ़ैली हुई है. मानों वह संपूर्ण पृथ्वी के उत्तर दक्षिण तथा पूर्व पश्चिम की ओर के क्षेत्रों की निगरानी कर रही हो. ध्रुवीय कोनों से चाहे हिमालय लक्षित न होता हो तथापि पृथ्वी के पूर्वार्ध में वह निश्चित ही कोई वैज्ञानिक उपस्थिति है. सदियों के वैज्ञानिक अध्ययन धीरे धीरे उस उपस्थिति के महत्व को अनावृत्त कर ही रहे हैं क्योंकि अब मौसम विज्ञानियों के निष्कर्ष बिना हिमालय के उल्लेख के अपूर्व ही जान पड़ते. दो सौ किलोमीटर से अधिक चौड़ाई वाले इस पर्वताकार के भीतर कितनी ही घाटियाँ, कितने ही दर्रे, कितनी ही ढलानें तथा असंख्य वनस्पतियाँ, विभिन्न जीव-जंतु तथा अनाम किस्म के फूल और विस्मय में डालने वाली साँस्कृतिक चर्यायें हैं.

पामीर के दक्षिण पूर्व से आरंभ होने वाली इस पर्वतमाला में विश्व की अनेक ऊँची चोटियाँ हैं, जिनमें से अभी कुछ एक पर मनुष्य की विजयपताका नहीं फ़हरायी है. हिंदुकुश, काराकोरम, कश्मीर, नागापर्वत, हिमाल, पीरपंजाल, जानकर पर्वतमाला, गणेश हिमाल, धौलागिरि श्रंखला, लाँगटाँग हिमाल, खुम्बू हिमाल, कैलाश हिमाल, नेपाल, सिक्किम, भूटान, हिमालय में नागा पर्वत, नन्दा देवी, त्रिशूल, चौखंभा, माश्पुच्छ, बंदरपुच्छ, गौरीशंकर, कैलाश चोटियाँ, कंचनजंघा जैसी अदभुत चोटियाँ हैं जो बराबर पर्वतारोहियों को आकर्षित करती. चित्राल, हुंजा, कोहिस्तान, गिल्गिट, काफ़िरस्तान, क़ाबुल, नैटवाड़, कोहात, हाजरा, हेमण्ड घाटी, लद्दाख, चेतन, जम्मू, कुल्लू, सुकेत, मुंश्यारी से लेकर पूर्वीय हिमालय के असंख्य क्षेत्र हैं. जहाँ अनेक मतावलंबी हिमालयवासी रहते हैं उन्हें सिंधु, झेलम, चिनाब, रावी, व्यास, सतलज, गंगा, यमुना, घाघरा, गण्डक, काली नदी, कोसी, ब्रह्मपुत्र, दिवाँग, लोहित, तीसता, पाँसा, खेमंग, सुवन्स्री, पटकोई, सुरमा, तथा पफ़ा जैसी नदियाँ सींचती. मानसरोवर, सप्त ताल, राक्षा स्थल जैसे असंख्य ताल इस भू भाग में हैं. यदि हम मध्य हिमालय की ही फूलों की घाटियों का उल्लेख करें तो सौ से ज़्यादा फूलों की घाटियाँ अकेले उत्तराखण्ड के तीन जनपदों में हैं. विश्व के आश्चर्य के रूप में स्थिति इन फूलों की घाटियों की वनौषधियों के बारे में वैज्ञानिक सजग हैं और तरह तरह के अनुसंधान कार्य चल रहे हैं. विश्व वैज्ञानिक संभवत निकट भविष्य में दुर्लभ किस्म की वनौषधियों से मनुष्य के निरोग रहने की आधारशिला स्पष्ट करने वाले हैं.

हिमालय क्षेत्र के खनिजों का अभी मानवोपयोगी दोहन नहीं हुआ है. तथापि यह क्षेत्र खनिजों का अदभुत खज़ाना भी है. अभी तक उपलब्ध सर्वेक्षण हिमालय क्षेत्र में तेल और गैस भंडार के रूप में नयी सूचनायें मिल रही हैं और असम के पूर्वी क्षेत्र में कच्चे तेल कि उपलब्धता की आँकड़े स्पष्ट हैं पश्चिमी और पूर्वी हिमालय में जहाँ कुछ एक समानतायें हैं वहाँ उनकी अपनी अलग-अलग विशेषताओं के कारण वे एक-दूसरे से बिलकुल प्रथक भी. एक आँकलन के मुताबिक हिमालय क्षेत्र के पक्षियों की ही अकेले दो हज़ार एक सौ प्रजातियाँ हैं और ये प्रजातियाँ विभिन्न हिमालयी क्षेत्र में अपने धंग से ऊँचे स्थानों या घाटियों में जीवन-यापन करती हैं. पूर्वी और पश्चिमी हिमालय की यह संपदा जीवन सृष्टि के अदभुत संतुलन का ही करिश्मा है. तीन हज़ार किलोमीटर की दूरी के लिये कोई एक गलियारा विकसित नहीं किया गया. फ़लत: हिमालयवासियों को मैदानी क्षेत्रों की दूर दूर की यात्रायें कर फ़िर अपने सजातीयों से संपर्क स्थापित करना पड़ता है.

