अर्गला

इक्कीसवीं सदी की जनसंवेदना एवं हिन्दी साहित्य की पत्रिका

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शिखर

नेहा वैद्य

बोलना होगा

औरों की ओर
उद्ग्रीव रहना
जीवन की परिणति नहीं.
तुम्हें भी
घसीट दिया जाएगा
सड़क के किनारे
वृक्षों के सोपान में.
वृक्ष, जो अज्ञात निर्देशक की भाँति
चेताते भर हैं
रहस्यों के प्रति.
तुम्हें बोलना होगा
तोड़ना होगा
वह सुनहरा पात्र
जिसमें मुँदा रहता है सत्य.
तुम्हें देनी होगी
उल्लासमयी आवेग की अभिव्यक्ति
हाँ,
तभी तुम
बेलौस खड़े रह सकते हो
इस धक्कम-धक्के में.

गज़ल

आँख में बेशक नमी पलने लगी
ज़िन्दगी फिर राह पे चलने लगी

छूट गया जो हाथ वो अपना न था
बात इतनी थी मगर खलने लगी

मकड़ियों के जाल सी फैली हुई
श्वाँस अपनी ही मुझे छलने लगी

मैने तब खुद को बनाया चाँदनी
ज़िन्दगी की शाम जब ढलने लगी

दिल के उपर जम रही जो बर्फ थी
प्यार पाया जब तेरा गलने लगी

नींद को मेरी न जाने क्या हुआ
जाके उनकी आँख में पलने लगी

खुद को देखा तो बहुत अच्छा लगा
जब तेरे साँचे में मैं ढलने लगी

मैं बनी दीपक तो हर मुश्किल मेरी
मुझमें आके खुद-ब-खुद जलने लगी.

© 2009 Neha Vaid; Licensee Argalaa Magazine.

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