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विरासत

ओम प्रकाश सिंह

आचार्य रामचंद्र शुक्ल का अप्राप्य साहित्य

आचार्य रामचंद्र शुक्ल हिन्दी के पहले और आख़िरी व्यवस्थित साहित्य चिंतक हैं. पहले इसलिए कि उन्होंने हिन्दी में जिस साहित्यशास्त्र की अवतारणा की वह संस्कृत परंपरा से पोषित होते हुए भी उससे भिन्न था. रस सिद्धांत को एक नया जामा पहनाकर शुक्ल जी ने पहली बार हिन्दी में प्रस्तुत किया. ' लोक ' शब्द के महत्व को हिन्दी साहित्यशास्त्र में जिस ऊँचाई पर शुक्ल जी ने स्थापित किया वह आज भी वहीं कायम है. इसी तरह पाश्चात्य काव्य विचारकों के बारे में या सिद्धान्तों के बारे में अ. शुक्ल ने जिस धारणा का विकास किया वह आज भी उसी रूप में विद्यमान है. क्रोचे के अभिव्यन्जनावाद के संदर्भ में मेरे उक्त कथन को जाँचा परखा जा सकता है. अ. शुक्ल को मैंने आख़िरी व्यवस्थित साहित्य चिंतक इसलिए कहा है कि हिन्दी में सैद्धान्तिक समीक्षा का जो ढाँचा उन्होंने खड़ा किया आज भी वह अपनी जगह पर कायम है. बातें चाहे जितनी हुई हों पर सैद्धान्तिक समीक्षा उसी जगह पर है जहाँ शुक्ल जी ने छोड़ा था. अ. शुक्ल के बाद समीक्षा के सैद्धान्तिक पक्ष पर बहुत कम बातें हुई हैं. अगर हुई भी हैं तो छिटपुट और उनसे किसी दृष्टि का बोध नहीं होता. साहित्य समीक्षा के क्षेत्र में भाषण चाहे जितने दिए जाएँ, लेख चाहे जितने लिखे जाएँ पर मुक़म्मल किताब ग़ायब है. किसी भी मुक़म्मल पुस्तक का न लिखा जाना मेरे उक्त कथन को सर्वाधिक बल देने वाला तथ्य है.

अ. शुक्ल ने व्यावहारिक समीक्षा के क्षेत्र में दो तरह से योग दिया है-लम्बी भूमिकाओं के द्वारा और लेखों के द्वारा. मलिक मुहम्मद जायसी, सूरदास और तुलसीदास पुस्तकें लम्बी भूमिकाएँ हैं. साहित्यकारों और उनकी कृतियों पर लिखे हुए उनके कुछ लेख भी इसी श्रेणी में परिगणित किए जाते हैं. यहाँ उन पर चर्चा करना मेरा उद्देश्य नहीं है. कुछ विषयों पर आचार्य शुक्ल जीवन भर चिन्तन मनन और लेखन करते रहे हैं. ऐसा लगता है कि जो बातें वे कहना चाह रहे हों वह पूरी न हो रही हों अथवा उनकी पकड़ से बाहर पड़ती जा रही हो. वे उसे दोबारा पकड़ना चाहते हैं. ' कविता क्या है ' या ' हिन्दी भाषा ' से संबंधित उनके लेखों को इसी श्रेणी में रखा जा सकता है. इसी क्रम में ' भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ' और उनके साहित्य पर कई कई कोणों से शुक्ल जी जीवनपर्यन्त विचार करते रहे और लिखते रहे. भारतेन्दु हरिश्चन्द्र पर उनके कई लेख हैं, यथा-भारतेन्दु हरिश्चन्द्र और हिन्दी, हरिश्चन्द्र समीक्षा, भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, युग प्रवर्तक भारतेन्दु हरिश्चन्द्र आदि. भारतेन्दु हरिश्चन्द्र लम्बा लेख है. यह लेख सन 1928 ई. की नागरी प्रचार्णी पत्रिका में छपा था. युग प्रवर्तक भारतेंदु हरिश्चन्द्र सन 1935 का लेख है और वीणा में प्रकाशित हुआ था. पहले लेख की तुलना में यह काफ़ी छोटा है. शेष दोनों लेख क्रमश: 1910 ई. और 1911 ई. के हैं.

अ. शुक्ल ने ' भारतेन्दु-साहित्य ' शीर्षक से एक पुस्तक संपादित की थी. यह पुस्तक 1928 ई. में हिन्दी पुस्तक भण्डार, लहेरिया सराय (बिहार) से प्रकाशित हुई थी. अ. शुक्ल ने इस पुस्तक के माध्यम से भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के लेखन की एक बानगी प्रस्तुत करने की कोशिश की है. इसमें उनके गद्य लेखन के विविध रूपों ओ संकलित संपादित करने की कोशिश की गई है. संकलित और संपादित सामग्री का जो महत्व है वह तो है ही, इस पुस्तक का सर्वाधिक महत्वपूर्ण अंश है-' भारतेन्दु हरिश्चन्द्र-परिचय ' शीर्षक से लिखी गई इसकी 16 पृष्ठों की भूमिका. एक तरह से कहें तो यह भारतेंदु पर लिखा गया शुक्ल जी का सबसे लम्बा लेख है. इस लेख का ऐतिहासिक महत्व है. आज भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के व्यक्तित्व, उनकी भाषा नीति, साहित्य आदि पर तरह के प्रश्न उठाये जा रहे हैं, आप देखेंगे कि इस लेख में ऐसे प्रश्नों के उत्तर निहित हैं. यह लेख साफ़ संकेत देता है कि भारतेन्दु साहित्य का अध्ययन हम किस कोण से करें. वैसे साहित्य में मनमानी चाल की परंपरा नयी नहीं है.

' भारतेन्दु साहित्य ' पुस्तक अप्राप्य है. अ. शुक्ल की ग्रंथावली पर काम करते हुए काफ़ी खोजबीन के बावज़ूद यह पुस्तक हाथ न लगी थी. पिछले दिनों आर्य भाषा पुस्तकालय, नागरी प्रचारणी सभा काशी में यह पुस्तक मिल गई. ग्रंथावली के दूसरे संस्करण में इस लेख को जोड़ दिया जाएगा पर इसकी महत्ता को देखते हुए तब तक इंतज़ार करना मुझे संगत प्रतीत न हुआ. अब ' परिचय ' शीर्षक की भूमिका आपके सामने है. भूमिका के कुछ वाक्य हटा दिए गये हैं. ये दो चार वाक्य ऐसे हैं जिनमें शुक्ल जी ने ' भारतेन्दु साहित्य ' के सँग्रह-संपादन के संदर्भ में कुछ कहा है. बाकी सब कुछ वैसा ही है जैसे शुक्ल जी ने प्रस्तुत किया था-हू-ब-हू.

© 2009 Om Prakash Singh; Licensee Argalaa Magazine.

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