हिमालय क्षेत्र में बौद्ध, हिंदू इस्लाम धर्मावलंबियों के साथ साथ जैन, ईसाई, सिक्ख, मताधारों के केंद्र भी हैं. हिंदुओं के पवित्र तीर्थों के अनेक विश्वविख्यात केंद्र तो आध्यात्मिक तीर्थाटन के नये पर्यटन केंद्रों के रूप में करोड़ों तीर्थयात्रियों को प्रतिवर्ष आकर्षित करते हैं. शिव, शाक्त, वैष्ण्वधर्मियों के लिये इन स्थलों की यात्रा की असंख्य गाथायें हिमालय क्षेत्र के लोक साहित्य में संचरित हैं. कैलाश मानसरोवर जहाँ हिंदुओं के लिये उच्चतम तीर्थ है. वहीं बौद्धों और जैनियों के लिये भी वे निर्विकल्प केंद्र हैं. भारत, नेपाल, तिब्बत से असंख्य तीर्थयात्री इस दुर्गम तीर्थस्थली की यात्रा एकदम प्रतिरोधी वातावरण में करते हैं. हिमालय क्षेत्र सांस्कृतिक रूप से अत्यंत जागृत स्थान है. भारतीय ज्ञानधारा की अनेक शाखाओं के महत्तम ग्रंथों का प्रणयन यहीं हुआ है. तपस्वीजनों तथा विद्वानों की अनेक गूढ़ ज्ञानधारओं का साहित्य यहीं रचा गया है. भारतीय साहित्य के साथ साथ तिब्ब्तीय, मंगोलियाई, बर्मी भाषाओं की अनेक लोक छवियों की उपलब्धता यहाँ के उन्नत लोक साहित्य में मिलती है. हिमालयवासी मूल रूप से सुसंस्कारित जातियों के समूह के रूप में विकसित हुये. इसी कारण वहाँ का साहित्य, वहाँ की कलायें और उपयोगी कलायें अत्यंत उन्नत किस्म की हैं बेशक उन्हें पश्चिमी यंत्रों का स्पर्श न मिला हो. वे मानव निर्मित अदभुत, विस्मयकारी उत्पाद्य के रूप में उपलब्ध हैं वे चाहे ऊनी वस्त्र हों या ऊनीकालीन या विरल किस्म के ऊन के अन्य उत्पाद. कास्ठ कलाओं से लेकर भवन निर्माण की हिमालय क्षेत्रीय अनुकूलता के असंख्य प्रारूप आज भी हिमालय में देखे जा सकते हैं. लोकगीतों, लोकसंगीतों के साथ-साथ लोकवाद्यों का भी विचित्र संग्राहक हिमालय क्षेत्र को कहा जा सकता है.

विशाल हिमालय की जीवनचर्या में जो माधुर्य है. उसे उदार किस्म की शैली के रूप में भी नाम दिया जा सकता है. हिमालय क्योंकि अपनी भिन्नता को अपने में ही रोपे हुये है. अत: यह कहना ज़्यादा संगत है कि भारत महादेश की मूल सांस्कृतिक बुनावट का निर्माता हिमालय ही है.

हिमालय के अस्तित्व के ख़तरों की ओर नज़र अवश्य डालनी चाहिये. चीनी भारतीय राजनैतिक हलचलों ने हिमालय क्षेत्र में दखलंदाज़ी की है. उससे मानव निर्मित ख़तरे ज़्यादा बढ़ जाते हैं. अक्सायी चिन, जो भारत का हिस्सा रहा, चीन के बलात अधिग्रहण के कारण मानव निर्मित अनिवार्यताओं के कारण पूरे हिमालय क्षेत्र और पूरे एशिया के लिये ख़तरा है. सैन्य नीति के चलते चीन ने जो विशाल सड़कें वहाँ बनायी हैं उससे भूस्खलन की क्या स्थिति वहाँ है. इसका सूचनाओं के अभाव में केवल अनुमान ही लगाया जा सकता है. किंतु अमेरिकी जासूसी उपग्रहों ने जो चित्र भेजे हैं उनसे लगता है कि वहाँ संतुलित ढंग का निर्माण नहीं हुआ है. एशिया के अस्तित्व के लिये विश्वजनमत को चीन पर अवश्य दबाव डालना चाहिये. कि वह सही सूचनाएँ पड़ोसी देश को देता रहे. यही नहीं चीन ने हिमाचल की ओर बहने वाली नदियों पर जो बाँध बनाये हैं वे भी विश्व बिरादरी की जाँच के घेरे में आने चाहिये. यही स्थिति भारत के साथ प्रतिहिंसा की राजनीति खेलने वाले पाकिस्तान की है.

