अर्गला

इक्कीसवीं सदी की जनसंवेदना एवं हिन्दी साहित्य की पत्रिका

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शिखर

नीलाभ अश्क

भगतसिंह

एक आदमी
अपने अंशों के योग से
बड़ा होता है

ठहरिए!
इसे मुझको
ठीक से कहने दीजिए

एक जिन्दा आदमी
बड़ा होता है
अपने अंशों के योग से

वरना अपने बाकी तो
उससे कम ही
ठहरते आये हैं

नालन्दा........

एक हजार साल पहले उजाड़े गये
ज्ञान के केन्द्र को
फिर से बनाया जा रहा है
फिर से खड़ा किया जा रहा है वह गौरव
जो नष्ट हो गया था सदियों पहले
यह जीर्णोद्वार का युग है
नये निर्माण का नहीं

कैसा था वह ज्ञान
जिसे बचाने के लिए कोई सामने नहीं आया?
कोई सत्यान्वेषी नहीं? सत्य साधक नहीं?
इस निपट निचाट उज़ाड़ में
सिर्फ खण्डहर है
ग्रीष्म की हू-हू करती लू में
या शिशिर की हाड़ कँपाती धुंध में
या फिर एक बस्ती
कनिंघम से पुरानी, कुमारगुप्त,
अशोक, पुष्यमित्र, शुंग और बुद्ध से भी पुरानी
अपने रोजमर्रा के संघर्ष जितने ज्ञान से
काम चलाती हुई

यहाँ बुद्ध ने भोजन किया
यहाँ तथागत ने शयन किया
शास्ता ने यहाँ दिए उपदेश
जो किसी को याद नहीं
ताक में रखे सुत्त पिटक और मज्झिम निकाय को
ढँक लिया है धूल की परत ने

उधर बुहारे जा रहे हैं खँडहर,
आतशी शीशे और खुर्दबीन से हो कर
आँखें ढूँढती हैं निशान खोये हुए गौरव के
पास की झुग्गियों में रहने वाले कृष्णकाय किसान
ढूँढते हैं किसी तरह शरीर में प्राणों के
जोड़े रखने के साधन
इस जुगत मे कोई काम नहीं आता
नष्ट हुआ ज्ञान, चूर-चूर हुआ गौरव

मेला

(ऋतुराज के लिए)

अर्सा पहले एक मित्र ने
दूसरे मित्र की कविता के बारे में बताया था
बताया था
कविता में एक पिता,
पिता के कन्धे पर बैठा एक बच्चा,
दोनों मेले में थे कि पिता को
दिख गयी थी एक धानी ओढ़नी
जिसका पीछा करते-करते,
जिससे बात करते-करते,
जिसके लिए व्याकुल होते-होते
पिता ने बिता दिया था सारा दिन
बीच में बच्चे को दे दिया था
किसी दूसरी की गोद में भी

बच्चा अभी छोटा था
नहीं समझ पाया था यह अबूझ व्यापार

हमनें देर तक उन बाप-बेटे की चचा की थी
और उनकी गाथा हम तक पहुँचाने वाले
मित्र की भी
तीनों अनुपस्थित थे हमारे बीच

बाद में उन्हें ढूँढ़ने निकला मैं
छाने बहुत-से मेले,
बहुत-सी धानी ओढ़नियाँ तलाशीं
पर वह ख़ालिस धानी ओढ़नी नहीं मिली

बीच में मित्र से जरूर भेंट हुई
उन्हें याद थे पिता-पुत्र
याद था मेला
लेकिन उस कविता का अता-पता छिपा गये वे
मानो उन्हीं के साथ घटा हो वह अबूझ व्यापार

इसी तरह छिपा लेते हैं हम अपनी गोपन व्यथाएँ
व्यस्त कर लेने के बाद भी

वर्षों बाद आज अचानक
मित्र की एक किताब में दबे हुए
मिल गए वे बाप-बेटे
और वह मेला सजा हुआ
और वह धानी ओढ़नी
और वह दूसरी औरत बच्चे को गोद में उठाये

आश्चर्य! कैसे दुबका रहा यह सब
दो पन्नों के बीच

सारा दिन मैं भी पीछा करता रहा बाप-बेटे का
उस लहराती हुई धानी ओढ़नी के पीछे

बच्चे के लिए मेला तबाह हो गया था
मेरे लिए तो एक ओझल हो चुका मित्र
मानो अप्रत्यासित टकरा गया था
मेले में

दीदा दिलेरी........

ऐसे ही बेमन से पढ़ रहा था
कोई लेखनुमा चीज
अचानक आँख जा अटकी
एक शब्द पर
मानो मछली पकड़ने के लिए डाली गयी
कटिया में फँस जाये
अर्सा पहले नदी में गिरी हुई अँगूठी
या उड़ाह में निकला कंगन या बिछुआ

दीदा दिलेरी........

कई बार दोहराया मैंने उसे
हर बार नये सिरे से स्वाद लेते हुए उसका
मन-ही-मन उसके अभिप्राय और
गन्तव्य की दिशाओं का आभास लगाते हुए
लाजवाब शब्द है अपनी ठेठ हिन्दी का
पर कितना कम सुनाई देने लगा है अब
जब से बढ़ते चले गये हैं उसके अक्स
हमारे समाज में

जाने कितने ही ऐसे शब्द
आहिस्ता से सरकते चले गये हैं
हमारी भाषा के अथाह तल में
जिन्हें दोबारा वापस लाने के लिए
जरूरत है माहिर ग़ोताख़ोरों की
ताकि उनकी वाज़िब जगह पर
काबिज न हो जाये
कोई नकली उत्तराधिकारी
और वह भी दीदादिलेरी के साथ

(हंस में लता शर्मा की एक टिप्पणी पढ़ कर)

टेक-1

जीवन जो जिया, अपनी तरह जिया
जिया बहुत बहुत, बहुत बहुत दिया
माँगा बहुत कम

टूटे झुके बिखरे, उतना ही निखरे
बहुत ताप सहा, रहे खरे खरे
क़ायम रहा दम

जितना सुर बाँधा, उतना ही साधा
उड़ान हुई पूरी, सही नहीं बाधा
आया सहज सम

टेक-2

मैं अँधेरे का दस्तावेज हूँ
राख को चिड़िया में बदलने की तासीर हूँ
मीर हूँ अपने उजड़े हुए दयार का
परचम हूँ प्यार का

मैं आकाश के पंख हूँ
अंतरतारकीय प्रकाश हूँ
धरती की कोख तक उतरी जड़ें हूँ
समंदर में पलती हुई आग हूँ
राग हूँ जलते हुए देश का

मैं लड़ाई का अलम हूँ
लड़ने वालों का हमदम हूँ
बड़े बड़ों से बहुत ज़्यादा
छोटे से छोटे से बहुत कम हूँ

© 2009 Neelabh Ashk; Licensee Argalaa Magazine.

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