अर्गला

इक्कीसवीं सदी की जनसंवेदना एवं हिन्दी साहित्य की पत्रिका

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शिखर

किशोरी लाल

मेढक स्त्वन

मेढक तुमको शत-शत प्रणाम
हे ज्योतिषी तुम्हारी वाणी निष्फल कभी न जाती है
पावस ऋतु के शुभागमन का आगम हमें बताती है
सत्कवियों के महाकाव्य के क्या तुम रहे उपेक्षित पात्र
नहीं, नहीं तुलसी की प्रतिमा बना गई तुमको शुभ छात्र
ऐसे गुण-सम्पन्न मेक को क्या दे दूँ हे राम
मेढक तुमको शत-शत प्रणाम

त्याग स्वर्ग की विमल विभूती सद्म बनाया नर्दा में
ग्रीष्म समय में तुमको जीवन पड़ा बिताना गर्दा में
तेरी ऐसी उग्र तपस्या पर भी विधि क्यों बाम
मेढक तुमको शत-शत प्रणाम

© 2009 Kishori Lal; Licensee Argalaa Magazine.

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