मानव-निर्मित ख़तरों में सड़कें, बाँध और अंधाधुंध वनकटायी की वारदातें तो हैं, किये जा चुके दोषयुक्त विकास कार्यों की समीक्षा भी अनिवार्य है. जिससे समय रहते दोषों का निवारण किया जा सके. हिमालय क्षेत्र में नैसर्गिक आपदाओं की एक लंबी सूची है. वहाँ सबसे बड़ा ख़तरा भूकंपीय संवेदनशीलता के कारण आसन्न है. इससे बचने के कारगर उपायों के लिये संबंधित राष्ट्रों को आपदा विरोधी सामुदायिकता स्वीकार करनी ही चाहिये. अतिवृष्टि, अतिहिमपात, हिमस्खलन भी नैसर्गिक विपत्तियों की सूची में हैं उनसे बचाव के वैज्ञानिक आधार पूरी मनुष्य जाति को अन्वेषित करने चाहिये. खासतौर पर हिमालय क्षेत्र में बनने वाली सड़कों के लिये अन्तर्राष्ट्रीय किस्म के मानदण्ड निर्धारित हों जितना भी क्षेत्र उपयोग में लाया जा रहा है उसी के अनुपात में दूसरे क्षेत्र में हिमालयी पौधारोपण कार्य अनिवार्य माना जाना चाहिये. इससे वह संतुलन बना रहेगा. जो प्राकृतिक आपदाओं से बचाता है. भूस्खलन न हो इस हेतु सड़कों के ऊपर नीचे वैज्ञानिक किस्म की स्खलन विरोधी नीति अपनानी अनिवार्य मानी जाये. यह तो केवल उदाहरण है. यदि हिमालय क्षेत्र के बुद्धिजीवी और विश्वविद्यालय अपने शोध कार्यों में इस दिशा में कार्यरत हों तो उससे एक सामुदायिक नीति का गठन संभव है. बाँधों के निर्माण की योजनाओं को भूकंप संवेदनशीलता के परिप्रेक्ष्य में देखना इसलिये अनिवार्य है कि कहीं विकास के इस आयोजन का परिणाम विनाश में न घटित हो जाये. छोटे छोटे राज्यों में विकास की योजनाओं को लेकर जो हड़बड़ी है. वह अत्यंत घातक मानसिकता है. इसीलिये अभी समय रहते राष्ट्रीय अन्तर्राष्ट्रीय दबावों का एक ऐसा क्रम अवश्य स्वीकार हो जो विकास की संभावनाओं को खारिज कर सके.

हिमालय क्षेत्र पर्यटन की संभावनाओं का क्षेत्र है. भारतीय पर्यटक आध्यात्मिक पर्यटन के कारण भी उससे गहरे रूप में जुड़ा हुआ है. पर्यटन की दृष्टि से, पर्यावरण संतुलन बनाये रखते हुये, हिमालय क्षेत्र के विकास की अकूत संभावनायें हैं. मैदानी इलाक़ों के प्रदूषण से बचने का एकमात्र उपाय पर्वतीय क्षेत्रों में क्षेत्रानुरूप सुविधाओं की बढ़ोत्तरी है. इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिये हर दृष्टि से प्रयास वांछनीय है.

मोटे तौर पर हिमालय की यात्राओं के अतीत का यदि हम विवेचन करें तो दुर्गम क्षेत्रों की यात्राओं के लिये तत्कालीन मनुष्य ने सानुकूल व्यवस्थायें की थीं. ख़ोजी तथा वैज्ञानिक अनुसंधान को लक्ष्य बनाकर की गयी यात्राओं में युंगहस्बेंड आदि के विवरणों के साक्ष्य यह साबित करते हैं कि हिमालय क्षेत्र अतीत से ही वैज्ञानिकों और खोजियों को आकर्षित करता रहा है. हिमालय के दर्रों और गलियारों से आक्रांताओं की भी आवाज़ाही रही है. किंतु अजेय हिमालय थोड़े अर्से के लिये तो अनुकूल रहा होगा. अपने असहयनीय मौसमों में मनुष्य कभी उसका सामना नहीं कर पाया है. आज आवागमन की सुविधाओं ने यद्यपि हिमालय की यात्राएँ आसान की हैं, पथ की दुर्गमताओं पर मनुष्य और यंत्र ने विजय प्राप्त की है. किंतु अपराजेय हिमालय अपने रहस्यात्मक वैविध्य के साथ आज भी आधुनिक मनुष्य के लिये चुनौती बना हुआ है.

आरंभ में हमने हिमालय और हिंदोस्तान की चर्चा की थी. चीन के साथ सीमा विवाद ने चीनी पक्ष की एकतरफ़ा निर्णयवादिता ने कई नये प्रश्न सामने रखे. चीन का हिमालय से रिश्ता तिब्बत के कारण है. वर्तमान चीनी नक्शे में पूर्वकाल की सोवियत भूमि से उसके विवादों ने भी एक करवट ली है कि चीन ने सोवियत भूमि से अपने सीमा विवादों में संतुलन से काम लिया है. किंतु भारत के संदर्भ में चीनी पक्ष विस्तारवाद से जुड़ा हुआ है. अत: यह प्रस्तावित करना ज़्यादा तर्कयुक्त है कि चीन के सुझावों में से चीनी निहित स्वार्थों को अलग किया जाये. इतिहास और मिथक के प्रमाणों को आज चीन ब्रिटिश दृष्टि कहकर खारिज करता है. किंतु भारतीय नदियाँ हिमालय से भारत महादेश में ही अपनी लीला फ़ैलाती हैं, उनमें से कोई भी ब्रह्मपुत्र की तरह तिब्बती क्षेत्र से तिब्बत में प्रवेश नहीं करती.

स्पष्ट है कि नदियों की बुनावट भी भारतीय पक्ष को सुदृढ़ करती है. ठीक वैसी ही जैसे चीन की ऐतिहासिक दीवार चीनी राष्ट्र की प्रामाणिक सीमा है. उसे लेकर विवाद भी नहीं किया जाता. अत: सीमा-विवाद को सुलझाने के लिये चीन को हिमालय की ढलानें, नदी संरचनाओं तथा मानसून की गतिविधियों से प्रभावित क्षेत्रों की विशेषताओं को भी अपने विवेचन की आधारशिलायें मानना होगा. असल में तिब्बत के कारण चीन का हिमालय संबंधी लगाव सामने आता है. यही नहीं 1930 में प्रस्तावित माओ विचारणा के मुताबिक हथेली कभी भी अँगुलियों के बिना पूरी नहीं होती. चीनी विशेषज्ञ इसी आधार पर भारतीय क्षेत्र और भारत उपमहाद्वीप के कुछ इलाक़ों को चीन के क्षेत्र मानने के प्रचार में लगे रहते हैं. अत: इस एक आधार को स्वीकार करना होगा, कि ऐतिहासिक आधारों पर हिमालय का भारत से कितना अंतरंग रिश्ता है. तथा सीमांतों के निर्धारण में प्रकृति प्रदत्त आधारों की अवहेलना करना सत्य को पीठ दिखाने जैसी वृत्ति स्वीकार की जाये. संभवत: तब नये ढंग से सीमांतों के प्रति स्वीकार्यता का फ़ॉर्मूला उभय पक्षों को स्वीकार करेगा.

हिमालय क्षेत्र विश्व की अदभुत क्षेत्रीय उपस्थिति है. मानव निर्मित पर्वत दोहन की पूर्ण समीक्षा ही यह आश्वस्ति दे सकती है, कि पर्वतों में निर्माण कार्यों सड़कों, घर, बाँध, उद्योग, लघु उद्योग, पर्यटन केंद्र के विकास की कौन सी नीतियाँ लागू हो सकती हैं. भूस्खलन, भूकंप, और वनाग्नि के ख़तरों से निपटने तथा शीतकालीन क्रीड़ाओं, पर्यटन संबंधी अन्य लाभकारी गतिविधियों को भी सामुदायिक नीतियों के अंतर्गत आँकना होगा. असल में सम्पूर्ण हिमालय क्षेत्र के संदर्भ में ही भावी योजनाओं तथा विकास कार्यों तथा प्रकृति संबंधी मनुष्यता के लाभकारी अभियानों से उभयपक्ष अर्थात हिमालयवासियों और शेष संसार के हितों को लेकर आगे बढ़ा जा सकता है. कारण केवल यह है कि हिमालय क्षेत्र मनुष्यजाति के उत्कर्ष की बहुआयामी संभावनाओं का क्षेत्र है.

© 2009 Ganga Prasad Vimal; Licensee Argalaa Magazine.

This is an Open Access article distributed under the terms of the Creative Commons Attribution License, which permits unrestricted use, distribution, and reproduction in any medium, provided the original work is properly cited.